सोमवार, 26 जनवरी 2026

2020 की एक लघुकथा - कोरोना के डर से दरकता रिश्ता

2020 की एक लघुकथा - 

कोरोना के डर से दरकता रिश्ता 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

मार्च 2020 की वह शाम अभी भी उसकी स्मृतियों में धुँधली-सी नहीं, बल्कि बहुत स्पष्ट है। प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन सुनते ही जैसे पूरे देश की साँसें थम गई थीं। “आज रात बारह बजे से सम्पूर्ण लॉकडाउन…” इतना सुनते ही उसकी आँखों के सामने अंधेरा-सा छा गया। मुंबई की ऊँची इमारतों के बीच काम करता वह एक साधारण मजदूर था, पर उसके सपने असाधारण थे—घर लौटने के, अपनों से मिलने के।


काम बंद हो गया। ठेकेदार ने हाथ खड़े कर दिए। किराये का कमरा, रोज़ का खर्च और जेब में चंद रुपये—इन सबने उसे एक ही राह दिखाई, घर जाना है, चाहे पैदल ही क्यों न जाना पड़े।


उसने सुना बहुत से मजदूर अपने घर जा रहे हैं। अगली सुबह वह सैकड़ों मजदूरों के साथ सड़क पर था। कोई कह रहा था,“भाई, ट्रेनें तो बंद हैं, कैसे जाएँगे?” वह बस इतना बोला, “रुकने से अच्छा है चल पड़ें, शायद मंज़िल खुद रास्ता बना ले।”


धूप, भूख, थकान और डर—सब उसके साथ चलते रहे। कहीं पुलिस रोकती, कहीं लोग दूरी बनाकर देखते। कोई खाना या पानी देता तो हाथ आगे बढ़ाने से पहले हिचकता, मानो इंसान नहीं, कोई बड़ा खतरा खड़ा हो। उसे यह दूरी सबसे ज़्यादा चुभती थी—शरीर से ज़्यादा दिलों में बनी दूरी। इंसान इंसान से दूर हो चला था। 


रास्ते भर वह यही सोचता रहा— घर पहुँचते ही माँ गले लगाएगी, भाई के बच्चे लिपट जाएँगे… सारी थकान मिट जाएगी। पंद्रह दिनों की पैदल यात्रा के बाद जब वह अपने गाँव पहुँचा तो शाम ढल चुकी थी। थका शरीर, सूखे होंठ और आँखों में चमक—घर की चौखट देखकर उसके कदम तेज़ हो गए। उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।


अंदर से आवाज आई— “कौन?”

“मैं हूँ… तुम्हारा भाई।”


कुछ क्षण की खामोशी के बाद दरवाज़ा नहीं खुला। अंदर से धीमी-सी आवाज आई— “भैया… आप बाहर ही रुकिए। गाँव में कहा गया है कि बाहर से आए लोग सीधे घर न आएँ… कोरोना का खतरा है।”


वह सन्न रह गया। जिस घर की ओर वह हर कदम पर उम्मीद लेकर चला था, वही घर अब उसे खतरा समझ रहा था।


“मैं… मैं तुम्हारा अपना हूँ…” उसकी आवाज काँप गई।


पर जवाब में सिर्फ चुप्पी थी। वह चौखट पर बैठ गया—थका हुआ नहीं, बल्कि टूटा हुआ। उसे अब पैरों की पीड़ा नहीं साल रही थी, साल रही थी रिश्तों में आई वह दरार, जिसे न पैदल चलकर पाटा जा सकता था, न आँसुओं से। रात गहराती गई और वह वहीं बैठा रहा— घर के बाहर, अपनों के बहुत पास… और फिर भी बहुत दूर। थकान से वह बेहाल है और बार-बार अपनी लम्बी पैदल यात्रा को याद कर वह रोने लगता है।


केशव राम सिंघल 

लेखक द्वारा लिखी कहानी "कोरोना का डर और दरकता रिश्ता" ब्लॉग पोस्ट लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।