बैंक राष्ट्रीयकरण
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स्वतंत्रता प्राप्ति (1947) के समय भारत में अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में थे। भारत का केंद्रीय बैंक Reserve Bank of India (RBI) उस समय भी कार्यरत था, जिसका राष्ट्रीयकरण 1 जनवरी 1949 को किया गया। इसके बाद 1955 में State Bank of India Act के अंतर्गत Imperial Bank of India के उपक्रम का अधिग्रहण कर State Bank of India (SBI) की स्थापना की गई। आगे चलकर 1959 में State Bank of India (Subsidiary Banks) Act के अंतर्गत विभिन्न पूर्व रियासतों के राज्य-संबद्ध बैंकों को SBI की सहायक (Associate) बैंकों के रूप में पुनर्गठित किया गया। इसके बावजूद अधिकांश वाणिज्यिक बैंक निजी स्वामित्व में ही थे। इन निजी बैंकों का ऋण मुख्यतः बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों को मिलता था। कृषि, लघु उद्योग और ग्रामीण क्षेत्रों की बैंकिंग आवश्यकताओं की अपेक्षाकृत उपेक्षा होती थी। कई निजी बैंक वित्तीय कुप्रबंधन के कारण बंद हो जाते थे, जिससे जमाकर्ताओं को नुकसान उठाना पड़ता था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 को 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा (Deposits) उस समय ₹50 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में शामिल थे—Central Bank of India, Bank of India, Punjab National Bank, Bank of Baroda, United Commercial Bank (वर्तमान UCO Bank), Canara Bank, United Bank of India, Dena Bank, Syndicate Bank, Union Bank of India, Allahabad Bank, Indian Bank, Indian Overseas Bank तथा Bank of Maharashtra।
15 अप्रैल 1980 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनकी जमा ₹200 करोड़ से अधिक थी। इन बैंकों में Andhra Bank, Punjab and Sind Bank, New Bank of India, Vijaya Bank, Corporation Bank तथा Oriental Bank of Commerce शामिल थे। इस प्रकार राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या बढ़कर 20 हो गई।
बैंक राष्ट्रीयकरण के प्रमुख उद्देश्य
1. ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक शाखाओं का विस्तार।
2. किसानों, लघु उद्योगों तथा कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराना।
3. बचत की आदत को बढ़ावा देना।
4. आर्थिक विकास में बैंकिंग प्रणाली की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित करना।
5. प्राथमिकता क्षेत्र (Priority Sector) को ऋण उपलब्ध कराना।
राष्ट्रीयकरण के प्रमुख परिणाम
सकारात्मक पक्ष
* ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नई बैंक शाखाएँ खुलीं।
* बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार से बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिला।
* वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की मजबूत नींव पड़ी।
* कृषि एवं लघु उद्योगों को संस्थागत ऋण उपलब्ध होने लगा।
* बैंकिंग सेवाएँ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचीं।
चुनौतियाँ
* सरकारी हस्तक्षेप बढ़ा।
* कुछ बैंकों में कार्यकुशलता और लाभप्रदता प्रभावित हुई।
* समय के साथ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPAs) बढ़ीं।
* प्रतिस्पर्धा की कमी के कारण सेवा गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।
1969 और 1980 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के आर्थिक विकास के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है। इससे बैंकिंग का दायरा बड़े उद्योगों से आगे बढ़कर किसानों, छोटे उद्यमियों और आम नागरिकों तक पहुँचा और कृषि, लघु उद्योग तथा अन्य प्राथमिकता क्षेत्रों को संस्थागत ऋण अधिक सुलभ होने लगा। यद्यपि बाद के वर्षों में कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियाँ सामने आईं, फिर भी वित्तीय समावेशन और सामाजिक बैंकिंग के क्षेत्र में राष्ट्रीयकरण की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। आज भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 12 है, क्योंकि समय-समय पर अनेक राष्ट्रीयकृत बैंकों का आपस में विलय किया जा चुका है। 1969 में जब 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था, तब भारत में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या लगभग 8,260 थी। राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बैंक शाखाओं के विस्तार पर विशेष बल दिया गया। परिणामस्वरूप आज देश में वाणिज्यिक बैंक शाखाओं की संख्या बढ़कर लगभग पौने दो लाख तक पहुँच गई है। यह बैंक राष्ट्रीयकरण की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है, जिसने देश में वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी।
बैंक शाखाओं के तीव्र विस्तार के कारण बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर सृजित हुए। इसी विस्तार के परिणामस्वरूप इस आलेख के लेखक को वर्ष 1971 में बैंक की सेवा में आने का अवसर मिला।
19 जुलाई 2026 को बैंक राष्ट्रीयकरण के 57 वर्ष पूर्ण होंगे। यह अवसर भारतीय बैंकिंग इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को स्मरण करने का अवसर भी है। इस ऐतिहासिक अवसर पर सभी बैंककर्मियों, सेवानिवृत्त बैंककर्मियों और बैंक ग्राहकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
केशव राम सिंघल
