कोरोना काल के संस्मरण - 5
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इतिहास की चेतावनी - 1918 की सीख
मानवता को कभी भी 1918 की उन गलतियों को दोहराने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जिनका खामियाजा हमारे पूर्वजों ने भुगता था। इतिहास गवाह है कि सबसे गंभीर महामारी 'स्पैनिश फ्लू' ने दो वर्षों में तीन लहरों के दौरान 50 करोड़ लोगों को संक्रमित किया था और करीब 5 करोड़ जानें लीं। विडंबना देखिए, सर्वाधिक मौतें दूसरी लहर में हुईं। जब पहली लहर के बाद प्रतिबंध हटाए गए, तो लोग सड़कों पर उत्सव मनाने निकल पड़े। इसी सामूहिक लापरवाही का परिणाम था कि अगली लहर में करोड़ों लोग काल के गाल में समा गए।
हमें याद रखना होगा कि नियमों में ढील केवल सरकार ने दी है, वायरस ने नहीं। सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य है, पर अपने विवेक का उपयोग करना उससे भी अधिक आवश्यक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वे मूल मंत्र, जो आज भी प्रासंगिक हैं -
टीकाकरण - कोविड-19 के टीके डेल्टा और ओमिक्रॉन जैसे घातक स्वरूपों से सुरक्षा का 'अभय कवच' प्रदान करते हैं। टीका लगवाकर आप न केवल स्वयं को, बल्कि समाज को भी सुरक्षित करते हैं।
सावधानी ही बचाव - संक्रमण को रोकने का हर छोटा प्रयास नए स्वरूपों (Variants) के उभरने के जोखिम को कम करता है।
बुनियादी अनुशासन - सुरक्षित शारीरिक दूरी, चेहरे पर सही ढंग से लगा मास्क, बंद जगहों पर हवा का आवागमन (Ventilation), बार-बार हाथ धोना और खांसते-छींकते समय सावधानी—ये सामान्य व्यवहार ही हमारी सबसे बड़ी जीत हैं।
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कोरोना काल में नियमों की व्याख्या भी अक्सर सुविधा और दृष्टिकोण के अनुसार बदलती रही। मार्च 2020 में जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्थित 'तबलीगी जमात' के कार्यक्रम में नियमों का उल्लंघन हुआ, तो लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर पूरे देश में एक कोहराम मच गया। उस घटना को लेकर जिस तरह का सामाजिक और मीडिया विमर्श बना, उसने एक गहरा तनाव पैदा कर दिया था।
किंतु विडंबना देखिए, इसके ठीक एक महीने बाद अप्रैल 2020 में जब कर्नाटक के कलबुर्गी में लॉकडाउन के बावजूद सैकड़ों लोगों ने एकत्र होकर 'रथ उत्सव' मनाया और सोशल डिस्टेंसिंग की सरेआम धज्जियाँ उड़ाईं, तब वैसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। प्रशासन और विमर्श के स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी साध ली गई। यह दोहरापन दर्शाता है कि आपदा के समय भी सरकार ने नियमों को निष्पक्षता से लागू करने के बजाय, उन्हें चश्मे बदल-बदल कर देखा।
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इतिहास की कड़ियाँ जोड़ें तो याद आता है कि अमेरिका में कोरोना से पहली मृत्यु जनवरी 2020 में ही दर्ज हो चुकी थी। इसके ठीक बाद, 24 फरवरी 2020 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने विशाल काफिले के साथ अहमदाबाद पहुँचे थे। साबरमती की धरती पर 'नमस्ते ट्रम्प' के भव्य आयोजन में लाखों की भीड़ उमड़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रम्प ने अहमदाबाद की सड़कों पर रोड-शो किया और मोटेरा स्टेडियम में जनसभा को संबोधित किया।
ट्रम्प आगरा और दिल्ली भी गए और 25 फरवरी को वापस लौटे। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उस अंतरराष्ट्रीय आवाजाही और भारी भीड़ ने कोरोना संक्रमण का द्वार नहीं खोला होगा? बहुत संभव है कि उस काफिले और विदेशी मेहमानों की आवाजाही के साथ ही कोरोना का संक्रमण भारत की गलियों तक पहुँच गया हो। यह केवल एक अनुमान नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए एक गंभीर संदेह है, जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। अहमदाबाद का वह भव्य आयोजन अनसुलझा प्रश्न छोड़ गया है।
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कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 से लगभग दो वर्षों तक स्कूलों के द्वार बंद रहे। इस लंबी अवधि में देश के करोड़ों गरीब बच्चों को न केवल बुनियादी शिक्षा से वंचित होना पड़ा, बल्कि उनके पोषण और स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का ढांचा भी चरमरा गया।
शहरों में भले ही 'ऑनलाइन कक्षाओं' का शोर रहा, लेकिन ग्रामीण भारत की हकीकत इससे कोसों दूर थी। गाँवों में न तो बिजली और इंटरनेट की सुचारु सुविधा थी और न ही उन बच्चों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप जैसे आवश्यक संसाधन थे। विडंबना तो यह भी थी कि बहुत से अध्यापक, जो पारंपरिक शिक्षण पद्धति में माहिर थे, वे स्वयं भी तकनीक के माध्यम से शिक्षा देने के इस नए तरीके से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। इस तकनीकी कमी ने अमीर और गरीब के बीच की शैक्षिक दूरी को और अधिक गहरा कर दिया।
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अदृश्य कोरोना जीवाणु का क्रूर पंजा न जाने कितने ही मनीषी लेखकों और साहित्यकारों को हमसे छीन ले गया। यह एक अत्यंत दुखद और कड़वा सत्य है कि साहित्य जगत की कई आवाज़ें इस महामारी के शोर में हमेशा के लिए खामोश हो गईं। उन सभी दिवंगत आत्माओं को मैं सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
उन विदा होते रचनाकारों से मेरा एक विनम्र निवेदन है—जाते-जाते अपनी कलम की उस ओजस्वी शक्ति का कुछ अंश मुझे सौंपते जाना। आपकी अधूरी रह गई 'दास्तानों' और आपकी समृद्ध विरासत को मैं अपनी लेखनी के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहता हूँ। जब भी आपका लिखा कुछ पढूँ आपकी लेखनी के शब्द मैं आत्मसात कर पाऊँ। ॐ शान्ति!
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काव्य-संस्मरण
कुछ तो सब्र करो।
इतिहास गवाह है कि समय ढूंढ ही लेता है अपनी जरूरतें।
हरेक का अपना समय होता है।
कोई ना कोई तो आएगा।
कोरोना काल भी गुजर जाएगा।
एक आंधी के बाद वातावरण में शान्ति आती है।
याद रखो - स्थाईत्व शाश्वत नहीं है।
परिवर्तन शाश्वत है।
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काव्य-संस्मरण
कुछ तो सब्र करो, ऐ मन!
इतिहास गवाह है कि समय स्वयं ढूँढ ही लेता है अपनी ज़रूरतें।
सृष्टि के रंगमंच पर हर पात्र और हर दौर का अपना एक समय होता है।
अंधेरे के बीच से ही कोई न कोई राह दिखाने वाला आ ही जाता है,
और यह भीषण कोरोना काल भी अंततः गुज़र जाएगा।
याद रखो, विनाश की एक प्रचंड आँधी के बाद ही
वातावरण में एक गहरी शांति आती है।
सत्य भी यही है कि स्थायित्व शाश्वत नहीं है,
'परिवर्तन' ही इस संसार का शाश्वत सत्य है।
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काव्य-संस्मरण
पिछली सरकारों को कोसते हुए,
स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार का दंभ भरा गया।
सांसद निधि से ढेरों एम्बुलेंस खरीदी गईं,
पर विडंबना देखिए...
उन जीवनदायिनी एम्बुलेंसों से बीमारों को नहीं,
मंत्रीजी के नए महल के लिए 'बजरी' ढोई गई!
जब महल खड़ा हो गया और ढोने का काम पूरा हुआ,
तो बड़ी सहजता से कह दिया गया— "ड्राइवर नहीं हैं!"
भीषण कोरोना काल में, जब साँसें उखड़ रही थीं,
वे एम्बुलेंसें सांसद के आवास के बाहर तिरपाल में लिपटी 'घूँघट' ओढ़े खड़ी थीं,
और लाचार जनता के लिए अस्पताल की दहलीज पर सिर्फ 'ठेला गाड़ियाँ' उपलब्ध थीं।
बीमार जीवित हो या देह निर्जीव,
सबके नसीब में या तो कंधे थे, या साइकिल,
या फिर मिन्नत-अर्जी से मांगी गई कोई रेहड़ी या ठेला गाड़ी।
पर वे एम्बुलेंसें?
वे तो सांसद की कोठी के बाहर चैन की नींद सो रही थीं,
क्योंकि सिस्टम की फाइलों में 'ड्राइवर' उपलब्ध नहीं थे!
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काव्य-संस्मरण
यह कफनखसोटों का मुल्क है साधो,
यह कोरोना काल एक युद्धकालीन समय है।
और कुछ नरभक्षियों के लिए यह आपदा—
युद्ध के मैदान से लूट बटोरने का सबसे उपयुक्त समय है।
दवा, ऑक्सीजन और अस्पताल के बिस्तर,
यहाँ सब 'ब्लैक' में उपलब्ध किए जाएँगे।
एम्बुलेंस के दाम सातवें आसमान पर होंगे,
और बेबसी की आँच पर मुनाफे के पकवान सेंके जाएँगे।
एक ओर कोरोना से महायुद्ध और मौत का तांडव है,
दूसरी ओर हर छटपटाता बीमार एक 'अवसर' है।
यह मातम का नहीं, जश्न का मौका है दरिंदों के लिए,
क्योंकि लाशों के ढेर पर ही इनका व्यापार फलता-फूलता है।
यह कफनखसोटों का मुल्क है साधो!
ऐतिहासिक संदर्भ - इतिहास साक्षी है कि युद्ध की विभीषिका के बीच कुछ ऐसे नीच प्रवृति के लोग (कफनखसोट) सक्रिय हो जाते थे, जो रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए या घायल शूरवीरों के शरीर से उनके कीमती वस्त्र, शस्त्र और आभूषण तक लूट लिया करते थे। दुर्भाग्यवश, कोरोना काल में दवाइयों और ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों ने उसी आदिम और क्रूर मानसिकता का परिचय दिया।
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काव्य-संस्मरण
वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था,
साँस उसकी उखड़ रही थी, पर पास में अस्पताल न था।
जैसे-तैसे अस्पताल पहुँचा, तो वहाँ बेड कोई खाली न था,
जैसे-तैसे हुआ जुगाड़, तो वहाँ 'प्राण-वायु' का इंतजाम न था।
न हो सका इलाज समय पर, और 'ब्लैक' में थी हवा और दवा,
वह मर गया सपने देखते-देखते, पर कसूर किसी का भी न था।
वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था।
वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था,
मर गया तो मर गया, पर पास में श्मशान भी न था।
अंतिम सफर पर विदा करने को अपनों का साथ भी न था,
जैसे-तैसे श्मशान पहुँचा, तो वहाँ भी नंबर अभी न था।
जैसे-तैसे नंबर आया, तो पूरी लकड़ी का इंतजाम न था,
जैसे-तैसे रात में हुआ संस्कार, पर वह शास्त्रोक्त विधान न था।
वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था।
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मानव जाति के ज्ञात इतिहास में कोरोना काल एक ऐसा भयावह कालखंड था, जब भारत का लगभग हर नागरिक इस आशंका से घिरा था कि वह कभी भी संक्रमित हो सकता है और अंततः मौत के मुँह में जा सकता है। यह केवल एक शारीरिक बीमारी का दौर नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना का चरम था।
तकरीबन हर व्यक्ति अपना एक-एक दिन यह गईं कर बिता रहा था कि— "चलो, सुरक्षित तरीके से एक दिन और बीत गया।" शायद मानव सभ्यता के इतिहास में मृत्यु कभी इतनी 'करीब' और इतनी 'आम' नहीं रही होगी, जितनी इन दिनों देखने को मिली। हर आहट, हर छींक और हर एम्बुलेंस की आवाज़ मौत का संदेश देती प्रतीत होती थी। हर दिन मृत्यु का साया दिखता था और ऐसा लगता था हम एक जंग लड़ रहे हों। हम सब जीवन नहीं जी रहे थे, बल्कि केवल मौत को टाल रहे थे।
आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ।
सादर,
केशव राम सिंघल
