शनिवार, 1 अगस्त 2026

360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली (360-Degree Evaluation System)

360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली (360-Degree Evaluation System)

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360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली कर्मचारी के प्रदर्शन और क्षमता का मूल्यांकन करने की एक संपूर्ण प्रणाली है।


पारंपरिक तरीकों में केवल नियोक्ता (Employer) अपने कर्मचारी (Employee) का आंकलन करता है। इसके विपरीत, 360-डिग्री प्रक्रिया में कर्मचारी का मूल्यांकन उसके आसपास के सभी प्रमुख स्रोतों द्वारा किया जाता है। इसमें निम्न प्रमुख स्रोत हो सकते हैं - 


- स्वयं का आंकलन (Self-Evaluation)

- मैनेजर या सीनियर (Manager / Supervisor)

- साथ काम करने वाले सहकर्मी (Peers / Colleagues)

- अधीनस्थ कर्मचारी (Subordinate Staff)

- ग्राहक या बाहरी हितधारक (Customers or External Stakeholder) आवश्यकतानुसार


इसका मुख्य उद्देश्य केवल मूल्यांकन करना (Rating) नहीं, बल्कि कर्मचारी की शक्तियों (Strengths) और सुधार के क्षेत्रों (Gaps in Perception) की पहचान करके उसके निरंतर विकास (Evolution/Development) का मार्ग प्रशस्त करना है।


360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली प्रक्रिया के मुख्य चरण (Steps)


इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से लागू करने के लिए इसे निम्न 7 चरणों में विभाजित किया जा सकता है -


1. उद्देश्य तय करना और तैयारी (Objective Setting & Preparation) - सबसे पहले यह तय किया जाता है कि मूल्यांकन लक्ष्य क्या है—क्या यह नेतृत्व विकास (Leadership development) के लिए है, निष्पादन मूल्यांकन (Performance appraisal) के लिए है या प्रशिक्षण आवश्यकता (Training needs) की पहचान के लिए है। प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले मापदंडों (Criteria),  जैसे Competencies, Behavioral Traits, Leadership Qualities) को परिभाषित किया जाता है।


2. प्रश्नावली तैयार करना (Questionnaire Design) - एक स्पष्ट और तटस्थ प्रश्नावली तैयार की जाती है। इसमें ऑब्जेक्टिव प्रश्न (Likert Scale Rating, जैसे 1 से 5 की रेटिंग) और खुले प्रश्न (टिप्पणी या फीडबैक के लिए) शामिल होते हैं।


3. मूल्यांककों का चयन (Selection of Evaluators) - जिस कर्मचारी (Ratee) का मूल्यांकन किया जाना है, उसके लिए उपयुक्त फीडबैक देने वालों (Raters) का चयन किया जाता है। संतुलित दृष्टिकोण के लिए मैनेजर, 3-5 सहकर्मी और 3-5 जूनियर सदस्यों को चुना जाता है।


4. सर्वे का संचालन और डेटा संग्रह (Survey Administration & Data Collection) - सर्वे को आमतौर पर एक ऑनलाइन HRMS पोर्टल या गोपनीय सॉफ्टवेयर के माध्यम से भेजा जाता है। गोपनीयता (Anonymity) के लिए मैनेजर के अलावा अन्य सभी (Peers और Subordinates) का फीडबैक पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता है ताकि सब बिना किसी डर या पक्षपात के निष्पक्ष राय दे सकें।


5. रिपोर्ट तैयार करना (Data Analysis & Report Generation) - प्राप्त सभी रेटिंग्स और टिप्पणियों का विश्लेषण (Analysis) किया जाता है। एक विस्तृत व्यक्तिगत रिपोर्ट (Individual Feedback Report) तैयार की जाती है, जिसमें कर्मचारी के स्वयं के आंकलन और दूसरों के आंकलन के बीच की तुलना (Blind Spots) की जाती है और कर्मचारी की शक्तियों की सूची (Strengths) के साथ सुधार के मुख्य क्षेत्र (Developmental Areas) का पता लगाया जाता है। 


6. फीडबैक सेशन और संवाद (Feedback C) - HR प्रतिनिधि या एक कुशल कोच/मैनेजर कर्मचारी के साथ आमने-सामने बैठकर रिपोर्ट साझा करता है। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि बातचीत का रुख सकारात्मक और विकासात्मक (Developmental) रहे, ताकि कर्मचारी अपने आपको रक्षात्मक (Defensive) महसूस न करे।


7. व्यक्तिगत विकास योजना (Individual Development Plan - IDP) - प्राप्त फीडबैक के आधार पर एक कार्य योजना (Action Plan) तैयार किया जाए, जिसमें आवश्यक ट्रेनिंग, मेंटरशिप और भविष्य के लक्ष्यों को निर्धारित किया जाता है ताकि कर्मचारी का वास्तविक उन्नयन (Evolution) हो सके।


संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यह 360-डिग्री मूल्यांकन प्रणाली की प्रक्रिया यह बताती है कि कर्मचारी कैसा काम कर रहा है, साथ ही यह उजागर करती है कि कर्मचारी का व्यवहार और काम दूसरों को कैसा दिखता है। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

सोमवार, 20 जुलाई 2026

प्रतिभा, विचार या व्यक्तित्व कभी दबता नहीं

प्रतिभा, विचार या व्यक्तित्व कभी दबता नहीं 

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"वे उन्हें जमीं में दफ़ना देना चाहते हैं,

पर वे बीज हैं,

अंकुरित होने के लिए तैयार,

वृक्ष बनने के लिए।"


यह संदेश और उससे जुड़ा चित्र अपने अन्तर्निहित भाव को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। इसमें प्रयुक्त प्रतीकात्मकता (Symbolism) अत्यंत सशक्त है।


1. ऊपर का दृश्य – दमन और निराशा का प्रतीक 


चित्र में कुछ लोग बीज को मिट्टी में दबा रहे हैं। प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है मानो वे उसे समाप्त करना चाहते हों। यह उन लोगों का प्रतीक है जो किसी व्यक्ति की प्रतिभा, विचार या व्यक्तित्व को दबाने का प्रयास करते हैं।


2. बीज – संभावना का प्रतीक 


यह कोई साधारण बीज नहीं, बल्कि संभावना (Potential) का प्रतीक है। किसी व्यक्ति को दबाने या रोकने का प्रयास कई बार उसके विकास की शुरुआत बन जाता है। यही इस विचार का सबसे सुंदर विरोधाभास (Paradox) है।


3. भूमिगत अंकुरण – संघर्ष से विकास 


मिट्टी के भीतर अंकुरित होता बीज यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियाँ विनाश का नहीं, बल्कि विकास का आधार बन सकती हैं। अंधकार ही वह स्थान है जहाँ से नए जीवन का आरम्भ होता है।


4. विशाल वृक्ष – सफलता और समाजोपयोगिता का प्रतीक 


पूर्ण विकसित वृक्ष सफलता, परिपक्वता, आत्मविश्वास और समाज के प्रति योगदान का प्रतीक है। वह अकेला खड़ा होता है, पर उसकी छाया, फल और प्राणवायु असंख्य लोगों को लाभ पहुँचाते हैं। यही एक सफल और विकसित व्यक्तित्व की पहचान है।


यह चित्र केवल संघर्ष की कहानी नहीं कहता, बल्कि दृष्टिकोण (Perspective) बदलने की प्रेरणा देता है। जिस घटना को कुछ लोग (विरोधी) "दफ़नाना" समझते हैं, उसी घटना को प्रकृति "रोपना" मानती है।


इसलिए —


* आलोचना में सीखने का अवसर खोजिए।

* असफलता को अनुभव में बदलिए।

* संघर्ष को अपनी शक्ति बनाइए।

* उपेक्षा को आत्मनिर्माण और आत्मविकास का माध्यम बनाइए।

* दबाव को विकास की ऊर्जा में परिवर्तित कीजिए।


यह चित्र लचीलापन (Resilience) तथा घावों के बाद का विकास (Post-Traumatic Growth) जैसी अवधारणाओं को भी सशक्त रूप से व्यक्त करता है। कुछ लोग कठिन परिस्थितियों से टूट जाते हैं, जबकि कुछ उसी कठिनाई को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बना लेते हैं।


प्रतिभा, विचार और व्यक्तित्व कभी दबते नहीं। यदि उनमें जीवन, सत्य और सामर्थ्य है, तो वे बीज की तरह एक दिन अवश्य अंकुरित होते हैं और समय आने पर विशाल वृक्ष बनकर समाज को छाया, प्रेरणा और दिशा प्रदान करते हैं।


सादर,

केशव राम सिंघल 


शनिवार, 18 जुलाई 2026

बैंक राष्ट्रीयकरण

बैंक राष्ट्रीयकरण

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स्वतंत्रता प्राप्ति (1947) के समय भारत में अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में थे। भारत का केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) उस समय भी कार्यरत था, जिसका राष्ट्रीयकरण 1 जनवरी 1949 को किया गया। इसके बाद 1955 में State Bank of India Act के अंतर्गत Imperial Bank of India के उपक्रम का अधिग्रहण कर State Bank of India (SBI) की स्थापना की गई। आगे चलकर 1959 में State Bank of India (Subsidiary Banks) Act के अंतर्गत विभिन्न पूर्व रियासतों के राज्य-संबद्ध बैंकों को SBI की सहायक (Associate) बैंकों के रूप में पुनर्गठित किया गया। इसके बावजूद अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में ही थे। इन निजी बैंकों का ऋण मुख्यतः बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों को मिलता था। कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों की बैंकिंग आवश्यकताओं की अपेक्षाकृत उपेक्षा होती थी। कई निजी बैंक वित्तीय कुप्रबंधन के कारण बंद हो जाते थे, जिससे जमाकर्ताओं को नुकसान उठाना पड़ता था।


तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 को 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा (Deposits) उस समय ₹50 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में शामिल थे—Central Bank of India, Bank of India, Punjab National Bank, Bank of Baroda, United Commercial Bank (वर्तमान UCO Bank), Canara Bank, United Bank of India, Dena Bank, Syndicate Bank, Union Bank of India, Allahabad Bank, Indian Bank, Indian Overseas Bank तथा Bank of Maharashtra।


15 अप्रैल 1980 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा ₹200 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में Andhra Bank, Punjab and Sind Bank, New Bank of India, Vijaya Bank, Corporation Bank तथा Oriental Bank of Commerce शामिल थे। इस प्रकार राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई।


बैंक राष्ट्रीयकरण के प्रमुख उद्देश्य


1. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं का विस्तार।

2. किसानों, लघु उद्योगों तथा कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराना।

3. बचत की आदत को बढ़ावा देना।

4. आर्थिक विकास में बैंकिंग प्रणाली की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करना।

5. प्राथमिकता क्षेत्र (Priority Sector) को ऋण उपलब्ध कराना।


राष्ट्रीयकरण के प्रमुख परिणाम


सकारात्मक पक्ष


* ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नई बैंक शाखाएँ खुलीं।

* बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार से बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिला।

* वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की मजबूत नींव पड़ी।

* कृषि एवं लघु उद्योगों को संस्थागत ऋण उपलब्ध होने लगा।

* बैंकिंग सेवाएँ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचीं।


चुनौतियाँ


* सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा।

* कुछ बैंकों में कार्यकुशलता और लाभप्रदता प्रभावित हुई।

* समय के साथ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) बढ़ीं।

* प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण सेवा गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।


1969 और 1980 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के आर्थिक विकास के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है। इससे बैंकिंग का दायरा बड़े उद्योगों से आगे बढ़कर किसानों, छोटे उद्यमियों और आम नागरिकों तक पहुँचा और कृषि, लघु उद्योग तथा अन्य प्राथमिकता क्षेत्रों को संस्थागत ऋण अधिक सुलभ होने लगा। यद्यपि बाद के वर्षों में कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियाँ सामने आईं, फिर भी वित्तीय समावेशन और सामाजिक बैंकिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीयकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। आज भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 12 है, क्योंकि समय-समय पर अनेक राष्ट्रीयकृत बैंकों का आपस में विलय किया जा चुका है। 1969 में जब 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था, तब भारत में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या लगभग 8,260 थी। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंक शाखाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया गया। परिणामस्वरूप आज देश में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या बढ़कर लगभग पौने दो लाख तक पहुँच गई है। यह बैंक राष्ट्रीयकरण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है, जिसने देश में वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी।


बैंक शाखाओं के तीव्र विस्तार के कारण बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित हुए। इसी विस्तार के परिणामस्वरूप इस आलेख के लेखक को वर्ष 1971 में बैंक की सेवा में आने का अवसर मिला।


19 जुलाई 2026 को बैंक राष्ट्रीयकरण के 57 वर्ष पूर्ण होंगे। यह अवसर भारतीय बैंकिंग इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करने का अवसर भी है। इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी बैंककर्मियों, सेवानिवृत्त बैंककर्मियों और बैंक ग्राहकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।


केशव राम सिंघल 


शुक्रवार, 26 जून 2026

पुस्तक चर्चा

पुस्तक चर्चा 

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पिछले दिनों पितृ दिवस (Fathers' Day) के अवसर पर मेरे बच्चों ने मुझे किताबों का एक सेट भेंट किया, जिसमें विक्टर फ्रैंकल (Viktor Frankl) की किताब "Man's Search for Meaning" भी एक है। यह किताब दो मुख्य भागों में विभाजित है। किताब का पहला भाग व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन है, जो नाजी यातना शिविरों में नरसंहार (Holocaust) के दौरान फ्रैंकल के व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन करता है, और भाग दो उनके द्वारा विकसित लोगोथेरपी (Logotherapy - खोज अर्थ की थेरेपी) का संक्षिप्त वर्णन है। यह किताब सन 1946 में प्रकाशित हुई थी और दुनिया भर में इसकी 16 मिलियन से ज्यादा कॉपी बिक चुकी हैं। लेखक ने यह किताब मूल रूप में जर्मन भाषा में लिखी थी। फिलहाल मैं किताब के पहले भाग की चर्चा कर रहा हूँ। 











विक्टर फ्रैंकल Auschwitz और अन्य कैम्पों में कैदी के रूप में तीन साल बिताते हैं। उन्होंने कैदियों के मनोवैज्ञानिक चरणों का वर्णन किया है - 


- आघात चरण - कैम्प पहुंचने पर शुरुआती सदमा।

- भावनात्मक सुन्नता का चरण - लंबे समय में भावनाओं का सुन्न होना, सिर्फ जीने (survival) पर ध्यान, भूख और यातनाओं के बावजूद कुछ सुंदर चीजों (जैसे सूर्यास्त) का आनंद लेना।

- मुक्ति चरण - आजादी के बाद निजीकरण, कटुता, मोहभंग (Depersonalization, Bitterness, Disillusionment) — मुक्ति के बाद कई लोगों ने पाया कि उनके प्रियजन जीवित नहीं रहे।











Auschwitz = नाजी जर्मनी का सबसे बड़ा और सबसे भयानक एकाग्रता सह विनाश शिविर (Concentration cum Extermination Camp) था, जहाँ एक साथ हजारों लोगों को कैद किया जाता था और यह सामूहिक हत्या का केंद्र था।


इस किताब से निम्न सीखें मिली - 


- भले ही व्यक्ति की परिस्थितियाँ कितनी भी भयानक हों, फिर भी वह अपना मनोदृष्टि (Attitude) चुन सकता है।

- जिसके पास जीने का कोई कारण होता है, वह लगभग किसी भी तरह से सह सकता है। (He who has a why to live for can bear almost any how.) नीत्शे का यह कथन किताब के केंद्र में है।

- जीवन में अर्थ (Meaning) खोजने से कष्ट (Suffering) सहन करने की ताकत मिलती है — काम (रचनात्मक कार्य) करके, दूसरों के लिए प्यार कर, या पीड़ा (कष्टों) का गरिमामय तरीके से सामना करने से। 

- बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जितनी भयानक हों — भूख, ठंड, यातनाएँ, अपमान — वे हमारे अंदरूनी स्वतंत्रता को पूरी तरह छीन नहीं सकतीं।

- यदि मौत का कोई उद्देश्य होता है तो जीवन अर्थ से भर जाता है, बेमानी नहीं रहता। यह फ्रैंकल के दर्शन का सार है। 

 










Dachau कैंप में  Typhus महामारी फ़ैल गई। बहुत से कैदी इस बीमारी से मर रहे थे। कैंप के डाक्टरों ने स्वयंसेवक मांगे, जो Typhus के मरीजों की देखभाल करें - मरीजों को दवाई दे, साफ़-सफाई रखे और डाक्टरों की मदद करे। फ्रैंकल ने खुद Typhus Ward में स्वयंसेवक बन एक उद्देश्य का चयन किया। वे जानते थे कि वे मर सकते हैं, पर उन्होंने सोचा कि ऐसे में उनकी मौत व्यर्थ नहीं होगी। फ्रैंकल ने कैम्पों में देखा कि जो कैदी भविष्य में कोई उद्देश्य (Purpose) देख पाए, वे ज्यादा जीवित रहे। फ्रैंकल ने Typhus Ward में स्वयंसेवक बनकर एक उद्देश्य चुना। वे जानते थे कि संक्रमण का खतरा है, लेकिन उनकी मौत व्यर्थ नहीं होगी — यह उनकी मनोदृष्टि का उदाहरण था।


किताब में केपोज (Capos) कैदियों का वर्णन है। केपोज वे कैदी (prisoners) थे जिन्हें नाजी गार्ड्स द्वारा चुना जाता था। इनकी जिम्मेदारी होती थी कि वे अन्य कैदियों की निगरानी करें, उनसे काम करवाएं और अनुशासन बनाए रखें। केपोज आम कैदियों से बेहतर सुविधाएं पाते थे, बेहतर कपड़े, ज्यादा खाना, अलग बिस्तर आदि। केपोज नाजी गार्ड्स से भी ज्यादा क्रूर और निर्दयी हो जाते थे। वे अपने साथी कैदियों को मारते-पीटते, शोषण करते थे, सिर्फ़ अपने जीवन और सुविधाओं को बचाने के लिए।

 

फ्रैंकल इस किताब के माध्यम से कहते हैं - "इंसानों की सिर्फ़ दो नस्लें होती हैं - शरीफ़ आदमी और बदतमीज़ आदमी। भले ही कोई जेल में हो या कैदी हो, इंसान अपनी आंतरिक स्वतंत्रता (Inner freedom) और शिष्टता (Decency) बनाए रख सकता है। लेकिन कई लोग ताकत (Power) मिलने पर भ्रष्ट (Corrupt) हो जाते थे।


मैंने कुछ प्रासंगिक चित्र OpenAI Tool की सहायता से निर्मित किए हैं, इस पुस्तक चर्चा आलेख के साथ साभार प्रस्तुत हैं। 


सादर,

केशव राम सिंघल 


रविवार, 21 जून 2026

फादर्स डे पर विशेष - बाऊजी की प्रेरणा

फादर्स डे पर विशेष 

बाऊजी की प्रेरणा

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सन 1972 की बात है। बैंक की नौकरी में मुझे मात्र छह महीने ही हुए थे। नए परिवेश से तालमेल बैठ ही रहा था कि अचानक ब्रांच मैनेजमेंट ने एक आदेश जारी कर दिया कि सभी कर्मचारियों की ड्यूटी रोटेट (बदल) की जा रही है। इस अप्रत्याशित निर्णय से शाखा में खलबली मच गई। अनेक पुराने कर्मचारी इस व्यवस्था से बेहद नाराज थे और सबने मिलकर तय किया कि अगले दिन प्रबंधन को एक संयुक्त विरोध-पत्र दिया जाएगा।


सच कहूँ तो, असमंजस में मैं भी था। छह महीने से मैं जिस सीट पर काम कर रहा था, उस पर मेरी पकड़ मजबूत हो चुकी थी। मैं उस आरामदेह दायरे (कंफर्ट जोन) से बाहर नहीं निकलना चाहता था। मन में डर था कि नई सीट पर नए सिरे से सब सीखना होगा। इसलिए, मैं भी अंदर ही अंदर इस रोटेशन के खिलाफ था।


दिनभर के मानसिक तनाव के बोझ तले दबा जब मैं शाम को घर पहुँचा, तो उदासी चेहरे पर साफ झलक रही थी। मुझे तनाव में देखकर बाऊजी भांप गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "क्या बात है बेटा, आज कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो?" मैंने बिना कुछ छुपाए बैंक की पूरी घटना उन्हें बता दी।


बाऊजी ने मेरी बात धैर्य से सुनी और मुस्कुराते हुए वात्सल्य भाव से कहा, "बेटा, वास्तव में यह रोटेशन तो तुम्हारे हित में है। करियर की शुरुआत में एक ही सीट पर बंध जाना तुम्हारी प्रतिभा को सीमित कर देगा। तुम जितनी अधिक सीटों पर काम करोगे, बैंकिंग के अलग-अलग विभागों को समझोगे, उतनी ही अधिक कार्य में तुम्हारी प्रवीणता बढ़ेगी। बहुमुखी प्रतिभा ही तुम्हें भविष्य में सफल बनाएगी।"


बाऊजी के इन व्यावहारिक और दूरदर्शी शब्दों ने मानो मेरी आँखों से संकीर्णता का पर्दा हटा दिया। उन्होंने मुझे बदलाव को सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा दी। अगले दिन, मैं एक नए उत्साह के साथ अपनी नई सीट की ओर बढ़ गया।


सादर,

केशव राम सिंघल