रविवार, 21 जून 2026

फादर्स डे पर विशेष - बाऊजी की प्रेरणा

फादर्स डे पर विशेष 

बाऊजी की प्रेरणा

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सन 1972 की बात है। बैंक की नौकरी में मुझे मात्र छह महीने ही हुए थे। नए परिवेश से तालमेल बैठ ही रहा था कि अचानक ब्रांच मैनेजमेंट ने एक आदेश जारी कर दिया कि सभी कर्मचारियों की ड्यूटी रोटेट (बदल) की जा रही है। इस अप्रत्याशित निर्णय से शाखा में खलबली मच गई। अनेक पुराने कर्मचारी इस व्यवस्था से बेहद नाराज थे और सबने मिलकर तय किया कि अगले दिन प्रबंधन को एक संयुक्त विरोध-पत्र दिया जाएगा।


सच कहूँ तो, असमंजस में मैं भी था। छह महीने से मैं जिस सीट पर काम कर रहा था, उस पर मेरी पकड़ मजबूत हो चुकी थी। मैं उस आरामदेह दायरे (कंफर्ट जोन) से बाहर नहीं निकलना चाहता था। मन में डर था कि नई सीट पर नए सिरे से सब सीखना होगा। इसलिए, मैं भी अंदर ही अंदर इस रोटेशन के खिलाफ था।


दिनभर के मानसिक तनाव के बोझ तले दबा जब मैं शाम को घर पहुँचा, तो उदासी चेहरे पर साफ झलक रही थी। मुझे तनाव में देखकर बाऊजी भांप गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "क्या बात है बेटा, आज कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो?" मैंने बिना कुछ छुपाए बैंक की पूरी घटना उन्हें बता दी।


बाऊजी ने मेरी बात धैर्य से सुनी और मुस्कुराते हुए वात्सल्य भाव से कहा, "बेटा, वास्तव में यह रोटेशन तो तुम्हारे हित में है। करियर की शुरुआत में एक ही सीट पर बंध जाना तुम्हारी प्रतिभा को सीमित कर देगा। तुम जितनी अधिक सीटों पर काम करोगे, बैंकिंग के अलग-अलग विभागों को समझोगे, उतनी ही अधिक कार्य में तुम्हारी प्रवीणता बढ़ेगी। बहुमुखी प्रतिभा ही तुम्हें भविष्य में सफल बनाएगी।"


बाऊजी के इन व्यावहारिक और दूरदर्शी शब्दों ने मानो मेरी आँखों से संकीर्णता का पर्दा हटा दिया। उन्होंने मुझे बदलाव को सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा दी। अगले दिन, मैं एक नए उत्साह के साथ अपनी नई सीट की ओर बढ़ गया।


सादर,

केशव राम सिंघल


रविवार, 7 जून 2026

खरगोश और कछुए की कहानी

खरगोश और कछुए की कहानी 

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मित्रों,


आपने कछुए और खरगोश की पारंपरिक कहानी तो सुनी ही होगी। जब दोनों में पहली बार दौड़ हुई, तो कछुआ इसलिए जीत गया क्योंकि खरगोश अति-आत्मविश्वास में दौड़ के दौरान सो गया था। उस दिन खरगोश बहुत दुखी हुआ कि वह धीमी गति से चलने वाले कछुए से हार गया। उसने अपनी गलती पर विचार किया और अगले दिन कछुए को दोबारा दौड़ लगाने की चुनौती दी। इस बार खरगोश ने अपनी एकाग्रता बनाए रखी, वह बिना रुके लगातार भागा और आसानी से जीत गया। अब कछुआ हार के कारण दुखी था।


कछुए ने ठंडे दिमाग से सोचा कि खरगोश से उसकी तेज गति के रहते कैसे जीता जाए। अगले दिन कछुए ने खरगोश से कहा, "चलो आज फिर दौड़ लगाते हैं, पर इस बार दौड़ का लक्ष्य वह सामने दिखने वाला पेड़ होगा।" खरगोश तुरंत तैयार हो गया और दौड़ शुरू हुई।


खरगोश हमेशा की तरह बहुत तेजी से भागा, पर कुछ ही दूरी पर जाकर अचानक रुक गया। रास्ते में एक चौड़ी नदी आ गई थी। वह सोचने लगा कि बिना किसी पुल के नदी के उस पार पेड़ तक कैसे पहुँचा जाए? खरगोश नदी के इसी किनारे लाचार होकर बैठ गया। दूसरी ओर, कछुआ अपनी धीमी लेकिन निरंतर गति से चलता हुआ नदी के किनारे पहुँचा, आसानी से तैरकर नदी पार की और लक्ष्य (पेड़) तक पहुँचकर दौड़ जीत गया। इस बार खरगोश अपनी इस कमजोरी पर उदास था कि उसे तैरना नहीं आता, पर यह उसके बस में नहीं था। 


अगले दिन खरगोश और कछुआ दोबारा मिले। खरगोश ने व्यावहारिक होकर कहा, "कछुए भाई! नदी के इस पार की दौड़ में मैं जीता और नदी के उस पार की दौड़ में तुम जीते। इस तरह तो हम एक-दूसरे को नीचा ही दिखाते रहेंगे।"


इस पर कछुआ मुस्कुराकर बोला, "खरगोश भाई! यदि हम दोनों एक-दूसरे की ताकत को अपनी ताकत बना लें, तो हम दोनों हर बार जीत सकते हैं और अन्य लोगों को एक सीख दे सकते हैं।"


दोनों ने मिलकर एक नई योजना बनाई और आखिरी बार फिर दौड़ शुरू हुई। इस बार, ज़मीन पर दौड़ते समय खरगोश की पीठ पर कछुआ बैठा था, जिससे वे पलक झपकते ही नदी के किनारे पहुँच गए। नदी आते ही खरगोश कछुए की पीठ पर बैठ गया और दोनों ने आसानी से नदी पार कर ली। नदी पार करने के बाद फिर कछुआ खरगोश की पीठ पर सवार हुआ और दोनों एक साथ, एक ही समय पर लक्ष्य (पेड़) तक पहुँच गए।


इस बार दोनों ही विजेता थे। 


मेरी सीख 


जब हम व्यक्तिगत स्पर्धा से ऊपर उठकर एक टीम के रूप में काम करते हैं, तो हर कठिन परिस्थिति को जीत सकते हैं। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी

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भारत में Bank Account Portability (बैंक खाता पोर्टेबिलिटी) को लेकर हाल ही में महत्वपूर्ण चर्चा हुई है। RBI ने अपनी Payments Vision 2028 में Payments Switching Service (PaSS) नामक एक प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत ग्राहक भविष्य में बैंक बदल सकेंगे लेकिन अपना खाता नंबर वही रख सकेंगे। यह उसी के समान है जैसे हम अपने मोबाइल की पोर्टेबिलिटी करवाते हैं कि सर्विस प्रोवाइडर तो बदल जाता है पर मोबाइल नंबर वही रहता है। 


इसका अर्थ यह है कि आज यदि कोई व्यक्ति एक बैंक से दूसरे बैंक में जाना चाहता है, तो उसे नया खाता खोलना पड़ता है और फिर उसे -


- वेतन (Salary) के लिए नए बैंक खाते की जानकारी देनी पड़ती है,

- EMI निर्देश अपडेट करने पड़ते हैं,

- SIP, बीमा प्रीमियम और ऑटो-डेबिट बदलने पड़ते हैं,

- UPI और अन्य भुगतान व्यवस्थाएँ पुनः सेट करनी पड़ती हैं।


प्रस्तावित व्यवस्था में ग्राहक बैंक बदल सकेगा, खाता संख्या वही रहेगी, उससे जुड़े भुगतान निर्देश स्वतः नए बैंक में स्थानांतरित हो सकेंगे। 


यह सुविधा अभी लागू नहीं हुई है। RBI इस पर कार्य कर रहा है और इसे Payments Vision 2028 के अंतर्गत प्रस्तावित किया गया है। इसके लिए तकनीकी और परिचालन ढाँचा विकसित किया जाना है।


ग्राहकों को इससे बहुत लाभ होगा। वे बेहतर सेवा देने वाले बैंक में आसानी से अपने खाते का स्थानांतरण करवा सकेंगे। बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। खाता बदलने का झंझट और कागजी कार्यवाही कम होगी। EMI, SIP, बीमा और वेतन जैसी सेवाओं में व्यवधान नहीं आएगा।


वैसे भारत में कई वर्षों से RBI ने एक ही बैंक की विभिन्न शाखाओं के बीच खाता स्थानांतरण (Intra-bank Portability) की अनुमति दी हुई है, जिसमें ग्राहक शाखा बदल सकता है और खाता संख्या वही रहती है। कुछ बैंकों ने यह सुविधा पहले से लागू कर रखी है।


सार रूप में कहा जा सकता है कि भारत में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की तरह बैंक अकाउंट पोर्टेबिलिटी लाने की दिशा में RBI गंभीरता से कार्य कर रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो ग्राहक बिना खाता संख्या बदले बैंक बदल सकेंगे। फिलहाल यह एक प्रस्तावित व्यवस्था है और इसके कार्यान्वयन की प्रतीक्षा है।


अधिक जानकारी के लिए RBI के Payments Vision 2028 दस्तावेज का अध्ययन किया जा सकता है, जिसमें Payments Switching Service (PaSS) सहित डिजिटल भुगतान क्षेत्र की भावी रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।


सादर,

केशव राम सिंघल

शनिवार, 6 जून 2026

बेबी बूमर्स - हमारी पीढ़ी

बेबी बूमर्स - हमारी पीढ़ी

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मैं 'बेबी बूमर्स' पीढ़ी का सदस्य हूँ, जो दुनिया की सबसे प्रभावशाली पीढ़ियों में से एक रही है। इस वर्ग में वे लोग आते हैं जिनका जन्म 1946 से 1964 के बीच हुआ। जब हमारी पीढ़ी का आगमन हुआ, तब तक द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था और पूरे विश्व में शांति व आर्थिक सुधार का दौर शुरू हो रहा था। उस समय दुनिया भर में जन्म दर में एक बहुत बड़ा उछाल आया, जिसके कारण ही इस पीढ़ी को 'बेबी बूमर्स' का नाम मिला।


हमारी पीढ़ी के लोग काम के प्रति बेहद समर्पित रहे हैं और हमने अपनी कड़ी मेहनत से आर्थिक समृद्धि के नए आयाम देखे हैं। टेलीविजन और कार सहित तमाम आधुनिक घरेलू उपकरणों का विस्तार हमारे ही सामने हुआ। आज इस पीढ़ी के लोग सीनियर सिटिज़न्स हैं, जिनकी उम्र 62 से 80 वर्ष के बीच है और अधिकांश लोग परिवारों में दादा-दादी या नाना-नानी की भूमिका निभा रहे हैं। हम आज भी पारंपरिक मूल्यों, आर्थिक सुरक्षा और पारिवारिक जिम्मेदारी को ही सर्वोपरि मानते हैं।


सादर,

केशव राम सिंघल


मेरे से पहले की पीढ़ी - मूक पीढ़ी (The Silent Generation)

मेरे से पहले की पीढ़ी - मूक पीढ़ी (The Silent Generation)
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मेरे माता-पिता 'मूक पीढ़ी' से थे। यह पीढ़ी उन लोगों से संबंधित है जिनका जन्म 1928 से 1945 के दौरान हुआ था। इस पीढ़ी के लोगों की आज की उम्र 81 से 98 वर्ष के बीच है। यद्यपि इस पीढ़ी के अनेक वरिष्ठ हमारे बीच से जा चुके हैं, फिर भी आज कई बुजुर्ग हमारे बीच मौजूद हैं। ये समाज के वे सबसे वरिष्ठ और अनुभवी स्तंभ हैं, जिन्होंने आधुनिक दुनिया की नींव रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। 

यह वह पीढ़ी है जिसका जन्म 'महान आर्थिक मंदी' (Great Depression) और 'द्वितीय विश्व युद्ध' के साये में हुआ था। जब ये बच्चे थे, तब दुनिया में जीवन यापन करना बेहद कठिन था।

इन्हें 'मूक' (Silent) कहे जाने के पीछे भी एक इतिहास है। इस नाम का इस्तेमाल सबसे पहले 1951 में 'Time' मैगजीन के एक लेख में किया गया था। दरअसल, इस पीढ़ी के माता-पिता व्यवस्था के खिलाफ काफी मुखर और विद्रोही स्वभाव के थे, परंतु उनके विपरीत इस पीढ़ी के युवाओं ने चुपचाप, बिना किसी बड़े विरोध के, कठिन परिस्थितियों में काम करना और व्यवस्था का सम्मान करना चुना। वे व्यवस्था से लड़ने के बजाय चुपचाप अपनी मेहनत से देश को दोबारा खड़ा करने में जुट गए।

इस पीढ़ी के लोगों की मुख्य विशेषताएँ यह रहीं कि ये बेहद वफादार, नियमों व अनुशासन का पालन करने वाले, और आर्थिक मामलों में बहुत मितव्ययी (Thrifty) थे। भारत के संदर्भ में, यह वही पीढ़ी है जिसने देश की आज़ादी के आंदोलन में भाग लिया और विभाजन का दंश अपनी आँखों से देखा और महसूस किया है।

सादर,
केशव राम सिंघल