मंगलवार, 15 सितंबर 2026

बाल नाटक - भारत की भाषाएँ

बाल नाटक - भारत की भाषाएँ 

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अवधि - 12–15 मिनट 

रचनाकार - केशव राम सिंघल

मंच - मंच पर सामने भारत का मानचित्र। सामने बोर्ड पर लिखा हो — भाषा वाटिका। प्रत्येक बाल-कलाकार के गले में अपनी भाषा का पट्टा।

पात्र - हिंदी (सूत्रधार) · तमिल · गुजराती · बंगाली · मराठी · असमिया · ओड़िया · कश्मीरी · भोजपुरी · राजस्थानी · पंजाबी · उर्दू · संस्कृत

 दृश्य 1 · भाषा वाटिका में

(धीमी रोशनी। हिंदी तिरंगा लेकर दर्शकों की ओर मुड़ती है।)


हिंदी - नमस्ते बच्चों! नमस्ते अतिथियों और गुरुजनों! मैं हिंदी हूँ — किताबों की भाषा, गीतों की भाषा। आज मेरी वाटिका में बहुत सी बहनें आने वाली हैं। हमारी अपनी बहनें — भारत की भाषाएँ!


(तमिल हाथ जोड़कर, मल्लिका सजाए, धीरे नाचते हुए आती है।)

तमिल - वणक्कम्! मैं तमिल हूँ। द्रविड़ भाषाओं की बड़ी बहन। मेरे घर संगम काव्य है, भरतनाट्यम है, इडली-डोसा की खुशबू है। मेरी बहनें कन्नड़ और तेलुगु भी दक्षिण से पुकारती हैं।


हिंदी - वणक्कम्, तमिल बहन! तुम्हारे बिना हमारा दक्षिण अधूरा है।


(गुजराती झाँझ बजाती, गरबा की छोटी चाल के साथ प्रवेश करती है।)

गुजराती - केम छो? मजामा! मैं मज़े में हूँ। मैं गुजराती हूँ। मेरे आँगन में गरबा नाचता है, ढोकला गुनगुनाता है, और व्यापार मेरी रगों में बहता है।

हिंदी - केम छो, गुजराती बहन! तुम्हारी मिठास और तुम्हारा उत्साह दोनों प्यारे हैं।


(बाएँ से बंगाली गुनगुनाती हुई आती है और दाएँ से मराठी।)

बंगाली - नमोस्कार! मैं बांग्ला हूँ। कण्ठ में रवीन्द्रनाथ का गीत, दुर्गा पूजा की ढाक, और थाली में रसगुल्ला!

मराठी - नमस्कार! मी मराठी आहे! शिवाजी महाराज की भूमि से आई हूँ। ज्ञानेश्वरी है, गणपति बप्पा मोरया है, पुरणपोली की मिठास है! महाराष्ट्र और आसपास कोंकण इलाके में रहती है कोंकणी बहन। 


(पूर्व से असमिया और ओड़िया साथ-साथ आती हैं।)

असमिया - नमस्कार! ब्रह्मपुत्र के तट से आई हूँ — असमिया। बिहू मेरे घर नाचता है। मेरी बहनें बोडो, मणिपुरी, खासी, मिजो भी पूर्वोत्तर से हाथ हिलाती हैं।

ओड़िया - नमस्कार! मैं ओड़िया हूँ — ओडिशा की कला। जगन्नाथ की रथयात्रा, ओडिसी नृत्य, पट्टचित्र — सब मेरे आँगन की बातें हैं।


(उत्तर से कश्मीरी धीरे-धीरे; भोजपुरी इठलाती हुई पीछे-पीछे।)

कश्मीरी - आदाब! मैं कश्मीरी हूँ। वादियों में बोली जाती हूँ, अतिथि के स्वागत में तैयार रहती हूँ। मेरी बहन डोगरी भी उन घाटियों में गूँजती है।

भोजपुरी - प्रणाम! मैं भोजपुरी — बिहार की बोली, हिंदी की छोटी बहन। हमारे घर अपनापन बहुत है। मेरी बहन मैथिली भी साथ है।


(पश्चिम से राजस्थानी और पंजाबी महफ़िल की चाल से।)

राजस्थानी - खम्मा घणी! मैं राजस्थानी हूँ। मेवाड़ का शौर्य तुमने सुना होगा। हर पंद्रह कोस पर मेरी बोली बदल जाती है, पर स्वाद दाल-बाटी जैसा एक ही रहता है।

पंजाबी - सत श्री अकाल! बड़ी महफ़िल सजी है आज। लगती है सब बहनें चौपाल जमाए बैठी हैं! 


(उर्दू और संस्कृत साथ प्रवेश।)

उर्दू - आदाब! यह चौपाल नहीं, संसद है — जहाँ भाषाएँ एक-दूसरे को सहयोग से देखती-समझती हैं।

संस्कृत - नमस्ते। मैं संस्कृत — देवभूमि की प्राचीन वाणी। मेरे कई शब्द बहनों के घर बस गए हैं, जैसे दीये का प्रकाश कई आँगनों में फैल जाए।


(सभी बाल-कलाकार घेरा बनाकर खड़े हैं भाषाओं के प्रतीक रूप में।)

हिंदी - वाह! आज वाटिका में उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम — सब एक आँगन में हैं। भारत माँ मुस्करा रही होंगी।


दृश्य 2 · गर्व की हवा 


(थोड़ी देर चुप्पी। तमिल गर्व से सिर उठाती है।)

तमिल - सच कहूँ तो… मेरी भाषा सबसे प्राचीन है। दो हज़ार साल पहले भी मेरे कवि गा रहे थे।

संस्कृत - प्राचीनता मेरी भी थाती है। वेद मेरे कंठ से निकले।

गुजराती - प्राचीन होना अच्छी बात है, पर जीवंत होना भी ज़रूरी है ना! मेरे व्यापारी समुद्र पार गए, मेरी भाषा दुनिया घूमी।

बंगाली - और साहित्य? गीतांजलि सुनकर सारा विश्व झूम उठा।

मराठी- तेज और भक्ति दोनों मेरे पास हैं। संत ज्ञानेश्वर से छत्रपति तक — मेरी भाषा ने इतिहास लिखा।


(हिंदी हाथ उठाती है। सब शांत।)

हिंदी - अरे बहनों, रुको। गर्व सुंदर है। जड़ें प्यारी हैं। पर जब हम एक-दूसरे से ऊँची होने लगती हैं, तो भारत माँ उदास हो जाती हैं।


(सब सिर झुकाते हैं, फिर मुस्कराते हैं।)

तमिल - सच कहा। माफ़ करना। मुझे अपनी जड़ें प्यारी हैं, पर मैं अकेली पूरी बगिया नहीं हूँ।

गुजराती - हाँ। मिलकर बैठें तो मजामा, अलग हों तो सूना।


दृश्य 3 · हम एक-दूसरे की ताकत


हिंदी - तो चलो एक खेल। हर बहन बताए — तुमने इस देश को क्या दिया?

तमिल - तुम रोज़ बोलती हो — करी, चटनी, इडली, डोसा, सांभर। ये शब्द मेरे घर से निकले। मैंने भारत की थाली में स्वाद भरा।

गुजराती - और मैं? ढोकला, गरबा, डांडिया। फिल्मों में “केम छो” सुनकर लोग मुस्कराते हैं। मेरी भाषा ने हिम्मत दी — कुछ कर गुजरने की।

बंगाली - मैंने दिया रवीन्द्र-गीत और दुर्गा की ढाक — वह प्यार जो गाने में बसता है।


(मराठी, असमिया, ओड़िया, कश्मीरी, भोजपुरी, राजस्थानी, पंजाबी बारी-बारी एक-एक शब्द जोड़ती हैं।)

सभी मिलकर कहती हैं - गणपति बप्पा मोरया! बिहू! रथयात्रा! आदाब! प्रणाम! खम्मा घणी! सत श्री अकाल!

उर्दू - मैंने ग़ज़ल दी, आदाब दिया, और वह नज़ाकत जिससे बात भी इत्र की तरह फैलती है।

हिंदी - और मैं? मैं सबकी सहेली हूँ। मैंने तुम्हारे शब्द अपने में सजाए। किताब, सिनेमा, परीक्षा — सभी को एक मंच देती हूँ। पर मैं अकेली कुछ नहीं। तुम्हारे बिना मेरी थाली फीकी, मेरा गीत अधूरा, मेरा देश अधूरा।


(सब हाथ थाम लेती हैं।)

तमिल - मैं तमिल हूँ, पर मैं भारत की बेटी हूँ।

गुजराती - मैं गुजराती हूँ, पर मैं भारत की बेटी हूँ।

बंगाली - मैं बांग्ला हूँ, पर मैं भारत की बेटी हूँ।

मराठी - मी मराठी आहे, पण मी भारताची लेक आहे।

सभी - हम सब भारत की बेटियाँ हैं। एक-दूसरे की बहन। भारत माँ की आवाज़।


दृश्य 4 · समापन गीत


(तिरंगा बीच में। हिंदी सूत्रधार।)

हिंदी - दर्शकों, याद रखना — भाषाएँ अनेक हैं, भाव एक है। हम एक-दूसरे की ताकत हैं। हम एक-दूसरे से समृद्ध होती हैं। कोई छोटी नहीं, कोई बड़ी नहीं। सब मिलकर भारत हैं। विविधता में एकता — यही हमारी पहचान है।


(हाथ थामे, सरल ताल। गीत दो बार दोहराया जा सकता है।)

सभी एक साथ गाते हैं - 

भाषाएँ अनेक, भाव तो एक,

भारत माँ का यही विवेक।

एक की लय, दूसरी की ताल,

एक का गीत, दूसरे का हाल।

हर भाषा दूसरी भाषा को गले लगाए,

हर बोली का सभी मिलकर मान बढ़ाए।

उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम,

हम सब मिलकर एक हैं निश्चित।

विविधता में एकता हमारा मान,

जय भारत, जय हिन्द, जय महान!


हिंदी - धन्यवाद श्रोताओं! धन्यवाद गुरुजनों! आज से जब कोई नई भाषा सुनाई दे, उसे पराई मत समझना। वह भी हमारी बहन है। वणक्कम्, केम छो, नमोस्कार, नमस्कार, खम्मा घणी, सत श्री अकाल, आदाब, और नमस्ते! आइए, पड़ोसी की भाषा का एक शब्द आज ही सीखें। जय हिन्द, जय भारत।

सभी - भारत माता की जय! सभी भाषाओं की जय! एकता की जय!

(हाथ जोड़कर प्रणाम। मंचन समाप्त।)


मंचन संकेत - अभिवादन और बोलना शुद्ध हों। यदि मंचन समय कम हो तो दृश्य 1 में असमिया से पंजाबी तक एक समूह-प्रवेश दिया जा सकता है; हिंदी, तमिल, गुजराती अलग-अलग अवश्य आएँ। मंचन श्रेष्ठ हो, इसके लिए एक निर्देशक (Director) चुने और संगीत टीम के साथ तारतम्य बनाए रखें। 


गुरुवार, 10 सितंबर 2026

पौराणिक कथा — रावण के शिव-भक्त होने की कथा

पौराणिक कथा — रावण के शिव-भक्त होने की कथा

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रावण हिमालय-अंचल में विचरण कर रहा था। तभी नंदी ने पूछा - कौन है तू? इस अगम वन में क्यों घूम रहा है? रावण ने निर्भय कहा - तू कौन है ऐसा पूछने वाला? यह वन अगम कैसे? नंदी बोला - यहाँ देव-दैत्य-पूजित भगवान् शिव का धाम है। यह निषिद्ध क्षेत्र है। भाग जा यहाँ से।


मैं उन्हें देखना चाहता हूँ। तू कौन है मुझे रोकने वाला? यह कहकर रावण कैलाश की ओर चढ़ने लगा। नंदी ने उसे पीछे ठेल दिया। रावण ने क्रोध में नंदी को दूर फेंक दिया। मल्लयुद्ध हुआ; रावण विजयी रहा। तब नंदी उसे शिव के पास ले गया। रावण ने अपना परिचय दिया। शिव ने पूछा - क्या तूने ज्येष्ठ कुबेर की अवज्ञा की? रावण बोला - मैं ऐसा नहीं मानता। कुबेर ने यक्ष-संस्कृति रखी, मैंने रक्ष-संस्कृति। मूलमंत्र है—वयं रक्षामः। जो सहमत, उसे अभय; जो नहीं, वह शत्रु। शिव ने कहा - मैं तुझसे सहमत नहीं। रावण बोला - तो युद्ध करें।


शिव ने त्रिशूल उठाया, रावण ने कुठार। युद्ध चला। शीघ्र ही रावण थककर हाँफने लगा, बोला - विराम चाहता हूँ। आप युद्ध नहीं, खिलवाड़ करते हैं। आप देव हैं, मैं सेवक। कल्याण कीजिए। 


शिव ने हाथ उठाया और कहा - कल्याण हो। तेरा शौर्य स्तुत्य है, तू अजेय है। तेरी रक्ष-संस्कृति क्या है?


रावण ने कहा - वयं रक्षामः—हम रक्षा करते हैं। आर्यों ने आर्यावर्त बनाकर जनों को दक्षिणारण्य में बहिष्कृत किया। सागर के द्वीपों में आर्य-अनार्य अनेक जातियाँ बसती हैं, परस्पर विवाह भी होता है। रक्ष-संस्कृति में सबका समावेश हो, सभी की रक्षा हो—यही मेरा उद्देश्य है।


शिव प्रसन्न हुए और बोले - तेरा प्रयास स्तुत्य है। मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। 


रावण घुटनों के बल बैठकर चरणों में सिर नवाया। शिव ने कहा - कल्याणं ते भवतु! शिवं ते अस्तु!


इस प्रकार रावण शिव का भक्त बना।


सादर,  

केशव राम सिंघल 


रविवार, 16 अगस्त 2026

नाटक - आइए! गणेश जी महाराज से बहुत कुछ सीखें!

नाटक - आइए! गणेश जी महाराज से बहुत कुछ सीखें!

लेखक - केशव राम सिंघल 

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प्रस्तुति संबंधी सामान्य निर्देश


* यह नाटक गणेश चतुर्थी के अवसर पर या किसी अन्य अवसर पर बच्चों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

* बाल कलाकारों की संख्या: 5 से 10 (सूत्रधार सहित) रहे।

* नाटक अभ्यास और प्रस्तुति के लिए एक उपयुक्त निर्देशक भी हो। 

* मंच के बीच में सामने गणेश जी की सुंदर मूर्ति रखी जाए।

* सभी बाल कलाकार मूर्ति के सामने अर्ध-चंद्राकार में खड़े हों, ताकि मूर्ति और कलाकारों के चेहरे दोनों दर्शकों को साफ दिखें।

* जयकारे के समय ढोल-मंजीरा या गणेश भजन का उपयुक्त संगीत बजे।

* बोलते समय कलाकार संबंधित इशारे अवश्य करें (कान पर हाथ, पेट दिखाना, सूँड का इशारा आदि)।

* आवाज़ साफ़, धीमी-तेज़ का संतुलन और भावपूर्ण हो।



नेपथ्य से सूत्रधार - भाइयों और बहनों! यहाँ उपस्थित सभी दर्शकों को नमस्कार। आज का दिन बहुत ही शुभ दिन है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर शिव-पार्वती नंदन सिद्धि-विनायक गणेश जी हमारे बीच आए हुए हैं। आइए! सभी मिलकर गणेश जी महाराज का जयकारा लगाएँ—

सभी (मंच पर प्रवेश करते हुए, संगीत के साथ) - “गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया! गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया!”


(जिस समय जयकारा हो रहा हो, एक-एक कर सभी बाल कलाकार मंच पर आते हैं। वे गणेश जी की मूर्ति के सामने झुककर आदर व्यक्त करते हैं और अर्ध-चंद्राकार में मूर्ति के दोनों ओर खड़े हो जाते हैं। सूत्रधार भी मंच पर आ जाता है।)


सूत्रधार - गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया! भगवान् गणेश जी पूजा-पाठ के प्रथम देवता हैं। साथ ही वे हमारे अनमोल गुरु भी हैं।


बाल कलाकार 1 - (हाथ से मस्तक का इशारा करते हुए) - बहुत कुछ सीख सकते हैं हम गणेश जी महाराज से और अपने जीवन में सफल हो सकते हैं। देखो, गणेश जी का हाथी जैसा बड़ा मस्तक! यह हमें सिखाता है कि हमें बड़ी सोच रखनी चाहिए और हर फैसला सोच-समझकर लेना चाहिए।


बाल कलाकार 2 - (मस्तक की ओर इशारा करते हुए) - यह विशाल मस्तक हमें विशाल बुद्धि, दूर दृष्टि और गहरी समझ का संदेश देता है। इसलिए भावनाओं में बहकर नहीं, सोच-समझकर फैसला लें। 


बाल कलाकार 3 - (दोनों हाथों से कानों को छूते हुए और फिर मुँह की ओर इशारा करते हुए) - गणेश जी महाराज के बड़े कान और छोटा मुँह हमें सिखाते हैं— सफल होना है तो सुनो अधिक, बोलो कम।


सूत्रधार - गणेश जी महाराज की लंबी सूँड छोटी और बड़ी दोनों तरह की चीजें उठा सकती है। क्या सीख सकते हैं हम इससे?


बाल कलाकार 4 - (हाथ से सूँड का इशारा करते हुए) - मित्रों, यही तो गणेश जी महाराज का लचीलापन है। हर सवाल का एक ही समाधान नहीं हो सकता। बदलते हालात के अनुसार हमें अपनी रणनीति बदलनी चाहिए।


बाल कलाकार 5 - (दृढ़ स्वर में) - गणेश जी महाराज विघ्नहर्ता हैं। वे सिखाते हैं कि हमें अपनी मुश्किलों को समझना चाहिए और उनका हल खोजने का उपाय सोचना चाहिए।


बाल कलाकार 6 - (हाथ जोड़कर विनम्र भाव से) - गणेश जी महाराज विनम्रता सिखाते हैं। कितने बड़े देवता हैं गणेश जी, फिर भी उनका वाहन छोटा चूहा है। यही तो असली विनम्रता है।


सूत्रधार - अरे वाह! क्या बात कही मेरे मित्र ने। गणेश जी महाराज की जय हो! साथियों, उनका पेट भी कितना बड़ा है।


बाल कलाकार 7 - (दोनों हाथों से पेट की ओर इशारा करते हुए) - गणेश जी का बड़ा पेट हमें सिखाता है कि हमें सभी तरह के अनुभवों— अच्छे और बुरे— को पचाने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।


बाल कलाकार 8 - (आश्चर्य व्यक्त करते हुए, एक हाथ से दाँत का इशारा करते हुए) - पता है, गणेश जी महाराज ने महाभारत लिखते समय अपना एक दाँत तोड़कर लेखनी बनाई थी। कुछ पाने के लिए कुछ त्याग करना पड़ता है। लक्ष्य पाने के लिए एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।


बाल कलाकार 9 - (हाथ जोड़कर) - हर शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है। हमें हर नए काम की शुरुआत सही तरीके से करनी चाहिए। अच्छी शुरुआत ही आधा काम है।


सूत्रधार - गणेश जी के चार हाथों में अलग-अलग वस्तुएँ हैं, जो जीवन में हमें संतुलन रखने का पाठ पढ़ाती हैं। आइए, हम अपने जीवन में काम, परिवार, टीम और अपने विकास में यथोचित संतुलन बनाए रखें।


सभी बाल कलाकार (एक स्वर में, हाथ जोड़कर) - सिद्धि विनायक गणेश जी महाराज की जय हो!


सूत्रधार - विघ्न हरने वाले, मंगल कर्ता, सिद्धि के दाता, बुद्धि के दाता गणेश जी महाराज की जय हो! आइए, आज हम सब गणेश जी से ये पाठ सीखकर अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।(संगीत के साथ सभी फिर से जयकारा लगाते हैं— “गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया!”)


अंत में, नाटक के निर्देशक मंच पर आते हैं और सभी कलाकारों का संक्षिप्त परिचय दर्शकों से कराते हैं। सभी कलाकार मूर्ति की ओर झुककर प्रणाम करते हैं और मंच से विदा होते हैं।

(नाटक समाप्त)


कलाकारों के लिए अतिरिक्त निर्देश


* बोलते समय चेहरे पर भाव रखें— गंभीरता, आश्चर्य, विनम्रता और उत्साह।

* अर्ध-चंद्राकार में खड़े रहते हुए एक-दूसरे को ढकें नहीं।

* जयकारे के समय ताली या हाथ हिलाकर उत्साह दिखाएँ।

* मूर्ति के सामने झुकते समय सम्मान का भाव बनाए रखें।

* निर्देशक के मार्गदर्शन में अभ्यास करते समय इशारों को स्वाभाविक बनाने का प्रयास करें।


यह नाटक लगभग 8 से 10 मिनट में आसानी से मंचित हो जाएगा।


इस नाटक के गैरव्यावसायिक मंचन के लिए लेखक की सामान्य स्वीकृति है। कृपया मंचन की जानकारी लेखक को ईमेल से या इस पोस्ट की टिप्पणी में देने का प्रयास करें। धन्यवाद। 


शुभकामनाओं के साथ, 

केशव राम सिंघल 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

प्राचीन यूनानी परंपरा से प्रेरित एक साहित्यिक पुनर्कल्पना - सृष्टि का उदभव

प्राचीन यूनानी परंपरा से प्रेरित एक साहित्यिक पुनर्कल्पना  

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सृष्टि का उदभव 

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यवनों की कल्पना में 

सृष्टि की यात्रा कैओस से आरम्भ हुई—एक ऐसे असीम शून्य से, 

जहाँ न व्यवस्था थी, न समय था और न ही जीवन, 

वही अनंत रिक्तता कैओस थी, 

उसी से प्रकृति, देवत्व और समस्त सृष्टि का क्रमिक प्राकट्य हुआ।


उसी असीम शून्य (कैओस) से पृथ्वी (गीया),

अन्धकार (एरीबस),

पृथ्वी के भीतर गहन अन्धकार (तारटरस), 

रात्रि (निक्स),

प्रेम (एरॉस) जैसी आदिम शक्तियाँ प्रकट हुईं। 


रात्रि (निक्स) और अन्धकार (एरीबस) से 

देवताओं के रहने की जगह व्योम (ईथर) और दिन (हेमरा) उत्पन्न हुए। 


पृथ्वी (गीया) से आकाश (यूरेनस), समुद्र (पौंटस), और पर्वतों का उद्भव हुआ।  

सृष्टि अपना आकार ले रही थी। 


जब पृथ्वी (गीया) और आकाश (यूरेनस) का मिलन हुआ,

उनके संसर्ग से अनेक टाइटनों की उत्पत्ति हुई, 

जो विभिन्न शक्तियों के प्रतीक थे, उनमें प्रमुख थे -

ओकिएनस, सूर्य (हाइपेरियन), इएपिटस, रीया, धरती की देवी (थेमिस), टेथिस और क्रोनस। 

क्रोनस की पत्नी रीया थी, 

ओकिएनस की पत्नी टेथिस थी, जिसने पृथ्वी के चारों ओर बहती नदियाँ पैदा कीं 

और 

इएपिटस की पत्नी धरती की देवी (थेमिस) थी। 

पृथ्वी (गीया) से गोल-गोल आँखों वाले (साइक्लोप) नामक तीन दानव - 

(ब्रांटिस, स्टेरॉप्स और आरगिस)  

और 

सौ बाँहों वाले तीन और दानव 

(ब्रायेरियस, काटास और गाइस) पैदा हुए। 


सृष्टि क्रमशः विकसित हो रही थी, 

प्रकृति अपने विविध रूप धारण कर रही थी, 

मानो समस्त ब्रह्मांड सृजन के महान प्रजनन काल से गुजर रहा हो।

 

रात्रि (निक्स) से भाग्य (मरोस), मृत्यु (थेंटौस), नींद (हिप्नोस), प्रतिशोध (नेमसिस), विनाश (केर), स्वप्न, बुढ़ापे, कलह (एरिस), दोष निकालने की प्रवृत्ति (मोमॉस), पीड़ा, नियति (म्वायरा/म्वाराय) और प्रेमानंद (फिलाटीज) उत्पन्न हुए। 


रात्रि (निक्स) की पुत्री कलह (एरिस) ने अकाल, दुःख, लड़ाई, संहार, हत्या, मूढ़ता आदि को जन्म दिया। 


रात्रि (निक्स) से सभी देवी-देवता डरते थे, 

नियति (म्वायरा/म्वाराय) की तीन बहनें थीं, 

जो भाग्य का सूत काटती थीं,

इनके नाम थे - क्लॉथो, लैकिसिस और एट्रोपस,

यही तीनों मानव शिशु को जन्म के समय देखने आती हैं 

और उनका भाग्य लिखती हैं, 

क्लॉथो अपने हाथ तकुआ रखती है, 

लैकिसिस सूत कातती है 

और  

सबसे छोटी एट्रोपस का व्यवहार बहुत कठोर है क्योंकि वह मौत लिख देती है। 


समुद्र (पौंटस) बुद्धिमान, दयालु और भविष्यवक्ता वृद्ध समुद्रदेव (नीरियस) उत्पन्न हुआ, 

वृद्ध समुद्रदेव (नीरियस) और जलपरी (डोरिस) के संसर्ग से बहुत सी जलपरियों का जन्म हुआ ,

थेटिस उन्हीं जलपरियों में से एक थी, वह एकिलीज की माँ भी थी, 

नदियों (ओकिएनस) और उनकी पत्नी टेथिस ने न केवल नदियाँ पैदा की, 

अपितु उनसे तीन सहस्त्र सागरकन्याओं का जन्म हुआ। 


सूर्य (हाइपेरियन) और उसकी पत्नी थिआया ने 

हीलियस / सॉल नामक सूर्य और चन्द्रमा (लूना / सिलीने) 

और उषा (ईऔस / औरोरा) को जन्म दिया, 

प्रतिदिन प्रत्यूषकाल में उषा (ईऔस / औरोरा) 

अपने दो घोड़ों वाले रथ में बैठकर आती हैं 

और अपने भाई सूर्य (हीलियस) के आने की सूचना देती हैं। 


इस प्रकार यवनों की कल्पना में 

समस्त सृष्टि की यात्रा 

कैओस—उस असीम शून्य और रिक्त विस्तार—से आरम्भ हुई 

और धीरे-धीरे प्रकृति, देवत्व तथा जीवन के असंख्य रूपों में 

विकसित होती चली गई।


सादर,

केशव राम सिंघल 

(इस प्रस्तुति का आधार प्राचीन यूनानी मिथकीय परंपरा तथा होमर के इलियड का हिंदी अनुवाद है। विभिन्न यूनानी स्रोतों में देववंश और घटनाओं के विवरण में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं; यहाँ प्रस्तुत कथा उसी परंपरा का अनुसरण करती है, जिसका आधार इस लेखक ने ग्रहण किया है।)


शनिवार, 1 अगस्त 2026

360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली (360-Degree Evaluation System)

360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली (360-Degree Evaluation System)

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360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली कर्मचारी के प्रदर्शन और क्षमता का मूल्यांकन करने की एक संपूर्ण प्रणाली है।


पारंपरिक तरीकों में केवल नियोक्ता (Employer) अपने कर्मचारी (Employee) का आंकलन करता है। इसके विपरीत, 360-डिग्री प्रक्रिया में कर्मचारी का मूल्यांकन उसके आसपास के सभी प्रमुख स्रोतों द्वारा किया जाता है। इसमें निम्न प्रमुख स्रोत हो सकते हैं - 


- स्वयं का आंकलन (Self-Evaluation)

- मैनेजर या सीनियर (Manager / Supervisor)

- साथ काम करने वाले सहकर्मी (Peers / Colleagues)

- अधीनस्थ कर्मचारी (Subordinate Staff)

- ग्राहक या बाहरी हितधारक (Customers or External Stakeholder) आवश्यकतानुसार


इसका मुख्य उद्देश्य केवल मूल्यांकन करना (Rating) नहीं, बल्कि कर्मचारी की शक्तियों (Strengths) और सुधार के क्षेत्रों (Gaps in Perception) की पहचान करके उसके निरंतर विकास (Evolution/Development) का मार्ग प्रशस्त करना है।


360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली प्रक्रिया के मुख्य चरण (Steps)


इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से लागू करने के लिए इसे निम्न 7 चरणों में विभाजित किया जा सकता है -


1. उद्देश्य तय करना और तैयारी (Objective Setting & Preparation) - सबसे पहले यह तय किया जाता है कि मूल्यांकन लक्ष्य क्या है—क्या यह नेतृत्व विकास (Leadership development) के लिए है, निष्पादन मूल्यांकन (Performance appraisal) के लिए है या प्रशिक्षण आवश्यकता (Training needs) की पहचान के लिए है। प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले मापदंडों (Criteria),  जैसे Competencies, Behavioral Traits, Leadership Qualities) को परिभाषित किया जाता है।


2. प्रश्नावली तैयार करना (Questionnaire Design) - एक स्पष्ट और तटस्थ प्रश्नावली तैयार की जाती है। इसमें ऑब्जेक्टिव प्रश्न (Likert Scale Rating, जैसे 1 से 5 की रेटिंग) और खुले प्रश्न (टिप्पणी या फीडबैक के लिए) शामिल होते हैं।


3. मूल्यांककों का चयन (Selection of Evaluators) - जिस कर्मचारी (Ratee) का मूल्यांकन किया जाना है, उसके लिए उपयुक्त फीडबैक देने वालों (Raters) का चयन किया जाता है। संतुलित दृष्टिकोण के लिए मैनेजर, 3-5 सहकर्मी और 3-5 जूनियर सदस्यों को चुना जाता है।


4. सर्वे का संचालन और डेटा संग्रह (Survey Administration & Data Collection) - सर्वे को आमतौर पर एक ऑनलाइन HRMS पोर्टल या गोपनीय सॉफ्टवेयर के माध्यम से भेजा जाता है। गोपनीयता (Anonymity) के लिए मैनेजर के अलावा अन्य सभी (Peers और Subordinates) का फीडबैक पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता है ताकि सब बिना किसी डर या पक्षपात के निष्पक्ष राय दे सकें।


5. रिपोर्ट तैयार करना (Data Analysis & Report Generation) - प्राप्त सभी रेटिंग्स और टिप्पणियों का विश्लेषण (Analysis) किया जाता है। एक विस्तृत व्यक्तिगत रिपोर्ट (Individual Feedback Report) तैयार की जाती है, जिसमें कर्मचारी के स्वयं के आंकलन और दूसरों के आंकलन के बीच की तुलना (Blind Spots) की जाती है और कर्मचारी की शक्तियों की सूची (Strengths) के साथ सुधार के मुख्य क्षेत्र (Developmental Areas) का पता लगाया जाता है। 


6. फीडबैक सेशन और संवाद (Feedback C) - HR प्रतिनिधि या एक कुशल कोच/मैनेजर कर्मचारी के साथ आमने-सामने बैठकर रिपोर्ट साझा करता है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि बातचीत का रुख सकारात्मक और विकासात्मक (Developmental) रहे, ताकि कर्मचारी अपने आपको रक्षात्मक (Defensive) महसूस न करे।


7. व्यक्तिगत विकास योजना (Individual Development Plan - IDP) - प्राप्त फीडबैक के आधार पर एक कार्य योजना (Action Plan) तैयार किया जाए, जिसमें आवश्यक ट्रेनिंग, मेंटरशिप और भविष्य के लक्ष्यों को निर्धारित किया जाता है ताकि कर्मचारी का वास्तविक उन्नयन (Evolution) हो सके।


संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह 360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली की प्रक्रिया यह बताती है कि कर्मचारी कैसा काम कर रहा है, साथ ही यह उजागर करती है कि कर्मचारी का व्यवहार और काम दूसरों को कैसा दिखता है। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

प्रतिभा, विचार या व्यक्तित्व कभी दबता नहीं

प्रतिभा, विचार या व्यक्तित्व कभी दबता नहीं 

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"वे उन्हें जमीं में दफ़ना देना चाहते हैं,

पर वे बीज हैं,

अंकुरित होने के लिए तैयार,

वृक्ष बनने के लिए।"


यह संदेश और उससे जुड़ा चित्र अपने अन्तर्निहित भाव को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। इसमें प्रयुक्त प्रतीकात्मकता (Symbolism) अत्यंत सशक्त है।


1. ऊपर का दृश्य – दमन और निराशा का प्रतीक 


चित्र में कुछ लोग बीज को मिट्टी में दबा रहे हैं। प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है मानो वे उसे समाप्त करना चाहते हों। यह उन लोगों का प्रतीक है जो किसी व्यक्ति की प्रतिभा, विचार या व्यक्तित्व को दबाने का प्रयास करते हैं।


2. बीज – संभावना का प्रतीक 


यह कोई साधारण बीज नहीं, बल्कि संभावना (Potential) का प्रतीक है। किसी व्यक्ति को दबाने या रोकने का प्रयास कई बार उसके विकास की शुरुआत बन जाता है। यही इस विचार का सबसे सुंदर विरोधाभास (Paradox) है।


3. भूमिगत अंकुरण – संघर्ष से विकास 


मिट्टी के भीतर अंकुरित होता बीज यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियाँ विनाश का नहीं, बल्कि विकास का आधार बन सकती हैं। अंधकार ही वह स्थान है जहाँ से नए जीवन का आरम्भ होता है।


4. विशाल वृक्ष – सफलता और समाजोपयोगिता का प्रतीक 


पूर्ण विकसित वृक्ष सफलता, परिपक्वता, आत्मविश्वास और समाज के प्रति योगदान का प्रतीक है। वह अकेला खड़ा होता है, पर उसकी छाया, फल और प्राणवायु असंख्य लोगों को लाभ पहुँचाते हैं। यही एक सफल और विकसित व्यक्तित्व की पहचान है।


यह चित्र केवल संघर्ष की कहानी नहीं कहता, बल्कि दृष्टिकोण (Perspective) बदलने की प्रेरणा देता है। जिस घटना को कुछ लोग (विरोधी) "दफ़नाना" समझते हैं, उसी घटना को प्रकृति "रोपना" मानती है।


इसलिए —


* आलोचना में सीखने का अवसर खोजिए।

* असफलता को अनुभव में बदलिए।

* संघर्ष को अपनी शक्ति बनाइए।

* उपेक्षा को आत्मनिर्माण और आत्मविकास का माध्यम बनाइए।

* दबाव को विकास की ऊर्जा में परिवर्तित कीजिए।


यह चित्र लचीलापन (Resilience) तथा घावों के बाद का विकास (Post-Traumatic Growth) जैसी अवधारणाओं को भी सशक्त रूप से व्यक्त करता है। कुछ लोग कठिन परिस्थितियों से टूट जाते हैं, जबकि कुछ उसी कठिनाई को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बना लेते हैं।


प्रतिभा, विचार और व्यक्तित्व कभी दबते नहीं। यदि उनमें जीवन, सत्य और सामर्थ्य है, तो वे बीज की तरह एक दिन अवश्य अंकुरित होते हैं और समय आने पर विशाल वृक्ष बनकर समाज को छाया, प्रेरणा और दिशा प्रदान करते हैं।


सादर,

केशव राम सिंघल 


शनिवार, 18 जुलाई 2026

बैंक राष्ट्रीयकरण

बैंक राष्ट्रीयकरण

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स्वतंत्रता प्राप्ति (1947) के समय भारत में अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में थे। भारत का केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) उस समय भी कार्यरत था, जिसका राष्ट्रीयकरण 1 जनवरी 1949 को किया गया। इसके बाद 1955 में State Bank of India Act के अंतर्गत Imperial Bank of India के उपक्रम का अधिग्रहण कर State Bank of India (SBI) की स्थापना की गई। आगे चलकर 1959 में State Bank of India (Subsidiary Banks) Act के अंतर्गत विभिन्न पूर्व रियासतों के राज्य-संबद्ध बैंकों को SBI की सहायक (Associate) बैंकों के रूप में पुनर्गठित किया गया। इसके बावजूद अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में ही थे। इन निजी बैंकों का ऋण मुख्यतः बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों को मिलता था। कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों की बैंकिंग आवश्यकताओं की अपेक्षाकृत उपेक्षा होती थी। कई निजी बैंक वित्तीय कुप्रबंधन के कारण बंद हो जाते थे, जिससे जमाकर्ताओं को नुकसान उठाना पड़ता था।


तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 को 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा (Deposits) उस समय ₹50 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में शामिल थे—Central Bank of India, Bank of India, Punjab National Bank, Bank of Baroda, United Commercial Bank (वर्तमान UCO Bank), Canara Bank, United Bank of India, Dena Bank, Syndicate Bank, Union Bank of India, Allahabad Bank, Indian Bank, Indian Overseas Bank तथा Bank of Maharashtra।


15 अप्रैल 1980 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा ₹200 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में Andhra Bank, Punjab and Sind Bank, New Bank of India, Vijaya Bank, Corporation Bank तथा Oriental Bank of Commerce शामिल थे। इस प्रकार राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई।


बैंक राष्ट्रीयकरण के प्रमुख उद्देश्य


1. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं का विस्तार।

2. किसानों, लघु उद्योगों तथा कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराना।

3. बचत की आदत को बढ़ावा देना।

4. आर्थिक विकास में बैंकिंग प्रणाली की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करना।

5. प्राथमिकता क्षेत्र (Priority Sector) को ऋण उपलब्ध कराना।


राष्ट्रीयकरण के प्रमुख परिणाम


सकारात्मक पक्ष


* ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नई बैंक शाखाएँ खुलीं।

* बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार से बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिला।

* वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की मजबूत नींव पड़ी।

* कृषि एवं लघु उद्योगों को संस्थागत ऋण उपलब्ध होने लगा।

* बैंकिंग सेवाएँ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचीं।


चुनौतियाँ


* सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा।

* कुछ बैंकों में कार्यकुशलता और लाभप्रदता प्रभावित हुई।

* समय के साथ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) बढ़ीं।

* प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण सेवा गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।


1969 और 1980 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के आर्थिक विकास के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है। इससे बैंकिंग का दायरा बड़े उद्योगों से आगे बढ़कर किसानों, छोटे उद्यमियों और आम नागरिकों तक पहुँचा और कृषि, लघु उद्योग तथा अन्य प्राथमिकता क्षेत्रों को संस्थागत ऋण अधिक सुलभ होने लगा। यद्यपि बाद के वर्षों में कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियाँ सामने आईं, फिर भी वित्तीय समावेशन और सामाजिक बैंकिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीयकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। आज भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 12 है, क्योंकि समय-समय पर अनेक राष्ट्रीयकृत बैंकों का आपस में विलय किया जा चुका है। 1969 में जब 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था, तब भारत में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या लगभग 8,260 थी। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंक शाखाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया गया। परिणामस्वरूप आज देश में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या बढ़कर लगभग पौने दो लाख तक पहुँच गई है। यह बैंक राष्ट्रीयकरण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है, जिसने देश में वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी।


बैंक शाखाओं के तीव्र विस्तार के कारण बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित हुए। इसी विस्तार के परिणामस्वरूप इस आलेख के लेखक को वर्ष 1971 में बैंक की सेवा में आने का अवसर मिला।


19 जुलाई 2026 को बैंक राष्ट्रीयकरण के 57 वर्ष पूर्ण होंगे। यह अवसर भारतीय बैंकिंग इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करने का अवसर भी है। इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी बैंककर्मियों, सेवानिवृत्त बैंककर्मियों और बैंक ग्राहकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।


केशव राम सिंघल 


शुक्रवार, 26 जून 2026

पुस्तक चर्चा

पुस्तक चर्चा 

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पिछले दिनों पितृ दिवस (Fathers' Day) के अवसर पर मेरे बच्चों ने मुझे किताबों का एक सेट भेंट किया, जिसमें विक्टर फ्रैंकल (Viktor Frankl) की किताब "Man's Search for Meaning" भी एक है। यह किताब दो मुख्य भागों में विभाजित है। किताब का पहला भाग व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन है, जो नाजी यातना शिविरों में नरसंहार (Holocaust) के दौरान फ्रैंकल के व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन करता है, और भाग दो उनके द्वारा विकसित लोगोथेरपी (Logotherapy - खोज अर्थ की थेरेपी) का संक्षिप्त वर्णन है। यह किताब सन 1946 में प्रकाशित हुई थी और दुनिया भर में इसकी 16 मिलियन से ज्यादा कॉपी बिक चुकी हैं। लेखक ने यह किताब मूल रूप में जर्मन भाषा में लिखी थी। फिलहाल मैं किताब के पहले भाग की चर्चा कर रहा हूँ। 











विक्टर फ्रैंकल Auschwitz और अन्य कैम्पों में कैदी के रूप में तीन साल बिताते हैं। उन्होंने कैदियों के मनोवैज्ञानिक चरणों का वर्णन किया है - 


- आघात चरण - कैम्प पहुंचने पर शुरुआती सदमा।

- भावनात्मक सुन्नता का चरण - लंबे समय में भावनाओं का सुन्न होना, सिर्फ जीने (survival) पर ध्यान, भूख और यातनाओं के बावजूद कुछ सुंदर चीजों (जैसे सूर्यास्त) का आनंद लेना।

- मुक्ति चरण - आजादी के बाद निजीकरण, कटुता, मोहभंग (Depersonalization, Bitterness, Disillusionment) — मुक्ति के बाद कई लोगों ने पाया कि उनके प्रियजन जीवित नहीं रहे।











Auschwitz = नाजी जर्मनी का सबसे बड़ा और सबसे भयानक एकाग्रता सह विनाश शिविर (Concentration cum Extermination Camp) था, जहाँ एक साथ हजारों लोगों को कैद किया जाता था और यह सामूहिक हत्या का केंद्र था।


इस किताब से निम्न सीखें मिली - 


- भले ही व्यक्ति की परिस्थितियाँ कितनी भी भयानक हों, फिर भी वह अपना मनोदृष्टि (Attitude) चुन सकता है।

- जिसके पास जीने का कोई कारण होता है, वह लगभग किसी भी तरह से सह सकता है। (He who has a why to live for can bear almost any how.) नीत्शे का यह कथन किताब के केंद्र में है।

- जीवन में अर्थ (Meaning) खोजने से कष्ट (Suffering) सहन करने की ताकत मिलती है — काम (रचनात्मक कार्य) करके, दूसरों के लिए प्यार कर, या पीड़ा (कष्टों) का गरिमामय तरीके से सामना करने से। 

- बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जितनी भयानक हों — भूख, ठंड, यातनाएँ, अपमान — वे हमारे अंदरूनी स्वतंत्रता को पूरी तरह छीन नहीं सकतीं।

- यदि मौत का कोई उद्देश्य होता है तो जीवन अर्थ से भर जाता है, बेमानी नहीं रहता। यह फ्रैंकल के दर्शन का सार है। 

 










Dachau कैंप में  Typhus महामारी फ़ैल गई। बहुत से कैदी इस बीमारी से मर रहे थे। कैंप के डाक्टरों ने स्वयंसेवक मांगे, जो Typhus के मरीजों की देखभाल करें - मरीजों को दवाई दे, साफ़-सफाई रखे और डाक्टरों की मदद करे। फ्रैंकल ने खुद Typhus Ward में स्वयंसेवक बन एक उद्देश्य का चयन किया। वे जानते थे कि वे मर सकते हैं, पर उन्होंने सोचा कि ऐसे में उनकी मौत व्यर्थ नहीं होगी। फ्रैंकल ने कैम्पों में देखा कि जो कैदी भविष्य में कोई उद्देश्य (Purpose) देख पाए, वे ज्यादा जीवित रहे। फ्रैंकल ने Typhus Ward में स्वयंसेवक बनकर एक उद्देश्य चुना। वे जानते थे कि संक्रमण का खतरा है, लेकिन उनकी मौत व्यर्थ नहीं होगी — यह उनकी मनोदृष्टि का उदाहरण था।


किताब में केपोज (Capos) कैदियों का वर्णन है। केपोज वे कैदी (prisoners) थे जिन्हें नाजी गार्ड्स द्वारा चुना जाता था। इनकी जिम्मेदारी होती थी कि वे अन्य कैदियों की निगरानी करें, उनसे काम करवाएं और अनुशासन बनाए रखें। केपोज आम कैदियों से बेहतर सुविधाएं पाते थे, बेहतर कपड़े, ज्यादा खाना, अलग बिस्तर आदि। केपोज नाजी गार्ड्स से भी ज्यादा क्रूर और निर्दयी हो जाते थे। वे अपने साथी कैदियों को मारते-पीटते, शोषण करते थे, सिर्फ़ अपने जीवन और सुविधाओं को बचाने के लिए।

 

फ्रैंकल इस किताब के माध्यम से कहते हैं - "इंसानों की सिर्फ़ दो नस्लें होती हैं - शरीफ़ आदमी और बदतमीज़ आदमी। भले ही कोई जेल में हो या कैदी हो, इंसान अपनी आंतरिक स्वतंत्रता (Inner freedom) और शिष्टता (Decency) बनाए रख सकता है। लेकिन कई लोग ताकत (Power) मिलने पर भ्रष्ट (Corrupt) हो जाते थे।


मैंने कुछ प्रासंगिक चित्र OpenAI Tool की सहायता से निर्मित किए हैं, इस पुस्तक चर्चा आलेख के साथ साभार प्रस्तुत हैं। 


सादर,

केशव राम सिंघल 


रविवार, 21 जून 2026

फादर्स डे पर विशेष - बाऊजी की प्रेरणा

फादर्स डे पर विशेष 

बाऊजी की प्रेरणा

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सन 1972 की बात है। बैंक की नौकरी में मुझे मात्र छह महीने ही हुए थे। नए परिवेश से तालमेल बैठ ही रहा था कि अचानक ब्रांच मैनेजमेंट ने एक आदेश जारी कर दिया कि सभी कर्मचारियों की ड्यूटी रोटेट (बदल) की जा रही है। इस अप्रत्याशित निर्णय से शाखा में खलबली मच गई। अनेक पुराने कर्मचारी इस व्यवस्था से बेहद नाराज थे और सबने मिलकर तय किया कि अगले दिन प्रबंधन को एक संयुक्त विरोध-पत्र दिया जाएगा।


सच कहूँ तो, असमंजस में मैं भी था। छह महीने से मैं जिस सीट पर काम कर रहा था, उस पर मेरी पकड़ मजबूत हो चुकी थी। मैं उस आरामदेह दायरे (कंफर्ट जोन) से बाहर नहीं निकलना चाहता था। मन में डर था कि नई सीट पर नए सिरे से सब सीखना होगा। इसलिए, मैं भी अंदर ही अंदर इस रोटेशन के खिलाफ था।


दिनभर के मानसिक तनाव के बोझ तले दबा जब मैं शाम को घर पहुँचा, तो उदासी चेहरे पर साफ झलक रही थी। मुझे तनाव में देखकर बाऊजी भांप गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "क्या बात है बेटा, आज कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो?" मैंने बिना कुछ छुपाए बैंक की पूरी घटना उन्हें बता दी।


बाऊजी ने मेरी बात धैर्य से सुनी और मुस्कुराते हुए वात्सल्य भाव से कहा, "बेटा, वास्तव में यह रोटेशन तो तुम्हारे हित में है। करियर की शुरुआत में एक ही सीट पर बंध जाना तुम्हारी प्रतिभा को सीमित कर देगा। तुम जितनी अधिक सीटों पर काम करोगे, बैंकिंग के अलग-अलग विभागों को समझोगे, उतनी ही अधिक कार्य में तुम्हारी प्रवीणता बढ़ेगी। बहुमुखी प्रतिभा ही तुम्हें भविष्य में सफल बनाएगी।"


बाऊजी के इन व्यावहारिक और दूरदर्शी शब्दों ने मानो मेरी आँखों से संकीर्णता का पर्दा हटा दिया। उन्होंने मुझे बदलाव को सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा दी। अगले दिन, मैं एक नए उत्साह के साथ अपनी नई सीट की ओर बढ़ गया।


सादर,

केशव राम सिंघल


रविवार, 7 जून 2026

खरगोश और कछुए की कहानी

खरगोश और कछुए की कहानी 

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मित्रों,


आपने कछुए और खरगोश की पारंपरिक कहानी तो सुनी ही होगी। जब दोनों में पहली बार दौड़ हुई, तो कछुआ इसलिए जीत गया क्योंकि खरगोश अति-आत्मविश्वास में दौड़ के दौरान सो गया था। उस दिन खरगोश बहुत दुखी हुआ कि वह धीमी गति से चलने वाले कछुए से हार गया। उसने अपनी गलती पर विचार किया और अगले दिन कछुए को दोबारा दौड़ लगाने की चुनौती दी। इस बार खरगोश ने अपनी एकाग्रता बनाए रखी, वह बिना रुके लगातार भागा और आसानी से जीत गया। अब कछुआ हार के कारण दुखी था।


कछुए ने ठंडे दिमाग से सोचा कि खरगोश से उसकी तेज गति के रहते कैसे जीता जाए। अगले दिन कछुए ने खरगोश से कहा, "चलो आज फिर दौड़ लगाते हैं, पर इस बार दौड़ का लक्ष्य वह सामने दिखने वाला पेड़ होगा।" खरगोश तुरंत तैयार हो गया और दौड़ शुरू हुई।


खरगोश हमेशा की तरह बहुत तेजी से भागा, पर कुछ ही दूरी पर जाकर अचानक रुक गया। रास्ते में एक चौड़ी नदी आ गई थी। वह सोचने लगा कि बिना किसी पुल के नदी के उस पार पेड़ तक कैसे पहुँचा जाए? खरगोश नदी के इसी किनारे लाचार होकर बैठ गया। दूसरी ओर, कछुआ अपनी धीमी लेकिन निरंतर गति से चलता हुआ नदी के किनारे पहुँचा, आसानी से तैरकर नदी पार की और लक्ष्य (पेड़) तक पहुँचकर दौड़ जीत गया। इस बार खरगोश अपनी इस कमजोरी पर उदास था कि उसे तैरना नहीं आता, पर यह उसके बस में नहीं था। 


अगले दिन खरगोश और कछुआ दोबारा मिले। खरगोश ने व्यावहारिक होकर कहा, "कछुए भाई! नदी के इस पार की दौड़ में मैं जीता और नदी के उस पार की दौड़ में तुम जीते। इस तरह तो हम एक-दूसरे को नीचा ही दिखाते रहेंगे।"


इस पर कछुआ मुस्कुराकर बोला, "खरगोश भाई! यदि हम दोनों एक-दूसरे की ताकत को अपनी ताकत बना लें, तो हम दोनों हर बार जीत सकते हैं और अन्य लोगों को एक सीख दे सकते हैं।"


दोनों ने मिलकर एक नई योजना बनाई और आखिरी बार फिर दौड़ शुरू हुई। इस बार, ज़मीन पर दौड़ते समय खरगोश की पीठ पर कछुआ बैठा था, जिससे वे पलक झपकते ही नदी के किनारे पहुँच गए। नदी आते ही खरगोश कछुए की पीठ पर बैठ गया और दोनों ने आसानी से नदी पार कर ली। नदी पार करने के बाद फिर कछुआ खरगोश की पीठ पर सवार हुआ और दोनों एक साथ, एक ही समय पर लक्ष्य (पेड़) तक पहुँच गए।


इस बार दोनों ही विजेता थे। 


मेरी सीख 


जब हम व्यक्तिगत स्पर्धा से ऊपर उठकर एक टीम के रूप में काम करते हैं, तो हर कठिन परिस्थिति को जीत सकते हैं। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी

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भारत में Bank Account Portability (बैंक खाता पोर्टेबिलिटी) को लेकर हाल ही में महत्वपूर्ण चर्चा हुई है। RBI ने अपनी Payments Vision 2028 में Payments Switching Service (PaSS) नामक एक प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत ग्राहक भविष्य में बैंक बदल सकेंगे लेकिन अपना खाता नंबर वही रख सकेंगे। यह उसी के समान है जैसे हम अपने मोबाइल की पोर्टेबिलिटी करवाते हैं कि सर्विस प्रोवाइडर तो बदल जाता है पर मोबाइल नंबर वही रहता है। 


इसका अर्थ यह है कि आज यदि कोई व्यक्ति एक बैंक से दूसरे बैंक में जाना चाहता है, तो उसे नया खाता खोलना पड़ता है और फिर उसे -


- वेतन (Salary) के लिए नए बैंक खाते की जानकारी देनी पड़ती है,

- EMI निर्देश अपडेट करने पड़ते हैं,

- SIP, बीमा प्रीमियम और ऑटो-डेबिट बदलने पड़ते हैं,

- UPI और अन्य भुगतान व्यवस्थाएँ पुनः सेट करनी पड़ती हैं।


प्रस्तावित व्यवस्था में ग्राहक बैंक बदल सकेगा, खाता संख्या वही रहेगी, उससे जुड़े भुगतान निर्देश स्वतः नए बैंक में स्थानांतरित हो सकेंगे। 


यह सुविधा अभी लागू नहीं हुई है। RBI इस पर कार्य कर रहा है और इसे Payments Vision 2028 के अंतर्गत प्रस्तावित किया गया है। इसके लिए तकनीकी और परिचालन ढाँचा विकसित किया जाना है।


ग्राहकों को इससे बहुत लाभ होगा। वे बेहतर सेवा देने वाले बैंक में आसानी से अपने खाते का स्थानांतरण करवा सकेंगे। बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। खाता बदलने का झंझट और कागजी कार्यवाही कम होगी। EMI, SIP, बीमा और वेतन जैसी सेवाओं में व्यवधान नहीं आएगा।


वैसे भारत में कई वर्षों से RBI ने एक ही बैंक की विभिन्न शाखाओं के बीच खाता स्थानांतरण (Intra-bank Portability) की अनुमति दी हुई है, जिसमें ग्राहक शाखा बदल सकता है और खाता संख्या वही रहती है। कुछ बैंकों ने यह सुविधा पहले से लागू कर रखी है।


सार रूप में कहा जा सकता है कि भारत में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की तरह बैंक अकाउंट पोर्टेबिलिटी लाने की दिशा में RBI गंभीरता से कार्य कर रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो ग्राहक बिना खाता संख्या बदले बैंक बदल सकेंगे। फिलहाल यह एक प्रस्तावित व्यवस्था है और इसके कार्यान्वयन की प्रतीक्षा है।


अधिक जानकारी के लिए RBI के Payments Vision 2028 दस्तावेज का अध्ययन किया जा सकता है, जिसमें Payments Switching Service (PaSS) सहित डिजिटल भुगतान क्षेत्र की भावी रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।


सादर,

केशव राम सिंघल

शनिवार, 6 जून 2026

बेबी बूमर्स - हमारी पीढ़ी

बेबी बूमर्स - हमारी पीढ़ी

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मैं 'बेबी बूमर्स' पीढ़ी का सदस्य हूँ, जो दुनिया की सबसे प्रभावशाली पीढ़ियों में से एक रही है। इस वर्ग में वे लोग आते हैं जिनका जन्म 1946 से 1964 के बीच हुआ। जब हमारी पीढ़ी का आगमन हुआ, तब तक द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था और पूरे विश्व में शांति व आर्थिक सुधार का दौर शुरू हो रहा था। उस समय दुनिया भर में जन्म दर में एक बहुत बड़ा उछाल आया, जिसके कारण ही इस पीढ़ी को 'बेबी बूमर्स' का नाम मिला।


हमारी पीढ़ी के लोग काम के प्रति बेहद समर्पित रहे हैं और हमने अपनी कड़ी मेहनत से आर्थिक समृद्धि के नए आयाम देखे हैं। टेलीविजन और कार सहित तमाम आधुनिक घरेलू उपकरणों का विस्तार हमारे ही सामने हुआ। आज इस पीढ़ी के लोग सीनियर सिटिज़न्स हैं, जिनकी उम्र 62 से 80 वर्ष के बीच है और अधिकांश लोग परिवारों में दादा-दादी या नाना-नानी की भूमिका निभा रहे हैं। हम आज भी पारंपरिक मूल्यों, आर्थिक सुरक्षा और पारिवारिक जिम्मेदारी को ही सर्वोपरि मानते हैं।


सादर,

केशव राम सिंघल


मेरे से पहले की पीढ़ी - मूक पीढ़ी (The Silent Generation)

मेरे से पहले की पीढ़ी - मूक पीढ़ी (The Silent Generation)
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मेरे माता-पिता 'मूक पीढ़ी' से थे। यह पीढ़ी उन लोगों से संबंधित है जिनका जन्म 1928 से 1945 के दौरान हुआ था। इस पीढ़ी के लोगों की आज की उम्र 81 से 98 वर्ष के बीच है। यद्यपि इस पीढ़ी के अनेक वरिष्ठ हमारे बीच से जा चुके हैं, फिर भी आज कई बुजुर्ग हमारे बीच मौजूद हैं। ये समाज के वे सबसे वरिष्ठ और अनुभवी स्तंभ हैं, जिन्होंने आधुनिक दुनिया की नींव रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। 

यह वह पीढ़ी है जिसका जन्म 'महान आर्थिक मंदी' (Great Depression) और 'द्वितीय विश्व युद्ध' के साये में हुआ था। जब ये बच्चे थे, तब दुनिया में जीवन यापन करना बेहद कठिन था।

इन्हें 'मूक' (Silent) कहे जाने के पीछे भी एक इतिहास है। इस नाम का इस्तेमाल सबसे पहले 1951 में 'Time' मैगजीन के एक लेख में किया गया था। दरअसल, इस पीढ़ी के माता-पिता व्यवस्था के खिलाफ काफी मुखर और विद्रोही स्वभाव के थे, परंतु उनके विपरीत इस पीढ़ी के युवाओं ने चुपचाप, बिना किसी बड़े विरोध के, कठिन परिस्थितियों में काम करना और व्यवस्था का सम्मान करना चुना। वे व्यवस्था से लड़ने के बजाय चुपचाप अपनी मेहनत से देश को दोबारा खड़ा करने में जुट गए।

इस पीढ़ी के लोगों की मुख्य विशेषताएँ यह रहीं कि ये बेहद वफादार, नियमों व अनुशासन का पालन करने वाले, और आर्थिक मामलों में बहुत मितव्ययी (Thrifty) थे। भारत के संदर्भ में, यह वही पीढ़ी है जिसने देश की आज़ादी के आंदोलन में भाग लिया और विभाजन का दंश अपनी आँखों से देखा और महसूस किया है।

सादर,
केशव राम सिंघल

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

सुरक्षित कार्यस्थल, स्वस्थ संगठन

सुरक्षित कार्यस्थल, स्वस्थ संगठन

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 



भारत के आईटी सेक्टर में महिला यौन उत्पीड़न (sexual harassment) के मामले हाल ही में बेहद गंभीर रूप ले चुके हैं। TCS नासिक यूनिट में यौन उत्पीड़न, धर्मांतरण और HR मैनेजर की गिरफ्तारी जैसे आरोपों ने पूरे सेक्टर में सनसनी मचा दी है। इंफोसिस पुणे जैसे अन्य मामलों ने भी इस विवाद को और गहरा किया है। 


ऐसे में मानव संसाधन प्रमुख (HR Head) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे संगठन की संस्कृति, नीतियों और कर्मचारी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं।


संगठनों को कार्यस्थल को सुरक्षित, सम्मानजनक और समावेशी (inclusive) बनाना चाहिए। यह केवल कानूनी अनुपालन (compliance) तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक परिवर्तन की मांग करता है। नीचे कुछ व्यावहारिक उपाय दिए गए हैं -


1. कार्यस्थल को बेहतर बनाने के व्यावहारिक उपाय


HR Head को नेतृत्व लेते हुए निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए - 


- स्पष्ट POSH नीति बनाएँ और लागू करें 

  10 या अधिक कर्मचारियों वाले हर संगठन को Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013 (POSH Act) के तहत यौन उत्पीड़न विरोधी नीति बनानी चाहिए। इसमें यौन उत्पीड़न की स्पष्ट परिभाषा, शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance), रिपोर्टिंग प्रक्रिया और परिणामों का उल्लेख होना चाहिए। इस नीति को कंपनी की वेबसाइट, इंटरनल पोर्टल और नोटिस बोर्ड पर प्रमुखता से (Prominently) प्रदर्शित किया जाए।


- आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन करें  

  10 या अधिक कर्मचारियों वाले हर संगठन में ICC का गठन अनिवार्य है। इसमें कम से कम 4 सदस्य हों — पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी, एक बाहरी सदस्य (NGO से) और अन्य सदस्य। HR Head को ICC को पूर्ण सहयोग देना चाहिए। हर शिकायत की जांच ICC द्वारा 90 दिनों के अंदर पूरी की जाए तथा पूर्ण गोपनीयता बनाए रखी जाए।


- नियमित जागरूकता प्रशिक्षण आयोजित करें  

  सभी कर्मचारियों के लिए वर्ष में कम से कम दो बार POSH जागरूकता प्रशिक्षण अनिवार्य करें। ICC सदस्यों के लिए अलग से विशेष ट्रेनिंग का प्रबंध करें। प्रशिक्षण इंटरैक्टिव और केस स्टडी आधारित हो।


- सुरक्षित रिपोर्टिंग तंत्र स्थापित करें  

  ईमेल, हेल्पलाइन, मोबाइल ऐप या थर्ड-पार्टी प्लेटफॉर्म के माध्यम से शिकायत दर्ज करने की सुविधा दें। प्रतिशोध (retaliation) से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दें। शिकायतकर्ता को आवश्यकता अनुसार काउंसलिंग और अवकाश उपलब्ध कराएँ।


- सकारात्मक संगठनात्मक संस्कृति विकसित करें   

  शीर्ष प्रबंधन से “Zero Tolerance” का स्पष्ट संदेश आए। विविधता और समावेशी (Diversity & Inclusion - D&I) नीति लागू करें जिसमें लिंग समानता, नाइट शिफ्ट सुरक्षा, फ्लेक्सिबल वर्किंग आदि शामिल हों। नियमित कर्मचारी सर्वेक्षण और ऑडिट कराएँ ताकि पता चल सके कि कर्मचारी कार्यस्थल को कितना सुरक्षित मानते हैं। मानसिक स्वास्थ्य सहायता कार्यक्रम भी चलाएँ।


- वार्षिक रिपोर्टिंग और ऑडिट सुनिश्चित करें  

  POSH Act के तहत वार्षिक रिपोर्ट फाइल करें। बाहरी ऑडिट करवाएँ ताकि अनुपालन में कोई कमी न रह जाए।


सारांश


यदि संगठन उपरोक्त कदम उठाता है, तो न केवल कानूनी जोखिम कम होगा, बल्कि कर्मचारियों की उत्पादकता, रिटेंशन और कंपनी की ब्रांड छवि भी मजबूत होगी। एक अच्छा कार्यस्थल वह है जहाँ हर कर्मचारी, खासकर महिलाएँ, सम्मान और सुरक्षा महसूस करें। यह केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है।


सुरक्षित कार्यस्थल = स्वस्थ संगठन


सादर, 

केशव राम सिंघल 

#POSH #WorkplaceSafety #WomenAtWork #ITIndustry #HRLeadership #DiversityAndInclusion #SafeWorkplace #HR


रविवार, 12 अप्रैल 2026

कथ्य-विशेष : अंतःकरण चतुष्टय और मैं

कथ्य-विशेष : अंतःकरण चतुष्टय और मैं: अंतःकरण चतुष्टय और मैं  **********  मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में क्या अंतर है? यह समझने की एक छोटी सी कोशिश।

सादर,
केशव राम सिंघल

शनिवार, 21 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - विषय-सूची (Index), प्रस्तावना (Preface) और समर्पण

कोरोना काल के संस्मरण 








विषय-सूची (Index)


लेखक - केशव राम सिंघल

प्रस्तावना (Preface) 

समर्पण

कोरोना काल के संस्मरण - भाग 1 - अंश 1 से 10 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 1 - उलझन के साथ भ्रम की स्थिति 

अंश 2 - स्पर्श खतरनाक 

अंश 3 - नर्स की व्यथा 

अंश 4 - मजदूर की व्यथा 

अंश 5 - स्पर्श की मनाही 

अंश 6 - देश की संसद मौन 

अंश 7 - बहुत से सवाल 

अंश 8 - सामूहिक शोक पर विराम 

अंश 9 - मुश्किल वक्त में लोगों की मदद 

अंश 10 - संवेदनाओं का अकाल 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 2 - अंश 11 से 20 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 11 - रोशनी के कण 

अंश 12 - अस्तित्व का संकट और प्रकृति का पुनर्जन्म 

अंश 13 - भरोसे का बिखराव 

अंश 14 - हाशिए के बार श्रमिक 

अंश 15 - अन्य बीमारियों के मरीज नियति के भरोसे 

अंश 16 - आसमान में दिखा आसमान का नीला रंग (काव्य) 

अंश 17 - राजनेताओं का एकाधिकारवादी रवैया 

अंश 18 -  कोई निश्चित इलाज नहीं 

अंश 19 - शिक्षा का संकट 

अंश 20 - बेरोजगारी 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 3 - अंश 21 से 30 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 21 - अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद 

अंश 22 - चिंताजनक वैश्विक स्थिति 

अंश 23 - बुजुर्ग 

अंश 24 - बेटियों का दवाब 

अंश 25 - प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत की खाई 

अंश 26 - मानवता की मिसाल 

अंश 27 - कोविड वैक्सीन (काव्य) 

अंश 28 - प्रार्थना (काव्य) 

अंश 29 - डर ही वायरस है (काव्य) 

अंश 30 - कोरोना एक भीषण युद्ध (काव्य) 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 4 - अंश 31 से 40 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 31 - हे कोरोना (काव्य) 

अंश 32 - मेरा माफीनामा (काव्य) 

अंश 33 - कोरोना काल (काव्य) 

अंश 34 - विडम्बना और त्रासदी 

अंश 35 - कड़वा सत्य 

अंश 36 - गरीबी भी महामारी 

अंश 37 - मशवरों का अम्बार 

अंश 38 - दुआ ही दवा (काव्य) 

अंश 39 - अँधेरे में तीर 

अंश 40 - एक समीक्षा 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 5 - अंश 41 से 50 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 41 - इतिहास की चेतावनी - 1918 की सीख 

अंश 42 - नियमों की व्याख्या 

अंश 43 - अनसुलझा प्रश्न 

अंश 44 - बुनियादी शिक्षा 

अंश 45 - श्रद्धांजलि 

अंश 46 - परिवर्तन - शाश्वत सत्य (काव्य) 

अंश 47 - सांसद की कोठी के बाहर (काव्य) 

अंश 48 - कफनखसोटों का मुल्क 

अंश 49 - वह देश का गरीब था (काव्य) 

अंश 50 - भयावह कालखंड 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 6 - अंश 51 से 60 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 51 - दुःख भरी दास्ताँ 

अंश 52 - सकारात्मक रहिए (काव्य) 

अंश 53 - सुरक्षा ही समाधान (काव्य) 

अंश 54 - सकारात्मकता और मानवता 

अंश 55 - जीवन दर्शन 

अंश 56 - बच्चों की शिक्षा 

अंश 57 - क्या स्कूल भेजना सुरक्षित?

अंश 58 - अजमेर से विदा और जनता कर्फ्यू की आहट 

अंश 59 - मन का वहम और 69 वर्ष का वह पड़ाव 

अंश 60 - सन्नाटा, प्रकृति और 21 दिनों की लक्ष्मण रेखा 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 7 - अंश 61 से 70 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 61 - पैदल महाप्रयाण और  व्यवस्था 

अंश 62 - सृजन और 'भीलवाड़ा मॉडल' 

अंश 63 - कैदी-जेलर द्वन्द और सेवाभाव को सलाम 

अंश 64 - विचलित मन, विसंगतियाँ और 5 अप्रेल की रोशनी 

अंश 65 - कृतज्ञता की दीये, घर की कैद और व्यवस्था का द्वन्द 

अंश 66 - टोटकों का देश 

अंश 67 - बेबसी और गुड्डी 

अंश 68 - दुःखद समाचार और परिस्थितियों के बीच 

अंश 69 - कन्टेनमेंट ज़ोन की घोषणा और अचानक यात्रा 

अंश 70 - अजमेर की पुकार और गुड्डी की सेवा 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 8 - अंश 71 से 74  (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 71 - युग का अंत और गुड्डी की अंतिम यात्रा 

अंश 72 - टीकाकरण की सुरक्षा और विदाई का अंतहीन सिलसिला 

अंश 73 - इतिहास का आइना और भविष्य की सीख 

अंश 74 - उपसंहार - स्मृतियों का पाथेय और एक नई सुबह - संकट में सृजन और समय का सदुपयोग 

लेखक परिचय 

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प्रस्तावना (Preface)

"कोरोना काल के संस्मरण - एक अंतर्यात्रा"

वर्ष 2020 की वह आहट, जिसने पूरी दुनिया की रफ्तार थाम दी थी, मेरे लिए केवल एक वैश्विक महामारी नहीं, बल्कि आत्म-मंथन और स्मृतियों को सहेजने का एक पड़ाव बन गई। आज जब मैं इन 74 अंशों की श्रृंखला को पाठकों के सम्मुख रख रहा हूँ, तो मन में संतोष और कृतज्ञता का मिला-जुला भाव है।


संस्मरण लिखना कितना कठिन कार्य है, इसका आभास मुझे तब हुआ जब मैंने कलम उठाई। डायरी के पन्नों में दर्ज नोट्स संक्षिप्त होते हैं, पर उन पन्नों के पीछे छिपी संवेदनाओं और विस्तार को शब्दों में ढालना एक बड़ी चुनौती थी। लिखते समय मैंने इस बात पर बहुत विचार किया कि अभिव्यक्ति की विधा क्या हो? अंततः मैंने तय किया कि जैसे-जैसे भाव मन में आएँगे, उन्हें वैसे ही कागज़ पर उतारूँगा। यही कारण है कि इस यात्रा में पाठकों को कभी गद्य मिलेगा, तो कभी पद्य।


इन संस्मरणों की विषयवस्तु केवल मेरी स्मृतियों तक सीमित नहीं है। इसमें मेरे स्वयं के लिखे नोट्स के साथ-साथ विभिन्न पुस्तकें, समाचार-पत्र, लेख, व्याख्यान और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का समावेश है। विशेष रूप से, आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), विशेषकर 'गूगल जैमिनी' के साथ हुए निरंतर संवाद ने मुझे कई स्थानों पर मार्गदर्शन और जानकारी प्रदान की है। मैं इन सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों के प्रति हृदय से आभार प्रकट करता हूँ।


प्रस्तुत संस्मरणों में दिए गए आँकड़े विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और तत्कालीन सूचनाओं पर आधारित हैं, जो अनुमानित हो सकते हैं। अतः यदि कोई पाठक इस विषय पर अकादमिक शोध या गंभीर विश्लेषण करना चाहे, तो उन्हें अधिकृत एवं आधिकारिक सरकारी स्रोतों से प्रमाणित आँकड़े प्राप्त करने की सलाह दी जाती है। यह संस्मरण सांख्यिकीय दस्तावेज़ से अधिक एक मानवीय अनुभव का जीवंत चित्र है।


70 वर्ष की आयु के इस पड़ाव पर, 'अहमदाबाद के उस 10x10 के कमरे' से लेकर 'अजमेर की पुकार' तक का यह सफर मेरे जीवन का सबसे संतोषजनक अध्याय है। उम्मीद है कि ये संस्मरण यह बता पाने में सफल रहेंगे कि आपदा के उस घने अंधेरे और डर के माहौल में भी हमने अपनों के साथ और सृजन की मशाल के सहारे रास्ता ढूँढ ही लिया।


सादर,

केशव राम सिंघल 

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समर्पण


यह संस्मरण श्रृंखला सादर समर्पित है—


मेरी प्रिय दिवंगत बहन 'गुड्डी' (सुधा) की पावन स्मृति को, जिसका शांत स्वभाव और कष्टों के बीच भी 'राम-राम' जपना मेरे लिए जीवन की सबसे बड़ी सीख बना। जिसके अंतिम पड़ाव में सेवा का अवसर मिलना मैं ईश्वर की विशेष कृपा मानता हूँ।


उन सभी 'कोरोना योद्धाओं' (चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, पुलिस और सफाईकर्मियों) को, जिन्होंने स्वयं के प्राणों की परवाह किए बिना मानवता की मशाल को जलाए रखा। साथ ही मैं मेरी बेटियों, दामादों और पत्नी का, जिनकी देखरेख के कारण मैं कोरोना काल में टूटने से बचता रहा और पढ़ने-लिखने में व्यस्त रहा। 


और उन अनगिनत दिवंगत आत्माओं को, जिन्होंने इस वैश्विक आपदा में हमसे विदा ली।यह लेखनी उन सभी के प्रति मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है।


सादर, 

केशव राम सिंघल

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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 8

कोरोना काल के संस्मरण - 8 


71

एक युग का अंत और 'गुड्डी' की अंतिम यात्रा


28 जनवरी 2021 को अजमेर नगर निगम के चुनाव थे। मधु और मैंने अपने नागरिक धर्म का पालन करते हुए वोट डाला। उसी दौरान मधु जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल से मिलने उनके घर गई। शरीर में एक अजीब सी थकान महसूस हो रही थी। बच्चों से लंबी चर्चा के बाद एक भारी मन से निर्णय लिया गया कि अब 70 की इस उम्र में हमारा अकेले अजमेर रहना ठीक नहीं। तय हुआ कि हम बारी-बारी से बेटियों के पास आते-जाते रहेंगे और बीच-बीच में अजमेर भी आते रहेंगे। अपनी जड़ों को छोड़ना कठिन था, पर बढ़ती उम्र और व्यावहारिकता के आगे झुकना पड़ा। 30 जनवरी 2021 को हम प्रदीप, दीप्ति और इनु के साथ बंगलुरु के लिए रवाना हो गए।


अभी बंगलुरु पहुँचे दो ही दिन हुए थे कि 1 फरवरी को मोहन का संदेश मिला—गुड्डी ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया था। वह निरंतर बेहोशी की स्थिति में थी और उसे नली के जरिए लिक्विड आहार दिया जा रहा था। अगले ही दिन, 2 फरवरी को उसका 62वाँ जन्मदिन था, पर नियति का क्रूर मजाक देखिए कि वह होश में भी नहीं थी। 3 फरवरी की सुबह 10 बजे हमें वह दुखद समाचार मिला जिसका अंदेशा तो था, पर मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था—गुड्डी हमें छोड़कर जा चुकी थी।


मैं बंगलुरु में होने के कारण जयपुर नहीं पहुँच सका। माघ कृष्ण षष्ठी, संवत 2077 के उस दिन तीनों भाइयों ने चाँदपोल शमशान घाट पर अपनी बहन का अंतिम संस्कार किया। गुड्डी का पूरा जीवन (62 वर्ष) शारीरिक कष्टों और दूसरों पर निर्भरता में बीता, पर उसका स्वभाव अत्यंत शांत था। अपनी कॉपी में निरंतर 'राम-राम' लिखना उसकी वह मूक प्रार्थना थी, जिससे शायद वह अपने अगले जन्म की राह सुगम कर रही थी। 9 फरवरी को पुष्कर में भाइयों द्वारा अस्थि-विसर्जन और 14 फरवरी को पैतृक घर में शांति हवन के साथ उसकी इस लोक की यात्रा पूर्ण हुई। मैंने बंगलुरु में रहकर प्रार्थना की। ईश्वर उसकी पुण्यात्मा को सद्गति प्रदान करे। सादर नमन, ओम शांति।


72

टीकाकरण की सुरक्षा और विदाई का अंतहीन सिलसिला


2021 की शुरुआत उम्मीद की एक नई किरण 'टीकाकरण' के साथ हुई। मार्च और अप्रैल 2021 में मधु और मैंने बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड स्थित कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल में वैक्सीन की दोनों डोज़ लगवाईं। सुरक्षा का कवच तो मिल गया था, पर नियति का क्रूर प्रहार थमा नहीं था। 26 अप्रैल को इंदौर से मधु के भाई अशोक अग्रवाल जी के निधन का समाचार मिला, और अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि 22 मई को अजमेर के मित्तल हॉस्पिटल में जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल भी हमें छोड़कर चले गए। अगस्त 2021 में मित्र ओम प्रकाश जी की पत्नी और जनवरी 2022 में भाई मोहन के साले डॉ. हेमंत अग्रवाल का देहावसान हुआ। ऐसा लगता था जैसे इंसान और कोरोना के बीच एक अंतहीन युद्ध चल रहा है, जहाँ कभी हम जीतते, तो कभी हार जाते। नियति की आगे किसी का वश नहीं, यही सोच कर मन को तसल्ली दे लेते। भगवान् सभी दिवंगत आत्माओं को शान्ति प्रदान करे।  ओम शान्ति।


सरकार टीकाकरण को लेकर अत्यंत सजग थी। हम बेंगलुरु में थे, पर अजमेर के बीएलओ (BLO) ने फोन कर हमारी वैक्सीनेशन स्थिति की पुष्टि की। नवंबर 2021 में जब हम वापस अजमेर पहुँचे, तो बंद घर की उदासी दीमक के रूप में दीवारों पर चिपकी मिली। सीलन और दीमक ने मेरी प्रिय पुस्तकों को काफी नुकसान पहुँचाया था, जो मेरे लिए एक व्यक्तिगत आघात था। पेस्ट कंट्रोल के बाद हम कुछ दिन वहाँ रुककर अहमदाबाद होते हुए गोवा आ गए।


अब कोरोना जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका था। शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा हो जिसने इस महामारी में अपना कोई प्रिय न खोया हो। गोवा के सांखली स्थित सरकारी अस्पताल में 20 जनवरी 2022 को हमने 'प्रिकॉशन डोज़' (तीसरी खुराक) भी लगवाई। इसी बीच अहमदाबाद से शिव्या के संक्रमित होने की खबर ने फिर बेचैन किया, पर सात दिनों के एकांतवास और दवाओं के बाद वह 'नेगेटिव' आ गई। धीरे-धीरे समय का पहिया घूमा, प्रकोप कम हुआ और देश की गतिविधियाँ पुनः पटरी पर लौटने लगीं। 70 वर्ष की दहलीज पर, हालाँकि कई बार मुझे हल्का बुखार हुआ, कभी-कभी खाँसी भी हुई, बहुत बार नकसीर भी आई, पर स्थितियाँ हर बार परिवार वालों के सहयोग से संभलती रहीं और मैं कोरोना की चपेट में आने से बचा रहा। परिवार के सहयोग और सजगता ने मुझे इस अदृश्य शत्रु से बचाए रखा।  


73

इतिहास का आईना और भविष्य की सीख


वर्ष 2021 के बीतते-बीतते जीवन की पटरी पर रौनक लौटने लगी थी। स्कूल, दफ्तर और बाज़ार अपनी पुरानी गहमा-गहमी में वापस आ रहे थे। अंततः 5 मई 2023 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोविड-19 को 'वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल' की श्रेणी से बाहर कर दिया। आंकड़ों की नज़र से देखें तो इस महामारी ने विश्व भर में लगभग 7.1 मिलियन (71 लाख) और भारत में आधिकारिक तौर पर 5.34 लाख से अधिक जीवन निगल लिए।


इतिहास के पन्ने पलटें, तो ठीक सौ साल पहले 1918-19 के 'स्पेनिश फ्लू' ने इससे भी भयानक तांडव मचाया था। उस समय न कोई वैक्सीन थी, न एंटीबायोटिक्स। भारत तब ब्रिटिश दासता में था और एक अनुमान के अनुसार सवा करोड़ भारतीयों ने अपनी जान गंवाई थी। मेरे परिवार का इतिहास भी उस त्रासदी से अछूता नहीं रहा; मेरे दादा-दादी बताते थे कि मेरे परदादा जी का देहांत उसी महामारी के दौरान हुआ था।


कोविड-19 की इस अग्निपरीक्षा ने मानव सभ्यता को दस अमूल्य पाठ पढ़ाए हैं -


(1) पूर्व तैयारी - एक मज़बूत स्वास्थ्य ढांचा और आकस्मिक चुनौतियों के लिए सदैव तत्पर रहना अनिवार्य है।

(2) विज्ञान की शक्ति - त्वरित अनुसंधान और वैक्सीन निर्माण ही जीवन रक्षक कवच हैं।

(3) स्वास्थ्य समानता (Equity) - दवाओं और टीकों का वितरण न्यायसंगत होना चाहिए, ताकि अमीर-गरीब का भेद जान न ले।

(4) मानसिक स्वास्थ्य - अलगाव और आर्थिक तनाव से उपजी एंग्जायटी को गंभीरता से लेना ज़रूरी है।

(5) सामुदायिक विश्वास - स्थानीय नेतृत्व और आपसी भरोसे ने ही संकट में ढाल का काम किया।

(6) सटीक सूचना - 'इन्फोडेमिक' (गलत सूचनाओं) से लड़ना और सही जानकारी पहुँचाना जान बचाने जितना ही महत्वपूर्ण है।

(7) अनुकूलनशीलता - मनुष्य ने ऑनलाइन शिक्षा और टेलीवर्क के ज़रिए साबित किया कि वह बदलती स्थितियों में ढल सकता है, पर विज्ञान के प्रति अनुकूलनशीलता सदैव आवश्यक है।

(8) आपूर्ति शृंखला - आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला को संकट के लिए और अधिक लचीला बनाना होगा।

(9) धैर्य और सेवा - मुश्किल हालात में घबराने के बजाय एक-दूसरे का संबल बनना ही असली मानवता है।

(10) वैश्विक सहयोग - सीमाएँ देशों को बांट सकती हैं, पर वायरस सीमाओं को नहीं मानता; अतः वैश्विक एकजुटता ही हमारा भविष्य है।


74

उपसंहार - स्मृतियों का पाथेय और एक नई सुबह


आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो 2020 से 2022 का वह समय किसी डरावने सपने जैसा लगता है, लेकिन उस सपने में भी अपनों के प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की सुहानी धूप खिली हुई थी। वह 10x10 का कमरा, हाथ पर बँधा वह स्टेप-काउंटर, 'इनु' की मासूम चहक, बेटियों की वह चिंता भरी झिड़की और सभी का वह निस्वार्थ सेवा भाव—ये सब अब मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं।


बहन 'गुड्डी' का जाना एक व्यक्तिगत शून्य छोड़ गया, पर संतोष इस बात का है कि उसके 'शेष' समय को हम 'विशेष' बना सके। कोरोना ने हमसे बहुत कुछ छीना, हमारे कई प्रियजनों को हमसे दूर कर दिया, लेकिन उसने हमें 'ठहरना' भी सिखाया। उसने हमें बताया कि तकनीक कितनी भी आगे निकल जाए, अंततः एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ और प्रकृति के सान्निध्य की ही आवश्यकता होती है।


अब जीवन फिर से अपनी पुरानी लय में है। अजमेर की गलियों में फिर वही रौनक है, गोवा के समुद्र में वही संगीत है और अहमदाबाद की व्यस्तता वैसी ही है। पर हम वह पुराने इंसान नहीं रहे; हम अब अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक कृतज्ञ हैं। विज्ञान ने हमें वैक्सीन दी, तो ईश्वर ने हमें एक-दूसरे का हाथ थामने का साहस दिया।


यह संस्मरण केवल मेरी डायरी के पन्ने नहीं हैं, बल्कि उस ऐतिहासिक कालखंड का एक छोटा सा दस्तावेज़ है, जिसे मैंने जिया है। मेरी लेखनी यहाँ विराम लेती है, पर स्मृतियाँ सदैव जीवंत रहेंगी। आशा है कि आने वाली पीढ़ियाँ जब इन पन्नों को पलटेंगी, तो वे केवल महामारी का डर नहीं, बल्कि मानवता की उस अजेय शक्ति को देखेंगी जिसने हारना नहीं सीखा। "रात कितनी भी काली क्यों न हो, सुबह का सूरज उगना तय है।"


संकट में सृजन - समय का सदुपयोग 


इस महामारी के दौर ने जहाँ सभी के लिए शारीरिक सीमाएँ तय कर दी थीं, वहीं मानसिक विस्तार के नए द्वार भी खोले। मैंने उस एकांत और अनिश्चितता के समय को पाठन और लेखन के नाम कर दिया। मुझे संतोष है कि कोरोना काल के उस कठिन समय में लिखीं मेरी निम्नलिखित पुस्तकें 'अमेज़न किंडल' पर प्रकाशित हुईं, जो आज भी पाठकों के लिए उपलब्ध हैं -


(1) अजमेर की दास्ताँ (3 मई 2021) - अपनी जड़ों और शहर की जानकारी को समर्पित।

(2) Training Handbook on ISO 9001:2015 QMS Awareness (6 मई 2021) - गुणवत्ता प्रबंधन जागरूकता के लिए।

(3) बिटकॉइन क्या है? (10 जून 2021) - नई डिजिटल अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास।

(4) Future Banking is Lean Banking (10 सितम्बर 2021) - बैंकिंग क्षेत्र में प्रक्रियाओं को समझने और सुधारने का एक प्रयास।

(5) Understanding Circular Economy (25 अप्रैल 2022) - सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अध्ययन।

(6) Implementing An Effective Quality Management System (7 सितम्बर 2023) - प्रभावशाली गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली लागू करने के लिए।


उपर्युक्त पुस्तकें महामारी के उस दौर के मेरे 'लेखन पुरुषार्थ' का प्रमाण हैं, जिसने मुझे टूटने नहीं दिया और महामारी के दौरान मुझे व्यस्त रखा। मेरी ये किताबें केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि उस अंधकार में जलाई गई मेरी अपनी मशालें थीं।


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

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लेखक परिचय 

केशव राम सिंघल 

बहुमुखी प्रतिभा, मानवतावादी दृष्टिकोण और निरंतर सृजनशील व्यक्तित्व


केशव राम सिंघल एक ऐसी विलक्षण प्रतिभा हैं, जिनका जीवन विविध क्षेत्रों के गहन ज्ञान और अनुभवों का संगम है। बैंकिंग, गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (QMS), ऑडिटिंग, प्रकाशन, संपादन और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में आपकी विशेषज्ञता समाज के लिए प्रेरणादायी है।


अनुभवी बैंकर - 'बैंक ऑफ इंडिया' से मिडल मैनेजमेंट (ग्रेड-II) अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त, जहाँ आपने वित्तीय तंत्र की सूक्ष्मताओं को आत्मसात किया।


विशेषज्ञता - गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (ISO 9001:2015) और क्यूएमएस ऑडिट में दीर्घकालीन अनुभव।


सृजनशील लेखक व प्रशिक्षक - जटिल अवधारणाओं को सीखकर उन्हें सरल भाषा में जनमानस तक पहुँचाने की अद्भुत क्षमता।


14 मार्च 1951 (गाजियाबाद) में जन्मे श्री सिंघल एक ध्येयनिष्ठ, आशावादी और सामाजिक व्यक्तित्व हैं। व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की आपकी दूरदृष्टि ही आपको निरंतर सक्रिय रखती है। एक संवेदनशील श्रोता और समर्पित कार्यकर्ता के रूप में आप विभिन्न संगठनों से जुड़कर 'मानवता के कल्याण' हेतु कार्यरत हैं।


सृजन पथ - कोरोना काल की आपदा को 'अवसर' और 'अध्ययन' में बदलकर आपने 6 पुस्तकें 'अमेज़न किंडल' पर प्रकाशित कीं, जो आपके अटूट 'लेखन पुरुषार्थ' का प्रमाण हैं।


🔗 विस्तृत परिचय: https://profile-keshavramsinghal.blogspot.com/

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कोरोना काल के संस्मरण - 7

 कोरोना काल के संस्मरण - 7 


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मजदूरों का पैदल महाप्रयाण और व्यवस्था की दरारें


24 मार्च की रात आठ बजे घोषणा हुई और केवल चार घंटे बाद ही देश थम गया। इस 'थमे हुए देश' में जो सबसे तेज़ गति से चला, वह था 'बेबस मजदूर'। हजारों-लाखों प्रवासी श्रमिक अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए, सिर पर गृहस्थी की पोटली रखे, हजारों किलोमीटर के सफर पर पैदल ही निकल पड़े। उनके लिए न तो रोज़गार बचा था, न ही छत की गारंटी। परिवहन के सारे साधन—रेल, सड़क, वायु—बंद थे।


हमारी सोसायटी के घरों में अखबारों का वितरण थम चुका था, इसलिए खबरों के लिए ई-पेपर और टीवी ही मेरा सहारा थे। बरेली में मजदूरों पर केमिकल छिड़काव की खबरें हों या बिहार में उन्हें जेल भेजे जाने की बेबसी—हर सूचना मन को विचलित कर रही थी। अनुमानतः दस करोड़ प्रवासी मजदूरों को जैसे व्यवस्था ने उनके हाल पर छोड़ दिया था। एक ओर केंद्र सरकार ने जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत आवंटित किया, वहीं ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने बीस प्रतिशत तक का प्रावधान किया था।


उत्तर प्रदेश और दिल्ली राज्य सरकारों के बीच समन्वय का अभाव और एक-दूसरे पर दोषारोपण ने इस मानवीय संकट को और गहरा कर दिया। केंद्र का 'जहाँ हैं वहीं रुकें' का आदेश और राज्यों की 'घर वापसी' की आधी-अधूरी तैयारी के बीच मजदूर पिसता रहा। 30 मार्च आते-आते विभिन्न राज्यों से उठता हुआ यह जनसैलाब राजनीति का मोहरा बन गया। उन मजदूरों के पैरों के छाले दरअसल हमारे तंत्र की विफलता के गवाह थे।

 

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सृजन का सम्बल और 'भीलवाड़ा मॉडल' की धमक


अहमदाबाद के उस फ्लैट में स्थितियाँ विकट थीं, पर मैंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। नकारात्मक खबरों के बीच मन को शांत रखने के लिए मैंने कई लघु-कथाएँ और कहानियाँ लिखीं, फेसबुक और अपने ब्लॉग पर साझा किया। उस दौर में पढ़ना और लिखना ही मेरे लिए 'क्वालिटी टाइम' की एक छोटी सी खिड़की थी।


इसी दौरान मेरे गृह-राज्य राजस्थान से एक आशा की किरण दिखी—'भीलवाड़ा मॉडल'। तत्कालीन जिलाधीश राजेंद्र भट्ट और मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मुश्ताक खान के नेतृत्व में भीलवाड़ा ने जो 'महाकर्फ्यू' और 'स्क्रीनिंग' का साहस दिखाया, वह पूरे देश के लिए नज़ीर बन गया। 24 लाख लोगों की स्क्रीनिंग करना कोई साधारण बात नहीं थी। जब देश कोरोना संक्रमण से लड़ना सीख ही रहा था, तब भीलवाड़ा प्रशासन ने अपनी सीमाएं सील कर वायरस को वहीं रोकने का अभूतपूर्व प्रयास किया।


मार्च 2020 का अंत आर्थिक और कानूनी मोर्चों पर भी उथल-पुथल भरा था। वित्तीय वर्ष 2019-20 के समापन पर केंद्र सरकार ने 'अनुपालन' (Compliance) की तारीखें आगे बढ़ाईं, जिससे आम आदमी को थोड़ी राहत मिली। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि शेल्टर होम का प्रबंधन पुलिस नहीं, बल्कि स्वयंसेवक करें और वहां 'शक्ति' का प्रयोग वर्जित हो। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के वे शब्द आज भी कानों में गूँजते हैं कि गाँवों की ओर लौटते हर दस में से तीन मजदूर संक्रमित हो रहे थे। यह एक ऐसी लड़ाई थी जहाँ दुश्मन अदृश्य था और डर साक्षात।


उस समय की एक लघु कथा - राजा की मुनादी - सभी होशियार रहें !

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सभी जगह सन्नाटा पसरा है। राज्य में राजा ने मुनादी करवा दी है कि जो जहां है, उसी जगह रुक जाए। कोई आना जाना नहीं। एक भयंकर सूक्ष्म जीवाणु निकला है घूमने। जो उसके रास्ते में आएगा, उसका वह काल बन जाएगा।

सूक्ष्म जीवाणु स्वतंत्र घूम रहा है और प्रकृति पर विजय की चाह रखने वाला अहंकारी मानव अपने घरों में कैद है। हा ... हा ... हा ...!

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मन में कैदी-जेलर द्वंद्व और सेवाभाव को सलाम


अहमदाबाद के उस फ्लैट में रहते हुए मुझे कभी-कभी लगता था कि मैं स्वयं की कैद में हूँ। वह फ्लैट मेरा जेलखाना बन गया था, जहाँ मैं ही कैदी था और मैं ही जेलर। मेरा मन कैद को छोड़कर भाग जाना चाहता था, पर विवेक का जेलर उसे सुरक्षा के नाम पर वापस पकड़ लेता था।


इस कठिन समय में 'डिजिटल इंडिया' का एक वरदान रूप सामने आया। शिव्या घर की ज़रूरतें और दवाइयाँ ऑनलाइन ऑर्डर कर देती थी। रात नौ बजे से पहले किया गया ऑर्डर अगली सुबह दरवाज़े पर टंगे थैले में मिल जाता था। दूधवाला हो या डिलीवरी बॉय, ये वे 'अदृश्य कोरोना योद्धा' थे जो अपनी जान हथेली पर रखकर हमें जीवन की सुगमता दे रहे थे। इन सेवाभावियों को मेरा शत-शत नमन।


परंतु, हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं था। उसी दौरान 'लाइव हिन्दुस्तान' की एक रिपोर्ट पढ़कर मन कराह उठा। नोएडा से जालौन तक 200 किलोमीटर का सफर पैदल तय करने वाली एक 8 माह की गर्भवती महिला की कहानी व्यवस्था की विफलता और मानवीय जिजीविषा का चरम थी। ठेकेदार द्वारा पैसे रोके जाने के कारण उन्हें निकलने में देरी हुई, फिर भी दो दिन-रात पैदल चलकर वे अपने गाँव पहुँचे। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि उस अवस्था में उस महिला ने किन परिस्थितियों का सामना किया होगा।


इन विचलित करने वाली खबरों के बीच मैंने तय किया कि समय का सदुपयोग किया जाए। एक प्रोफेशनल होने के नाते मैंने ISO 9001:2015 QMS Awareness पर एक निःशुल्क ऑनलाइन ट्रेनिंग कोर्स शुरू करने का निश्चय किया। अपने ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी साझा की और ट्रेनिंग मटेरियल तैयार करने में जुट गया। आपदा के उस सन्नाटे में 'सृजन' ही मेरा संबल बना। ट्रेनिंग मटीरियल, आवश्यक सम्प्रेषण और असाइनमेंट मैं ईमेल से भेजता था। ट्रेनर-ट्रेनी के बीच बातचीत का माध्यम WhatsApp था। इस ट्रेनिंग में देश के विभिन्न भागों से लोगों ने भाग लिया। एक ट्रेनी तो विदेश (Phillipines) से भी था। 


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विचलित मन, विसंगतियां और 5 अप्रैल की वह रोशनी


अहमदाबाद के सरखेज सर्कल के पास उस एकांत सोसाइटी में मेरा जीवन घर की दीवारों तक सिमट गया था। शिव्या ही बाहरी दुनिया और सोसाइटी के वॉट्सएप्प ग्रुप की खबरों का मेरा एकमात्र सेतु थी। मन बाहर टहलने को मचलता, पर अंततः घर के भीतर ही टहलकदमी कर शांत हो जाता।


खबरों का संसार उस समय हृदय विदारक था। आंध्र प्रदेश में एक पिता का अपने मासूम बेटे के शव को कंधे पर रखकर 88 किलोमीटर पैदल चलना व्यवस्था की शून्यता को दर्शाता था। जहाँ एक ओर साधन संपन्न लोग पान जैसी मामूली चीज़ों के लिए कंट्रोल रूम को परेशान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर हजारों किलोमीटर दूर से ठेला चलाकर घर लौटते मजदूरों की दास्ताँ मानवता की परीक्षा ले रही थी। सरकार ने हरिद्वार में फंसे श्रद्धालुओं को तो बसों से घर पहुँचाया, पर सड़कों पर पैदल चलते उन बेबस मजदूरों के लिए समन्वय की भारी कमी दिखी।


उसी दौरान हमारे दूधवाले का फोन आया। उसने पूछा कि क्या हमें और अधिक दूध चाहिए? उसकी बातों से पता चला कि लॉकडाउन ने ग्रामीण दूध व्यवसाय की कमर तोड़ दी थी। ग्राहकों के न मिलने और परिवहन ठप होने से दूध वाले औने-पौने दामों पर दूध बेचने को मजबूर थे। यह देखना दुःखद था कि जहाँ शहरों में लोग दूध के लिए परेशान थे, वहीं गाँवों में पशुपालकों का निवेश मिट्टी में मिल रहा था।


इन नकारात्मकताओं के बीच मैंने अपना 'डिजिटल मोर्चा' संभाला। फेसबुक पर "तालाबंदी के दौरान की कविता" समूह बनाकर कवियों को एक मंच दिया। उधर, प्रकृति ने अपनी छटा बिखेरनी शुरू की—प्रदूषण मुक्त हवा के कारण जालंधर से हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दिखने लगीं और गंगा का पानी आचमन योग्य हो गया।


5 अप्रैल 2020 की रात ठीक 9 बजे, प्रधानमंत्री के आह्वान पर हमने भी अपनी रसोई की खिड़की पर नौ दीये जलाए। मन में एक तार्किक प्रश्न जरूर उठा कि क्या इन दीयों से वायरस भागेगा? पर जब खिड़की से बाहर देखा, तो हर घर से आती वह रोशनी उस सामूहिक संकल्प और अकेलेपन के विरुद्ध एक युद्ध जैसी लग रही थी। वह दीया वायरस मारने के लिए नहीं, शायद उम्मीद को जीवित रखने के लिए था।


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कृतज्ञता के नौ दीये, घर की कैद और व्यवस्था का द्वंद्व


5 अप्रैल 2020 की रात ठीक नौ बजे, हमने नौ दीये जलाए। वे केवल रोशनी नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रार्थना थी। पहला दीया देश और समाज कल्याण के लिए था, तो अन्य दीये स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों, पुलिस, मीडिया, दूधवालों और बैंक कर्मचारियों की सलामती के लिए थे। अंतिम दीया अपनों और मित्रों की कुशलता के लिए समर्पित था।


उस समय केवल लोग ही नहीं, बीमा कंपनियाँ भी इस वायरस से सहमी हुई थीं। उन्हें चिंता थी कि निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर आने वाले लाखों के बिल उनके बजट को बिगाड़ देंगे। भय ऐसा था कि लोग पूरी तरह घरों में कैद थे। मैं भी 19 मार्च से अहमदाबाद में शिव्या के साथ था। वह दिनभर एक कमरे में ऑफिस का काम करती और मैं दूसरे कमरे में रहता। मेरा वह 10x10 वर्गफुट का कमरा ही मेरी दुनिया थी। शिव्या मुझे घर का काम नहीं करने देती थी, पर मैं मन बहलाने के लिए कभी मेथी-पालक साफ़ कर देता, कभी सब्जी काट देता या आटा गूँथ देता। बर्तन धोने की तो सख्त मनाही थी। घर से बाहर निकलना वर्जित था, इसलिए मैं कमरे से हॉल तक ही चहल-कदमी करता। मेरा 'हैंड-बैंड' रोज़ाना लगभग 6000 कदम दर्ज करता था—यही मेरा एकमात्र व्यायाम था।


एकांत के उन दिनों में जयपुर से मित्र ओम प्रकाश स्वर्णकार का फोन आना या बेटियों से वीडियो कॉल पर बात करना सुकून देता था। उधर, वैश्विक स्थिति भयावह थी। अप्रैल के प्रारंभ तक लाखों संक्रमित हो चुके थे, पर शीर्ष नेता किसी अंधेरे कमरे में उस 'काली बिल्ली' को ढूंढ रहे थे जो वहाँ थी ही नहीं। भारत में 4 अप्रैल तक केवल 75 हज़ार टेस्ट हुए थे, जबकि अमेरिका और जर्मनी लाखों में जाँचें कर रहे थे। 'सीआईआई' की रिपोर्ट 52 प्रतिशत नौकरियों के जाने का खतरा जता रही थी।


डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने 'राष्ट्रदूत' में सटीक लिखा था कि यह 'साँप-सीढ़ी' का खेल बन गया है, जहाँ एक चूक हमें वापस नीचे पटक देती है। 5 अप्रैल की रात को लेकर समाज बँटा हुआ था। किसी ने इसे 'नीरो के बंशी बजाने' जैसा बताया, तो किसी ने पटाखों के शोर पर व्यंग्य किया। विडंबना देखिए—देश में लोग ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे थे और कुछ लोग दीये के नाम पर पटाखे फोड़कर जश्न मना रहे थे। किसी ने चुटकी ली कि हनुमान जी की तरह हम भी अति-उत्साही भक्त हैं—प्रभु ने दीया जलाने को कहा और हमने लंका फूँकने जैसा माहौल बना दिया।


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टोटकों का देश, कड़वा सच और लॉकडाउन का अनंत विस्तार


उस दौर के भारीपन को कम करने के लिए हास्य-व्यंग्य ही एक सहारा था। उन दिनों मैंने एक कविता लिखी, जो उस समय के सामूहिक मनोविज्ञान को दर्शाती थी -


टोटकों वाला देश है मेरा


टोटकों वाला देश है मेरा, 

टोटका करने में क्या जाता है मेरा?

जब दिखता नहीं कोई रास्ता, 

तब टोटका जोड़ देते हैं बचाव का वास्ता।


विश्व में हमारे देश का नाम है, 

हमारी अनूठी परम्पराओं की अलग पहचान है।

टोटकों से बनती हमारी अपनी आन-बान-शान है, 

लगता है टोटकों से बचेगी हमारी जान है।


कोरोना से बचना है तो, बार-बार हाथ धोना सीख ले,

लोगों से दूर एकांत में अकेला रहना सीख ले।

बचाव का अभी तक कोई टीका बना नहीं, 

बचना है तो ताली-थाली बजाना सीख ले,

खुद अंधेरे में दीया जलाना सीख ले।


जान ले, कोरोना ने बहुतों को मारा है, 

अब संक्रमण से बचना ही एकमात्र सहारा है।

रास्ता कोई और दिखता नहीं, 

टोटका भी एक सहारा है।


लिखने-पढ़ने की इस व्यस्तता ने मुझे सुस्ती और मानसिक बोझ से बचाए रखा। मुझे बरसों से 'नकसीर' (नाक से खून आने) की समस्या थी, जिससे मेरी तीनों बेटियाँ सदैव चिंतित रहती थीं। पर मैंने स्वयं को ISO 9001 QMS Awareness ट्रेनिंग प्रोग्राम में पूरी तरह झोंक दिया था। ट्रेनिंग मटेरियल तैयार करना और देश-विदेश से आए प्रतिभागियों के असाइनमेंट जाँचना—यही मेरी दिनचर्या थी। बस दुःख एक ही था कि उस 10x10 के कमरे वाले फ़्लैट से बाहर कदम रखना मुमकिन न था।


वैश्विक परिदृश्य भी कम विचित्र न था। शक्तिशाली अमेरिका अपने नागरिकों को विमान भरकर भारत से निकाल रहा था। उधर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी चिर-परिचित आदत के अनुसार 'हाइड्रोक्लोरोक्वीन' दवा के निर्यात को लेकर भारत को धमकी भरे लहजे में चेतावनी दे रहे थे। हमारी 'वसुधैव कुटुम्बकम' की संस्कृति ने उस दबाव को भी झेला और व्यापक मानवीय जरूरतों को देखते हुए निर्यात से रोक हटा ली।


समाज का एक कड़वा सच यह भी दिखा कि इस महामारी की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी। विडंबना देखिए—संक्रमण अमीर लाए, जो विदेश यात्राओं से हवाई जहाज में बैठकर आए थे और जिन्होंने क्वारंटाइन नियमों का पालन नहीं किया था, पर तोहमत उन गरीबों पर मढ़ी गई जो सड़क पर पैदल चलने को मजबूर थे। वाराणसी की वह हृदय विदारक घटना जिसमें एक पत्नी को अपने पति की अर्थी के लिए चार कंधे तक नसीब नहीं हुए और उसे स्वयं मुखाग्नि देनी पड़ी, यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के टूटने का चरम था।


15 अप्रैल से ट्रेनों के चलने की एक धुंधली सी आस थी, पर 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने राज्यों की सिफारिश पर लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया। इसके बाद यह सिलसिला थमा नहीं—1 मई को इसे 17 मई तक और फिर 17 मई को इसे 31 मई तक बढ़ा दिया गया। पूरा देश लाल, नारंगी और हरे ज़ोन में बँट चुका था। 'अजमेर वापसी' का सपना अब तारीखों के इस जाल में कहीं उलझ कर रह गया था।


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बेबसी और 'गुड्डी'  


अहमदाबाद की गर्मी मुझे अजमेर से कहीं अधिक प्रतीत हुई, पर सौभाग्य से फ्लैट के दोनों कमरों में एसी (AC) होने के कारण शारीरिक राहत मिली। मन तो बार-बार अजमेर के बंद घर की ओर भागता, पर लॉकडाउन की बंदिशों और बच्चों की जायज़ झिड़कियों के आगे मैं विवश था। उनकी अपनी मजबूरियाँ थीं और बाहर के हालात भी अनुकूल नहीं थे।


इसी बीच जून 2020 में एक ऐसी पारिवारिक खबर आई जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। मेरी छोटी दिव्यांग बहन सुधा (गुड्डी), जो 60 वर्ष की थी और जयपुर के पैतृक मकान में भाई मोहन के साथ रहती थी, के सीने में 'ब्रेस्ट ट्यूमर' का पता चला। पूरा देश कोरोना से लहूलुहान था और उसी दौरान गुड्डी के कैंसर की स्थिति गंभीर बताई गई। 22 जून 2020 को जयपुर स्थित भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल में उसका टेस्ट हुआ और दुर्भाग्य से वह कोरोना पॉजिटिव भी पाई गई।


23 जून को भाई मोहन और महेश उसे लेकर सीतापुरा स्थित महात्मा गाँधी हॉस्पिटल (MGH) पहुँचे। वहाँ एक अजीब प्रशासनिक बाधा आई; शाम तक उसका नाम कोरोना मरीजों की सरकारी लिस्ट में अपडेट नहीं हुआ था, जिस कारण उसे भर्ती करने में घंटों की देरी हुई। अंततः जब उसे भर्ती किया गया, तो नियम इतने सख्त थे कि मरीज के साथ कोई अटेंडेंट नहीं रह सकता था। वह अपाहिज बहन, जो ठीक से सीधी लेट भी नहीं सकती थी, अस्पताल के कमरे में 'भगवान भरोसे' अकेले छोड़ दी गई। मोहन रात 11 बजे घर पहुँच पाया क्योंकि कर्फ्यू और टैक्सी न मिलने के कारण रास्ते बंद थे।


अहमदाबाद में बैठा मैं व्याकुल था। मेरे तीनों भाई—मोहन, महेश और गोपाल—जयपुर में थे, पर संक्रमण के डर और सरकारी गाइडलाइन्स के कारण वे सब 'होम क्वारंटाइन' में थे। मेरी व्याकुलता देख शिव्या ने तुरंत मोहन के खाते में सहायता राशि भेजी ताकि इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सके। गोवा से दिव्या ने अस्पताल के डॉक्टर शशांक मेहरा से संपर्क किया और बुआ की दिव्यांगता के बारे में बताया, जिस पर उन्होंने नर्सिंग स्टाफ द्वारा विशेष ध्यान रखने का आश्वासन दिया।


गुड्डी अकेले उस 6500 रुपये प्रतिदिन वाले कमरे में कैसे समय बिताती होगी, यह सोचकर मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहता। 30 जून को राहत मिली जब उसके दो कोविड टेस्ट नेगेटिव आए। 1 जुलाई को वह घर लौटी, पर संकट टला नहीं था। ट्यूमर से ब्लीडिंग इतनी ज्यादा थी कि बिस्तर लाल हो जाता। बायोप्सी रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कैंसर अंतिम चरण में था। अपाहिज होने के कारण न तो उसका ऑपरेशन संभव था और न ही वह कीमोथेरेपी सहन कर पाती। गुड्डी को आयुर्वेद अस्पताल भी दिखाया गया। डॉक्टरों ने केवल दवाइयाँ ही उचित समझीं। उन दिनों मोबाइल पर मोहन और गुड्डी से बात होती, तो उसकी तकलीफ सुन गला भर आता। अस्पताल से लौटने के बाद उसे दस्त भी हो गए थे। शिव्या ने पुनः सहायता राशि भेजी, क्योंकि कैंसर की दवाइयाँ बहुत महँगी थीं। मैं अलग शहर में था, बस दुआ ही कर सकता था— "हे भगवान! अब तेरा ही आसरा है।" 


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दुःखद समाचार और परिस्थितियों के बीच 


जुलाई 2020 का अंत एक दुःखद समाचार लेकर आया। अजमेर के प्रतिष्ठित समाजसेवी और मेरे प्रिय मित्र नवीन सोगानी जी का देहावसान हो गया। मन अत्यंत व्यथित हुआ; समाज ने एक सच्चा सेवाभावी खो दिया था। नियति के आगे किसी का वश नहीं चलता, यही सोचकर स्वयं को ढांढस बंधाया। सादर नमन, ओम शांति।


अगस्त के अंत में जानकारी मिली कि दीप्ति के ससुर (जो बांसवाड़ा के गढ़ी गाँव में रहते थे) का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। 1 सितंबर 2020 को उनके बड़े बेटे प्रमोद उन्हें टैक्सी से लेकर अहमदाबाद के 'किडनी हेल्थ हॉस्पिटल' पहुँचे। रास्ते में दोनों की तबीयत भी नासाज थी। स्थिति की गंभीरता देख प्रदीप, दीप्ति और छोटी इनु तुरंत बंगलुरु से फ्लाइट पकड़कर अहमदाबाद आ गए। इनु को हमारे पास छोड़कर दोनों अस्पताल की व्यवस्थाओं में जुट गए। दीप्ति के मौसी के बेटे अनुज ने अपनी कार उन्हें उपलब्ध कराई, जिससे इस कठिन समय में आवाजाही आसान हो गई। प्रमोद भी पाँच-छह दिन अस्पताल में भर्ती रहे, आखिरकार कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट आने पर हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर गढ़ी लौट सके। 


अस्पताल में ससुर जी को 'प्लाज्मा' चढ़ाने की नितांत आवश्यकता थी। उस समय प्लाज्मा डोनर मिलना किसी चुनौती से कम नहीं था। अंततः सोशल मीडिया पर की गई अपील रंग लाई और एक निस्वार्थ डोनर मिल गया। उधर प्रमोद की तबीयत खराब होने के कारण उन्हें भी भर्ती करना पड़ा, पर ईश्वर की कृपा रही कि उनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई और वे डिस्चार्ज होकर गढ़ी लौट सके। प्रदीप के पिताजी कई दिनों तक जीवन और संक्रमण के बीच जूझते रहे। उन्हें प्लाज्मा के अलावा रक्त भी चढ़ाया गया, पर उनके जुझारूपन, अपनों और अस्पताल-कर्मियों की सेवा ने रंग दिखाया। 22 सितंबर 2020 को उन्होंने संक्रमण को मात दे दी और अस्पताल से डिस्चार्ज हुए। प्रदीप और दीप्ति उन्हें सकुशल गढ़ी छोड़ने गए। कई दिनों के तनाव के बाद, यह हम सभी के लिए बड़ी राहत और संतोष का क्षण था।


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कन्टेनमेंट ज़ोन की घोषणा और गोवा की अचानक यात्रा


सितंबर 2020 के वे दिन छोटी इनु की चहक और उसकी व्यस्तताओं के बीच बीते। वह हमारे साथ हॉल में रहकर अपनी ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेती और वहीं जिम्नास्टिक का अभ्यास भी करती। उसे देख मन को थोड़ा सुकून मिलता, पर बाहर का खतरा अब हमारी दहलीज तक आ पहुँचा था।


4 सितंबर 2020 को खबर मिली कि हमारे ही बी-ब्लॉक के ऊपर वाले फ्लैट में एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। प्रशासन ने तुरंत हमारे ब्लॉक को 'कन्टेनमेंट ज़ोन' घोषित कर दिया। 20 फ्लैट्स वाली उस ब्लॉक-बिल्डिंग में सन्नाटा पसर गया। अगले 14 दिनों के लिए बाहरी सामान की डिलीवरी बंद कर दी गई। यहाँ तक कि दूध के लिए भी शिव्या को रोज़ाना नीचे जाना पड़ता था। उसी दोपहर मेडिकल टीम आई और ब्लॉक के सभी निवासियों की टेस्टिंग हुई। वह दौर ऐसा था कि हर टेस्ट रिपोर्ट के आने तक सांसें अटकी रहती थीं।


अभी अहमदाबाद की पाबंदियाँ खत्म ही हुई थीं कि 23 सितंबर की सुबह गोवा से दिव्या का फोन आया। उसने बताया कि वह और पदमनाभन दोनों कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं। यह सुनते ही मेरे होश फाख्ता हो गए। चिंता केवल उनकी नहीं थी, बल्कि वहाँ रह रही दीक्षा (दोहती) और मेरी पत्नी मधु की भी थी। मन में बस यही डर था कि कहीं वे भी संक्रमित न हो गई हों। बिना देर किए, हम शाम की फ्लाइट से गोवा पहुँचे। 25 सितंबर की रात तक जब रिपोर्ट आई कि मधु और दीक्षा की रिपोर्ट 'नेगेटिव' है, तब जाकर जान में जान आई। हम कई दिनों तक गोवा में ही रुके। डॉक्टरों के मार्गदर्शन में दिव्या और पदमनाभन का घर पर ही इलाज चला और कुछ समय बाद वे स्वस्थ होकर 'नेगेटिव' आ गए। वह हमारे लिए ईश्वर का बड़ा आशीर्वाद था।


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अजमेर की पुकार और 'गुड्डी' की सेवा 


अक्टूबर 2020 का अंत मेरे लिए एक नई सुबह लेकर आया। महीनों की तड़प के बाद 27 अक्टूबर को मैं, मधु और शिव्या अंततः अपने अजमेर वाले घर पहुँच गए। घर धूल-मिट्टी से अटा पड़ा था, पर अपनी जड़ों की उस महक ने मन को असीम शांति दी। उधर मोहन ने बताया कि उसके बेटे उत्कर्ष की शादी पुणे में तय हुई, तो गुड्डी (दिव्यांग बहन सुधा) की जिम्मेदारी का प्रश्न खड़ा हुआ। मोहन ने छोटे भाई महेश से आग्रह किया, पर किन्हीं कारणों से उसने मना कर दिया। ऐसे में मधु ने छोटे भाई गोपाल की पत्नी कंचन से बात की। कंचन ने रिश्तों का मान रखते हुए सहर्ष स्वीकार किया और 12 अक्टूबर को गुड्डी को पैतृक घर गोविन्द नगर से अपने घर मालवीय नगर ले आई।


मैं अजमेर घर पहुँचने के लिए व्याकुल था ही और गुड्डी को भी वहाँ लाने की तैयारी थी। 3 नवंबर 2020 को कंचन और पलाश अपनी कार से गुड्डी को सुरक्षित अजमेर छोड़ गए। गुड्डी का अजमेर से पुराना नाता था; 2006 में बाऊजी के निधन के बाद वह और अम्मा यहाँ करीब ढाई साल रहे थे। पिछले साल 2019 में भी गुड्डी कुछ समय हमारे पास रही थी, जब मोहन अपने दूसरे बेटे सार्थक के पास अमेरिका गया था। इस बार भी हमने उसके लिए वही कमरा चुना जहाँ से वह टीवी भी देख सके और पीछे नींबू के पेड़ के पास धूप भी सेंक सके। हमने उसकी मरहम-पट्टी, नहलाने-धुलाने और देखभाल के लिए एक कुशल परिचायिका (Attendant) लगा ली थी, जो पास की बस्ती में ही रहती थी। कैंसर की अंतिम अवस्था और उस असह्य पीड़ा के बावजूद गुड्डी हमारे पास आकर बहुत खुश थी। जैसा कि मैंने महसूस किया—"जो उसका शेष था, वही उसके लिए विशेष था।" गुड्डी के साथ हमने नवम्बर 2020 की दीपावली और भाई दूज अपने अजमेर घर में मनाई, जो हमारे एक यादगार बन गई। यही उसकी इस जीवन की अंतिम दीपावली और भाई दूज थी। 


इसी बीच 8 नवंबर 2020 को एक हृदय विदारक खबर मिली। मधु की बड़ी बहन मालती दीदी ने बताया कि जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। वह दौर चिकित्सा व्यवस्था की लाचारी का चरम था; उन्हें अजमेर के कई अस्पतालों में भर्ती करने से मना कर दिया गया। अंततः उन्हें जयपुर के एपेक्स अस्पताल ले जाना पड़ा। व्यवस्था इतनी बेबस थी कि डॉक्टरों को भी इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा था।


शिव्या को अपने काम के सिलसिले में अहमदाबाद लौटना जरूरी था, इसलिए बंगलुरु से दीप्ति ने अजमेर आने का प्रोग्राम बना लिया। कुछेक दिनों बाद वह और प्रदीप अपनी बेटी प्रगन्या (इनु) के साथ अजमेर आ गए और शिव्या अहमदाबाद लौट गई। पुणे में उत्कर्ष की शादी 10-11 दिसंबर को हो गई थी। हम वहाँ नहीं जा सके। 


जनवरी 2021 के दूसरे पखवाड़े में जब भाई मोहन पुणे से वापस लौटा, तो गुड्डी की विदाई की बेला आ गई। प्रदीप और दीप्ति ने जिम्मेदारी ली और 26 जनवरी 2021 को वे स्वयं कार से गुड्डी को जयपुर छोड़ आए। वह कुछ महीने जो गुड्डी ने हमारे सानिध्य में बिताए, वे मेरे जीवन के सबसे संतोषजनक पन्ने बन गए। 2010 में अम्मा के जाने के बाद वह अधिकतर जयपुर ही रही थी, पर इस अंतिम पड़ाव में उसकी सेवा का अवसर मिलना ईश्वर की विशेष कृपा थी। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल