मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 5

कोरोना काल के संस्मरण - 5 

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इतिहास की चेतावनी - 1918 की सीख


मानवता को कभी भी 1918 की उन गलतियों को दोहराने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जिनका खामियाजा हमारे पूर्वजों ने भुगता था। इतिहास गवाह है कि सबसे गंभीर महामारी 'स्पैनिश फ्लू' ने दो वर्षों में तीन लहरों के दौरान 50 करोड़ लोगों को संक्रमित किया था और करीब 5 करोड़ जानें लीं। विडंबना देखिए, सर्वाधिक मौतें दूसरी लहर में हुईं। जब पहली लहर के बाद प्रतिबंध हटाए गए, तो लोग सड़कों पर उत्सव मनाने निकल पड़े। इसी सामूहिक लापरवाही का परिणाम था कि अगली लहर में करोड़ों लोग काल के गाल में समा गए।


हमें याद रखना होगा कि नियमों में ढील केवल सरकार ने दी है, वायरस ने नहीं। सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य है, पर अपने विवेक का उपयोग करना उससे भी अधिक आवश्यक है।


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वे मूल मंत्र, जो आज भी प्रासंगिक हैं - 


टीकाकरण - कोविड-19 के टीके डेल्टा और ओमिक्रॉन जैसे घातक स्वरूपों से सुरक्षा का 'अभय कवच' प्रदान करते हैं। टीका लगवाकर आप न केवल स्वयं को, बल्कि समाज को भी सुरक्षित करते हैं।


सावधानी ही बचाव - संक्रमण को रोकने का हर छोटा प्रयास नए स्वरूपों (Variants) के उभरने के जोखिम को कम करता है।


बुनियादी अनुशासन - सुरक्षित शारीरिक दूरी, चेहरे पर सही ढंग से लगा मास्क, बंद जगहों पर हवा का आवागमन (Ventilation), बार-बार हाथ धोना और खांसते-छींकते समय सावधानी—ये सामान्य व्यवहार ही हमारी सबसे बड़ी जीत हैं। 


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कोरोना काल में नियमों की व्याख्या भी अक्सर सुविधा और दृष्टिकोण के अनुसार बदलती रही। मार्च 2020 में जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्थित 'तबलीगी जमात' के कार्यक्रम में नियमों का उल्लंघन हुआ, तो लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर पूरे देश में एक कोहराम मच गया। उस घटना को लेकर जिस तरह का सामाजिक और मीडिया विमर्श बना, उसने एक गहरा तनाव पैदा कर दिया था।


किंतु विडंबना देखिए, इसके ठीक एक महीने बाद अप्रैल 2020 में जब कर्नाटक के कलबुर्गी में लॉकडाउन के बावजूद सैकड़ों लोगों ने एकत्र होकर 'रथ उत्सव' मनाया और सोशल डिस्टेंसिंग की सरेआम धज्जियाँ उड़ाईं, तब वैसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। प्रशासन और विमर्श के स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी साध ली गई। यह दोहरापन दर्शाता है कि आपदा के समय भी सरकार ने नियमों को निष्पक्षता से लागू करने के बजाय, उन्हें चश्मे बदल-बदल कर देखा। 


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इतिहास की कड़ियाँ जोड़ें तो याद आता है कि अमेरिका में कोरोना से पहली मृत्यु जनवरी 2020 में ही दर्ज हो चुकी थी। इसके ठीक बाद, 24 फरवरी 2020 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने विशाल काफिले के साथ अहमदाबाद पहुँचे थे। साबरमती की धरती पर 'नमस्ते ट्रम्प' के भव्य आयोजन में लाखों की भीड़ उमड़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रम्प ने अहमदाबाद की सड़कों पर रोड-शो किया और मोटेरा स्टेडियम में जनसभा को संबोधित किया।


ट्रम्प आगरा और दिल्ली भी गए और 25 फरवरी को वापस लौटे। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उस अंतरराष्ट्रीय आवाजाही और भारी भीड़ ने कोरोना संक्रमण का द्वार नहीं खोला होगा? बहुत संभव है कि उस काफिले और विदेशी मेहमानों की आवाजाही के साथ ही कोरोना का संक्रमण भारत की गलियों तक पहुँच गया हो। यह केवल एक अनुमान नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए एक गंभीर संदेह है, जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। अहमदाबाद का वह भव्य आयोजन अनसुलझा प्रश्न छोड़ गया है। 


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कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 से लगभग दो वर्षों तक स्कूलों के द्वार बंद रहे। इस लंबी अवधि में देश के करोड़ों गरीब बच्चों को न केवल बुनियादी शिक्षा से वंचित होना पड़ा, बल्कि उनके पोषण और स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का ढांचा भी चरमरा गया।


शहरों में भले ही 'ऑनलाइन कक्षाओं' का शोर रहा, लेकिन ग्रामीण भारत की हकीकत इससे कोसों दूर थी। गाँवों में न तो बिजली और इंटरनेट की सुचारु सुविधा थी और न ही उन बच्चों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप जैसे आवश्यक संसाधन थे। विडंबना तो यह भी थी कि बहुत से अध्यापक, जो पारंपरिक शिक्षण पद्धति में माहिर थे, वे स्वयं भी तकनीक के माध्यम से शिक्षा देने के इस नए तरीके से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। इस तकनीकी कमी ने अमीर और गरीब के बीच की शैक्षिक दूरी को और अधिक गहरा कर दिया।


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अदृश्य कोरोना जीवाणु का क्रूर पंजा न जाने कितने ही मनीषी लेखकों और साहित्यकारों को हमसे छीन ले गया। यह एक अत्यंत दुखद और कड़वा सत्य है कि साहित्य जगत की कई आवाज़ें इस महामारी के शोर में हमेशा के लिए खामोश हो गईं। उन सभी दिवंगत आत्माओं को मैं सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।


उन विदा होते रचनाकारों से मेरा एक विनम्र निवेदन है—जाते-जाते अपनी कलम की उस ओजस्वी शक्ति का कुछ अंश मुझे सौंपते जाना। आपकी अधूरी रह गई 'दास्तानों' और आपकी समृद्ध विरासत को मैं अपनी लेखनी के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहता हूँ। जब भी आपका लिखा कुछ पढूँ आपकी लेखनी के शब्द मैं आत्मसात कर पाऊँ। ॐ शान्ति!


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काव्य-संस्मरण 


कुछ तो सब्र करो।

इतिहास गवाह है कि समय ढूंढ ही लेता है अपनी जरूरतें।

हरेक का अपना समय होता है।

कोई ना कोई तो आएगा।

कोरोना काल भी गुजर जाएगा।

एक आंधी के बाद वातावरण में शान्ति आती है।

याद रखो - स्थाईत्व शाश्वत नहीं है।

परिवर्तन शाश्वत है।  


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काव्य-संस्मरण


कुछ तो सब्र करो, ऐ मन!

इतिहास गवाह है कि समय स्वयं ढूँढ ही लेता है अपनी ज़रूरतें।

सृष्टि के रंगमंच पर हर पात्र और हर दौर का अपना एक समय होता है।

अंधेरे के बीच से ही कोई न कोई राह दिखाने वाला आ ही जाता है,

और यह भीषण कोरोना काल भी अंततः गुज़र जाएगा।


याद रखो, विनाश की एक प्रचंड आँधी के बाद ही

वातावरण में एक गहरी शांति आती है।

सत्य भी यही है कि स्थायित्व शाश्वत नहीं है,

'परिवर्तन' ही इस संसार का शाश्वत सत्य है। 


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काव्य-संस्मरण 


पिछली सरकारों को कोसते हुए,

स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार का दंभ भरा गया।

सांसद निधि से ढेरों एम्बुलेंस खरीदी गईं,

पर विडंबना देखिए...

उन जीवनदायिनी एम्बुलेंसों से बीमारों को नहीं,

मंत्रीजी के नए महल के लिए 'बजरी' ढोई गई!


जब महल खड़ा हो गया और ढोने का काम पूरा हुआ,

तो बड़ी सहजता से कह दिया गया— "ड्राइवर नहीं हैं!"

भीषण कोरोना काल में, जब साँसें उखड़ रही थीं,

वे एम्बुलेंसें सांसद के आवास के बाहर तिरपाल में लिपटी 'घूँघट' ओढ़े खड़ी थीं,

और लाचार जनता के लिए अस्पताल की दहलीज पर सिर्फ 'ठेला गाड़ियाँ' उपलब्ध थीं।


बीमार जीवित हो या देह निर्जीव,

सबके नसीब में या तो कंधे थे, या साइकिल,

या फिर मिन्नत-अर्जी से मांगी गई कोई रेहड़ी या ठेला गाड़ी।

पर वे एम्बुलेंसें?

वे तो सांसद की कोठी के बाहर चैन की नींद सो रही थीं,

क्योंकि सिस्टम की फाइलों में 'ड्राइवर' उपलब्ध नहीं थे!


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काव्य-संस्मरण


यह कफनखसोटों का मुल्क है साधो,

यह कोरोना काल एक युद्धकालीन समय है।

और कुछ नरभक्षियों के लिए यह आपदा—

युद्ध के मैदान से लूट बटोरने का सबसे उपयुक्त समय है।


दवा, ऑक्सीजन और अस्पताल के बिस्तर,

यहाँ सब 'ब्लैक' में उपलब्ध किए जाएँगे।

एम्बुलेंस के दाम सातवें आसमान पर होंगे,

और बेबसी की आँच पर मुनाफे के पकवान सेंके जाएँगे।


एक ओर कोरोना से महायुद्ध और मौत का तांडव है,

दूसरी ओर हर छटपटाता बीमार एक 'अवसर' है।

यह मातम का नहीं, जश्न का मौका है दरिंदों के लिए,

क्योंकि लाशों के ढेर पर ही इनका व्यापार फलता-फूलता है।


यह कफनखसोटों का मुल्क है साधो!


ऐतिहासिक संदर्भ - इतिहास साक्षी है कि युद्ध की विभीषिका के बीच कुछ ऐसे नीच प्रवृति के लोग (कफनखसोट) सक्रिय हो जाते थे, जो रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए या घायल शूरवीरों के शरीर से उनके कीमती वस्त्र, शस्त्र और आभूषण तक लूट लिया करते थे। दुर्भाग्यवश, कोरोना काल में दवाइयों और ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों ने उसी आदिम और क्रूर मानसिकता का परिचय दिया।


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काव्य-संस्मरण


वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था,

साँस उसकी उखड़ रही थी, पर पास में अस्पताल न था।

जैसे-तैसे अस्पताल पहुँचा, तो वहाँ बेड कोई खाली न था,

जैसे-तैसे हुआ जुगाड़, तो वहाँ 'प्राण-वायु' का इंतजाम न था।

न हो सका इलाज समय पर, और 'ब्लैक' में थी हवा और दवा,

वह मर गया सपने देखते-देखते, पर कसूर किसी का भी न था।

वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था।


वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था,

मर गया तो मर गया, पर पास में श्मशान भी न था।

अंतिम सफर पर विदा करने को अपनों का साथ भी न था,

जैसे-तैसे श्मशान पहुँचा, तो वहाँ भी नंबर अभी न था।

जैसे-तैसे नंबर आया, तो पूरी लकड़ी का इंतजाम न था,

जैसे-तैसे रात में हुआ संस्कार, पर वह शास्त्रोक्त विधान न था।

वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था।

  

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मानव जाति के ज्ञात इतिहास में कोरोना काल एक ऐसा भयावह कालखंड था, जब भारत का लगभग हर नागरिक इस आशंका से घिरा था कि वह कभी भी संक्रमित हो सकता है और अंततः मौत के मुँह में जा सकता है। यह केवल एक शारीरिक बीमारी का दौर नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना का चरम था।


तकरीबन हर व्यक्ति अपना एक-एक दिन यह गईं कर बिता रहा था कि— "चलो, सुरक्षित तरीके से एक दिन और बीत गया।" शायद मानव सभ्यता के इतिहास में मृत्यु कभी इतनी 'करीब' और इतनी 'आम' नहीं रही होगी, जितनी इन दिनों देखने को मिली। हर आहट, हर छींक और हर एम्बुलेंस की आवाज़ मौत का संदेश देती प्रतीत होती थी। हर दिन मृत्यु का साया दिखता था और ऐसा लगता था हम एक जंग लड़ रहे हों। हम सब जीवन नहीं जी रहे थे, बल्कि केवल मौत को टाल रहे थे। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


कोरोना काल के संस्मरण - 4

कोरोना काल के संस्मरण - 4 

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काव्य-संस्मरण


हे कोरोना अदृश्य जीवाणु !


कहाँ तक तू हमारे बीच चलेगा,

कभी तो कहीं हमसे दूर भागेगा!


तू हमें मिटाने आया है,

तू हमसे भिड़ने आया है?


याद रख, हस्ती मिटती नहीं हमारी,

हम बुलबुलें हैं इस की, यह गुलसिताँ हमारा, 

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा! 


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काव्य-संस्मरण: मेरा माफीनामा


मैं यह माफीनामा लिख रहा हूँ,

हर उस व्यक्ति के नाम—

जो कोविड काल की क्रूरता में, 

यह दुनिया छोड़ चला गया। 


मुझे गहरा दुःख है,

कि तुम अचानक चले गए...

और हम तुम्हारी विदाई को,

न ढंग से स्वीकार कर सके,

न तुम्हारे सम्मान में दो शब्द बोल सके।


शोक की उस घड़ी में,

बहुतों को अपनों का कंधा तक नसीब न हुआ।

सत्य तो यही है कि जो भी इस कालखंड में,

हमसे सदा के लिए दूर चले गए—

वे सभी इस 'व्यवस्था की विफलता' के जीवित दस्तावेज़ हैं।


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काव्य-संस्मरण: कोरोना काल


दिन हो या रात,

शमशानों में अब अनगिनत चिताएँ जल रही हैं,

गलियों से जनाज़े उठ रहे हैं,

और विडम्बना देखिए...

मुर्दे भी अब कतारों में पड़े हैं, 

अपनी बारी के इंतज़ार में!


तुम्हें अब अस्पताल चाहिए?

तुम्हें अस्पताल में ऑक्सीजन और बेड चाहिए?

पर याद करो—तुमने वोट तो मंदिर के नाम पर दिया था,

तुमने वोट अस्पताल के लिए तो कभी दिया ही नहीं था!

फिर आज किस हक से अस्पताल और बेड मांगते हो? 


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कोरोना काल में वह दौर भी था, जब चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल था। एक व्यक्ति की पत्नी कोरोना से संक्रमित हुईं और बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें अस्पताल में एक बेड मिल सका। डॉक्टर ने उपचार के लिए 'रेमडेसिविर' इंजेक्शन की तत्काल व्यवस्था करने को कहा। वह व्यक्ति जब बाज़ार निकला, तो उसे पता चला कि उस जीवनरक्षक दवा की भारी कालाबाज़ारी हो रही है। अपनी जीवनसंगिनी की जान बचाने की खातिर उसने अपनी उम्र भर की सारी जमा-पूँजी उस इंजेक्शन को खरीदने और इलाज में झोंक दी।


विडंबना और त्रासदी की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब बाद में उसे पता चला कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 'रेमडेसिविर' को कोरोना के प्रभावी इलाज की सूची से बाहर कर दिया है। यह जानकर वह शख्स अपना माथा पकड़कर बैठ गया। उसकी बरसों की मेहनत की कमाई उस भ्रम की भेंट चढ़ गई थी, जिसे तंत्र ने समय रहते स्पष्ट नहीं किया था। वह हताश था, पर अपनी नियति के आगे कर भी क्या सकता था?


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यह एक ऐसा कड़वा सत्य है कि आज इस पूरे देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिले, जो यह कह सके कि उसने कोरोना काल की विभीषिका में अपने किसी परिचित, मित्र या सगे-संबंधी को नहीं खोया है। इस महामारी ने हर घर के आँगन में शोक की एक ऐसी लकीर खींच दी, जो दशकों तक हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन की स्मृतियों में दर्ज रहेगी।


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न केवल कोरोना, गरीबी भी महामारी है। कोरोना काल के दौरान सबसे पीड़ित गरीब ही रहा। उसके पास न तो संचित पूँजी थी और नहीं कल के भोजन का कोई जुगाड़ या भरोसा। कोरोना वायरस ने तो शरीर पर वार किया, पर गरीबी ने उसकी गरिमा और अस्तित्व पर ही प्रहार कर दिया। 


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कोरोना काल में हर व्यक्ति दूसरे के लिए सलाहकार, वैद्य या डॉक्टर बन गया था। चारों ओर नुस्खों और मशवरों का अंबार लगा था।


लोगों का मानना था कि साँस लेने में ज़रा सी भी दिक्कत कोविड का संकेत है। सलाह दी जाती थी कि एसी और फ्रिज के ठंडे खाने से बचें और सामान्य तापमान में रहने की आदत डालें। उस समय कुछ 'घरेलू उपाय' और 'नुस्खे' रामबाण की तरह प्रचारित हो रहे थे -


अग्निबाण - लहसुन, प्याज और अदरक के रस में नींबू, काला नमक और काली मिर्च का मिश्रण—इसे हर रोग की काट माना जाने लगा।


प्राकृतिक चटनी - 11 तुलसी के पत्ते, 11 नीम के पत्ते और 11 काली मिर्च के दानों को पीसकर बनाई गई चटनी लोगों को भाने लगी। 


बच्चों के लिए - लहसुन, प्याज और अदरक की चटनी शहद के साथ लोग बच्चो को चटाने लगे।


त्रिवेणी - अदरक, प्याज और लहसुन की चटनी में नींबू रस और मसालों का संगम लोगों ने खूब उपयोग में लिया।


लोग इन उपायों को एक सुरक्षा कवच की तरह अपना रहे थे, क्योंकि उस समय 'भरोसा' ही सबसे बड़ी औषधि थी। ये वे विशिष्ट नुस्खे थे, जो कोरोना काल में सोशल मीडिया में गूँज रहे थे। ये नुस्खे देसी उपचार की महत्ता को जनता के बीच रख रहे थे। भले ही ये वैज्ञानिक रूप से सटीक इलाज न हों, लेकिन अदरक, तुलसी और काली मिर्च ने लोगों की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' (Immunity) और 'मनोबल' को बढ़ाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई। अंकों का मनोविज्ञान लोगों को खूब भाया - "11 पत्ते, 11 दानों" ने भारतीय मानसिकता में शुभ और सटीक होने का अहसास कराया। 


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काव्य-संस्मरण


कई बार दुआ ही सबसे बड़ी दवा बन जाती है,

जहाँ विज्ञान और औषधि हार मान लें, 

वहाँ मौन प्रार्थना भी काम कर जाती है।


औरों के सुख के लिए की गई हमारी निस्वार्थ दुआ,

अक्सर हमारे स्वयं के दुःखों की दवा बन जाती है।


शुभ भावनाओं में एक असीम, अलौकिक शक्ति होती है,

इसलिए मन में हमेशा सबके लिए कल्याणकारी भाव रखें।


शायद यही वो कल्याणकारी 'अभय कवच' था,

जो उस भीषण कोरोना काल में हमारे काम आया।


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सत्य तो यह है कि चिकित्सा पद्धति चाहे कोई भी रही हो, कोरोना के इलाज में अधिकतर चिकित्सक 'अँधेरे में तीर' ही चला रहे थे। उस अनिश्चित कालखंड में चिकित्सक मुख्य रूप से अपने विवेक और पिछले अनुभवों के सहारे ही उपचार कर रहे थे, क्योंकि वे स्वयं भी इस नई महामारी की सटीक चिकित्सा विधि से अनभिज्ञ थे।


एलोपैथी के क्षेत्र में भी विरोधाभासों का अंबार था। हज़ारों मरीज़ों को महँगी 'प्लाज्मा थेरेपी' देने के बाद अंततः विशेषज्ञों ने स्वीकार किया कि यह कोरोना के इलाज में प्रभावी नहीं है। ऐसा प्रतीत होता था मानो लाचार जनता को प्रयोगशाला बना दिया गया हो। जहाँ कुछ चिकित्सक पूरी निष्ठा से जूझ रहे थे, वहीं कुछ ने इन विषम हालातों का लाभ उठाने में भी संकोच नहीं किया।


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कोरोना काल की एक समीक्षा -


कोरोना महामारी ने न केवल आम जन को, बल्कि विश्व की तथाकथित सर्वशक्तिमान सरकारों को भी घुटनों पर ला दिया था। हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकारों ने प्रयास तो किए, पर वे उस स्तर के नहीं थे जितनी संकट की गंभीरता थी। इच्छाशक्ति का अभाव और भविष्य की स्पष्ट योजनाओं की कमी ने आम नागरिक को बेसहारा छोड़ दिया।


इस दौर की कुछ कड़वी सच्चाइयाँ - 


- अर्थव्यवस्था और शिक्षा - रोजगार पटरी से उतर गया, महँगाई बढ़ी और आय के स्रोत सिमट गए। शिक्षण संस्थानों में ताले लटकने से बच्चों का भविष्य धुंधला गया।


- स्वास्थ्य और टीकाकरण - स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गईं और विशाल जनसंख्या का टीकाकरण एक अभूतपूर्व चुनौती बनकर उभरा।


- दिवंगतों को अंतिम गरिमा - सबसे हृदयविदारक बात वह थी कि महामारी की भेंट चढ़े बहुत से दिवंगतों को एक सम्मानजनक विदाई तक नसीब न हो सकी।


- आंकड़ों का शोर - सरकारी अनुमानों के अनुसार चार करोड़ से अधिक संक्रमण के मामले और पाँच लाख से अधिक मौतें दर्ज हुईं, पर वास्तविक टीस इन आंकड़ों से कहीं अधिक गहरी थी।


भले ही महामारी का प्रकोप कम हो गया है, पर संक्रमण का डर आज भी शेष है। अब हमें सजग रहकर ही जीवन बिताना होगा। कुछ बुनियादी नियम जो आज भी हमारा 'अभय कवच' हैं -


- सीमित आवागमन - अनावश्यक यात्राओं से आज भी बचना ही श्रेयस्कर है।


- शारीरिक दूरी - भौतिक संपर्क में दूरी बनाए रखना अभी भी सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है।


- मास्क का महत्त्व - भीड़भाड़ वाले स्थानों पर मास्क का प्रयोग अब भी लाभदायक है।


- टीकाकरण - जिन्होंने टीका नहीं लगवाया है, उन्हें इसे अवश्य लगवाना चाहिए। टीकाकरण ही इस अदृश्य शत्रु के विरुद्ध हमारा वास्तविक सुरक्षा कवच है।


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 3

कोरोना काल के संस्मरण - 3 

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कोरोना महामारी ने मनुष्य को जीवन जीने के नए और अनपेक्षित तरीके सिखा दिए। अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में वह 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) और 'मास्क प्रोटोकॉल' जैसी नई शब्दावलियों को आत्मसात करने लगा। देखते ही देखते दुनिया का स्वरूप बदल गया; बैठकें 'ज़ूम मीटिंग्स' में सिमट गईं, दफ्तर घर के किसी कोने में तब्दील हो गए और शिक्षा का मंदिर मोबाइल की स्क्रीन बन गया। लोग अब डॉक्टर से ऑनलाइन परामर्श ले रहे थे और घर की बुनियादी ज़रूरतें भी डिजिटल माध्यमों से पूरी होने लगी थीं।


यह सब केवल विवशता नहीं थी, बल्कि मनुष्य की वह जिजीविषा थी जिसके सहारे वह कोरोना के उस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु को पछाड़ने का संकल्प लिए हुए था। हालाँकि, इस कालखंड का दुःखद पक्ष किसी से छिपा नहीं है। संक्रमण की पीड़ा और अपनों को खोने का असहनीय शोक हर किसी ने महसूस किया। किंतु प्रकृति का शाश्वत नियम है कि स्थायित्व शाश्वत नहीं है, हर काली रात के बाद एक उजली सुबह आती है और दुःख के बाद सुख का चक्र अवश्य घूमता है। इसी विश्वास के साथ मनुष्य इस महासंकट से जूझता रहा। वास्तव में, मानव जाति की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि उसमें गहरा दर्द और अपार नुकसान को अपने भीतर 'ज़ज्ब' कर लेने की अकूत क्षमता है। वह गिरकर संभलना और मलबे से नया संसार खड़ा करना बखूबी जानता है।


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वर्ष 2020 का अंत होते-होते भारत की स्थिति वैश्विक मानचित्र पर अत्यंत चिंताजनक हो चुकी थी। 31 दिसंबर 2020 तक देश में कोरोना संक्रमण के मामले एक करोड़ दो लाख छियासठ हजार छह सौ चौहत्तर (1,02,66,674) तक जा पहुँचे थे, जिसने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे अधिक प्रभावित देश बना दिया था। किंतु, इन भयावह आँकड़ों के बीच एक बड़ी राहत यह रही कि कुल एक लाख अड़तालीस हजार सात सौ अड़तीस (1,48,738) मौतों के साथ हमारा देश दुनिया में सबसे कम 'मृत्यु दर' वाले देशों में से एक था। यह तथ्य हमारे स्वास्थ्य तंत्र की अटूट जिजीविषा और देशवासियों के सामूहिक प्रयासों का एक सकारात्मक परिणाम था।


इसी अंधकारमय समय में वैक्सीन की खोज ने मानव जाति के खोए हुए विश्वास को पुनः जागृत किया। यह वैज्ञानिकों के प्रयासों का ही फल था कि 'आशा' अब एक मूर्त रूप ले रही थी। भारत सरकार ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए टीकाकरण अभियान को एक विशाल राष्ट्रीय मिशन के रूप में आयोजित करने का सफल प्रयास किया। यह सुनिश्चित किया गया कि तकनीक और सुलभता के माध्यम से देश की आम जनता तक बचाव का यह सुरक्षा कवच पहुँच सके। वैक्सीन केवल एक दवा नहीं थी, वह तो 'जीवन-अमृत' था; उस लंबी और थका देने वाली लड़ाई को जीतने का एक अमोघ अस्त्र, जिसका इंतज़ार हर भारतीय बड़ी बेसब्री से कर रहा था।


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कोरोना महामारी का सबसे घातक प्रहार बुजुर्गों पर हुआ, जिन्हें न केवल शारीरिक जोखिम बल्कि एक गहरी मानसिक वेदना से भी गुज़रना पड़ा। सुरक्षा के नाम पर उन्हें घर की चारदीवारी में 'कैद' होकर रहना पड़ा। सबसे विकट परिस्थिति उन बुजुर्गों की थी, जिनके बच्चे आजीविका के कारण दूसरे शहरों या विदेशों में थे और वे घरों में अकेले रह गए थे। महामारी से पूर्व बच्चे सप्ताहांत या महीने-दो महीने में आकर माँ-बाप का हाल-चाल ले लिया करते थे, किंतु उन दिनों यातायात के साधनों पर पाबंदी और संक्रमण के खौफ ने इस मिलन पर भी ताला लगा दिया था।


वृद्ध आँखें हर दिन दरवाज़े पर टकटकी लगाए अपने बच्चों की राह देखतीं, पर अंततः उन्हें मोबाइल की निर्जीव आवाज़ों से ही संतोष करना पड़ता था। जिन्हें तकनीक की विशेष जानकारी नहीं थी, उनके लिए सही सूचनाएँ प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती था। 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) की अनिवार्यता ने उन्हें एक ऐसे अकेलेपन में धकेल दिया जहाँ केवल चिंताएँ और अनिश्चितता ही उनकी साथी थीं। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि मानसिक तनाव शरीर की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' को क्षीण कर देता है, और इसी कारण बुजुर्गों के लिए संक्रमण का खतरा और भी भयावह हो गया था।


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मैं स्वयं भी इस विषम परिस्थिति का साक्षी रहा। 2020 के प्रारम्भ में जब कोरोना ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू किया, उस समय मैं अजमेर स्थित अपने घर में अकेला था। मेरी पत्नी एक बेटी के पास गोवा गई हुई थीं और शेष दो बेटियाँ भी दूसरे शहरों में थीं। उस एकांत में मेरे लिए सबसे बड़ी राहत बेटियों का वह स्नेह और चिंता थी, जो रोज़ाना मोबाइल के माध्यम से मुझ तक पहुँचती थी। उन्होंने ही मुझ पर प्यार भरा दबाव डाला और मुझे किसी एक बेटी के पास चले जाने के लिए प्रेरित किया। अंततः, मैंने उनकी सलाह मानी और अहमदाबाद अपनी उस बेटी के पास चला गया, जो उस समय अविवाहित थी और वहाँ अकेली रह रही थी। वह निर्णय न केवल शारीरिक सुरक्षा के लिए, बल्कि मानसिक संबल के लिए भी मुझे अनिवार्य लग रहा था।


उस समय मेरी आयु 69 वर्ष थी। यद्यपि मैं सुरक्षित परिवेश में पहुँच गया था, किंतु पीछे छूट गए बंद घर की चिंता रह-रहकर मन को सताने लगती। वह घर जिसे तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, जहाँ मेरी स्मृतियाँ और जीवन की तमाम ज़रूरी चीज़ें रखी थीं, उसकी सुरक्षा का विचार मन को भारी कर देता था। नियति का खेल देखिए, उस प्रवास के बाद एक लंबे अरसे तक मेरा अजमेर लौटना संभव न हो सका। वह 'बंद घर' और उसकी प्रतीक्षा, मेरे कोरोना काल के प्रवास की एक लंबी और व्याकुल कर देने वाली कहानी बन गई।


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लॉकडाउन की आकस्मिक घोषणा के बाद देश ने वह मंज़र भी देखा जब हजारों लोग भूखे-प्यासे, नंगे पाँव सड़कों पर बेबस भटकने को मजबूर थे। यह कोरोना काल की विडंबना ही थी कि जब पूरा देश अपनी आँखों से और सोशल मीडिया के माध्यम से मजदूरों के महा-पलायन के कारुणिक दृश्य देख रहा था, ठीक उसी समय सरकार के नुमाइंदे देश की सर्वोच्च अदालत में यह दलील दे रहे थे कि "सड़कों पर कोई नहीं है।"


प्रशासनिक दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की यह खाई उस समय पूरी तरह बेपर्दा हो गई, जब एक रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर अपनी मरी हुई माँ की चादर खींचते एक मासूम बच्चे का वीडियो सामने आया। वह दृश्य इतना मर्मभेदी था कि पूरा देश सकते में आ गया। सोशल मीडिया पर दिख रहे महा-पलायन के दृश्य और वह बच्चा अदालत में दिए गए उन सरकारी बयानों को झुठला रहा था, जो मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर थे। यह वह दौर था जब सरकारी तंत्र की आँखों पर पट्टी बँधी थी और सड़कों पर बिखरा आम आदमी केवल अपनी नियति के भरोसे छोड़ दिया गया था।

 

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कोरोना महामारी के उस खौफनाक दौर में बहुत से 'अपने' परायों जैसा व्यवहार कर रहे थे, वहीं मानवता की कुछ ऐसी मिसालें भी सामने आईं जिन्होंने समाज का मस्तक ऊँचा कर दिया। महाराष्ट्र के पुणे में कोरोना संक्रमित एक डॉक्टर की दुःखद मृत्यु हो गई। विडंबना देखिए, जिस डॉक्टर ने उम्र भर लोगों का उपचार किया, उसके अंतिम संस्कार के लिए कोई भी परिचित या सम्बन्धी आगे आने को तैयार नहीं था। जानकारी के अनुसार, डॉक्टर का इकलौता पुत्र अमेरिका में था और यात्रा प्रतिबंधों के कारण भारत आने में असमर्थ था और उनकी 74 वर्षीय पत्नी असहाय महसूस कर रही थीं।


कोरोना संक्रमण के भय ने रिश्तों की गर्माहट को इस कदर सोख लिया था कि डॉक्टर का कोई भी संबंधी शव को कंधा देने या अंतिम संस्कार में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। ऐसी विषम परिस्थिति में मुस्लिम समुदाय के युवाओं ने न केवल संवेदनशीलता दिखाई, बल्कि आगे बढ़कर अंतिम संस्कार की पूरी ज़िम्मेदारी संभाली। उन्होंने न केवल शव को कंधा देकर श्मशान घाट पहुँचाया, बल्कि हिन्दू विधि-विधान के साथ अंतिम विदाई भी दी। यह घटना उस दौर के उस 'डर' पर एक करारी चोट थी जिसने रिश्तों को दरका दिया था, और उस 'सांझी विरासत' का प्रमाण थी जो धर्म से ऊपर उठकर केवल मानवता को पहचानती है।


27 

काव्य-संस्मरण 


मेरी पत्नी और मैंने, कोविड की वैक्सीन लगवाई,

सर्वव्यापी इस व्याधि से, कुछ हद तक मुक्ति पाई।

कुछ हद तक मुक्ति पाई, अभी तो एक और लगवानी है,

अट्ठाईस दिनों के बाद फिर, अस्पताल की राह बनानी है।

 

28 

काव्य-संस्मरण 


हे कृपा निधान!


मरने से पहले, हर पल मर रहा हूँ मैं,

अब खुद में ही सिमटा-सहमा रहता हूँ मैं,

हर दूसरे को शक की निगाह से देखता हूँ मैं,

कोई पास आ जाए तो कोरोना से डरता हूँ मैं!


हालात बहुत ख़राब हैं, मंज़र डरा रहे हैं,

दुःखद समाचार हर पल मन को रुला रहे हैं,

जीवन में ऐसा दौर कभी पहले देखा न था,

हर तरफ लोग बेबस ठोकरें खा रहे हैं!


चाहता हूँ कि अब कोई 'प्रणय-गीत' लिखूँ,

रिश्तों के प्यार और 'सद्भाव' का संगीत रचूँ,

मगर क्या करूँ कि हालात बहुत बेहाल हैं,

नहीं चाहता कि कोई 'शोक-गीत' लिखूँ!


दुःखों का सैलाब है... हर ओर बस रोना है,

चैन छीना, सुख लूटा, यह कैसा कोरोना है?

हे कृपा निधान! बस यही एक प्रार्थना है,

इस महामारी से शीघ्र छुटकारा देना है!

 

29

काव्य-संस्मरण


आपदाकाल में प्रकृति स्वयं अपना उपचार करती है,

खुद को अधिक स्वच्छ, पोषक और निर्मल बनाती है!


दिन सुधरेंगे, निश्चित रहें - 

कोरोना का यह काल भी जाएगा, 

और फिर वही सुनहरे दिन लौट आएँगे, 

जिनका हमें बेसब्री से इंतज़ार है।


डर ही वायरस है,

विश्वास ही वैक्सीन है,

सकारात्मकता ही वास्तविक दवा है।


आजकल कमरे में ही बंद रहता हूँ,

शायद इसीलिए खूब पढ़ता और लिखता हूँ।

यही एक सार्थक काम अब मेरे हिस्से बचा है,

मन में जो भी विचार आए, 

बस उसे कागज़ पर उकेरता रहता हूँ! 


30

काव्य-संस्मरण


कोरोना...

कोरोना एक भीषण युद्ध है,

लोग मर रहे हैं, लोग जी भी रहे हैं,

मगर समय का पहिया, क्रूरता से चल रहा है!


वैक्सीन गायब, दवा गायब,

यहाँ तक कि प्राण-वायु (ऑक्सीजन) गायब!

अस्पतालों से बेड गायब,

श्मशानों से सूखी लकड़ी गायब,

और सबसे बढ़कर... संकट के समय राजनेता गायब!


वे बैठे हैं सुरक्षित अपने घरों में दुबके हुए,

एक अस्पष्ट टीकाकरण नीति, परदों में छुपाए हुए।


इधर 'आपदा में अवसर' खोज रहे कुछ लोग कहते हैं—

"नकारात्मकता मत फैलाओ,

सकारात्मकता को तवज्जो दो!"


वे चाहते हैं—

दवा न मिले, तो भी संतुष्ट रहो,

अस्पताल में बेड न मिले, तो भी संतुष्ट रहो,

ऑक्सीजन के बिना दम घुट जाए, फिर भी संतुष्ट रहो!

वे कहते हैं— नकारात्मकता फैलाने वाले 'गिद्धों' से बचो,

काहे परेशान होते हो भाई, यह तो सब भाग्य का खेल है! 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......


सादर,

केशव राम सिंघल 


रविवार, 15 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 2

कोरोना काल के संस्मरण - 2 

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11

यह सत्य है कि कोरोना ने मानवीय संबंधों के ताने-बाने में अविश्वास और भय का अंधेरा फैलाया, किंतु इसी अंधकार के बीच संवेदनाओं के कुछ 'रोशनी के कण' भी छितराए हुए दिखाई दिए। जहाँ एक ओर आपस में दूरियाँ बढ़ीं, वहीं दूसरी ओर मध्य-वर्ग के भीतर 'पारिवारिकता' और 'सामुदायिक सहयोग' की एक नई चेतना भी जाग्रत हुई। संकट ने सिखाया कि जब बाहर के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब केवल 'आपसी जुड़ाव' ही एक-दूसरे के लिए संबल बनता है।


इसका एक जीवंत उदाहरण उस कॉलोनी में देखने को मिला, जहाँ एक पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आ गया था। उस एकाकीपन और बीमारी के दौर में उनके अपने सगे-संबंधी भले ही भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन पड़ोसियों ने 'पड़ोस-धर्म' की एक नई इबारत लिख दी। उन पड़ोसियों ने न केवल संक्रमित परिवार के लिए भोजन और दवाइयों का प्रबंध किया, बल्कि उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखा। ऐसे समय में मोबाइल की घंटियाँ केवल हाल-चाल पूछने का जरिया नहीं थीं, बल्कि वे संक्रमित परिवार को यह अहसास दिलाती रहीं कि "आप अकेले नहीं हैं।" यह सहयोग का भाव यह बताता है कि कोरोना जैसी आपदा ने जहाँ हमारे कुछ पुराने मूल्यों को झकझोरा, वहीं 'सह-अस्तित्व' और 'निःस्वार्थ सेवा' के कुछ नए अंकुर भी हमारे भीतर फूटने लगे हैं।


12

कोरोना काल ने आदमी को यह अहसास करा दिया कि उसका अस्तित्व कितना भंगुर है, कुछ भी स्थाई नहीं है। इस आपदा में मानवता ने बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया—किसी ने अपने प्रियजन खोए, तो किसी की जीवन भर की जमा-पूंजी इलाज की भेंट चढ़ गई। आर्थिक गतिविधियाँ रुक जाने से मध्यम और निम्न वर्ग के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। लेकिन, जहाँ आदमी के लिए यह समय 'महाविनाश' जैसा था, वहीं प्रकृति के लिए यह 'पुनर्जन्म' का काल सिद्ध हुआ।


जब आदमी अपनी सुरक्षा के लिए घरों में कैद हुआ, तो प्रकृति मानो अपनी बेड़ियाँ तोड़कर मुस्कुराने लगी। वर्षों से धुएँ और शोर से घुट रहे पेड़ों में एक नई जान आ गई; उनकी हरियाली में एक अनोखी चमक लौट आई। सड़कों का सन्नाटा पक्षियों के कलरव से भर गया। वे चिड़ियाँ, जो शहरों के कंक्रीट के जंगलों में कहीं खो गई थीं, अब बालकनियों और छतों पर बेखौफ़ चहकने लगीं। प्रदूषण कम हुआ, तो आसमान का नीला रंग अपनी असली आभा में दिखने लगा। चिमनियों से उगलते विषैले धुएँ पर विराम लगा, तो नदियों का जल भी साफ दिखने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति मानो यह संदेश दे रही हो कि आदमी के बिना वह फल-फूल सकती है, लेकिन प्रकृति के बिना आदमी का कोई अस्तित्व नहीं। यह उस दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास था—इंसान वेंटिलेटर के सहारे था और प्रकृति गहरी सांसें ले रही थी।


13

लॉकडाउन की अचानक हुई घोषणा ने उन प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया, जो शहरों की चकाचौंध और विकास के असली शिल्पकार थे। देखते ही देखते सड़कें, पगडंडियाँ, खेतों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते और रेल की पटरियाँ एक बेबस भीड़ के सैलाब से भर गईं। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं था, बल्कि व्यवस्था पर से आम आदमी के भरोसे का सामूहिक बिखराव था। इनमें से कई अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रेल की पटरियों पर कट मरे या सड़क हादसों का शिकार हो गए, पर विडंबना देखिए कि सरकारी संवेदनाओं का ग्राफ 'शून्य' ही रहा।


आजादी के पिचहत्तर वर्षों के गौरवशाली उत्सवों के बीच भारत के औसत मजदूर की यह नियति मन को व्यथित करती है। आज भी हमारे देश में मजदूर की छवि एक लाचार और बेबस इकाई बनकर रह गई है। वह चाहे अपने गाँव में पसीना बहाए या किसी महानगर के निर्माण में अपना रक्त-स्वेद दे, बुनियादी तौर पर वह 'असंगठित' और 'उपेक्षित' ही है। संकट के उन दिनों में यह साफ हो गया कि मजदूर शायद कभी सरकारों की प्राथमिक सूची में थे ही नहीं। अचानक लगे लॉकडाउन ने वह अनिश्चितता पैदा की, जिसने लाखों लोगों को नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर चलने पर मजबूर कर दिया। न तो राज्य सरकारों के पास कोई ठोस राहत योजना थी और न ही केंद्र के पास कोई प्रभावी समन्वय। जब सब कुछ 'भगवान भरोसे' छोड़ दिया गया था, तब देश के सत्ताधीशों ने जनता से थाली और बर्तन बजवाकर कोरोना भगाने का एक अतार्किक मूलमंत्र सामने रखा। विज्ञान और चिकित्सा की इस सदी में प्रतीकों का ऐसा प्रदर्शन एक मजाक जैसा लग रहा था।


एक तरफ प्रवासी मजदूरों की आँखों में कोरोना का खौफ था और दूसरी तरफ परिवार के भरण-पोषण की चिंता उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। उनके लिए 'घर' ही आखिरी उम्मीद थी, लेकिन घर लौटने की राह लहूलुहान थी। इस त्रासदी ने यह अनिवार्य प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हमें अब भी एक व्यापक 'राष्ट्रीय मजदूर नीति' की जरुरत नहीं है? क्या हम केवल राष्ट्रीय उत्सवों के शोर में डूबे रहेंगे या उस हाथ को भी गरिमा देंगे, जो इस राष्ट्र की नींव का पत्थर है? 


14

कोरोना काल के दौरान हुए कुछ अध्ययनों ने एक भयावह सत्य को उजागर किया। आंकड़ों के अनुसार, असंगठित क्षेत्र के केवल 17 प्रतिशत मजदूर ऐसे थे, जिनके 'नियोक्ता' (Employers) की पहचान की जा सकती थी। शेष 83 प्रतिशत मजदूर एक ऐसे 'अदृश्य गलियारे' में काम कर रहे थे, जिनका न कोई आधिकारिक रिकॉर्ड था और न ही कोई ज़िम्मेदार मालिक। जब संकट आया, तो इन मजदूरों को यह भी नहीं पता था कि वे अधिकार के साथ मदद के लिए किसका दरवाजा खटखटाएं। अधिकतर मजदूर दैनिक मजदूरी पर आश्रित थे, जिनके लिए 'अगले दिन की रोटी' हमेशा एक अनिश्चित और डरावना सवाल बनी रहती थी।


कोरोना ने केवल स्वास्थ्य पर हमला नहीं किया, बल्कि श्रमिकों की कमर ही तोड़ दी। विशेषकर निर्माण उद्योग और परिवहन जैसे क्षेत्रों के अचानक ठप हो जाने से करोड़ों हाथ अचानक बेरोजगार हो गए। जिस मजदूर का जीवन 'रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीना' था, उसके लिए लॉकडाउन एक ऐसी कैद बन गया जहाँ भूख की दीवारें सबसे ऊँची थीं। शहरों की ऊँची इमारतों को बनाने वाले ये मजदूर रातों-रात बेगाने हो गए; जिस तंत्र के लिए उन्होंने अपना पसीना बहाया, उसी ने संकट की घड़ी में उन्हें पहचानने तक से इनकार कर दिया। ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उस त्रासदी की सच्चाई हैं जो बताती हैं कि जो हाथ देश के विकास का पहिया घुमाते हैं, विपत्ति के समय उन्हें ही सबसे पहले हाशिए के बाहर धकेल दिया जाता है। 


15

कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र के लगभग समस्त संसाधनों और कार्मिकों को केवल कोरोना संक्रमण से निपटने के मोर्चे पर तैनात कर दिया गया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अन्य गंभीर बीमारियों—जैसे हृदय रोग, कैंसर और गुर्दा रोगों—से जूझ रहे मरीज पूरी तरह हाशिए पर चले गए। वे अपने इलाज और उपचार के लिए अंतहीन प्रतीक्षा करने को मजबूर हो गए। अस्पतालों में ओपीडी (OPD) सेवाएँ ठप थीं और जीवन रक्षक सर्जरी लगभग बंद कर दी गई थीं। वह समय ऐसा था जब व्यवस्था ने केवल एक बीमारी को 'संकट' माना और बाकी बीमारियों के मरीजों को उनकी नियति के भरोसे छोड़ दिया। यह स्वास्थ्य तंत्र की विवशता थी या दूरदर्शिता का अभाव, कह नहीं सकते, पर इसने कई उन मरीजों की जान जोखिम में डाल दी, जो अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे।



16

लॉकडाउन के दौरान

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आसमान में दिखा आसमान का असल नीला रंग

और सड़कों का मौन अब मुखरित हुआ जाता था।


मौन जब मुखरित होने लगे,

तब समझना कि क्रांति आने वाली है।


तो क्या कोरोना-काल सचमुच क्रांति का समय था?

या किसी आने वाली आँधी का आहट-भरा अहसास था?


कोरोना भी ताक रहा था अचरज से—ये कैसे लोग हैं,

जो मेरे साये में भी, खुश रहने की राह खोज रहे हैं?


आशा और निराशा की सड़क पर

सँभलकर चलते हुए सोच रहे लोग—

एक न एक दिन इस महामारी का अंत होगा,

और जीवन फिर से खुशहाल हो जाएगा।


आदमी डटा था, लड़ रहा था, 

हर विषम परिस्थिति से,

वह घर की चहारदीवारी से काम कर रहा था,

अस्तित्व बचाने के नए रास्ते तलाश रहा था

और संहारक कोरोना के विरुद्ध 

वैक्सीन के रूप में—

'जीवन का अमृत' खोज रहा था। 


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देश जनता से निर्मित होता है और उसका अस्तित्व जनता के कल्याण के लिए ही है। काश, संसार के राजनेता 'वोट बैंक' की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर कुछ व्यापक सोच पाते। सत्य तो यह है कि देश और जनता—दोनों में से किसी की भी अनदेखी आत्मघाती है। हम जानते हैं कि एकता में अटूट शक्ति होती है, किंतु कोरोना के नाम पर संसार के अधिकांश शासकों ने 'असीमित अधिकार' अपने हाथों में केंद्रित कर लिए।


कोरोना के साये के साथ-साथ 'निरंकुशता' का काला खतरा भी दुनिया पर मंडराने लगा था। कुछ वैश्विक विचारकों ने इस ओर संकेत किया कि कोरोना से लड़ने के बहाने कई देशों के शासकों ने जो असाधारण शक्तियाँ अर्जित की हैं, वे लोकतंत्र के लिए आने वाले समय में घातक सिद्ध हो सकती हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता जब एक बार असीमित अधिकारों का स्वाद चख लेती है, तो वह उन्हें स्वेच्छा से आसानी से नहीं त्यागती। आशंका यही थी कि सुरक्षा के नाम पर कहीं वैयक्तिक स्वतंत्रता की बलि न चढ़ जाए। आने वाले समय में सत्ताधीश राजनेताओं के एकाधिकारवादी रवैये से लोकतांत्रिक मूल्यों का नुकसान और महामारी का अदृश्य दुष्प्रभाव की आशंका लगने लगी थी। 


18

कोरोना काल में हम सब कोरोना महामारी से होने वाली मौतों की दैनिक संख्या और डरावने आंकड़ों के मायाजाल में उलझकर रह गए थे। दुर्भाग्य यह था कि महामारी के उस प्रारंभिक दौर में इस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु शत्रु का कोई निश्चित इलाज नहीं था और न ही कोई सुरक्षात्मक टीका बन पाया था। दुःख इस बात का था कि हमारा देश, भारत, दुनिया भर में संक्रमण से सबसे अधिक ग्रस्त देशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुँच गया था।


संख्याओं के वे आकड़े तब दुःख में बदल गए, जब हर व्यक्ति ने अपना कोई न कोई नजदीकी इस महामारी की भेंट चढ़ते देखा। मौतें अब केवल सरकारी बुलेटिन के 'आंकड़े' नहीं थे, बल्कि वे हमारे घरों के उजड़ते हुए प्रियजन थे। मैंने स्वयं इस क्रूर कालखंड में अपनी छोटी दिव्यांग बहन को खोया —एक ऐसा शून्य जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। केवल वही नहीं, अपनी पत्नी के भाई और उनके जीजा जी को भी इसी महामारी ने हमसे छीन लिया। अपनों को खोने का वह खालीपन और अंतिम विदा में उनके पास न जा पाने की लाचारी—यह वह टीस है, जो इस सदी के इतिहास और हमारे हृदय में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है।


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कोरोना महामारी ने विश्व अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी, साथ ही आगामी पीढ़ी की नींव—शिक्षा—को भी गहरे संकट में डाल दिया। यद्यपि तकनीक के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प सामने आया, किंतु 'डिजिटल इंडिया' की यह चमक देश के बड़े हिस्से के लिए बेमानी सिद्ध हुई। वास्तविकता यह थी कि करोड़ों बच्चों के पास न तो स्मार्टफोन थे और न ही इंटरनेट कनेक्शन। 


विभिन्न अनुमानों और नीति आयोग की रिपोर्टों के भयावह आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान भारत के लगभग 75 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन कक्षाओं की पहुँच से बाहर रहे। ग्रामीण अंचलों में स्थिति और भी विकट थी, जहाँ मात्र 15 फीसदी लोगों के पास फोन कनेक्टिविटी थी। 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में लगभग पचपन हजार गाँवों में तो मोबाइल नेटवर्क तक नहीं था। विडंबना देखिए, जिस दौर में पूरी शिक्षा 'बिजली और इंटरनेट' पर निर्भर हो गई, उस समय देश के 36 प्रतिशत स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं था।


इस डिजिटल रिक्तता का परिणाम यह हुआ कि लगभग 28.6 करोड़ छात्र-छात्राओं का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में फंस गया। उच्च शिक्षा के प्रति भी छात्रों का मोहभंग हुआ और करीब 47 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरे शहरों में जाकर पढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मानव जाति ने प्रगति तो बहुत की है, लेकिन तकनीक और उसकी पहुँच के बीच की रिक्तता को वह आज तक नहीं भर पाई। तकनीक तो खोज ली जाती है, पर उसे खरीदने और उपयोग करने की आर्थिक शक्ति आधी आबादी के पास आज भी नहीं है। महामारी ने गरीबी बढ़ाई और बाजारों को सीमित कर दिया, जिससे 3 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चे केवल डिजिटल उपकरणों के अभाव में शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित रह गए। इसकी वजह से आने वाले समय में एक बड़ी सामाजिक असमानता आ सकती है।


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बाजार के सिकुड़ने और आर्थिक गतिविधियों के थम जाने से आम आदमी के रोजगार छिन गए और बेरोजगारी बढ़ गई। वहीं दूसरी ओर आश्चर्य यह रहा कि जहाँ मध्यम और निम्न वर्ग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, वहीं कॉर्पोरेट सेक्टर की बड़ी कंपनियों की आय में बेतहाशा वृद्धि हो रही थी। आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2020 से जुलाई 2020 की संक्षिप्त अवधि के बीच ही भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 423 अरब डॉलर की भारी वृद्धि दर्ज की गई।


इसे पूँजीवाद का चरित्र कहें या विडंबना, कि पूँजीपतियों ने इस वैश्विक त्रासदी को भी एक 'सुनहरे अवसर' के रूप में भुनाया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा दाने-दाने को मोहताज था, तब इन औद्योगिक घरानों ने अपनी आय को कई गुना बढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कोरोना काल का यह कालखंड गवाह है कि कैसे एक ही संकट ने गरीब को और अधिक गरीब बना दिया और धनी को और अधिक धनी। 'आपदा में अवसर' खोजने की यह होड़ दरअसल उस आर्थिक विषमता की ओर इशारा करती है, जो किसी भी महामारी से अधिक संक्रामक और घातक हो सकती है।

आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 

सादर, 

केशव राम सिंघल 


शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 1

 कोरोना काल के संस्मरण - 1

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इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक एक उलझन के साथ शुरू हुआ। इस सदी के दूसरे दशक का अंत बहुत दु:खद अनुभव देकर गया। दूसरे दशक का अंतिम साल कोविड-19 (कोरोना) संक्रमण के साथ शुरू हुआ। प्रारम्भ में कोविड-19 संक्रमण के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, इसलिए शुरू के कुछ महीने भ्रम की स्थित में बीते। डर का माहौल था, सरकार ने मार्च 2020 में लॉकडाउन लगा दिया, काम-धंधे रुक गए, आर्थिक गतिविधियाँ रुक गई थीं।  

 

2

कोरोना काल में स्पर्श बहुत खतरनाक था। हाथ से हाथ नहीं मिला सकते थे। कोरोना कहता था - स्पर्श खतरनाक है। इंसान गाय, बैल, बकरी, भैंस आदि जानवरों को छू सकता है, पर सामने दिख रहे इंसान को नहीं छू सकता। कोरोना ने मानव समाज के दैनिक जीवन पर आक्रमण कर दिया था। 


3

नर्स अस्पताल में ड्यूटी कर रही है। कई दिनों से घर नहीं जा पायी है। खाना, पीना, रहना सब अस्पताल में और कोरोना से संक्रमित लोगों की सेवा में लगी हुई है। उसकी तीन वर्ष की बेटी अपने पापा के साथ उससे मिलने अस्पताल आयी है। पाँच दिन बाद नर्स अपनी बेटी को देख रही है और बेटी माँ को, वह भी दूर से। बेटी रो रही है, वह माँ के पास जाना चाहती है। माँ चाहकर भी उसे बुला नहीं सकती, उसे गोद में नहीं ले सकती, उसे प्यार नहीं कर सकती। बस दूर से माँ अपनी बेटी और और बेटी अपनी माँ को देख पा रही है। दोनों की आँखों से आँसू टपक रहे हैं। बच्ची के पिता और नर्स का पति असहाय सा खड़ा है, उसकी आँखें भी गीली हो गई हैं। माँ से उसकी ममता को छीन लेने वाला यह दर्द कितना बड़ा दर्द है। एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने मानव सभ्यता और दैनिक जीवन-शैली पर आक्रमण कर दिया। स्पर्श इंसान की सबसे बड़ी नियामत है, मानव समाज का सामूहिकता और मेल-मिलाप में विश्वास रहा है, जिसे एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने समाप्त कर दिया।  हाय ……… यह कैसी नियति है। 


एक व्यक्ति अपने गाँव से दूसरे राज्य में मजदूरी करने गया था। लॉक-डाउन लगने के बाद उसका काम छिन गया। उसके जैसे सैंकड़ों प्रवासी मजदूर थे। उनकी भीड़ टूटे भरोसे, भूखे पेट, थके पैर और अशांत मन के साथ अपने गाँव की ओर पैदल ही जा रहे थे, क्योंकि यातायात के साधन रेल, बस, हवाईजहाज सब बंद थे। वह भी अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर पैदल ही चल दिया। उसके जैसे बहुत से लोग अपने घर-गाँव की ओर जा रहे थे। गिरते-मरते कुछ पहुँचे अपनी मंजिल तक। कुछ ने रास्ते में दम तोड़ दिया। सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुए जब वह अपने गाँव की सीमा पर पहुँचा तो गाँव के लोगो ने उसे और उसके परिवार को गाँव के भीतर घुसने भी नहीं दिया। कोरोना के सूक्ष्म जीवाणु का डर हवा में फ़ैल गया था, भाव-शून्यता देखने को मिल रही थी। 


ईश्वर ने मनुष्य को 'स्पर्श' की अनमोल नियामत बख्शी है। यह वह मूक भाषा है जहाँ शब्द अपना अर्थ खो देते हैं और संवेदनाएँ सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। किसी ने सिसकते हुए कंधे पर रखा एक हाथ, रोते हुए बच्चे के सिर पर फेरा गया हाथ, या अपनों से किसी बड़े का चरण स्पर्श—ये वे सुनहरे धागे हैं जिनसे हमारे भारतीय समाज का ताना-बाना बुना गया है। कोरोना ने इन्हीं धागों को कच्चा कर दिया। उसने सिखाया कि अब 'प्रेम' का अर्थ 'दूरी' है। उसका स्पष्ट सन्देश था - स्पर्श करना मना है। 


कोरोना काल में सब अपनी सुरक्षा में लगे थे। सरकार देख रही थी, पर हालात ऐसे थे कि वह भी मजबूर थी। देश की संसद मौन थी, सवाल पूछने की मनाही थी। 


कोरोना काल में हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा की व्यक्तिगत लक्ष्मण-रेखा खींचने में लगा था। सरकारें व्यवस्था बनाए रखने का दावा तो कर रही थीं, पर जमीनी हालात ऐसे थे कि तंत्र स्वयं लाचार और बेबस नजर आ रहा था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहाँ संसद को जनता की आवाज बनना था, वहाँ एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। देश की सबसे बड़ी पंचायत—संसद—मौन थी। जिस समय सड़कों पर मानवता सिसक रही थी, उस समय सवाल पूछने की खिड़कियाँ बंद कर दी गई थीं।


सरकारी नीतियाँ विफल होती दिखीं और अस्पतालों के बाहर कतारें लंबी होने लगीं, तब जवाबदेही तय करने के बजाय 'सब ठीक है' का छद्म आवरण ओढ़ लिया गया। संकट केवल स्वास्थ्य का नहीं था, संकट नेतृत्व और सामूहिक जिम्मेदारी का भी था। यह वह दौर था जब सत्ता और आम नागरिक के बीच का संवाद टूट गया था और नागरिक केवल 'आंकड़ा' बनकर रह गया था। नीति-निर्माताओं की चुप्पी उन लोगों के घावों पर नमक की तरह थी, जो अपनों को खो रहे थे या सड़कों पर नंगे पाँव चल रहे थे।  


7

केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, शासन-प्रशासन सब देख रहे थे। रेल बंद थी, बसें बंद थी, हवाईजहाज भी बंद थे और हजारों प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने गाँवों की ओर भाग रहे थे, भूखे-प्यासे, कहीं कुछ मिल जाता तो खा लेते थे, सड़क के किनारे ही रात गुजारते थे। उस समय बहुत से सवाल उठे -

- क्या प्रवासी मजदूर इस देश के नागरिक नहीं हैं?

- क्या सत्ता और नागरिक का कोई रिश्ता बचा रह गया है?

- क्या संकट की घड़ी में प्रवासी मजदूरों के मालिकों ने अपने कामगारों के साथ मानवीय रिश्ता निभाया?

- क्या सरकार ने लॉक डाउन लगाने से पहले सोचा कि प्रवासी मजदूरों का क्या होगा?

- क्या चार घंटे पर्याप्त समय था प्रवासी मजदूरों के पास अपने को सुरक्षित करने के लिए?

- क्या सरकार राष्ट्रीय विपदा के इस संकटकालीन समय में एक अध्यादेश द्वारा निजी अस्पतालों पर नियंत्रण नहीं कर सकती थी, जो कोरोना संक्रमित रोग के इलाज के लिए लाखों रूपये वसूल रहे थे? 


हमारी परम्परा रही है कि परिजन और मित्र दिवंगत व्यक्ति को शव-यात्रा में कंधा देते हुए अंतिम विदा देते है, अंतिम संस्कार करते हैं। कोरोना ने जीवन और मृत्यु दोनों में न केवल इंसान को अकेले छोड़ा, वरन् मानवीय रिश्तों को तार-तार कर दिया। शव-यात्रा और सामूहिक शोक पर तो पूर्ण विराम लग गया। संवेदनाओं का जैसा खात्मा इस कोरोना काल में दिखा, वैसा कभी सोचा भी नहीं था।  


परिजनों और मित्रों का कंधा, वह अंतिम संबल होता है जो दिवंगत व्यक्ति को इस लोक की अंतिम गरिमा प्रदान करता है। अंतिम यात्रा में अपनों की मौजूदगी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस दुःख को बाँटने का माध्यम होता है, जिसे अकेले सहना कष्टप्रद है। किंतु कोरोना ने न केवल जीवन छीना, बल्कि मृत्यु की पवित्रता और विदाई के अधिकार को भी लहूलुहान कर दिया।


मानवीय रिश्तों के तार-तार होने का इससे वीभत्स दृश्य क्या होगा कि बेटा अपने पिता की चिता को मुखाग्नि देने से डर रहा था, और माँ अपनी संतान के अंतिम दर्शन के लिए पीपीई किट (PPE Kit) पहने हुए रोबोटनुमा अजनबियों के सामने गिड़गिड़ा रही थी। वे लोग, जो जीवन भर भरे-पूरे परिवारों के बीच रहे, अंत में एक पॉलिथीन में लिपटे हुए 'लावारिस' की तरह मशीनी क्रेन द्वारा चिता पर रख दिए गए।


शव-यात्रा और सामूहिक शोक, जो संवेदनाओं के साझा करने का माध्यम थे, उन पर पूर्ण विराम लग गया। श्मशान घाटों पर जलती अनगिनत चिताओं की लपटें गवाह थीं कि इंसान कितना असहाय हो चुका है। संवेदनाओं का ऐसा निर्दयी खात्मा इतिहास ने शायद ही कभी देखा हो। जहाँ मौत पर रोने के लिए अपनों का कंधा न मिले, वहाँ शोक केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का मानसिक अवसाद बन जाता है। जिस 'अंतिम विदा' में मंत्रों की ध्वनि और अपनों की सिसकियाँ होनी चाहिए थीं, वहाँ केवल सैनिटाइजर की गंध के साथ प्लास्टिक की सरसराहट सुनाई देती थी।


महामारियाँ पहले भी आईं और उन महामारियों में ऐसे योद्धा भी सामने आए, जिन्होंने जान की बाजी लगा कर मानवता के लिए काम किया। कोरोना काल में भी ढेरों ऐसे डॉक्टर, स्वास्थ्य-कर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता सामने आए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए लोगों को बचाया, मुश्किल वक्त में लोगों की मदद की। कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने मुफ्त में मास्क बाँटे, लोगों के घरों राशन पहुँचाया। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा की। 


जब जीवन अपनी चरम और दुरूह परिस्थितियों से टकराता है, तब मनुष्य के भीतर के दो रूप प्रकट होते हैं—या तो वह पूरी तरह आत्म-केंद्रित होकर संकुचित हो जाता है, या फिर वह अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भूलकर 'विश्व-चेतना' और 'परोपकार' के वृहद भाव से जुड़ जाता है। इतिहास साक्षी है कि महामारियाँ जब भी आईं, वे अपने साथ केवल विनाश नहीं, बल्कि 'मानवता के योद्धाओं' की अमर गाथाएँ भी लेकर आईं। कोरोना काल इस कसौटी पर मनुष्यता की सबसे बड़ी परीक्षा थी।


इस कालखंड में ऐसे अनगिनत 'अनाम नायक' आगे आए, जिन्होंने मौत के साये में रहकर जिंदगी की रक्षा की। ये वे डॉक्टर और नर्सें थीं, जो पीपीई किट के भीतर पसीने से तर-बतर, हफ्तों अपने मासूम बच्चों और बूढ़े माता-पिता से दूर रहे, केवल इसलिए कि किसी अजनबी की सांसें न उखड़ जाएँ। बहुत से एम्बुलेंस चालक, पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी, जो संक्रमण के सबसे करीब थे, फिर भी अपने कर्तव्य पथ से पीछे नहीं हटे।


यही वह समय था जब समाज की सामूहिक शक्ति भी जागी। कई गाँवों में लोगों ने मिलकर 'सामुदायिक रसोई' शुरू की, जहाँ भूखे प्रवासियों के लिए भोजन बना। बहुत से युवाओं की टोलियों ने सोशल मीडिया को 'मदद का कंट्रोल रूम' बना दिया, जहाँ आधी रात को भी ऑक्सीजन सिलेंडर या अस्पताल में बेड दिलाने के लिए लोग एक-दूसरे की जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे। कई मध्यमवर्गीय परिवारों ने अपनी जमा-पूंजी मुफ्त मास्क और राशन बाँटने में लगा दी। इन योद्धाओं ने सिद्ध कर दिया कि भले ही स्पर्श वर्जित था, पर 'संवेदनाओं का सेतु' अभी टूटा नहीं था। मनुष्यता की यह रक्षा केवल एक चिकित्सा कार्य नहीं था, बल्कि यह गिरती हुई सभ्यता को थामने वाला एक आध्यात्मिक अनुष्ठान था।


इसी दौर में 'पड़ोस' की परिभाषा भी बदल गई। एक कॉलोनी में एक ऐसा परिवार था जिसके सभी सदस्य एक साथ कोरोना की चपेट में आ गए। डॉक्टर की सलाह पर वे घर के भीतर ही क्वारंटाइन (पृथकवास) थे। विडंबना देखिए, सूचना मिलने पर भी कोई सगा संबंधी उनकी सीधी सहायता के लिए आगे नहीं आया; वे केवल मोबाइल की स्क्रीन पर हाल-चाल पूछकर अपनी औपचारिकता पूरी कर लेते थे। भय इतना गहरा था कि अपनों ने ही दूरियाँ बना ली थीं। ऐसे संकट के समय में, जब उस परिवार के सामने दवाइयाँ लाने और दो वक्त के भोजन का इंतजाम करने की विकट समस्या खड़ी हुई, तब पड़ोसियों ने 'मानवता का धर्म' निभाया। उन पड़ोसियों ने न केवल उनके दरवाजे पर समय से नाश्ता और भोजन पहुँचाया, बल्कि दवाइयों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की। यह वह क्षण था जब 'खून के रिश्तों' पर 'संवेदनाओं के रिश्ते' भारी पड़ गए। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा केवल अस्पतालों में ही नहीं, बल्कि घरों की उन दहलीज पर भी हो रही थी जहाँ एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के लिए देवदूत बनकर खड़ा था।

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कोरोना काल ने मानवता की तस्वीर के दोनों ध्रुवों को एक साथ उजागर कर दिया—एक ओर जहाँ निःस्वार्थ सहयोग की धारा थी, वहीं दूसरी ओर घोर 'आत्म-केन्द्रीयता' भी दिख रही थी। कोरोना आया और चला गया, पर पीछे छोड़ गया है कुछ अनुत्तरित और चुभते हुए सवाल। क्या हमारे आपसी रिश्ते कभी वैसे ही सहज और निश्छल हो पाएंगे जैसे इस त्रासदी से पहले थे?


कोरोना-काल केवल शारीरिक बीमारी का समय नहीं था, बल्कि यह 'संवेदनाओं के अकाल' का भी दौर था। सामुदायिक और सामाजिक जीवन से जो अनिवार्य दूरी बनी, उसने हमारे भीतर के 'सामूहिक विश्वास' को गहरा आघात पहुँचाया। मानवीय मूल्यों का जो ह्रास और मरती हुई संवेदनाओं को इस दौर में हमने देखा।


आज जब हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं, तो आँखों में वह पुराना भरोसा नहीं, बल्कि एक 'आशंकापूर्ण नजरिया' और 'संवेदनाओं का ठंडापन' अधिक दिखाई देता है। रिश्तों के बीच की भौतिक दूरियाँ तो खत्म हो गईं, लेकिन मन की दूरियाँ बनी रह गई हैं। मन के किसी कोने में यह प्रश्न बार-बार कौंधता रहा —क्या आत्म-केन्द्रीयता और 'स्व' तक सीमित रहने का यह भाव अब मनुष्य का स्थायी चरित्र तो नहीं बन जाएगा? क्या उस सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने हमसे वे तमाम मूल्य तो नहीं छीन लिए, जिन्हें मानव सभ्यता ने हज़ारों साल के संघर्ष और प्रेम से अर्जित किया था? क्या हम अब एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मनुष्य भीड़ में होकर भी नितांत अकेला और आत्ममुग्ध होगा? 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......


सादर,

केशव राम सिंघल