शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 1

 कोरोना काल के संस्मरण - 1

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इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक एक उलझन के साथ शुरू हुआ। इस सदी के दूसरे दशक का अंत बहुत दु:खद अनुभव देकर गया। दूसरे दशक का अंतिम साल कोविड-19 (कोरोना) संक्रमण के साथ शुरू हुआ। प्रारम्भ में कोविड-19 संक्रमण के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, इसलिए शुरू के कुछ महीने भ्रम की स्थित में बीते। डर का माहौल था, सरकार ने मार्च 2020 में लॉकडाउन लगा दिया, काम-धंधे रुक गए, आर्थिक गतिविधियाँ रुक गई थीं।  

 

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कोरोना काल में स्पर्श बहुत खतरनाक था। हाथ से हाथ नहीं मिला सकते थे। कोरोना कहता था - स्पर्श खतरनाक है। इंसान गाय, बैल, बकरी, भैंस आदि जानवरों को छू सकता है, पर सामने दिख रहे इंसान को नहीं छू सकता। कोरोना ने मानव समाज के दैनिक जीवन पर आक्रमण कर दिया था। 


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नर्स अस्पताल में ड्यूटी कर रही है। कई दिनों से घर नहीं जा पायी है। खाना, पीना, रहना सब अस्पताल में और कोरोना से संक्रमित लोगों की सेवा में लगी हुई है। उसकी तीन वर्ष की बेटी अपने पापा के साथ उससे मिलने अस्पताल आयी है। पाँच दिन बाद नर्स अपनी बेटी को देख रही है और बेटी माँ को, वह भी दूर से। बेटी रो रही है, वह माँ के पास जाना चाहती है। माँ चाहकर भी उसे बुला नहीं सकती, उसे गोद में नहीं ले सकती, उसे प्यार नहीं कर सकती। बस दूर से माँ अपनी बेटी और और बेटी अपनी माँ को देख पा रही है। दोनों की आँखों से आँसू टपक रहे हैं। बच्ची के पिता और नर्स का पति असहाय सा खड़ा है, उसकी आँखें भी गीली हो गई हैं। माँ से उसकी ममता को छीन लेने वाला यह दर्द कितना बड़ा दर्द है। एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने मानव सभ्यता और दैनिक जीवन-शैली पर आक्रमण कर दिया। स्पर्श इंसान की सबसे बड़ी नियामत है, मानव समाज का सामूहिकता और मेल-मिलाप में विश्वास रहा है, जिसे एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने समाप्त कर दिया।  हाय ……… यह कैसी नियति है। 


एक व्यक्ति अपने गाँव से दूसरे राज्य में मजदूरी करने गया था। लॉक-डाउन लगने के बाद उसका काम छिन गया। उसके जैसे सैंकड़ों प्रवासी मजदूर थे। उनकी भीड़ टूटे भरोसे, भूखे पेट, थके पैर और अशांत मन के साथ अपने गाँव की ओर पैदल ही जा रहे थे, क्योंकि यातायात के साधन रेल, बस, हवाईजहाज सब बंद थे। वह भी अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर पैदल ही चल दिया। उसके जैसे बहुत से लोग अपने घर-गाँव की ओर जा रहे थे। गिरते-मरते कुछ पहुँचे अपनी मंजिल तक। कुछ ने रास्ते में दम तोड़ दिया। सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुए जब वह अपने गाँव की सीमा पर पहुँचा तो गाँव के लोगो ने उसे और उसके परिवार को गाँव के भीतर घुसने भी नहीं दिया। कोरोना के सूक्ष्म जीवाणु का डर हवा में फ़ैल गया था, भाव-शून्यता देखने को मिल रही थी। 


ईश्वर ने मनुष्य को 'स्पर्श' की अनमोल नियामत बख्शी है। यह वह मूक भाषा है जहाँ शब्द अपना अर्थ खो देते हैं और संवेदनाएँ सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। किसी ने सिसकते हुए कंधे पर रखा एक हाथ, रोते हुए बच्चे के सिर पर फेरा गया हाथ, या अपनों से किसी बड़े का चरण स्पर्श—ये वे सुनहरे धागे हैं जिनसे हमारे भारतीय समाज का ताना-बाना बुना गया है। कोरोना ने इन्हीं धागों को कच्चा कर दिया। उसने सिखाया कि अब 'प्रेम' का अर्थ 'दूरी' है। उसका स्पष्ट सन्देश था - स्पर्श करना मना है। 


कोरोना काल में सब अपनी सुरक्षा में लगे थे। सरकार देख रही थी, पर हालात ऐसे थे कि वह भी मजबूर थी। देश की संसद मौन थी, सवाल पूछने की मनाही थी। 


कोरोना काल में हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा की व्यक्तिगत लक्ष्मण-रेखा खींचने में लगा था। सरकारें व्यवस्था बनाए रखने का दावा तो कर रही थीं, पर जमीनी हालात ऐसे थे कि तंत्र स्वयं लाचार और बेबस नजर आ रहा था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहाँ संसद को जनता की आवाज बनना था, वहाँ एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। देश की सबसे बड़ी पंचायत—संसद—मौन थी। जिस समय सड़कों पर मानवता सिसक रही थी, उस समय सवाल पूछने की खिड़कियाँ बंद कर दी गई थीं।


सरकारी नीतियाँ विफल होती दिखीं और अस्पतालों के बाहर कतारें लंबी होने लगीं, तब जवाबदेही तय करने के बजाय 'सब ठीक है' का छद्म आवरण ओढ़ लिया गया। संकट केवल स्वास्थ्य का नहीं था, संकट नेतृत्व और सामूहिक जिम्मेदारी का भी था। यह वह दौर था जब सत्ता और आम नागरिक के बीच का संवाद टूट गया था और नागरिक केवल 'आंकड़ा' बनकर रह गया था। नीति-निर्माताओं की चुप्पी उन लोगों के घावों पर नमक की तरह थी, जो अपनों को खो रहे थे या सड़कों पर नंगे पाँव चल रहे थे।  


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केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, शासन-प्रशासन सब देख रहे थे। रेल बंद थी, बसें बंद थी, हवाईजहाज भी बंद थे और हजारों प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने गाँवों की ओर भाग रहे थे, भूखे-प्यासे, कहीं कुछ मिल जाता तो खा लेते थे, सड़क के किनारे ही रात गुजारते थे। उस समय बहुत से सवाल उठे -

- क्या प्रवासी मजदूर इस देश के नागरिक नहीं हैं?

- क्या सत्ता और नागरिक का कोई रिश्ता बचा रह गया है?

- क्या संकट की घड़ी में प्रवासी मजदूरों के मालिकों ने अपने कामगारों के साथ मानवीय रिश्ता निभाया?

- क्या सरकार ने लॉक डाउन लगाने से पहले सोचा कि प्रवासी मजदूरों का क्या होगा?

- क्या चार घंटे पर्याप्त समय था प्रवासी मजदूरों के पास अपने को सुरक्षित करने के लिए?

- क्या सरकार राष्ट्रीय विपदा के इस संकटकालीन समय में एक अध्यादेश द्वारा निजी अस्पतालों पर नियंत्रण नहीं कर सकती थी, जो कोरोना संक्रमित रोग के इलाज के लिए लाखों रूपये वसूल रहे थे? 


हमारी परम्परा रही है कि परिजन और मित्र दिवंगत व्यक्ति को शव-यात्रा में कंधा देते हुए अंतिम विदा देते है, अंतिम संस्कार करते हैं। कोरोना ने जीवन और मृत्यु दोनों में न केवल इंसान को अकेले छोड़ा, वरन् मानवीय रिश्तों को तार-तार कर दिया। शव-यात्रा और सामूहिक शोक पर तो पूर्ण विराम लग गया। संवेदनाओं का जैसा खात्मा इस कोरोना काल में दिखा, वैसा कभी सोचा भी नहीं था।  


परिजनों और मित्रों का कंधा, वह अंतिम संबल होता है जो दिवंगत व्यक्ति को इस लोक की अंतिम गरिमा प्रदान करता है। अंतिम यात्रा में अपनों की मौजूदगी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस दुःख को बाँटने का माध्यम होता है, जिसे अकेले सहना कष्टप्रद है। किंतु कोरोना ने न केवल जीवन छीना, बल्कि मृत्यु की पवित्रता और विदाई के अधिकार को भी लहूलुहान कर दिया।


मानवीय रिश्तों के तार-तार होने का इससे वीभत्स दृश्य क्या होगा कि बेटा अपने पिता की चिता को मुखाग्नि देने से डर रहा था, और माँ अपनी संतान के अंतिम दर्शन के लिए पीपीई किट (PPE Kit) पहने हुए रोबोटनुमा अजनबियों के सामने गिड़गिड़ा रही थी। वे लोग, जो जीवन भर भरे-पूरे परिवारों के बीच रहे, अंत में एक पॉलिथीन में लिपटे हुए 'लावारिस' की तरह मशीनी क्रेन द्वारा चिता पर रख दिए गए।


शव-यात्रा और सामूहिक शोक, जो संवेदनाओं के साझा करने का माध्यम थे, उन पर पूर्ण विराम लग गया। श्मशान घाटों पर जलती अनगिनत चिताओं की लपटें गवाह थीं कि इंसान कितना असहाय हो चुका है। संवेदनाओं का ऐसा निर्दयी खात्मा इतिहास ने शायद ही कभी देखा हो। जहाँ मौत पर रोने के लिए अपनों का कंधा न मिले, वहाँ शोक केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का मानसिक अवसाद बन जाता है। जिस 'अंतिम विदा' में मंत्रों की ध्वनि और अपनों की सिसकियाँ होनी चाहिए थीं, वहाँ केवल सैनिटाइजर की गंध के साथ प्लास्टिक की सरसराहट सुनाई देती थी।


महामारियाँ पहले भी आईं और उन महामारियों में ऐसे योद्धा भी सामने आए, जिन्होंने जान की बाजी लगा कर मानवता के लिए काम किया। कोरोना काल में भी ढेरों ऐसे डॉक्टर, स्वास्थ्य-कर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता सामने आए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए लोगों को बचाया, मुश्किल वक्त में लोगों की मदद की। कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने मुफ्त में मास्क बाँटे, लोगों के घरों राशन पहुँचाया। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा की। 


जब जीवन अपनी चरम और दुरूह परिस्थितियों से टकराता है, तब मनुष्य के भीतर के दो रूप प्रकट होते हैं—या तो वह पूरी तरह आत्म-केंद्रित होकर संकुचित हो जाता है, या फिर वह अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भूलकर 'विश्व-चेतना' और 'परोपकार' के वृहद भाव से जुड़ जाता है। इतिहास साक्षी है कि महामारियाँ जब भी आईं, वे अपने साथ केवल विनाश नहीं, बल्कि 'मानवता के योद्धाओं' की अमर गाथाएँ भी लेकर आईं। कोरोना काल इस कसौटी पर मनुष्यता की सबसे बड़ी परीक्षा थी।


इस कालखंड में ऐसे अनगिनत 'अनाम नायक' आगे आए, जिन्होंने मौत के साये में रहकर जिंदगी की रक्षा की। ये वे डॉक्टर और नर्सें थीं, जो पीपीई किट के भीतर पसीने से तर-बतर, हफ्तों अपने मासूम बच्चों और बूढ़े माता-पिता से दूर रहे, केवल इसलिए कि किसी अजनबी की सांसें न उखड़ जाएँ। बहुत से एम्बुलेंस चालक, पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी, जो संक्रमण के सबसे करीब थे, फिर भी अपने कर्तव्य पथ से पीछे नहीं हटे।


यही वह समय था जब समाज की सामूहिक शक्ति भी जागी। कई गाँवों में लोगों ने मिलकर 'सामुदायिक रसोई' शुरू की, जहाँ भूखे प्रवासियों के लिए भोजन बना। बहुत से युवाओं की टोलियों ने सोशल मीडिया को 'मदद का कंट्रोल रूम' बना दिया, जहाँ आधी रात को भी ऑक्सीजन सिलेंडर या अस्पताल में बेड दिलाने के लिए लोग एक-दूसरे की जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे। कई मध्यमवर्गीय परिवारों ने अपनी जमा-पूंजी मुफ्त मास्क और राशन बाँटने में लगा दी। इन योद्धाओं ने सिद्ध कर दिया कि भले ही स्पर्श वर्जित था, पर 'संवेदनाओं का सेतु' अभी टूटा नहीं था। मनुष्यता की यह रक्षा केवल एक चिकित्सा कार्य नहीं था, बल्कि यह गिरती हुई सभ्यता को थामने वाला एक आध्यात्मिक अनुष्ठान था।


इसी दौर में 'पड़ोस' की परिभाषा भी बदल गई। एक कॉलोनी में एक ऐसा परिवार था जिसके सभी सदस्य एक साथ कोरोना की चपेट में आ गए। डॉक्टर की सलाह पर वे घर के भीतर ही क्वारंटाइन (पृथकवास) थे। विडंबना देखिए, सूचना मिलने पर भी कोई सगा संबंधी उनकी सीधी सहायता के लिए आगे नहीं आया; वे केवल मोबाइल की स्क्रीन पर हाल-चाल पूछकर अपनी औपचारिकता पूरी कर लेते थे। भय इतना गहरा था कि अपनों ने ही दूरियाँ बना ली थीं। ऐसे संकट के समय में, जब उस परिवार के सामने दवाइयाँ लाने और दो वक्त के भोजन का इंतजाम करने की विकट समस्या खड़ी हुई, तब पड़ोसियों ने 'मानवता का धर्म' निभाया। उन पड़ोसियों ने न केवल उनके दरवाजे पर समय से नाश्ता और भोजन पहुँचाया, बल्कि दवाइयों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की। यह वह क्षण था जब 'खून के रिश्तों' पर 'संवेदनाओं के रिश्ते' भारी पड़ गए। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा केवल अस्पतालों में ही नहीं, बल्कि घरों की उन दहलीज पर भी हो रही थी जहाँ एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के लिए देवदूत बनकर खड़ा था।

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कोरोना काल ने मानवता की तस्वीर के दोनों ध्रुवों को एक साथ उजागर कर दिया—एक ओर जहाँ निःस्वार्थ सहयोग की धारा थी, वहीं दूसरी ओर घोर 'आत्म-केन्द्रीयता' भी दिख रही थी। कोरोना आया और चला गया, पर पीछे छोड़ गया है कुछ अनुत्तरित और चुभते हुए सवाल। क्या हमारे आपसी रिश्ते कभी वैसे ही सहज और निश्छल हो पाएंगे जैसे इस त्रासदी से पहले थे?


कोरोना-काल केवल शारीरिक बीमारी का समय नहीं था, बल्कि यह 'संवेदनाओं के अकाल' का भी दौर था। सामुदायिक और सामाजिक जीवन से जो अनिवार्य दूरी बनी, उसने हमारे भीतर के 'सामूहिक विश्वास' को गहरा आघात पहुँचाया। मानवीय मूल्यों का जो ह्रास और मरती हुई संवेदनाओं को इस दौर में हमने देखा।


आज जब हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं, तो आँखों में वह पुराना भरोसा नहीं, बल्कि एक 'आशंकापूर्ण नजरिया' और 'संवेदनाओं का ठंडापन' अधिक दिखाई देता है। रिश्तों के बीच की भौतिक दूरियाँ तो खत्म हो गईं, लेकिन मन की दूरियाँ बनी रह गई हैं। मन के किसी कोने में यह प्रश्न बार-बार कौंधता रहा —क्या आत्म-केन्द्रीयता और 'स्व' तक सीमित रहने का यह भाव अब मनुष्य का स्थायी चरित्र तो नहीं बन जाएगा? क्या उस सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने हमसे वे तमाम मूल्य तो नहीं छीन लिए, जिन्हें मानव सभ्यता ने हज़ारों साल के संघर्ष और प्रेम से अर्जित किया था? क्या हम अब एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मनुष्य भीड़ में होकर भी नितांत अकेला और आत्ममुग्ध होगा? 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......


सादर,

केशव राम सिंघल 


सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बैंक पेंशनर्स का पेंशन अपडेशन – एम. सी. सिंगला केस से उम्मीद

बैंक पेंशनर्स का पेंशन अपडेशन – एम. सी. सिंगला केस से उम्मीद 

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बैंक पेंशनर्स लंबे समय से पेंशन अपडेशन के लिए संघर्षरत हैं। हर बार निराशा मिली, क्योंकि मामला वर्षों से लंबित रहा। कुछ वर्ष पहले आईबीए (IBA) और यूएफबीयू (UFBU) के बीच एक्स-ग्रेशिया समझौते से उम्मीद जगी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा। पेंशनर्स के संगठनों में एकता की कमी और आईबीए की अनिच्छा ने समस्या बढ़ाई। फिर भी, अब उम्मीद है कि यह कानूनी अधिकार सुप्रीम कोर्ट से मिलेगा।


BEPR 1995 का रेगुलेशन 35(1) (2003 संशोधित) स्पष्ट कहता है: "Basic pension and additional pension wherever applicable, shall be updated as per the formulae given in Appendix-I." यह प्रावधान अनिवार्य है, न कि वैकल्पिक। अपडेशन वेज रिविजन (wage revision) से जुड़ा है, जबकि DR (Dearness Relief) रेगुलेशन 37 के तहत महंगाई से राहत देता है। 2003 का संशोधन गजटेड और संसद द्वारा मान्य है, इसलिए बैंकों, आईबीए और डीएफएस (DFS) का इसे नजरअंदाज करना गलत है। वे बार-बार महंगाई राहत संशोधन (DR revision) का हवाला देकर भ्रम फैलाते हैं, जबकि अपडेशन रेगुलेशन में संरचनात्मक है।


पेंशन एक अधिकार है, कोई एहसान नहीं – सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि यह टाली गई मजदूरी है। RBI ने अपने पेंशनर्स के लिए अपडेशन लागू किया, तो बैंकों को क्यों नहीं? रेगुलेशन 56 CCS Rules का संदर्भ देता है।


05 फरवरी 2026 की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई (एम. सी. सिंगला बैंक पेंशन अपडेशन केस) - केस: M.C. Singla (Dead) Thr. LR. vs. Union of India (SLP (Civil) No. 5561/2016) - बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता (कोर्ट नंबर 2, वर्चुअल मोड) का संक्षिप्त ब्योरा 


- पेंशनर्स की तरफ से सीनियर एडवोकेट डॉ. मनिश सिंघवी ने दलीलें रखीं – पेंशन फंड का कॉर्पस ≈ ₹4.28 लाख करोड़, जबकि सालाना आउटगो ≈ ₹33,000 करोड़। पेंशन अपडेशन से बैंकों पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं, मौजूदा फंड से संभव। आरबीआइ (RBI) ने अपडेशन किया, बैंकों को भी करना चाहिए। रेगुलेशन्स के अनुसार अपडेशन अनिवार्य।  


- बैंकों/IBA/DFS की तरफ से सीनियर एडवोकेट श्री ध्रुव मेहता ने विरोध किया – अपडेशन से बैंकों पर फाइनेंशियल बोझ बढ़ेगा और विभिन्न रिटायरमेंट बैचों (1987 से पहले/बाद) में असमानता बढ़ेगी।   


कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। ओपन कोर्ट में यह ओपिनियन दिया कि रेगुलेशन्स के अनुसार बैंक पेंशन देने के लिए बाध्य हैं। दोनों को तुलनात्मक पेंशन टेबुलेशन (different retirement batches के लिए अंतर) दो हफ्तों में फाइल करने का निर्देश दिया। सुनवाई आंशिक (part-heard) रही। कोर्ट का ऑर्डर - "Heard. List the matter on 18th February 2026."  


सुप्रीम कोर्ट में चल रहा यह केस बैंक पेंशनर्स के लिए महत्वपूर्ण है। उम्मीद है कि 18 फरवरी 2026 को फाइनल दलीलें पूरी होंगी और फैसला बैंक पेंशनर्स के पक्ष में आएगा।  


सादर,  

केशव राम सिंघल  

 

आईबीए = IBA = Indian Bank's Association 

डीएफएस = DFS = Department of Financial Services , Ministry of Finance , Government of India 

यूएफबीयू = UFBU = United Forum of Bank Unions 

आरबीआई = RBI = Reserve Bank of India 


08 फरवरी 2026 तक की जानकारी के अनुसार आलेख तैयार किया गया। 


#BankPensionUpdation #MCSinglaCase #SupremeCourt #BankRetirees #PensionersRights #BankPension 


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

मौलिकता

मौलिकता 
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


एक विचार सामने आया कि हर विचार पहले से ही ब्रह्मांड में मौजूद है, इसलिए कुछ भी वास्तव में मौलिक नहीं है।

यदि इस कथन का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि यह कथन एक दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दर्शाता है, जो कई विचारधाराओं और सिद्धांतों में है। आइए इसे विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास करते हैं। दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो दर्शनशास्त्र में यह विचार प्राचीन काल से ही मौजूद है कि सब कुछ पहले से ही अस्तित्व में है और व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव केवल उसी का प्रतिबिंब या बदला हुआ रूप है। प्लेटो का "आइडियाज का सिद्धांत" भी इसी तरह का है, जिसमें उन्होंने कहा कि सभी विचार और रूप पहले से ही एक उच्च वास्तविकता में मौजूद हैं। यह सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि संवेदनशील जगत की अस्थायी और परिवर्तनशील वस्तुओं के पीछे एक शाश्वत और अपरिवर्तनीय वास्तविकता होती है। हम कुर्सी का उदाहरण लेते हैं। इस जगत में हम विभिन्न प्रकार की कुर्सियाँ देखते हैं, जो अलग-अलग आकार, रंग और डिज़ाइन की होती हैं। लेकिन आइडियाज के जगत में कुर्सी का एक आदर्श रूप होता है, जो सभी कुर्सियों के लिए एक मानक या आदर्श के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस संसार की सभी कुर्सियाँ कुर्सी के आदर्श रूप की अपूर्ण और अस्थायी अभिव्यक्तियाँ हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो हम पाते हैं कि आधुनिक भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान में भी यह विचार पाया जाता है कि ब्रह्मांड में सभी पदार्थ और ऊर्जा पहले से ही मौजूद हैं और वे केवल रूपांतरित होते हैं। ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है और न ही विनाश, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखे तो हम पाते हैं कि अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं में भी यह विचार पाया जाता है कि सब कुछ पहले से ही ब्रह्म या परम सत्ता में मौजूद है। अद्वैत वेदांत जैसे दर्शन में यह माना जाता है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और बाकी सब उसकी अभिव्यक्ति है। 

एक अनुवर्ती प्रश्न सामने आता है कि क्या सृजनात्मकता मौलिक हो सकती है? हाँ, यदि हम सृजन को सापेक्ष दृष्टि से देखें। अर्थात् मौलिकता निरपेक्ष नहीं है, बल्कि सापेक्ष है। सापेक्षता का मतलब है कि हम किसी विचार, रचना या सृजन को उसके संदर्भ में देखेंगे। उदाहरण के लिए, एक कलाकार दो अलग-अलग तत्वों को मिलाकर एक नया रूप बना सकता है। भले ही दोनों तत्व पहले से मौजूद हों, लेकिन उनका संयोजन पहली बार हुआ हो। इस दृष्टि से वह रचना या सृजन उस व्यक्ति के लिए मौलिक हो सकती है। हर व्यक्ति का अनुभव, शिक्षा, संस्कृति और पृष्ठभूमि अलग होती है। इसलिए, दो लोगों के लिए एक ही विचार का अर्थ अलग हो सकता है। इस सापेक्षता के कारण, एक व्यक्ति के लिए जो विचार मौलिक है, दूसरे के लिए वह सामान्य हो सकता है। विज्ञान भी सापेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। उसी तरह, दर्शन में भी सापेक्षवाद (रिलेटिविज्म) कहता है कि सत्य और मूल्य संदर्भ पर निर्भर करते हैं। 

अब हम मौलिकता की अवधारणा को सापेक्ष दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे। हम पाते हैं कि मौलिकता का अर्थ केवल पूर्ण नवीनता नहीं है, बल्कि यह भी है कि कोई विचार, सृजन या रचना किसी विशेष संदर्भ में कितनी नवीन और प्रभावशाली है। जब हम विचार, सृजन और रचना को सापेक्ष दृष्टि से देखते हैं, तो हम नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं। इससे लोग नए विचार, सृजन और दृष्टिकोण को अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। सापेक्ष दृष्टि व्यक्तिगत रचनात्मकता को महत्व देती है। जब लोग अपना विचार, अनुभव या  दृष्टिकोण साझा करते हैं, तो इससे अनोखे विचार उत्पन्न होते हैं, जो हमें नए लग सकते हैं। सापेक्ष दृष्टि सांस्कृतिक विविधता को भी महत्व देती है। अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के अपने अनोखे दृष्टिकोण और विचार होते हैं, जो सांस्कृतिक विविधता को सामने रखते हैं।

एक उदाहरण के रूप में, मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत की बात करना चाहूँगा। भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों और तालों की एक समृद्ध परंपरा है। हालाँकि भारतीय संगीत के ये राग और ताल पहले से मौजूद हैं, लेकिन हर संगीतकार अपनी शैली और दृष्टिकोण से उन्हें नए और अनोखे तरीके से प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, सापेक्ष दृष्टि से देखें तो हर संगीतकार की प्रस्तुति मौलिक होती है। मौलिकता को सापेक्ष दृष्टि से देखने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि नवाचार और रचनात्मकता के कई रूप हो सकते हैं। यह दृष्टिकोण हमें नए विचार, अनुभव और दृष्टिकोण अपनाने और व्यक्तिगत रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है।

पाठकों के विचार आमंत्रित हैं।

सादर, 
केशव राम सिंघल 


बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

वंदे मातरम् और सरल हिंदी भावार्थ

वंदे मातरम् और सरल हिंदी भावार्थ 












प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


वंदे मातरम् !
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वंदे मातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां मातरम् !
शुभ्र ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनीम्
फुलकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् 
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम् 
सुखदां, वरदां मातरम् ! 

वंदे मातरम् ! 
सप्तकोटीकंठ-कलकल निनादकराले, 
द्विसप्तकोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केणो मां तुमि एतो बले !
बहुबलधारिणीम् नमामि तारिणीम् 
रिपुदलवारिणीम् मातरम् !

वंदे मातरम् !
तुमि विद्या, तुमि धर्म, 
तुमि हरी, तुमि कर्म, 
तवं ही प्राणः शरीरे !
बाहुते तुमि मां शक्ति, 
हृदये तुमि मां भक्ति, 
तोमारई प्रतिमा गड़ी मंदिरे-मंदिरे !
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरण धारिणीं,
कमला कमल - दल- विहारिणीं !
वाणी विद्यादायिनीं नमामि त्वं, 
नमामि कमलां, अमलां, अतुलाम् !
सुजलां, सुफलां, मातरम् !

वंदे मातरम् !
श्यामलां, सरलां, सुस्मितां, भूषिताम् !
धरणी, भरणी मातरम् !

वंदे मातरम् !

सौजन्य - आनंदमठ, बंकिमचंद्र चटर्जी 

सरल हिंदी भावार्थ
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हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम जल से परिपूर्ण हो, फल-फूल और अन्न से समृद्ध हो।
तुम्हारी हवा मलय पर्वत की शीतल सुगंध से भरी हुई है।
तुम खेतों की हरियाली से ढकी हुई हो।
चाँदनी रातें तुम्हारे सौंदर्य को और बढ़ाती हैं।
तुम्हारे वृक्ष फूलों से लदे हैं और पत्तियाँ शोभायमान हैं।
तुम सदा मुस्कुराने वाली हो, मधुर भाषा बोलने वाली हो।
तुम सुख देने वाली और वरदान देने वाली हो।
हे माता! मैं तुम्हें वंदन करता हूँ।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम्हारे करोड़ों पुत्रों के कंठ से उठने वाला स्वर बहुत शक्तिशाली है।
तुम्हारे करोड़ों हाथों में शस्त्रों जैसी शक्ति है।
तुम देखने में कोमल लगती हो, फिर भी तुममें अपार बल है।
तुम अनेक शक्तियों से युक्त हो।
मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ, क्योंकि तुम संकटों से तारने वाली हो।
तुम शत्रुओं का नाश करने वाली हो।
हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम ही विद्या हो, तुम ही धर्म हो।
तुम ही हरि (ईश्वर) हो और तुम ही कर्म हो।
तुम ही शरीर में प्राण रूप में विद्यमान हो।

तुम्हारे बाहुओं में शक्ति है और हृदय में भक्ति है।
हर मंदिर में तुम्हारी ही प्रतिमा स्थापित है।

तुम दुर्गा के रूप में हो, जो दस हथियारों को धारण करती हैं।
तुम लक्ष्मी के रूप में हो, जो कमल पर विराजमान रहती हैं।
तुम सरस्वती के रूप में हो, जो ज्ञान देने वाली हैं।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम कमल के समान पवित्र हो, निर्मल हो और अतुलनीय हो।
हे जल और अन्न से परिपूर्ण माता! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। 

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम हरियाली से युक्त हो, सरल और सहज स्वभाव वाली हो।
तुम सदा मुस्कुराने वाली और आभूषणों से सुशोभित हो।
तुम धरती हो और पालन करने वाली माता हो।
मैं तुम्हें बार-बार प्रणाम करता हूँ।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
मैं तुम्हें नमन करता हूँ, वंदन करता हूँ, और श्रद्धा से प्रणाम करता हूँ।

धन्यवाद, 
केशव राम सिंघल 

सोमवार, 26 जनवरी 2026

2020 की एक लघुकथा - कोरोना के डर से दरकता रिश्ता

2020 की एक लघुकथा - 

कोरोना के डर से दरकता रिश्ता 

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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 

मार्च 2020 की वह शाम अभी भी उसकी स्मृतियों में धुँधली-सी नहीं, बल्कि बहुत स्पष्ट है। प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन सुनते ही जैसे पूरे देश की साँसें थम गई थीं। “आज रात बारह बजे से सम्पूर्ण लॉकडाउन…” इतना सुनते ही उसकी आँखों के सामने अंधेरा-सा छा गया। मुंबई की ऊँची इमारतों के बीच काम करता वह एक साधारण मजदूर था, पर उसके सपने असाधारण थे—घर लौटने के, अपनों से मिलने के।


काम बंद हो गया। ठेकेदार ने हाथ खड़े कर दिए। किराये का कमरा, रोज़ का खर्च और जेब में चंद रुपये—इन सबने उसे एक ही राह दिखाई, घर जाना है, चाहे पैदल ही क्यों न जाना पड़े।


उसने सुना बहुत से मजदूर अपने घर जा रहे हैं। अगली सुबह वह सैकड़ों मजदूरों के साथ सड़क पर था। कोई कह रहा था,“भाई, ट्रेनें तो बंद हैं, कैसे जाएँगे?” वह बस इतना बोला, “रुकने से अच्छा है चल पड़ें, शायद मंज़िल खुद रास्ता बना ले।”


धूप, भूख, थकान और डर—सब उसके साथ चलते रहे। कहीं पुलिस रोकती, कहीं लोग दूरी बनाकर देखते। कोई खाना या पानी देता तो हाथ आगे बढ़ाने से पहले हिचकता, मानो इंसान नहीं, कोई बड़ा खतरा खड़ा हो। उसे यह दूरी सबसे ज़्यादा चुभती थी—शरीर से ज़्यादा दिलों में बनी दूरी। इंसान इंसान से दूर हो चला था। 


रास्ते भर वह यही सोचता रहा— घर पहुँचते ही माँ गले लगाएगी, भाई के बच्चे लिपट जाएँगे… सारी थकान मिट जाएगी। पंद्रह दिनों की पैदल यात्रा के बाद जब वह अपने गाँव पहुँचा तो शाम ढल चुकी थी। थका शरीर, सूखे होंठ और आँखों में चमक—घर की चौखट देखकर उसके कदम तेज़ हो गए। उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।


अंदर से आवाज आई— “कौन?”

“मैं हूँ… तुम्हारा भाई।”


कुछ क्षण की खामोशी के बाद दरवाज़ा नहीं खुला। अंदर से धीमी-सी आवाज आई— “भैया… आप बाहर ही रुकिए। गाँव में कहा गया है कि बाहर से आए लोग सीधे घर न आएँ… कोरोना का खतरा है।”


वह सन्न रह गया। जिस घर की ओर वह हर कदम पर उम्मीद लेकर चला था, वही घर अब उसे खतरा समझ रहा था।


“मैं… मैं तुम्हारा अपना हूँ…” उसकी आवाज काँप गई।


पर जवाब में सिर्फ चुप्पी थी। वह चौखट पर बैठ गया—थका हुआ नहीं, बल्कि टूटा हुआ। उसे अब पैरों की पीड़ा नहीं साल रही थी, साल रही थी रिश्तों में आई वह दरार, जिसे न पैदल चलकर पाटा जा सकता था, न आँसुओं से। रात गहराती गई और वह वहीं बैठा रहा— घर के बाहर, अपनों के बहुत पास… और फिर भी बहुत दूर। थकान से वह बेहाल है और बार-बार अपनी लम्बी पैदल यात्रा को याद कर वह रोने लगता है।


केशव राम सिंघल 

लेखक द्वारा लिखी कहानी "कोरोना का डर और दरकता रिश्ता" ब्लॉग पोस्ट लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।