रविवार, 15 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 2

कोरोना काल के संस्मरण - 2 

====== 

11

यह सत्य है कि कोरोना ने मानवीय संबंधों के ताने-बाने में अविश्वास और भय का अंधेरा फैलाया, किंतु इसी अंधकार के बीच संवेदनाओं के कुछ 'रोशनी के कण' भी छितराए हुए दिखाई दिए। जहाँ एक ओर आपस में दूरियाँ बढ़ीं, वहीं दूसरी ओर मध्य-वर्ग के भीतर 'पारिवारिकता' और 'सामुदायिक सहयोग' की एक नई चेतना भी जाग्रत हुई। संकट ने सिखाया कि जब बाहर के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब केवल 'आपसी जुड़ाव' ही एक-दूसरे के लिए संबल बनता है।


इसका एक जीवंत उदाहरण उस कॉलोनी में देखने को मिला, जहाँ एक पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आ गया था। उस एकाकीपन और बीमारी के दौर में उनके अपने सगे-संबंधी भले ही भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन पड़ोसियों ने 'पड़ोस-धर्म' की एक नई इबारत लिख दी। उन पड़ोसियों ने न केवल संक्रमित परिवार के लिए भोजन और दवाइयों का प्रबंध किया, बल्कि उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखा। ऐसे समय में मोबाइल की घंटियाँ केवल हाल-चाल पूछने का जरिया नहीं थीं, बल्कि वे संक्रमित परिवार को यह अहसास दिलाती रहीं कि "आप अकेले नहीं हैं।" यह सहयोग का भाव यह बताता है कि कोरोना जैसी आपदा ने जहाँ हमारे कुछ पुराने मूल्यों को झकझोरा, वहीं 'सह-अस्तित्व' और 'निःस्वार्थ सेवा' के कुछ नए अंकुर भी हमारे भीतर फूटने लगे हैं।


12

कोरोना काल ने आदमी को यह अहसास करा दिया कि उसका अस्तित्व कितना भंगुर है, कुछ भी स्थाई नहीं है। इस आपदा में मानवता ने बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया—किसी ने अपने प्रियजन खोए, तो किसी की जीवन भर की जमा-पूंजी इलाज की भेंट चढ़ गई। आर्थिक गतिविधियाँ रुक जाने से मध्यम और निम्न वर्ग के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। लेकिन, जहाँ आदमी के लिए यह समय 'महाविनाश' जैसा था, वहीं प्रकृति के लिए यह 'पुनर्जन्म' का काल सिद्ध हुआ।


जब आदमी अपनी सुरक्षा के लिए घरों में कैद हुआ, तो प्रकृति मानो अपनी बेड़ियाँ तोड़कर मुस्कुराने लगी। वर्षों से धुएँ और शोर से घुट रहे पेड़ों में एक नई जान आ गई; उनकी हरियाली में एक अनोखी चमक लौट आई। सड़कों का सन्नाटा पक्षियों के कलरव से भर गया। वे चिड़ियाँ, जो शहरों के कंक्रीट के जंगलों में कहीं खो गई थीं, अब बालकनियों और छतों पर बेखौफ़ चहकने लगीं। प्रदूषण कम हुआ, तो आसमान का नीला रंग अपनी असली आभा में दिखने लगा। चिमनियों से उगलते विषैले धुएँ पर विराम लगा, तो नदियों का जल भी साफ दिखने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति मानो यह संदेश दे रही हो कि आदमी के बिना वह फल-फूल सकती है, लेकिन प्रकृति के बिना आदमी का कोई अस्तित्व नहीं। यह उस दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास था—इंसान वेंटिलेटर के सहारे था और प्रकृति गहरी सांसें ले रही थी।


13

लॉकडाउन की अचानक हुई घोषणा ने उन प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया, जो शहरों की चकाचौंध और विकास के असली शिल्पकार थे। देखते ही देखते सड़कें, पगडंडियाँ, खेतों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते और रेल की पटरियाँ एक बेबस भीड़ के सैलाब से भर गईं। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं था, बल्कि व्यवस्था पर से आम आदमी के भरोसे का सामूहिक बिखराव था। इनमें से कई अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रेल की पटरियों पर कट मरे या सड़क हादसों का शिकार हो गए, पर विडंबना देखिए कि सरकारी संवेदनाओं का ग्राफ 'शून्य' ही रहा।


आजादी के पिचहत्तर वर्षों के गौरवशाली उत्सवों के बीच भारत के औसत मजदूर की यह नियति मन को व्यथित करती है। आज भी हमारे देश में मजदूर की छवि एक लाचार और बेबस इकाई बनकर रह गई है। वह चाहे अपने गाँव में पसीना बहाए या किसी महानगर के निर्माण में अपना रक्त-स्वेद दे, बुनियादी तौर पर वह 'असंगठित' और 'उपेक्षित' ही है। संकट के उन दिनों में यह साफ हो गया कि मजदूर शायद कभी सरकारों की प्राथमिक सूची में थे ही नहीं। अचानक लगे लॉकडाउन ने वह अनिश्चितता पैदा की, जिसने लाखों लोगों को नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर चलने पर मजबूर कर दिया। न तो राज्य सरकारों के पास कोई ठोस राहत योजना थी और न ही केंद्र के पास कोई प्रभावी समन्वय। जब सब कुछ 'भगवान भरोसे' छोड़ दिया गया था, तब देश के सत्ताधीशों ने जनता से थाली और बर्तन बजवाकर कोरोना भगाने का एक अतार्किक मूलमंत्र सामने रखा। विज्ञान और चिकित्सा की इस सदी में प्रतीकों का ऐसा प्रदर्शन एक मजाक जैसा लग रहा था।


एक तरफ प्रवासी मजदूरों की आँखों में कोरोना का खौफ था और दूसरी तरफ परिवार के भरण-पोषण की चिंता उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। उनके लिए 'घर' ही आखिरी उम्मीद थी, लेकिन घर लौटने की राह लहूलुहान थी। इस त्रासदी ने यह अनिवार्य प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हमें अब भी एक व्यापक 'राष्ट्रीय मजदूर नीति' की जरुरत नहीं है? क्या हम केवल राष्ट्रीय उत्सवों के शोर में डूबे रहेंगे या उस हाथ को भी गरिमा देंगे, जो इस राष्ट्र की नींव का पत्थर है? 


14

कोरोना काल के दौरान हुए कुछ अध्ययनों ने एक भयावह सत्य को उजागर किया। आंकड़ों के अनुसार, असंगठित क्षेत्र के केवल 17 प्रतिशत मजदूर ऐसे थे, जिनके 'नियोक्ता' (Employers) की पहचान की जा सकती थी। शेष 83 प्रतिशत मजदूर एक ऐसे 'अदृश्य गलियारे' में काम कर रहे थे, जिनका न कोई आधिकारिक रिकॉर्ड था और न ही कोई ज़िम्मेदार मालिक। जब संकट आया, तो इन मजदूरों को यह भी नहीं पता था कि वे अधिकार के साथ मदद के लिए किसका दरवाजा खटखटाएं। अधिकतर मजदूर दैनिक मजदूरी पर आश्रित थे, जिनके लिए 'अगले दिन की रोटी' हमेशा एक अनिश्चित और डरावना सवाल बनी रहती थी।


कोरोना ने केवल स्वास्थ्य पर हमला नहीं किया, बल्कि श्रमिकों की कमर ही तोड़ दी। विशेषकर निर्माण उद्योग और परिवहन जैसे क्षेत्रों के अचानक ठप हो जाने से करोड़ों हाथ अचानक बेरोजगार हो गए। जिस मजदूर का जीवन 'रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीना' था, उसके लिए लॉकडाउन एक ऐसी कैद बन गया जहाँ भूख की दीवारें सबसे ऊँची थीं। शहरों की ऊँची इमारतों को बनाने वाले ये मजदूर रातों-रात बेगाने हो गए; जिस तंत्र के लिए उन्होंने अपना पसीना बहाया, उसी ने संकट की घड़ी में उन्हें पहचानने तक से इनकार कर दिया। ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उस त्रासदी की सच्चाई हैं जो बताती हैं कि जो हाथ देश के विकास का पहिया घुमाते हैं, विपत्ति के समय उन्हें ही सबसे पहले हाशिए के बाहर धकेल दिया जाता है। 


15

कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र के लगभग समस्त संसाधनों और कार्मिकों को केवल कोरोना संक्रमण से निपटने के मोर्चे पर तैनात कर दिया गया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अन्य गंभीर बीमारियों—जैसे हृदय रोग, कैंसर और गुर्दा रोगों—से जूझ रहे मरीज पूरी तरह हाशिए पर चले गए। वे अपने इलाज और उपचार के लिए अंतहीन प्रतीक्षा करने को मजबूर हो गए। अस्पतालों में ओपीडी (OPD) सेवाएँ ठप थीं और जीवन रक्षक सर्जरी लगभग बंद कर दी गई थीं। वह समय ऐसा था जब व्यवस्था ने केवल एक बीमारी को 'संकट' माना और बाकी बीमारियों के मरीजों को उनकी नियति के भरोसे छोड़ दिया। यह स्वास्थ्य तंत्र की विवशता थी या दूरदर्शिता का अभाव, कह नहीं सकते, पर इसने कई उन मरीजों की जान जोखिम में डाल दी, जो अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे।



16

लॉकडाउन के दौरान

*********

आसमान में दिखा आसमान का असल नीला रंग

और सड़कों का मौन अब मुखरित हुआ जाता था।


मौन जब मुखरित होने लगे,

तब समझना कि क्रांति आने वाली है।


तो क्या कोरोना-काल सचमुच क्रांति का समय था?

या किसी आने वाली आँधी का आहट-भरा अहसास था?


कोरोना भी ताक रहा था अचरज से—ये कैसे लोग हैं,

जो मेरे साये में भी, खुश रहने की राह खोज रहे हैं?


आशा और निराशा की सड़क पर

सँभलकर चलते हुए सोच रहे लोग—

एक न एक दिन इस महामारी का अंत होगा,

और जीवन फिर से खुशहाल हो जाएगा।


आदमी डटा था, लड़ रहा था, 

हर विषम परिस्थिति से,

वह घर की चहारदीवारी से काम कर रहा था,

अस्तित्व बचाने के नए रास्ते तलाश रहा था

और संहारक कोरोना के विरुद्ध 

वैक्सीन के रूप में—

'जीवन का अमृत' खोज रहा था। 


17

देश जनता से निर्मित होता है और उसका अस्तित्व जनता के कल्याण के लिए ही है। काश, संसार के राजनेता 'वोट बैंक' की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर कुछ व्यापक सोच पाते। सत्य तो यह है कि देश और जनता—दोनों में से किसी की भी अनदेखी आत्मघाती है। हम जानते हैं कि एकता में अटूट शक्ति होती है, किंतु कोरोना के नाम पर संसार के अधिकांश शासकों ने 'असीमित अधिकार' अपने हाथों में केंद्रित कर लिए।


कोरोना के साये के साथ-साथ 'निरंकुशता' का काला खतरा भी दुनिया पर मंडराने लगा था। कुछ वैश्विक विचारकों ने इस ओर संकेत किया कि कोरोना से लड़ने के बहाने कई देशों के शासकों ने जो असाधारण शक्तियाँ अर्जित की हैं, वे लोकतंत्र के लिए आने वाले समय में घातक सिद्ध हो सकती हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता जब एक बार असीमित अधिकारों का स्वाद चख लेती है, तो वह उन्हें स्वेच्छा से आसानी से नहीं त्यागती। आशंका यही थी कि सुरक्षा के नाम पर कहीं वैयक्तिक स्वतंत्रता की बलि न चढ़ जाए। आने वाले समय में सत्ताधीश राजनेताओं के एकाधिकारवादी रवैये से लोकतांत्रिक मूल्यों का नुकसान और महामारी का अदृश्य दुष्प्रभाव की आशंका लगने लगी थी। 


18

कोरोना काल में हम सब कोरोना महामारी से होने वाली मौतों की दैनिक संख्या और डरावने आंकड़ों के मायाजाल में उलझकर रह गए थे। दुर्भाग्य यह था कि महामारी के उस प्रारंभिक दौर में इस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु शत्रु का कोई निश्चित इलाज नहीं था और न ही कोई सुरक्षात्मक टीका बन पाया था। दुःख इस बात का था कि हमारा देश, भारत, दुनिया भर में संक्रमण से सबसे अधिक ग्रस्त देशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुँच गया था।


संख्याओं के वे आकड़े तब दुःख में बदल गए, जब हर व्यक्ति ने अपना कोई न कोई नजदीकी इस महामारी की भेंट चढ़ते देखा। मौतें अब केवल सरकारी बुलेटिन के 'आंकड़े' नहीं थे, बल्कि वे हमारे घरों के उजड़ते हुए प्रियजन थे। मैंने स्वयं इस क्रूर कालखंड में अपनी छोटी दिव्यांग बहन को खोया —एक ऐसा शून्य जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। केवल वही नहीं, अपनी पत्नी के भाई और उनके जीजा जी को भी इसी महामारी ने हमसे छीन लिया। अपनों को खोने का वह खालीपन और अंतिम विदा में उनके पास न जा पाने की लाचारी—यह वह टीस है, जो इस सदी के इतिहास और हमारे हृदय में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है।


19

कोरोना महामारी ने विश्व अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी, साथ ही आगामी पीढ़ी की नींव—शिक्षा—को भी गहरे संकट में डाल दिया। यद्यपि तकनीक के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प सामने आया, किंतु 'डिजिटल इंडिया' की यह चमक देश के बड़े हिस्से के लिए बेमानी सिद्ध हुई। वास्तविकता यह थी कि करोड़ों बच्चों के पास न तो स्मार्टफोन थे और न ही इंटरनेट कनेक्शन। 


विभिन्न अनुमानों और नीति आयोग की रिपोर्टों के भयावह आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान भारत के लगभग 75 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन कक्षाओं की पहुँच से बाहर रहे। ग्रामीण अंचलों में स्थिति और भी विकट थी, जहाँ मात्र 15 फीसदी लोगों के पास फोन कनेक्टिविटी थी। 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में लगभग पचपन हजार गाँवों में तो मोबाइल नेटवर्क तक नहीं था। विडंबना देखिए, जिस दौर में पूरी शिक्षा 'बिजली और इंटरनेट' पर निर्भर हो गई, उस समय देश के 36 प्रतिशत स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं था।


इस डिजिटल रिक्तता का परिणाम यह हुआ कि लगभग 28.6 करोड़ छात्र-छात्राओं का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में फंस गया। उच्च शिक्षा के प्रति भी छात्रों का मोहभंग हुआ और करीब 47 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरे शहरों में जाकर पढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मानव जाति ने प्रगति तो बहुत की है, लेकिन तकनीक और उसकी पहुँच के बीच की रिक्तता को वह आज तक नहीं भर पाई। तकनीक तो खोज ली जाती है, पर उसे खरीदने और उपयोग करने की आर्थिक शक्ति आधी आबादी के पास आज भी नहीं है। महामारी ने गरीबी बढ़ाई और बाजारों को सीमित कर दिया, जिससे 3 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चे केवल डिजिटल उपकरणों के अभाव में शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित रह गए। इसकी वजह से आने वाले समय में एक बड़ी सामाजिक असमानता आ सकती है।


20

बाजार के सिकुड़ने और आर्थिक गतिविधियों के थम जाने से आम आदमी के रोजगार छिन गए और बेरोजगारी बढ़ गई। वहीं दूसरी ओर आश्चर्य यह रहा कि जहाँ मध्यम और निम्न वर्ग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, वहीं कॉर्पोरेट सेक्टर की बड़ी कंपनियों की आय में बेतहाशा वृद्धि हो रही थी। आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2020 से जुलाई 2020 की संक्षिप्त अवधि के बीच ही भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 423 अरब डॉलर की भारी वृद्धि दर्ज की गई।


इसे पूँजीवाद का चरित्र कहें या विडंबना, कि पूँजीपतियों ने इस वैश्विक त्रासदी को भी एक 'सुनहरे अवसर' के रूप में भुनाया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा दाने-दाने को मोहताज था, तब इन औद्योगिक घरानों ने अपनी आय को कई गुना बढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कोरोना काल का यह कालखंड गवाह है कि कैसे एक ही संकट ने गरीब को और अधिक गरीब बना दिया और धनी को और अधिक धनी। 'आपदा में अवसर' खोजने की यह होड़ दरअसल उस आर्थिक विषमता की ओर इशारा करती है, जो किसी भी महामारी से अधिक संक्रामक और घातक हो सकती है।

आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 

सादर, 

केशव राम सिंघल 


शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 1

 कोरोना काल के संस्मरण - 1

====== 

इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक एक उलझन के साथ शुरू हुआ। इस सदी के दूसरे दशक का अंत बहुत दु:खद अनुभव देकर गया। दूसरे दशक का अंतिम साल कोविड-19 (कोरोना) संक्रमण के साथ शुरू हुआ। प्रारम्भ में कोविड-19 संक्रमण के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, इसलिए शुरू के कुछ महीने भ्रम की स्थित में बीते। डर का माहौल था, सरकार ने मार्च 2020 में लॉकडाउन लगा दिया, काम-धंधे रुक गए, आर्थिक गतिविधियाँ रुक गई थीं।  

 

2

कोरोना काल में स्पर्श बहुत खतरनाक था। हाथ से हाथ नहीं मिला सकते थे। कोरोना कहता था - स्पर्श खतरनाक है। इंसान गाय, बैल, बकरी, भैंस आदि जानवरों को छू सकता है, पर सामने दिख रहे इंसान को नहीं छू सकता। कोरोना ने मानव समाज के दैनिक जीवन पर आक्रमण कर दिया था। 


3

नर्स अस्पताल में ड्यूटी कर रही है। कई दिनों से घर नहीं जा पायी है। खाना, पीना, रहना सब अस्पताल में और कोरोना से संक्रमित लोगों की सेवा में लगी हुई है। उसकी तीन वर्ष की बेटी अपने पापा के साथ उससे मिलने अस्पताल आयी है। पाँच दिन बाद नर्स अपनी बेटी को देख रही है और बेटी माँ को, वह भी दूर से। बेटी रो रही है, वह माँ के पास जाना चाहती है। माँ चाहकर भी उसे बुला नहीं सकती, उसे गोद में नहीं ले सकती, उसे प्यार नहीं कर सकती। बस दूर से माँ अपनी बेटी और और बेटी अपनी माँ को देख पा रही है। दोनों की आँखों से आँसू टपक रहे हैं। बच्ची के पिता और नर्स का पति असहाय सा खड़ा है, उसकी आँखें भी गीली हो गई हैं। माँ से उसकी ममता को छीन लेने वाला यह दर्द कितना बड़ा दर्द है। एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने मानव सभ्यता और दैनिक जीवन-शैली पर आक्रमण कर दिया। स्पर्श इंसान की सबसे बड़ी नियामत है, मानव समाज का सामूहिकता और मेल-मिलाप में विश्वास रहा है, जिसे एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने समाप्त कर दिया।  हाय ……… यह कैसी नियति है। 


एक व्यक्ति अपने गाँव से दूसरे राज्य में मजदूरी करने गया था। लॉक-डाउन लगने के बाद उसका काम छिन गया। उसके जैसे सैंकड़ों प्रवासी मजदूर थे। उनकी भीड़ टूटे भरोसे, भूखे पेट, थके पैर और अशांत मन के साथ अपने गाँव की ओर पैदल ही जा रहे थे, क्योंकि यातायात के साधन रेल, बस, हवाईजहाज सब बंद थे। वह भी अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर पैदल ही चल दिया। उसके जैसे बहुत से लोग अपने घर-गाँव की ओर जा रहे थे। गिरते-मरते कुछ पहुँचे अपनी मंजिल तक। कुछ ने रास्ते में दम तोड़ दिया। सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुए जब वह अपने गाँव की सीमा पर पहुँचा तो गाँव के लोगो ने उसे और उसके परिवार को गाँव के भीतर घुसने भी नहीं दिया। कोरोना के सूक्ष्म जीवाणु का डर हवा में फ़ैल गया था, भाव-शून्यता देखने को मिल रही थी। 


ईश्वर ने मनुष्य को 'स्पर्श' की अनमोल नियामत बख्शी है। यह वह मूक भाषा है जहाँ शब्द अपना अर्थ खो देते हैं और संवेदनाएँ सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। किसी ने सिसकते हुए कंधे पर रखा एक हाथ, रोते हुए बच्चे के सिर पर फेरा गया हाथ, या अपनों से किसी बड़े का चरण स्पर्श—ये वे सुनहरे धागे हैं जिनसे हमारे भारतीय समाज का ताना-बाना बुना गया है। कोरोना ने इन्हीं धागों को कच्चा कर दिया। उसने सिखाया कि अब 'प्रेम' का अर्थ 'दूरी' है। उसका स्पष्ट सन्देश था - स्पर्श करना मना है। 


कोरोना काल में सब अपनी सुरक्षा में लगे थे। सरकार देख रही थी, पर हालात ऐसे थे कि वह भी मजबूर थी। देश की संसद मौन थी, सवाल पूछने की मनाही थी। 


कोरोना काल में हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा की व्यक्तिगत लक्ष्मण-रेखा खींचने में लगा था। सरकारें व्यवस्था बनाए रखने का दावा तो कर रही थीं, पर जमीनी हालात ऐसे थे कि तंत्र स्वयं लाचार और बेबस नजर आ रहा था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहाँ संसद को जनता की आवाज बनना था, वहाँ एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। देश की सबसे बड़ी पंचायत—संसद—मौन थी। जिस समय सड़कों पर मानवता सिसक रही थी, उस समय सवाल पूछने की खिड़कियाँ बंद कर दी गई थीं।


सरकारी नीतियाँ विफल होती दिखीं और अस्पतालों के बाहर कतारें लंबी होने लगीं, तब जवाबदेही तय करने के बजाय 'सब ठीक है' का छद्म आवरण ओढ़ लिया गया। संकट केवल स्वास्थ्य का नहीं था, संकट नेतृत्व और सामूहिक जिम्मेदारी का भी था। यह वह दौर था जब सत्ता और आम नागरिक के बीच का संवाद टूट गया था और नागरिक केवल 'आंकड़ा' बनकर रह गया था। नीति-निर्माताओं की चुप्पी उन लोगों के घावों पर नमक की तरह थी, जो अपनों को खो रहे थे या सड़कों पर नंगे पाँव चल रहे थे।  


7

केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, शासन-प्रशासन सब देख रहे थे। रेल बंद थी, बसें बंद थी, हवाईजहाज भी बंद थे और हजारों प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने गाँवों की ओर भाग रहे थे, भूखे-प्यासे, कहीं कुछ मिल जाता तो खा लेते थे, सड़क के किनारे ही रात गुजारते थे। उस समय बहुत से सवाल उठे -

- क्या प्रवासी मजदूर इस देश के नागरिक नहीं हैं?

- क्या सत्ता और नागरिक का कोई रिश्ता बचा रह गया है?

- क्या संकट की घड़ी में प्रवासी मजदूरों के मालिकों ने अपने कामगारों के साथ मानवीय रिश्ता निभाया?

- क्या सरकार ने लॉक डाउन लगाने से पहले सोचा कि प्रवासी मजदूरों का क्या होगा?

- क्या चार घंटे पर्याप्त समय था प्रवासी मजदूरों के पास अपने को सुरक्षित करने के लिए?

- क्या सरकार राष्ट्रीय विपदा के इस संकटकालीन समय में एक अध्यादेश द्वारा निजी अस्पतालों पर नियंत्रण नहीं कर सकती थी, जो कोरोना संक्रमित रोग के इलाज के लिए लाखों रूपये वसूल रहे थे? 


हमारी परम्परा रही है कि परिजन और मित्र दिवंगत व्यक्ति को शव-यात्रा में कंधा देते हुए अंतिम विदा देते है, अंतिम संस्कार करते हैं। कोरोना ने जीवन और मृत्यु दोनों में न केवल इंसान को अकेले छोड़ा, वरन् मानवीय रिश्तों को तार-तार कर दिया। शव-यात्रा और सामूहिक शोक पर तो पूर्ण विराम लग गया। संवेदनाओं का जैसा खात्मा इस कोरोना काल में दिखा, वैसा कभी सोचा भी नहीं था।  


परिजनों और मित्रों का कंधा, वह अंतिम संबल होता है जो दिवंगत व्यक्ति को इस लोक की अंतिम गरिमा प्रदान करता है। अंतिम यात्रा में अपनों की मौजूदगी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस दुःख को बाँटने का माध्यम होता है, जिसे अकेले सहना कष्टप्रद है। किंतु कोरोना ने न केवल जीवन छीना, बल्कि मृत्यु की पवित्रता और विदाई के अधिकार को भी लहूलुहान कर दिया।


मानवीय रिश्तों के तार-तार होने का इससे वीभत्स दृश्य क्या होगा कि बेटा अपने पिता की चिता को मुखाग्नि देने से डर रहा था, और माँ अपनी संतान के अंतिम दर्शन के लिए पीपीई किट (PPE Kit) पहने हुए रोबोटनुमा अजनबियों के सामने गिड़गिड़ा रही थी। वे लोग, जो जीवन भर भरे-पूरे परिवारों के बीच रहे, अंत में एक पॉलिथीन में लिपटे हुए 'लावारिस' की तरह मशीनी क्रेन द्वारा चिता पर रख दिए गए।


शव-यात्रा और सामूहिक शोक, जो संवेदनाओं के साझा करने का माध्यम थे, उन पर पूर्ण विराम लग गया। श्मशान घाटों पर जलती अनगिनत चिताओं की लपटें गवाह थीं कि इंसान कितना असहाय हो चुका है। संवेदनाओं का ऐसा निर्दयी खात्मा इतिहास ने शायद ही कभी देखा हो। जहाँ मौत पर रोने के लिए अपनों का कंधा न मिले, वहाँ शोक केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का मानसिक अवसाद बन जाता है। जिस 'अंतिम विदा' में मंत्रों की ध्वनि और अपनों की सिसकियाँ होनी चाहिए थीं, वहाँ केवल सैनिटाइजर की गंध के साथ प्लास्टिक की सरसराहट सुनाई देती थी।


महामारियाँ पहले भी आईं और उन महामारियों में ऐसे योद्धा भी सामने आए, जिन्होंने जान की बाजी लगा कर मानवता के लिए काम किया। कोरोना काल में भी ढेरों ऐसे डॉक्टर, स्वास्थ्य-कर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता सामने आए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए लोगों को बचाया, मुश्किल वक्त में लोगों की मदद की। कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने मुफ्त में मास्क बाँटे, लोगों के घरों राशन पहुँचाया। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा की। 


जब जीवन अपनी चरम और दुरूह परिस्थितियों से टकराता है, तब मनुष्य के भीतर के दो रूप प्रकट होते हैं—या तो वह पूरी तरह आत्म-केंद्रित होकर संकुचित हो जाता है, या फिर वह अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भूलकर 'विश्व-चेतना' और 'परोपकार' के वृहद भाव से जुड़ जाता है। इतिहास साक्षी है कि महामारियाँ जब भी आईं, वे अपने साथ केवल विनाश नहीं, बल्कि 'मानवता के योद्धाओं' की अमर गाथाएँ भी लेकर आईं। कोरोना काल इस कसौटी पर मनुष्यता की सबसे बड़ी परीक्षा थी।


इस कालखंड में ऐसे अनगिनत 'अनाम नायक' आगे आए, जिन्होंने मौत के साये में रहकर जिंदगी की रक्षा की। ये वे डॉक्टर और नर्सें थीं, जो पीपीई किट के भीतर पसीने से तर-बतर, हफ्तों अपने मासूम बच्चों और बूढ़े माता-पिता से दूर रहे, केवल इसलिए कि किसी अजनबी की सांसें न उखड़ जाएँ। बहुत से एम्बुलेंस चालक, पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी, जो संक्रमण के सबसे करीब थे, फिर भी अपने कर्तव्य पथ से पीछे नहीं हटे।


यही वह समय था जब समाज की सामूहिक शक्ति भी जागी। कई गाँवों में लोगों ने मिलकर 'सामुदायिक रसोई' शुरू की, जहाँ भूखे प्रवासियों के लिए भोजन बना। बहुत से युवाओं की टोलियों ने सोशल मीडिया को 'मदद का कंट्रोल रूम' बना दिया, जहाँ आधी रात को भी ऑक्सीजन सिलेंडर या अस्पताल में बेड दिलाने के लिए लोग एक-दूसरे की जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे। कई मध्यमवर्गीय परिवारों ने अपनी जमा-पूंजी मुफ्त मास्क और राशन बाँटने में लगा दी। इन योद्धाओं ने सिद्ध कर दिया कि भले ही स्पर्श वर्जित था, पर 'संवेदनाओं का सेतु' अभी टूटा नहीं था। मनुष्यता की यह रक्षा केवल एक चिकित्सा कार्य नहीं था, बल्कि यह गिरती हुई सभ्यता को थामने वाला एक आध्यात्मिक अनुष्ठान था।


इसी दौर में 'पड़ोस' की परिभाषा भी बदल गई। एक कॉलोनी में एक ऐसा परिवार था जिसके सभी सदस्य एक साथ कोरोना की चपेट में आ गए। डॉक्टर की सलाह पर वे घर के भीतर ही क्वारंटाइन (पृथकवास) थे। विडंबना देखिए, सूचना मिलने पर भी कोई सगा संबंधी उनकी सीधी सहायता के लिए आगे नहीं आया; वे केवल मोबाइल की स्क्रीन पर हाल-चाल पूछकर अपनी औपचारिकता पूरी कर लेते थे। भय इतना गहरा था कि अपनों ने ही दूरियाँ बना ली थीं। ऐसे संकट के समय में, जब उस परिवार के सामने दवाइयाँ लाने और दो वक्त के भोजन का इंतजाम करने की विकट समस्या खड़ी हुई, तब पड़ोसियों ने 'मानवता का धर्म' निभाया। उन पड़ोसियों ने न केवल उनके दरवाजे पर समय से नाश्ता और भोजन पहुँचाया, बल्कि दवाइयों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की। यह वह क्षण था जब 'खून के रिश्तों' पर 'संवेदनाओं के रिश्ते' भारी पड़ गए। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा केवल अस्पतालों में ही नहीं, बल्कि घरों की उन दहलीज पर भी हो रही थी जहाँ एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के लिए देवदूत बनकर खड़ा था।

10

कोरोना काल ने मानवता की तस्वीर के दोनों ध्रुवों को एक साथ उजागर कर दिया—एक ओर जहाँ निःस्वार्थ सहयोग की धारा थी, वहीं दूसरी ओर घोर 'आत्म-केन्द्रीयता' भी दिख रही थी। कोरोना आया और चला गया, पर पीछे छोड़ गया है कुछ अनुत्तरित और चुभते हुए सवाल। क्या हमारे आपसी रिश्ते कभी वैसे ही सहज और निश्छल हो पाएंगे जैसे इस त्रासदी से पहले थे?


कोरोना-काल केवल शारीरिक बीमारी का समय नहीं था, बल्कि यह 'संवेदनाओं के अकाल' का भी दौर था। सामुदायिक और सामाजिक जीवन से जो अनिवार्य दूरी बनी, उसने हमारे भीतर के 'सामूहिक विश्वास' को गहरा आघात पहुँचाया। मानवीय मूल्यों का जो ह्रास और मरती हुई संवेदनाओं को इस दौर में हमने देखा।


आज जब हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं, तो आँखों में वह पुराना भरोसा नहीं, बल्कि एक 'आशंकापूर्ण नजरिया' और 'संवेदनाओं का ठंडापन' अधिक दिखाई देता है। रिश्तों के बीच की भौतिक दूरियाँ तो खत्म हो गईं, लेकिन मन की दूरियाँ बनी रह गई हैं। मन के किसी कोने में यह प्रश्न बार-बार कौंधता रहा —क्या आत्म-केन्द्रीयता और 'स्व' तक सीमित रहने का यह भाव अब मनुष्य का स्थायी चरित्र तो नहीं बन जाएगा? क्या उस सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने हमसे वे तमाम मूल्य तो नहीं छीन लिए, जिन्हें मानव सभ्यता ने हज़ारों साल के संघर्ष और प्रेम से अर्जित किया था? क्या हम अब एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मनुष्य भीड़ में होकर भी नितांत अकेला और आत्ममुग्ध होगा? 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......


सादर,

केशव राम सिंघल 


सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

बैंक पेंशनर्स का पेंशन अपडेशन – एम. सी. सिंगला केस से उम्मीद

बैंक पेंशनर्स का पेंशन अपडेशन – एम. सी. सिंगला केस से उम्मीद 

************

बैंक पेंशनर्स लंबे समय से पेंशन अपडेशन के लिए संघर्षरत हैं। हर बार निराशा मिली, क्योंकि मामला वर्षों से लंबित रहा। कुछ वर्ष पहले आईबीए (IBA) और यूएफबीयू (UFBU) के बीच एक्स-ग्रेशिया समझौते से उम्मीद जगी, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा। पेंशनर्स के संगठनों में एकता की कमी और आईबीए की अनिच्छा ने समस्या बढ़ाई। फिर भी, अब उम्मीद है कि यह कानूनी अधिकार सुप्रीम कोर्ट से मिलेगा।


BEPR 1995 का रेगुलेशन 35(1) (2003 संशोधित) स्पष्ट कहता है: "Basic pension and additional pension wherever applicable, shall be updated as per the formulae given in Appendix-I." यह प्रावधान अनिवार्य है, न कि वैकल्पिक। अपडेशन वेज रिविजन (wage revision) से जुड़ा है, जबकि DR (Dearness Relief) रेगुलेशन 37 के तहत महंगाई से राहत देता है। 2003 का संशोधन गजटेड और संसद द्वारा मान्य है, इसलिए बैंकों, आईबीए और डीएफएस (DFS) का इसे नजरअंदाज करना गलत है। वे बार-बार महंगाई राहत संशोधन (DR revision) का हवाला देकर भ्रम फैलाते हैं, जबकि अपडेशन रेगुलेशन में संरचनात्मक है।


पेंशन एक अधिकार है, कोई एहसान नहीं – सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि यह टाली गई मजदूरी है। RBI ने अपने पेंशनर्स के लिए अपडेशन लागू किया, तो बैंकों को क्यों नहीं? रेगुलेशन 56 CCS Rules का संदर्भ देता है।


05 फरवरी 2026 की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई (एम. सी. सिंगला बैंक पेंशन अपडेशन केस) - केस: M.C. Singla (Dead) Thr. LR. vs. Union of India (SLP (Civil) No. 5561/2016) - बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता (कोर्ट नंबर 2, वर्चुअल मोड) का संक्षिप्त ब्योरा 


- पेंशनर्स की तरफ से सीनियर एडवोकेट डॉ. मनिश सिंघवी ने दलीलें रखीं – पेंशन फंड का कॉर्पस ≈ ₹4.28 लाख करोड़, जबकि सालाना आउटगो ≈ ₹33,000 करोड़। पेंशन अपडेशन से बैंकों पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं, मौजूदा फंड से संभव। आरबीआइ (RBI) ने अपडेशन किया, बैंकों को भी करना चाहिए। रेगुलेशन्स के अनुसार अपडेशन अनिवार्य।  


- बैंकों/IBA/DFS की तरफ से सीनियर एडवोकेट श्री ध्रुव मेहता ने विरोध किया – अपडेशन से बैंकों पर फाइनेंशियल बोझ बढ़ेगा और विभिन्न रिटायरमेंट बैचों (1987 से पहले/बाद) में असमानता बढ़ेगी।   


कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। ओपन कोर्ट में यह ओपिनियन दिया कि रेगुलेशन्स के अनुसार बैंक पेंशन देने के लिए बाध्य हैं। दोनों को तुलनात्मक पेंशन टेबुलेशन (different retirement batches के लिए अंतर) दो हफ्तों में फाइल करने का निर्देश दिया। सुनवाई आंशिक (part-heard) रही। कोर्ट का ऑर्डर - "Heard. List the matter on 18th February 2026."  


सुप्रीम कोर्ट में चल रहा यह केस बैंक पेंशनर्स के लिए महत्वपूर्ण है। उम्मीद है कि 18 फरवरी 2026 को फाइनल दलीलें पूरी होंगी और फैसला बैंक पेंशनर्स के पक्ष में आएगा।  


सादर,  

केशव राम सिंघल  

 

आईबीए = IBA = Indian Bank's Association 

डीएफएस = DFS = Department of Financial Services , Ministry of Finance , Government of India 

यूएफबीयू = UFBU = United Forum of Bank Unions 

आरबीआई = RBI = Reserve Bank of India 


08 फरवरी 2026 तक की जानकारी के अनुसार आलेख तैयार किया गया। 


#BankPensionUpdation #MCSinglaCase #SupremeCourt #BankRetirees #PensionersRights #BankPension 


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

मौलिकता

मौलिकता 
******












प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


एक विचार सामने आया कि हर विचार पहले से ही ब्रह्मांड में मौजूद है, इसलिए कुछ भी वास्तव में मौलिक नहीं है।

यदि इस कथन का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि यह कथन एक दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दर्शाता है, जो कई विचारधाराओं और सिद्धांतों में है। आइए इसे विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास करते हैं। दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो दर्शनशास्त्र में यह विचार प्राचीन काल से ही मौजूद है कि सब कुछ पहले से ही अस्तित्व में है और व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव केवल उसी का प्रतिबिंब या बदला हुआ रूप है। प्लेटो का "आइडियाज का सिद्धांत" भी इसी तरह का है, जिसमें उन्होंने कहा कि सभी विचार और रूप पहले से ही एक उच्च वास्तविकता में मौजूद हैं। यह सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि संवेदनशील जगत की अस्थायी और परिवर्तनशील वस्तुओं के पीछे एक शाश्वत और अपरिवर्तनीय वास्तविकता होती है। हम कुर्सी का उदाहरण लेते हैं। इस जगत में हम विभिन्न प्रकार की कुर्सियाँ देखते हैं, जो अलग-अलग आकार, रंग और डिज़ाइन की होती हैं। लेकिन आइडियाज के जगत में कुर्सी का एक आदर्श रूप होता है, जो सभी कुर्सियों के लिए एक मानक या आदर्श के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस संसार की सभी कुर्सियाँ कुर्सी के आदर्श रूप की अपूर्ण और अस्थायी अभिव्यक्तियाँ हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो हम पाते हैं कि आधुनिक भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान में भी यह विचार पाया जाता है कि ब्रह्मांड में सभी पदार्थ और ऊर्जा पहले से ही मौजूद हैं और वे केवल रूपांतरित होते हैं। ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है और न ही विनाश, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखे तो हम पाते हैं कि अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं में भी यह विचार पाया जाता है कि सब कुछ पहले से ही ब्रह्म या परम सत्ता में मौजूद है। अद्वैत वेदांत जैसे दर्शन में यह माना जाता है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और बाकी सब उसकी अभिव्यक्ति है। 

एक अनुवर्ती प्रश्न सामने आता है कि क्या सृजनात्मकता मौलिक हो सकती है? हाँ, यदि हम सृजन को सापेक्ष दृष्टि से देखें। अर्थात् मौलिकता निरपेक्ष नहीं है, बल्कि सापेक्ष है। सापेक्षता का मतलब है कि हम किसी विचार, रचना या सृजन को उसके संदर्भ में देखेंगे। उदाहरण के लिए, एक कलाकार दो अलग-अलग तत्वों को मिलाकर एक नया रूप बना सकता है। भले ही दोनों तत्व पहले से मौजूद हों, लेकिन उनका संयोजन पहली बार हुआ हो। इस दृष्टि से वह रचना या सृजन उस व्यक्ति के लिए मौलिक हो सकती है। हर व्यक्ति का अनुभव, शिक्षा, संस्कृति और पृष्ठभूमि अलग होती है। इसलिए, दो लोगों के लिए एक ही विचार का अर्थ अलग हो सकता है। इस सापेक्षता के कारण, एक व्यक्ति के लिए जो विचार मौलिक है, दूसरे के लिए वह सामान्य हो सकता है। विज्ञान भी सापेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। उसी तरह, दर्शन में भी सापेक्षवाद (रिलेटिविज्म) कहता है कि सत्य और मूल्य संदर्भ पर निर्भर करते हैं। 

अब हम मौलिकता की अवधारणा को सापेक्ष दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे। हम पाते हैं कि मौलिकता का अर्थ केवल पूर्ण नवीनता नहीं है, बल्कि यह भी है कि कोई विचार, सृजन या रचना किसी विशेष संदर्भ में कितनी नवीन और प्रभावशाली है। जब हम विचार, सृजन और रचना को सापेक्ष दृष्टि से देखते हैं, तो हम नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं। इससे लोग नए विचार, सृजन और दृष्टिकोण को अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। सापेक्ष दृष्टि व्यक्तिगत रचनात्मकता को महत्व देती है। जब लोग अपना विचार, अनुभव या  दृष्टिकोण साझा करते हैं, तो इससे अनोखे विचार उत्पन्न होते हैं, जो हमें नए लग सकते हैं। सापेक्ष दृष्टि सांस्कृतिक विविधता को भी महत्व देती है। अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के अपने अनोखे दृष्टिकोण और विचार होते हैं, जो सांस्कृतिक विविधता को सामने रखते हैं।

एक उदाहरण के रूप में, मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत की बात करना चाहूँगा। भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों और तालों की एक समृद्ध परंपरा है। हालाँकि भारतीय संगीत के ये राग और ताल पहले से मौजूद हैं, लेकिन हर संगीतकार अपनी शैली और दृष्टिकोण से उन्हें नए और अनोखे तरीके से प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, सापेक्ष दृष्टि से देखें तो हर संगीतकार की प्रस्तुति मौलिक होती है। मौलिकता को सापेक्ष दृष्टि से देखने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि नवाचार और रचनात्मकता के कई रूप हो सकते हैं। यह दृष्टिकोण हमें नए विचार, अनुभव और दृष्टिकोण अपनाने और व्यक्तिगत रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है।

पाठकों के विचार आमंत्रित हैं।

सादर, 
केशव राम सिंघल 


बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

वंदे मातरम् और सरल हिंदी भावार्थ

वंदे मातरम् और सरल हिंदी भावार्थ 












प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe 


वंदे मातरम् !
********
वंदे मातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां मातरम् !
शुभ्र ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनीम्
फुलकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् 
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम् 
सुखदां, वरदां मातरम् ! 

वंदे मातरम् ! 
सप्तकोटीकंठ-कलकल निनादकराले, 
द्विसप्तकोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केणो मां तुमि एतो बले !
बहुबलधारिणीम् नमामि तारिणीम् 
रिपुदलवारिणीम् मातरम् !

वंदे मातरम् !
तुमि विद्या, तुमि धर्म, 
तुमि हरी, तुमि कर्म, 
तवं ही प्राणः शरीरे !
बाहुते तुमि मां शक्ति, 
हृदये तुमि मां भक्ति, 
तोमारई प्रतिमा गड़ी मंदिरे-मंदिरे !
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरण धारिणीं,
कमला कमल - दल- विहारिणीं !
वाणी विद्यादायिनीं नमामि त्वं, 
नमामि कमलां, अमलां, अतुलाम् !
सुजलां, सुफलां, मातरम् !

वंदे मातरम् !
श्यामलां, सरलां, सुस्मितां, भूषिताम् !
धरणी, भरणी मातरम् !

वंदे मातरम् !

सौजन्य - आनंदमठ, बंकिमचंद्र चटर्जी 

सरल हिंदी भावार्थ
************
हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम जल से परिपूर्ण हो, फल-फूल और अन्न से समृद्ध हो।
तुम्हारी हवा मलय पर्वत की शीतल सुगंध से भरी हुई है।
तुम खेतों की हरियाली से ढकी हुई हो।
चाँदनी रातें तुम्हारे सौंदर्य को और बढ़ाती हैं।
तुम्हारे वृक्ष फूलों से लदे हैं और पत्तियाँ शोभायमान हैं।
तुम सदा मुस्कुराने वाली हो, मधुर भाषा बोलने वाली हो।
तुम सुख देने वाली और वरदान देने वाली हो।
हे माता! मैं तुम्हें वंदन करता हूँ।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम्हारे करोड़ों पुत्रों के कंठ से उठने वाला स्वर बहुत शक्तिशाली है।
तुम्हारे करोड़ों हाथों में शस्त्रों जैसी शक्ति है।
तुम देखने में कोमल लगती हो, फिर भी तुममें अपार बल है।
तुम अनेक शक्तियों से युक्त हो।
मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ, क्योंकि तुम संकटों से तारने वाली हो।
तुम शत्रुओं का नाश करने वाली हो।
हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम ही विद्या हो, तुम ही धर्म हो।
तुम ही हरि (ईश्वर) हो और तुम ही कर्म हो।
तुम ही शरीर में प्राण रूप में विद्यमान हो।

तुम्हारे बाहुओं में शक्ति है और हृदय में भक्ति है।
हर मंदिर में तुम्हारी ही प्रतिमा स्थापित है।

तुम दुर्गा के रूप में हो, जो दस हथियारों को धारण करती हैं।
तुम लक्ष्मी के रूप में हो, जो कमल पर विराजमान रहती हैं।
तुम सरस्वती के रूप में हो, जो ज्ञान देने वाली हैं।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम कमल के समान पवित्र हो, निर्मल हो और अतुलनीय हो।
हे जल और अन्न से परिपूर्ण माता! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। 

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
तुम हरियाली से युक्त हो, सरल और सहज स्वभाव वाली हो।
तुम सदा मुस्कुराने वाली और आभूषणों से सुशोभित हो।
तुम धरती हो और पालन करने वाली माता हो।
मैं तुम्हें बार-बार प्रणाम करता हूँ।

हे मातृभूमि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।
मैं तुम्हें नमन करता हूँ, वंदन करता हूँ, और श्रद्धा से प्रणाम करता हूँ।

धन्यवाद, 
केशव राम सिंघल