शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 1

 कोरोना काल के संस्मरण - 1

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इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक एक उलझन के साथ शुरू हुआ। इस सदी के दूसरे दशक का अंत बहुत दु:खद अनुभव देकर गया। दूसरे दशक का अंतिम साल कोविड-19 (कोरोना) संक्रमण के साथ शुरू हुआ। प्रारम्भ में कोविड-19 संक्रमण के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी, इसलिए शुरू के कुछ महीने भ्रम की स्थित में बीते। डर का माहौल था, सरकार ने मार्च 2020 में लॉकडाउन लगा दिया, काम-धंधे रुक गए, आर्थिक गतिविधियाँ रुक गई थीं।  

 

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कोरोना काल में स्पर्श बहुत खतरनाक था। हाथ से हाथ नहीं मिला सकते थे। कोरोना कहता था - स्पर्श खतरनाक है। इंसान गाय, बैल, बकरी, भैंस आदि जानवरों को छू सकता है, पर सामने दिख रहे इंसान को नहीं छू सकता। कोरोना ने मानव समाज के दैनिक जीवन पर आक्रमण कर दिया था। 


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नर्स अस्पताल में ड्यूटी कर रही है। कई दिनों से घर नहीं जा पायी है। खाना, पीना, रहना सब अस्पताल में और कोरोना से संक्रमित लोगों की सेवा में लगी हुई है। उसकी तीन वर्ष की बेटी अपने पापा के साथ उससे मिलने अस्पताल आयी है। पाँच दिन बाद नर्स अपनी बेटी को देख रही है और बेटी माँ को, वह भी दूर से। बेटी रो रही है, वह माँ के पास जाना चाहती है। माँ चाहकर भी उसे बुला नहीं सकती, उसे गोद में नहीं ले सकती, उसे प्यार नहीं कर सकती। बस दूर से माँ अपनी बेटी और और बेटी अपनी माँ को देख पा रही है। दोनों की आँखों से आँसू टपक रहे हैं। बच्ची के पिता और नर्स का पति असहाय सा खड़ा है, उसकी आँखें भी गीली हो गई हैं। माँ से उसकी ममता को छीन लेने वाला यह दर्द कितना बड़ा दर्द है। एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने मानव सभ्यता और दैनिक जीवन-शैली पर आक्रमण कर दिया। स्पर्श इंसान की सबसे बड़ी नियामत है, मानव समाज का सामूहिकता और मेल-मिलाप में विश्वास रहा है, जिसे एक सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने समाप्त कर दिया।  हाय ……… यह कैसी नियति है। 


एक व्यक्ति अपने गाँव से दूसरे राज्य में मजदूरी करने गया था। लॉक-डाउन लगने के बाद उसका काम छिन गया। उसके जैसे सैंकड़ों प्रवासी मजदूर थे। उनकी भीड़ टूटे भरोसे, भूखे पेट, थके पैर और अशांत मन के साथ अपने गाँव की ओर पैदल ही जा रहे थे, क्योंकि यातायात के साधन रेल, बस, हवाईजहाज सब बंद थे। वह भी अपनी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर पैदल ही चल दिया। उसके जैसे बहुत से लोग अपने घर-गाँव की ओर जा रहे थे। गिरते-मरते कुछ पहुँचे अपनी मंजिल तक। कुछ ने रास्ते में दम तोड़ दिया। सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुए जब वह अपने गाँव की सीमा पर पहुँचा तो गाँव के लोगो ने उसे और उसके परिवार को गाँव के भीतर घुसने भी नहीं दिया। कोरोना के सूक्ष्म जीवाणु का डर हवा में फ़ैल गया था, भाव-शून्यता देखने को मिल रही थी। 


ईश्वर ने मनुष्य को 'स्पर्श' की अनमोल नियामत बख्शी है। यह वह मूक भाषा है जहाँ शब्द अपना अर्थ खो देते हैं और संवेदनाएँ सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। किसी ने सिसकते हुए कंधे पर रखा एक हाथ, रोते हुए बच्चे के सिर पर फेरा गया हाथ, या अपनों से किसी बड़े का चरण स्पर्श—ये वे सुनहरे धागे हैं जिनसे हमारे भारतीय समाज का ताना-बाना बुना गया है। कोरोना ने इन्हीं धागों को कच्चा कर दिया। उसने सिखाया कि अब 'प्रेम' का अर्थ 'दूरी' है। उसका स्पष्ट सन्देश था - स्पर्श करना मना है। 


कोरोना काल में सब अपनी सुरक्षा में लगे थे। सरकार देख रही थी, पर हालात ऐसे थे कि वह भी मजबूर थी। देश की संसद मौन थी, सवाल पूछने की मनाही थी। 


कोरोना काल में हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा की व्यक्तिगत लक्ष्मण-रेखा खींचने में लगा था। सरकारें व्यवस्था बनाए रखने का दावा तो कर रही थीं, पर जमीनी हालात ऐसे थे कि तंत्र स्वयं लाचार और बेबस नजर आ रहा था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जहाँ संसद को जनता की आवाज बनना था, वहाँ एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई थी। देश की सबसे बड़ी पंचायत—संसद—मौन थी। जिस समय सड़कों पर मानवता सिसक रही थी, उस समय सवाल पूछने की खिड़कियाँ बंद कर दी गई थीं।


सरकारी नीतियाँ विफल होती दिखीं और अस्पतालों के बाहर कतारें लंबी होने लगीं, तब जवाबदेही तय करने के बजाय 'सब ठीक है' का छद्म आवरण ओढ़ लिया गया। संकट केवल स्वास्थ्य का नहीं था, संकट नेतृत्व और सामूहिक जिम्मेदारी का भी था। यह वह दौर था जब सत्ता और आम नागरिक के बीच का संवाद टूट गया था और नागरिक केवल 'आंकड़ा' बनकर रह गया था। नीति-निर्माताओं की चुप्पी उन लोगों के घावों पर नमक की तरह थी, जो अपनों को खो रहे थे या सड़कों पर नंगे पाँव चल रहे थे।  


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केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, शासन-प्रशासन सब देख रहे थे। रेल बंद थी, बसें बंद थी, हवाईजहाज भी बंद थे और हजारों प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने गाँवों की ओर भाग रहे थे, भूखे-प्यासे, कहीं कुछ मिल जाता तो खा लेते थे, सड़क के किनारे ही रात गुजारते थे। उस समय बहुत से सवाल उठे -

- क्या प्रवासी मजदूर इस देश के नागरिक नहीं हैं?

- क्या सत्ता और नागरिक का कोई रिश्ता बचा रह गया है?

- क्या संकट की घड़ी में प्रवासी मजदूरों के मालिकों ने अपने कामगारों के साथ मानवीय रिश्ता निभाया?

- क्या सरकार ने लॉक डाउन लगाने से पहले सोचा कि प्रवासी मजदूरों का क्या होगा?

- क्या चार घंटे पर्याप्त समय था प्रवासी मजदूरों के पास अपने को सुरक्षित करने के लिए?

- क्या सरकार राष्ट्रीय विपदा के इस संकटकालीन समय में एक अध्यादेश द्वारा निजी अस्पतालों पर नियंत्रण नहीं कर सकती थी, जो कोरोना संक्रमित रोग के इलाज के लिए लाखों रूपये वसूल रहे थे? 


हमारी परम्परा रही है कि परिजन और मित्र दिवंगत व्यक्ति को शव-यात्रा में कंधा देते हुए अंतिम विदा देते है, अंतिम संस्कार करते हैं। कोरोना ने जीवन और मृत्यु दोनों में न केवल इंसान को अकेले छोड़ा, वरन् मानवीय रिश्तों को तार-तार कर दिया। शव-यात्रा और सामूहिक शोक पर तो पूर्ण विराम लग गया। संवेदनाओं का जैसा खात्मा इस कोरोना काल में दिखा, वैसा कभी सोचा भी नहीं था।  


परिजनों और मित्रों का कंधा, वह अंतिम संबल होता है जो दिवंगत व्यक्ति को इस लोक की अंतिम गरिमा प्रदान करता है। अंतिम यात्रा में अपनों की मौजूदगी केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उस दुःख को बाँटने का माध्यम होता है, जिसे अकेले सहना कष्टप्रद है। किंतु कोरोना ने न केवल जीवन छीना, बल्कि मृत्यु की पवित्रता और विदाई के अधिकार को भी लहूलुहान कर दिया।


मानवीय रिश्तों के तार-तार होने का इससे वीभत्स दृश्य क्या होगा कि बेटा अपने पिता की चिता को मुखाग्नि देने से डर रहा था, और माँ अपनी संतान के अंतिम दर्शन के लिए पीपीई किट (PPE Kit) पहने हुए रोबोटनुमा अजनबियों के सामने गिड़गिड़ा रही थी। वे लोग, जो जीवन भर भरे-पूरे परिवारों के बीच रहे, अंत में एक पॉलिथीन में लिपटे हुए 'लावारिस' की तरह मशीनी क्रेन द्वारा चिता पर रख दिए गए।


शव-यात्रा और सामूहिक शोक, जो संवेदनाओं के साझा करने का माध्यम थे, उन पर पूर्ण विराम लग गया। श्मशान घाटों पर जलती अनगिनत चिताओं की लपटें गवाह थीं कि इंसान कितना असहाय हो चुका है। संवेदनाओं का ऐसा निर्दयी खात्मा इतिहास ने शायद ही कभी देखा हो। जहाँ मौत पर रोने के लिए अपनों का कंधा न मिले, वहाँ शोक केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का मानसिक अवसाद बन जाता है। जिस 'अंतिम विदा' में मंत्रों की ध्वनि और अपनों की सिसकियाँ होनी चाहिए थीं, वहाँ केवल सैनिटाइजर की गंध के साथ प्लास्टिक की सरसराहट सुनाई देती थी।


महामारियाँ पहले भी आईं और उन महामारियों में ऐसे योद्धा भी सामने आए, जिन्होंने जान की बाजी लगा कर मानवता के लिए काम किया। कोरोना काल में भी ढेरों ऐसे डॉक्टर, स्वास्थ्य-कर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता सामने आए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए लोगों को बचाया, मुश्किल वक्त में लोगों की मदद की। कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने मुफ्त में मास्क बाँटे, लोगों के घरों राशन पहुँचाया। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा की। 


जब जीवन अपनी चरम और दुरूह परिस्थितियों से टकराता है, तब मनुष्य के भीतर के दो रूप प्रकट होते हैं—या तो वह पूरी तरह आत्म-केंद्रित होकर संकुचित हो जाता है, या फिर वह अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भूलकर 'विश्व-चेतना' और 'परोपकार' के वृहद भाव से जुड़ जाता है। इतिहास साक्षी है कि महामारियाँ जब भी आईं, वे अपने साथ केवल विनाश नहीं, बल्कि 'मानवता के योद्धाओं' की अमर गाथाएँ भी लेकर आईं। कोरोना काल इस कसौटी पर मनुष्यता की सबसे बड़ी परीक्षा थी।


इस कालखंड में ऐसे अनगिनत 'अनाम नायक' आगे आए, जिन्होंने मौत के साये में रहकर जिंदगी की रक्षा की। ये वे डॉक्टर और नर्सें थीं, जो पीपीई किट के भीतर पसीने से तर-बतर, हफ्तों अपने मासूम बच्चों और बूढ़े माता-पिता से दूर रहे, केवल इसलिए कि किसी अजनबी की सांसें न उखड़ जाएँ। बहुत से एम्बुलेंस चालक, पुलिसकर्मी और सफाई कर्मचारी, जो संक्रमण के सबसे करीब थे, फिर भी अपने कर्तव्य पथ से पीछे नहीं हटे।


यही वह समय था जब समाज की सामूहिक शक्ति भी जागी। कई गाँवों में लोगों ने मिलकर 'सामुदायिक रसोई' शुरू की, जहाँ भूखे प्रवासियों के लिए भोजन बना। बहुत से युवाओं की टोलियों ने सोशल मीडिया को 'मदद का कंट्रोल रूम' बना दिया, जहाँ आधी रात को भी ऑक्सीजन सिलेंडर या अस्पताल में बेड दिलाने के लिए लोग एक-दूसरे की जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे। कई मध्यमवर्गीय परिवारों ने अपनी जमा-पूंजी मुफ्त मास्क और राशन बाँटने में लगा दी। इन योद्धाओं ने सिद्ध कर दिया कि भले ही स्पर्श वर्जित था, पर 'संवेदनाओं का सेतु' अभी टूटा नहीं था। मनुष्यता की यह रक्षा केवल एक चिकित्सा कार्य नहीं था, बल्कि यह गिरती हुई सभ्यता को थामने वाला एक आध्यात्मिक अनुष्ठान था।


इसी दौर में 'पड़ोस' की परिभाषा भी बदल गई। एक कॉलोनी में एक ऐसा परिवार था जिसके सभी सदस्य एक साथ कोरोना की चपेट में आ गए। डॉक्टर की सलाह पर वे घर के भीतर ही क्वारंटाइन (पृथकवास) थे। विडंबना देखिए, सूचना मिलने पर भी कोई सगा संबंधी उनकी सीधी सहायता के लिए आगे नहीं आया; वे केवल मोबाइल की स्क्रीन पर हाल-चाल पूछकर अपनी औपचारिकता पूरी कर लेते थे। भय इतना गहरा था कि अपनों ने ही दूरियाँ बना ली थीं। ऐसे संकट के समय में, जब उस परिवार के सामने दवाइयाँ लाने और दो वक्त के भोजन का इंतजाम करने की विकट समस्या खड़ी हुई, तब पड़ोसियों ने 'मानवता का धर्म' निभाया। उन पड़ोसियों ने न केवल उनके दरवाजे पर समय से नाश्ता और भोजन पहुँचाया, बल्कि दवाइयों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की। यह वह क्षण था जब 'खून के रिश्तों' पर 'संवेदनाओं के रिश्ते' भारी पड़ गए। मनुष्य और मनुष्यता दोनों की रक्षा केवल अस्पतालों में ही नहीं, बल्कि घरों की उन दहलीज पर भी हो रही थी जहाँ एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी के लिए देवदूत बनकर खड़ा था।

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कोरोना काल ने मानवता की तस्वीर के दोनों ध्रुवों को एक साथ उजागर कर दिया—एक ओर जहाँ निःस्वार्थ सहयोग की धारा थी, वहीं दूसरी ओर घोर 'आत्म-केन्द्रीयता' भी दिख रही थी। कोरोना आया और चला गया, पर पीछे छोड़ गया है कुछ अनुत्तरित और चुभते हुए सवाल। क्या हमारे आपसी रिश्ते कभी वैसे ही सहज और निश्छल हो पाएंगे जैसे इस त्रासदी से पहले थे?


कोरोना-काल केवल शारीरिक बीमारी का समय नहीं था, बल्कि यह 'संवेदनाओं के अकाल' का भी दौर था। सामुदायिक और सामाजिक जीवन से जो अनिवार्य दूरी बनी, उसने हमारे भीतर के 'सामूहिक विश्वास' को गहरा आघात पहुँचाया। मानवीय मूल्यों का जो ह्रास और मरती हुई संवेदनाओं को इस दौर में हमने देखा।


आज जब हम एक-दूसरे की ओर देखते हैं, तो आँखों में वह पुराना भरोसा नहीं, बल्कि एक 'आशंकापूर्ण नजरिया' और 'संवेदनाओं का ठंडापन' अधिक दिखाई देता है। रिश्तों के बीच की भौतिक दूरियाँ तो खत्म हो गईं, लेकिन मन की दूरियाँ बनी रह गई हैं। मन के किसी कोने में यह प्रश्न बार-बार कौंधता रहा —क्या आत्म-केन्द्रीयता और 'स्व' तक सीमित रहने का यह भाव अब मनुष्य का स्थायी चरित्र तो नहीं बन जाएगा? क्या उस सूक्ष्म अदृश्य जीवाणु ने हमसे वे तमाम मूल्य तो नहीं छीन लिए, जिन्हें मानव सभ्यता ने हज़ारों साल के संघर्ष और प्रेम से अर्जित किया था? क्या हम अब एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मनुष्य भीड़ में होकर भी नितांत अकेला और आत्ममुग्ध होगा? 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......


सादर,

केशव राम सिंघल 


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