शनिवार, 18 जुलाई 2026

बैंक राष्ट्रीयकरण

बैंक राष्ट्रीयकरण

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स्वतंत्रता प्राप्ति (1947) के समय भारत में अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में थे। भारत का केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) उस समय भी कार्यरत था, जिसका राष्ट्रीयकरण 1 जनवरी 1949 को किया गया। इसके बाद 1955 में State Bank of India Act के अंतर्गत Imperial Bank of India के उपक्रम का अधिग्रहण कर State Bank of India (SBI) की स्थापना की गई। आगे चलकर 1959 में State Bank of India (Subsidiary Banks) Act के अंतर्गत विभिन्न पूर्व रियासतों के राज्य-संबद्ध बैंकों को SBI की सहायक (Associate) बैंकों के रूप में पुनर्गठित किया गया। इसके बावजूद अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में ही थे। इन निजी बैंकों का ऋण मुख्यतः बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों को मिलता था। कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों की बैंकिंग आवश्यकताओं की अपेक्षाकृत उपेक्षा होती थी। कई निजी बैंक वित्तीय कुप्रबंधन के कारण बंद हो जाते थे, जिससे जमाकर्ताओं को नुकसान उठाना पड़ता था।


तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 को 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा (Deposits) उस समय ₹50 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में शामिल थे—Central Bank of India, Bank of India, Punjab National Bank, Bank of Baroda, United Commercial Bank (वर्तमान UCO Bank), Canara Bank, United Bank of India, Dena Bank, Syndicate Bank, Union Bank of India, Allahabad Bank, Indian Bank, Indian Overseas Bank तथा Bank of Maharashtra।


15 अप्रैल 1980 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा ₹200 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में Andhra Bank, Punjab and Sind Bank, New Bank of India, Vijaya Bank, Corporation Bank तथा Oriental Bank of Commerce शामिल थे। इस प्रकार राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई।


बैंक राष्ट्रीयकरण के प्रमुख उद्देश्य


1. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं का विस्तार।

2. किसानों, लघु उद्योगों तथा कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराना।

3. बचत की आदत को बढ़ावा देना।

4. आर्थिक विकास में बैंकिंग प्रणाली की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करना।

5. प्राथमिकता क्षेत्र (Priority Sector) को ऋण उपलब्ध कराना।


राष्ट्रीयकरण के प्रमुख परिणाम


सकारात्मक पक्ष


* ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नई बैंक शाखाएँ खुलीं।

* बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार से बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिला।

* वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की मजबूत नींव पड़ी।

* कृषि एवं लघु उद्योगों को संस्थागत ऋण उपलब्ध होने लगा।

* बैंकिंग सेवाएँ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचीं।


चुनौतियाँ


* सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा।

* कुछ बैंकों में कार्यकुशलता और लाभप्रदता प्रभावित हुई।

* समय के साथ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) बढ़ीं।

* प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण सेवा गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।


1969 और 1980 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के आर्थिक विकास के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है। इससे बैंकिंग का दायरा बड़े उद्योगों से आगे बढ़कर किसानों, छोटे उद्यमियों और आम नागरिकों तक पहुँचा और कृषि, लघु उद्योग तथा अन्य प्राथमिकता क्षेत्रों को संस्थागत ऋण अधिक सुलभ होने लगा। यद्यपि बाद के वर्षों में कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियाँ सामने आईं, फिर भी वित्तीय समावेशन और सामाजिक बैंकिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीयकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। आज भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 12 है, क्योंकि समय-समय पर अनेक राष्ट्रीयकृत बैंकों का आपस में विलय किया जा चुका है। 1969 में जब 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था, तब भारत में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या लगभग 8,260 थी। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंक शाखाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया गया। परिणामस्वरूप आज देश में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या बढ़कर लगभग पौने दो लाख तक पहुँच गई है। यह बैंक राष्ट्रीयकरण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है, जिसने देश में वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी।


बैंक शाखाओं के तीव्र विस्तार के कारण बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित हुए। इसी विस्तार के परिणामस्वरूप इस आलेख के लेखक को वर्ष 1971 में बैंक की सेवा में आने का अवसर मिला।


19 जुलाई 2026 को बैंक राष्ट्रीयकरण के 57 वर्ष पूर्ण होंगे। यह अवसर भारतीय बैंकिंग इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करने का अवसर भी है। इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी बैंककर्मियों, सेवानिवृत्त बैंककर्मियों और बैंक ग्राहकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।


केशव राम सिंघल 


शुक्रवार, 26 जून 2026

पुस्तक चर्चा

पुस्तक चर्चा 

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पिछले दिनों पितृ दिवस (Fathers' Day) के अवसर पर मेरे बच्चों ने मुझे किताबों का एक सेट भेंट किया, जिसमें विक्टर फ्रैंकल (Viktor Frankl) की किताब "Man's Search for Meaning" भी एक है। यह किताब दो मुख्य भागों में विभाजित है। किताब का पहला भाग व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन है, जो नाजी यातना शिविरों में नरसंहार (Holocaust) के दौरान फ्रैंकल के व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन करता है, और भाग दो उनके द्वारा विकसित लोगोथेरपी (Logotherapy - खोज अर्थ की थेरेपी) का संक्षिप्त वर्णन है। यह किताब सन 1946 में प्रकाशित हुई थी और दुनिया भर में इसकी 16 मिलियन से ज्यादा कॉपी बिक चुकी हैं। लेखक ने यह किताब मूल रूप में जर्मन भाषा में लिखी थी। फिलहाल मैं किताब के पहले भाग की चर्चा कर रहा हूँ। 











विक्टर फ्रैंकल Auschwitz और अन्य कैम्पों में कैदी के रूप में तीन साल बिताते हैं। उन्होंने कैदियों के मनोवैज्ञानिक चरणों का वर्णन किया है - 


- आघात चरण - कैम्प पहुंचने पर शुरुआती सदमा।

- भावनात्मक सुन्नता का चरण - लंबे समय में भावनाओं का सुन्न होना, सिर्फ जीने (survival) पर ध्यान, भूख और यातनाओं के बावजूद कुछ सुंदर चीजों (जैसे सूर्यास्त) का आनंद लेना।

- मुक्ति चरण - आजादी के बाद निजीकरण, कटुता, मोहभंग (Depersonalization, Bitterness, Disillusionment) — मुक्ति के बाद कई लोगों ने पाया कि उनके प्रियजन जीवित नहीं रहे।











Auschwitz = नाजी जर्मनी का सबसे बड़ा और सबसे भयानक एकाग्रता सह विनाश शिविर (Concentration cum Extermination Camp) था, जहाँ एक साथ हजारों लोगों को कैद किया जाता था और यह सामूहिक हत्या का केंद्र था।


इस किताब से निम्न सीखें मिली - 


- भले ही व्यक्ति की परिस्थितियाँ कितनी भी भयानक हों, फिर भी वह अपना मनोदृष्टि (Attitude) चुन सकता है।

- जिसके पास जीने का कोई कारण होता है, वह लगभग किसी भी तरह से सह सकता है। (He who has a why to live for can bear almost any how.) नीत्शे का यह कथन किताब के केंद्र में है।

- जीवन में अर्थ (Meaning) खोजने से कष्ट (Suffering) सहन करने की ताकत मिलती है — काम (रचनात्मक कार्य) करके, दूसरों के लिए प्यार कर, या पीड़ा (कष्टों) का गरिमामय तरीके से सामना करने से। 

- बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जितनी भयानक हों — भूख, ठंड, यातनाएँ, अपमान — वे हमारे अंदरूनी स्वतंत्रता को पूरी तरह छीन नहीं सकतीं।

- यदि मौत का कोई उद्देश्य होता है तो जीवन अर्थ से भर जाता है, बेमानी नहीं रहता। यह फ्रैंकल के दर्शन का सार है। 

 










Dachau कैंप में  Typhus महामारी फ़ैल गई। बहुत से कैदी इस बीमारी से मर रहे थे। कैंप के डाक्टरों ने स्वयंसेवक मांगे, जो Typhus के मरीजों की देखभाल करें - मरीजों को दवाई दे, साफ़-सफाई रखे और डाक्टरों की मदद करे। फ्रैंकल ने खुद Typhus Ward में स्वयंसेवक बन एक उद्देश्य का चयन किया। वे जानते थे कि वे मर सकते हैं, पर उन्होंने सोचा कि ऐसे में उनकी मौत व्यर्थ नहीं होगी। फ्रैंकल ने कैम्पों में देखा कि जो कैदी भविष्य में कोई उद्देश्य (Purpose) देख पाए, वे ज्यादा जीवित रहे। फ्रैंकल ने Typhus Ward में स्वयंसेवक बनकर एक उद्देश्य चुना। वे जानते थे कि संक्रमण का खतरा है, लेकिन उनकी मौत व्यर्थ नहीं होगी — यह उनकी मनोदृष्टि का उदाहरण था।


किताब में केपोज (Capos) कैदियों का वर्णन है। केपोज वे कैदी (prisoners) थे जिन्हें नाजी गार्ड्स द्वारा चुना जाता था। इनकी जिम्मेदारी होती थी कि वे अन्य कैदियों की निगरानी करें, उनसे काम करवाएं और अनुशासन बनाए रखें। केपोज आम कैदियों से बेहतर सुविधाएं पाते थे, बेहतर कपड़े, ज्यादा खाना, अलग बिस्तर आदि। केपोज नाजी गार्ड्स से भी ज्यादा क्रूर और निर्दयी हो जाते थे। वे अपने साथी कैदियों को मारते-पीटते, शोषण करते थे, सिर्फ़ अपने जीवन और सुविधाओं को बचाने के लिए।

 

फ्रैंकल इस किताब के माध्यम से कहते हैं - "इंसानों की सिर्फ़ दो नस्लें होती हैं - शरीफ़ आदमी और बदतमीज़ आदमी। भले ही कोई जेल में हो या कैदी हो, इंसान अपनी आंतरिक स्वतंत्रता (Inner freedom) और शिष्टता (Decency) बनाए रख सकता है। लेकिन कई लोग ताकत (Power) मिलने पर भ्रष्ट (Corrupt) हो जाते थे।


मैंने कुछ प्रासंगिक चित्र OpenAI Tool की सहायता से निर्मित किए हैं, इस पुस्तक चर्चा आलेख के साथ साभार प्रस्तुत हैं। 


सादर,

केशव राम सिंघल 


रविवार, 21 जून 2026

फादर्स डे पर विशेष - बाऊजी की प्रेरणा

फादर्स डे पर विशेष 

बाऊजी की प्रेरणा

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सन 1972 की बात है। बैंक की नौकरी में मुझे मात्र छह महीने ही हुए थे। नए परिवेश से तालमेल बैठ ही रहा था कि अचानक ब्रांच मैनेजमेंट ने एक आदेश जारी कर दिया कि सभी कर्मचारियों की ड्यूटी रोटेट (बदल) की जा रही है। इस अप्रत्याशित निर्णय से शाखा में खलबली मच गई। अनेक पुराने कर्मचारी इस व्यवस्था से बेहद नाराज थे और सबने मिलकर तय किया कि अगले दिन प्रबंधन को एक संयुक्त विरोध-पत्र दिया जाएगा।


सच कहूँ तो, असमंजस में मैं भी था। छह महीने से मैं जिस सीट पर काम कर रहा था, उस पर मेरी पकड़ मजबूत हो चुकी थी। मैं उस आरामदेह दायरे (कंफर्ट जोन) से बाहर नहीं निकलना चाहता था। मन में डर था कि नई सीट पर नए सिरे से सब सीखना होगा। इसलिए, मैं भी अंदर ही अंदर इस रोटेशन के खिलाफ था।


दिनभर के मानसिक तनाव के बोझ तले दबा जब मैं शाम को घर पहुँचा, तो उदासी चेहरे पर साफ झलक रही थी। मुझे तनाव में देखकर बाऊजी भांप गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "क्या बात है बेटा, आज कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो?" मैंने बिना कुछ छुपाए बैंक की पूरी घटना उन्हें बता दी।


बाऊजी ने मेरी बात धैर्य से सुनी और मुस्कुराते हुए वात्सल्य भाव से कहा, "बेटा, वास्तव में यह रोटेशन तो तुम्हारे हित में है। करियर की शुरुआत में एक ही सीट पर बंध जाना तुम्हारी प्रतिभा को सीमित कर देगा। तुम जितनी अधिक सीटों पर काम करोगे, बैंकिंग के अलग-अलग विभागों को समझोगे, उतनी ही अधिक कार्य में तुम्हारी प्रवीणता बढ़ेगी। बहुमुखी प्रतिभा ही तुम्हें भविष्य में सफल बनाएगी।"


बाऊजी के इन व्यावहारिक और दूरदर्शी शब्दों ने मानो मेरी आँखों से संकीर्णता का पर्दा हटा दिया। उन्होंने मुझे बदलाव को सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा दी। अगले दिन, मैं एक नए उत्साह के साथ अपनी नई सीट की ओर बढ़ गया।


सादर,

केशव राम सिंघल


रविवार, 7 जून 2026

खरगोश और कछुए की कहानी

खरगोश और कछुए की कहानी 

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मित्रों,


आपने कछुए और खरगोश की पारंपरिक कहानी तो सुनी ही होगी। जब दोनों में पहली बार दौड़ हुई, तो कछुआ इसलिए जीत गया क्योंकि खरगोश अति-आत्मविश्वास में दौड़ के दौरान सो गया था। उस दिन खरगोश बहुत दुखी हुआ कि वह धीमी गति से चलने वाले कछुए से हार गया। उसने अपनी गलती पर विचार किया और अगले दिन कछुए को दोबारा दौड़ लगाने की चुनौती दी। इस बार खरगोश ने अपनी एकाग्रता बनाए रखी, वह बिना रुके लगातार भागा और आसानी से जीत गया। अब कछुआ हार के कारण दुखी था।


कछुए ने ठंडे दिमाग से सोचा कि खरगोश से उसकी तेज गति के रहते कैसे जीता जाए। अगले दिन कछुए ने खरगोश से कहा, "चलो आज फिर दौड़ लगाते हैं, पर इस बार दौड़ का लक्ष्य वह सामने दिखने वाला पेड़ होगा।" खरगोश तुरंत तैयार हो गया और दौड़ शुरू हुई।


खरगोश हमेशा की तरह बहुत तेजी से भागा, पर कुछ ही दूरी पर जाकर अचानक रुक गया। रास्ते में एक चौड़ी नदी आ गई थी। वह सोचने लगा कि बिना किसी पुल के नदी के उस पार पेड़ तक कैसे पहुँचा जाए? खरगोश नदी के इसी किनारे लाचार होकर बैठ गया। दूसरी ओर, कछुआ अपनी धीमी लेकिन निरंतर गति से चलता हुआ नदी के किनारे पहुँचा, आसानी से तैरकर नदी पार की और लक्ष्य (पेड़) तक पहुँचकर दौड़ जीत गया। इस बार खरगोश अपनी इस कमजोरी पर उदास था कि उसे तैरना नहीं आता, पर यह उसके बस में नहीं था। 


अगले दिन खरगोश और कछुआ दोबारा मिले। खरगोश ने व्यावहारिक होकर कहा, "कछुए भाई! नदी के इस पार की दौड़ में मैं जीता और नदी के उस पार की दौड़ में तुम जीते। इस तरह तो हम एक-दूसरे को नीचा ही दिखाते रहेंगे।"


इस पर कछुआ मुस्कुराकर बोला, "खरगोश भाई! यदि हम दोनों एक-दूसरे की ताकत को अपनी ताकत बना लें, तो हम दोनों हर बार जीत सकते हैं और अन्य लोगों को एक सीख दे सकते हैं।"


दोनों ने मिलकर एक नई योजना बनाई और आखिरी बार फिर दौड़ शुरू हुई। इस बार, ज़मीन पर दौड़ते समय खरगोश की पीठ पर कछुआ बैठा था, जिससे वे पलक झपकते ही नदी के किनारे पहुँच गए। नदी आते ही खरगोश कछुए की पीठ पर बैठ गया और दोनों ने आसानी से नदी पार कर ली। नदी पार करने के बाद फिर कछुआ खरगोश की पीठ पर सवार हुआ और दोनों एक साथ, एक ही समय पर लक्ष्य (पेड़) तक पहुँच गए।


इस बार दोनों ही विजेता थे। 


मेरी सीख 


जब हम व्यक्तिगत स्पर्धा से ऊपर उठकर एक टीम के रूप में काम करते हैं, तो हर कठिन परिस्थिति को जीत सकते हैं। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी

बैंक खाता पोर्टेबिलिटी

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भारत में Bank Account Portability (बैंक खाता पोर्टेबिलिटी) को लेकर हाल ही में महत्वपूर्ण चर्चा हुई है। RBI ने अपनी Payments Vision 2028 में Payments Switching Service (PaSS) नामक एक प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत ग्राहक भविष्य में बैंक बदल सकेंगे लेकिन अपना खाता नंबर वही रख सकेंगे। यह उसी के समान है जैसे हम अपने मोबाइल की पोर्टेबिलिटी करवाते हैं कि सर्विस प्रोवाइडर तो बदल जाता है पर मोबाइल नंबर वही रहता है। 


इसका अर्थ यह है कि आज यदि कोई व्यक्ति एक बैंक से दूसरे बैंक में जाना चाहता है, तो उसे नया खाता खोलना पड़ता है और फिर उसे -


- वेतन (Salary) के लिए नए बैंक खाते की जानकारी देनी पड़ती है,

- EMI निर्देश अपडेट करने पड़ते हैं,

- SIP, बीमा प्रीमियम और ऑटो-डेबिट बदलने पड़ते हैं,

- UPI और अन्य भुगतान व्यवस्थाएँ पुनः सेट करनी पड़ती हैं।


प्रस्तावित व्यवस्था में ग्राहक बैंक बदल सकेगा, खाता संख्या वही रहेगी, उससे जुड़े भुगतान निर्देश स्वतः नए बैंक में स्थानांतरित हो सकेंगे। 


यह सुविधा अभी लागू नहीं हुई है। RBI इस पर कार्य कर रहा है और इसे Payments Vision 2028 के अंतर्गत प्रस्तावित किया गया है। इसके लिए तकनीकी और परिचालन ढाँचा विकसित किया जाना है।


ग्राहकों को इससे बहुत लाभ होगा। वे बेहतर सेवा देने वाले बैंक में आसानी से अपने खाते का स्थानांतरण करवा सकेंगे। बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। खाता बदलने का झंझट और कागजी कार्यवाही कम होगी। EMI, SIP, बीमा और वेतन जैसी सेवाओं में व्यवधान नहीं आएगा।


वैसे भारत में कई वर्षों से RBI ने एक ही बैंक की विभिन्न शाखाओं के बीच खाता स्थानांतरण (Intra-bank Portability) की अनुमति दी हुई है, जिसमें ग्राहक शाखा बदल सकता है और खाता संख्या वही रहती है। कुछ बैंकों ने यह सुविधा पहले से लागू कर रखी है।


सार रूप में कहा जा सकता है कि भारत में मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की तरह बैंक अकाउंट पोर्टेबिलिटी लाने की दिशा में RBI गंभीरता से कार्य कर रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो ग्राहक बिना खाता संख्या बदले बैंक बदल सकेंगे। फिलहाल यह एक प्रस्तावित व्यवस्था है और इसके कार्यान्वयन की प्रतीक्षा है।


अधिक जानकारी के लिए RBI के Payments Vision 2028 दस्तावेज का अध्ययन किया जा सकता है, जिसमें Payments Switching Service (PaSS) सहित डिजिटल भुगतान क्षेत्र की भावी रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।


सादर,

केशव राम सिंघल