मौलिकता
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प्रतीकात्मक चित्र साभार NightCafe
एक विचार सामने आया कि हर विचार पहले से ही ब्रह्मांड में मौजूद है, इसलिए कुछ भी वास्तव में मौलिक नहीं है।
यदि इस कथन का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि यह कथन एक दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण दर्शाता है, जो कई विचारधाराओं और सिद्धांतों में है। आइए इसे विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास करते हैं। दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो दर्शनशास्त्र में यह विचार प्राचीन काल से ही मौजूद है कि सब कुछ पहले से ही अस्तित्व में है और व्यक्ति का ज्ञान और अनुभव केवल उसी का प्रतिबिंब या बदला हुआ रूप है। प्लेटो का "आइडियाज का सिद्धांत" भी इसी तरह का है, जिसमें उन्होंने कहा कि सभी विचार और रूप पहले से ही एक उच्च वास्तविकता में मौजूद हैं। यह सिद्धांत हमें यह समझने में मदद करता है कि संवेदनशील जगत की अस्थायी और परिवर्तनशील वस्तुओं के पीछे एक शाश्वत और अपरिवर्तनीय वास्तविकता होती है। हम कुर्सी का उदाहरण लेते हैं। इस जगत में हम विभिन्न प्रकार की कुर्सियाँ देखते हैं, जो अलग-अलग आकार, रंग और डिज़ाइन की होती हैं। लेकिन आइडियाज के जगत में कुर्सी का एक आदर्श रूप होता है, जो सभी कुर्सियों के लिए एक मानक या आदर्श के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस संसार की सभी कुर्सियाँ कुर्सी के आदर्श रूप की अपूर्ण और अस्थायी अभिव्यक्तियाँ हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो हम पाते हैं कि आधुनिक भौतिकी और ब्रह्मांड विज्ञान में भी यह विचार पाया जाता है कि ब्रह्मांड में सभी पदार्थ और ऊर्जा पहले से ही मौजूद हैं और वे केवल रूपांतरित होते हैं। ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है और न ही विनाश, केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखे तो हम पाते हैं कि अनेक आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं में भी यह विचार पाया जाता है कि सब कुछ पहले से ही ब्रह्म या परम सत्ता में मौजूद है। अद्वैत वेदांत जैसे दर्शन में यह माना जाता है कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और बाकी सब उसकी अभिव्यक्ति है।
एक अनुवर्ती प्रश्न सामने आता है कि क्या सृजनात्मकता मौलिक हो सकती है? हाँ, यदि हम सृजन को सापेक्ष दृष्टि से देखें। अर्थात् मौलिकता निरपेक्ष नहीं है, बल्कि सापेक्ष है। सापेक्षता का मतलब है कि हम किसी विचार, रचना या सृजन को उसके संदर्भ में देखेंगे। उदाहरण के लिए, एक कलाकार दो अलग-अलग तत्वों को मिलाकर एक नया रूप बना सकता है। भले ही दोनों तत्व पहले से मौजूद हों, लेकिन उनका संयोजन पहली बार हुआ हो। इस दृष्टि से वह रचना या सृजन उस व्यक्ति के लिए मौलिक हो सकती है। हर व्यक्ति का अनुभव, शिक्षा, संस्कृति और पृष्ठभूमि अलग होती है। इसलिए, दो लोगों के लिए एक ही विचार का अर्थ अलग हो सकता है। इस सापेक्षता के कारण, एक व्यक्ति के लिए जो विचार मौलिक है, दूसरे के लिए वह सामान्य हो सकता है। विज्ञान भी सापेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत करता है। उसी तरह, दर्शन में भी सापेक्षवाद (रिलेटिविज्म) कहता है कि सत्य और मूल्य संदर्भ पर निर्भर करते हैं।
अब हम मौलिकता की अवधारणा को सापेक्ष दृष्टि से देखने का प्रयास करेंगे। हम पाते हैं कि मौलिकता का अर्थ केवल पूर्ण नवीनता नहीं है, बल्कि यह भी है कि कोई विचार, सृजन या रचना किसी विशेष संदर्भ में कितनी नवीन और प्रभावशाली है। जब हम विचार, सृजन और रचना को सापेक्ष दृष्टि से देखते हैं, तो हम नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं। इससे लोग नए विचार, सृजन और दृष्टिकोण को अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। सापेक्ष दृष्टि व्यक्तिगत रचनात्मकता को महत्व देती है। जब लोग अपना विचार, अनुभव या दृष्टिकोण साझा करते हैं, तो इससे अनोखे विचार उत्पन्न होते हैं, जो हमें नए लग सकते हैं। सापेक्ष दृष्टि सांस्कृतिक विविधता को भी महत्व देती है। अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के अपने अनोखे दृष्टिकोण और विचार होते हैं, जो सांस्कृतिक विविधता को सामने रखते हैं।
एक उदाहरण के रूप में, मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत की बात करना चाहूँगा। भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों और तालों की एक समृद्ध परंपरा है। हालाँकि भारतीय संगीत के ये राग और ताल पहले से मौजूद हैं, लेकिन हर संगीतकार अपनी शैली और दृष्टिकोण से उन्हें नए और अनोखे तरीके से प्रस्तुत करता है। इस प्रकार, सापेक्ष दृष्टि से देखें तो हर संगीतकार की प्रस्तुति मौलिक होती है। मौलिकता को सापेक्ष दृष्टि से देखने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि नवाचार और रचनात्मकता के कई रूप हो सकते हैं। यह दृष्टिकोण हमें नए विचार, अनुभव और दृष्टिकोण अपनाने और व्यक्तिगत रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है।
पाठकों के विचार आमंत्रित हैं।
सादर,
केशव राम सिंघल

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