सोमवार, 4 अप्रैल 2022

कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का बिल राज्यसभा में पेश

कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास का बिल राज्यसभा में पेश 

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कश्मीरी पंडितों पर आई फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' ने कश्मीरी पंडितों की समस्या पर लोगों को सोचने के लिए मजबूर अवश्य किया है, लेकिन दुःखद सच्चाई यह है कि पिछले बत्तीस सालों से किसी भी सरकार ने कश्मीरी पंडितों की समस्या को सुलझाने के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया। कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि समस्या का समाधान वास्तविक रूप में आना चाहिए। समस्या के समाधान के लिए कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने शुक्रवार 1 अप्रेल 2022 को कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए राज्यसभा में प्राइवेट मेंबर बिल Kashmiri Pandits (Recourse, Restitution, Rehabilitation & Resettlement) Bill, 2022 पेश कर दिया है। ये पहला मौका है जब कश्मीरी पंडितों की समस्याओं के समाधान के लिए कानून बनाने की माँग की गई है और इसके लिए प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया गया है। इस बिल में कश्मीरी पंडितों के सामाजिक और राजनीतिक पुनर्वास के प्रावधान किए गए हैं। साथ ही बिल में कश्मीर में मंदिरों का जीर्णोद्धार करने और कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा और मुआवज़ा देने का प्रावधान हैं। बिल की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें कश्मीरी पंडितों के नरसंहार (जैनोसाइड) की जाँच के लिए आयोग बनाने का प्रावधान किया गया है। बिल में जाँच आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज की अध्यक्षता और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों की सदस्यता के साथ करने की माँग की गई है। 


इस बिल के अनुसार केंद्र सरकार को एक सलाहकार (एडवायजरी) समिति बनानी होगी, जिसमें कश्मीरी पंडितों के प्रतिनिधि होने चाहिए। इसमें कश्मीर वैली में रहने वाले गैर कश्मीरी पंडितों को भी शामिल करें, जो अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इस समिति को अधिक अधिकार दें, जो कश्मीरी पंडितों की दुनिया दोबारा से बसाने के लिए अच्छे से काम कर सके। बिल के मुताबिक कश्मीरी पंडितों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाना चाहिए। कश्मीरी पंडितों के साथ जो भी घटना हुई है, उन्हें पीड़ित माना जाए।


इस बिल पर अब राज्यसभा के सभापति को बहस करवानी होगी। देखना है कि यह बहस कब होती है। यदि यह बिल राज्यसभा और लोकसभा अर्थात्त संसद के दोनों सदनों से पास हो जाता है तो कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए कानून बन जाएगा। यह बिल कांग्रेस सांसद ने पेश किया है और संसद में कांग्रेस का बहुमत नहीं है, लेकिन यदि संसद में बहुमत में मौजूद भाजपा अगर इस बिल को कानून बनाने का समर्थन नहीं करती है तो कश्मीरी पंडितों के गर्माए मुद्दे पर भाजपा खुद कठघरे में होगी। देखना है कि सत्तारूढ़ भाजपा इस प्राइवेट बिल पर क्या कदम उठाती है। आशा की जाती है कि इस बिल को फाइलों में नहीं दबाया जाएगा और सरकार की ओर से इस पर सकारात्मक कार्रवाई की जाएगी।


- केशव राम सिंघल 


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में निवेश अभी भी अनिश्चितता में

बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में निवेश अभी भी अनिश्चितता में

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भारत में बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी के निवेशक अभी भी अनिश्चितता के दौर में हैं। भारत सरकार द्वारा क्रिप्टोकरेंसी की आय पर एक मुश्त 30% कर लगाने वाला नियम 1 अप्रेल 2022 से नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ लागू हो गया है। पर अभी भी भारत में वर्चुअल (आभासी) डिजिटल एसेट्स (वीडीए) की कानूनी स्थिति के लिए टैक्स निश्चितता कोई गारंटी नहीं है क्योंकि सरकार अभी भी इस मुद्दे पर विचार कर रही है।


1 जुलाई, 2022 से क्रिप्टोकरेंसी के ट्रांसफर पर 1% टीडीएस प्रस्तावित है और क्रिप्टोकरेंसी के लेनदेन के पूरे मूल्य पर जीएसटी लगाने की बात से क्रिप्टो निवेशकों की परेशानी और बढ़ने की उम्मीद है। अनिश्चितताओं के बीच बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करते समय अनावश्यक नुकसान से बचने के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखने की सलाह है।


(1) आप जो समझ सकते हैं उसमें निवेश करें 

किसी भी ऐसी परिसंपत्ति में निवेश करना नुकसानदायक हो सकता है जिसकी आपको समझ नहीं है। अगर आपको लगता है कि आपको बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करना चाहिए, तो पहले इसके बारे में सब कुछ समझने की कोशिश करें। यदि आपको लगता है कि आपका निवेश भविष्य में विकास की विशाल संभावनाओं के साथ मौलिक रूप से मजबूत है, तो आप निवेश करने के लिए सोच सकते हैं।

क्रिप्टोकरेंसी निवेश को समझने के लिए तकनीक की समझ होनी चाहिए और यह कैसे काम करता है, और यदि आप तकनीक नहीं समझते हैं तो आपको विशेष क्रिप्टोकरेंसी में निवेश की व्यवहार्यता की जाँच के लिए एक विश्वसनीय सलाहकार की सलाह लेनी चाहिए। साथ ही आप नीचे वर्णित किंडल पुस्तक 'बिटकॉइन क्या है?' पढ़ सकते हैं।

 

(2) बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में अधिक राशि निवेश करने से बचे

 

यदि आप बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी के मूल सिद्धांतों को समझ गए हैं और निवेश जोखिम को समझ रहे हैं तो ध्यान रखें और क्रिप्टोकरेंसी में बहुत अधिक निवेश न करें। आपको समझ लेना चाहिए कि क्रिप्टोकरेंसी अभी भी एक ऐसा परिसंपत्ति वर्ग है, जो नियामक बाधाओं का सामना कर रहा है। इसलिए, यह उच्च-मूल्य वाले निवेश के लिए उपयुक्त नहीं है। वर्चुअल (आभासी) डिजिटल एसेट्स (परिसम्पत्तियों) के हस्तांतरण पर 1% टीडीएस और आय पर एक मुश्त 30% आयकर ने क्रिप्टोकरेंसी के निवेश के आकर्षण को छीन लिया है। भविष्य के नियमों के बारे में भारत में अभी भी अनिश्चितता है, इसलिए बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में अधिक राशि के निवेश के लिए अभी भी सही समय नहीं है।

 

आपको जानना चाहिए कि क्रिप्टोकरेंसी निवेश बाजार बेहद अस्थिर है और जोखिम भरा है। इसलिए सुझाव है कि वर्तमान में क्रिप्टोकरेंसी में निवेश से बचना चाहिए या फिर इसमें निवेश आपके पोर्टफोलियो का एक बहुत छोटा हिस्सा होना चाहिए।

 

(3) लंबी अवधि के लिए निवेश करें

 

विशेषज्ञों का सोचना है कि क्रिप्टोकरेंसी के ट्रांसफर पर 1% टीडीएस और प्रस्तावित जीएसटी अंततः भारत में क्रिप्टोकरेंसी ट्रेडिंग को खत्म कर देगा। इसलिए इसमें लघुअवधि निवेश से लाभ संभव नहीं हो सकेगा। हालाँकि, यदि आप क्रिप्टोकरेंसी संपत्ति की भविष्य की संभावनाओं के बारे में निश्चित हैं, तो आप दीर्घकालिक लाभ के लिए पाँच से दस साल की अवधि के लिए बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी खरीद सकते हैं।

 

(4) यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप अपनी क्रिप्टोकरेंसी कहाँ रख रहे हैं

 

यदि आप नहीं जानते कि अपनी क्रिप्टोकरेंसी को सुरक्षित कैसे रखें तो आप बेहद निराश होंगे। अब जब ट्रेडिंग लाभदायक नहीं हो सकती है, तो लंबी अवधि के लिए निवेश करने पर क्रिप्टोकरेंसी को रखने का सबसे सुरक्षित स्थान हार्डवेयर वॉलेट होगा। यह सलाह दी जाती है कि अपनी डिजिटल संपत्तियों की चाबियों का स्वामित्व रखें और बैकअप रखें। यदि क्रिप्टोकरेंसी के वॉलेट को लेकर आपको संशय है तो इस निवेश से बचें।

 

(5) टैक्स सम्बंधित नियमों का पालन करें

 

भारत में क्रिप्टोकरेंसी से सम्बंधित कर नियम 1 अप्रेल 2022 से प्रभावी हो गए हैं, इसलिए यह समझदारी होगी कि टैक्स सम्बंधित नियमों का पालन करें और ऐसा कुछ भी न करें जिससे कर अधिकारी आपके विरुद्ध कोई सख्त कदम उठाएं। आपको सलाह है कि आभासी डिजिटल परिसंपत्तियों पर करों को चकमा देने के तरीकों की तलाश नहीं करनी चाहिए और करों से बचने के लिए गैरकानूनी समाधान का सुझाव देने वाले से दूर रहना चाहिए।

 

और अंत में जून 2021 में प्रकाशित किंडल पुस्तक "बिटकॉइन क्या है?" पढ़ें, जिसमें बिटकॉइन और डिजिटल करेंसी से सम्बंधित बहुत सी जानकारियाँ पाठको तक पहुँचाने का प्रयास किया गया है। यह किंडल-पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है, जिसका ASIN: B096MWXZ7W है। अमेजन लिंक 

 

साथ ही पढ़े पूर्व प्रकाशित ब्लॉग लेख "बजट में क्रिप्टोकरेंसी के लिए कुछ स्पष्टता पर डिजिटल रूपये को महत्त्व"


- केशव राम सिंघल

रविवार, 6 फ़रवरी 2022

बजट में क्रिप्टोकरेंसी के लिए कुछ स्पष्टता पर डिजिटल रूपये को महत्त्व

 बजट में क्रिप्टोकरेंसी के लिए कुछ स्पष्टता पर डिजिटल रूपये को महत्त्व

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भारत में आभासी डिजिटल सम्पत्तियों सहित क्रिप्टोकरेंसी (जैसे बिटकॉइन) एक अनिश्चितता के साथ झूल रही थी। यह संभावना बहुत अधिक थी कि सरकार संसद में क्रिप्टोकरेंसी पर रोक के लिए विधेयक पेश करेगी, जैसा कि भारतीय रिजर्व बैंक शुरू से ही बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी को मान्यता देने के पक्ष में नहीं था और इसी कारण आभासी डिजिटल परिसंपत्ति आर्थिक वातावरण पर एक व्यापक प्रतिबन्ध का खतरा मंडरा रहा था। वित्त मंत्री ने आभासी डिजिटल संपत्ति से आय अर्जित करने वालों पर 30 प्रतिशत की दर से भारी कर का बोझ लगा कर इस ओर समर्थन करने के लिए अपनी अनिच्छा दर्शाते हुए क्रिप्टोकरेंसी  की वैधता को चतुराई से दरकिनार कर दिया है।

 

1 फरवरी 2022 को वित्त विधेयक 2022 में "आभासी डिजिटल संपत्ति के कराधान के लिए योजना" (Scheme for taxation of virtual digital asset) पेश किया गया। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2022 का बजट पेश करते हुए वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर टैक्स लगाने की योजना बताई। उन्होंने कहा, "आभासी डिजिटल संपत्ति में लेनदेन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। इन लेन-देन के परिमाण और आवृत्ति ने एक विशिष्ट कर व्यवस्था प्रदान करना अनिवार्य बना दिया है। तदनुसार, आभासी डिजिटल संपत्ति के कराधान के लिए, मैं यह प्रस्ताव करती हूँ कि किसी भी आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण से होने वाली किसी भी आय पर 30 प्रतिशत की दर से कर लगाया जाएगा।"

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केंद्रीय वित्त मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा, "अधिग्रहण की लागत को छोड़कर ऐसी आय की गणना करते समय किसी भी व्यय या भत्ते के संबंध में कोई कटौती की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके अलावा, आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण से होने वाली हानि को किसी अन्य आय के विरुद्ध समायोजित नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, लेन-देन के विवरण प्राप्त करने के लिए, मैं एक मौद्रिक सीमा से ऊपर इस तरह के प्रतिफल के 1 प्रतिशत की दर से आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण के संबंध में किए गए भुगतान पर टीडीएस प्रदान करने का भी प्रस्ताव करती हूँ। आभासी डिजिटल संपत्ति के उपहार पर प्राप्तकर्ता के हाथों कर लगाने का भी प्रस्ताव है।"

 

विधेयक में क्रिप्टोकरेंसी जैसी आभासी डिजिटल करेंसी को संपत्ति के रूप में जोड़ा गया है। जैसा कि आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण पर हुई आय पर 30 प्रतिशत की उच्च दर से कर लगाने का प्रस्ताव है। यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ऐसी परिसंपत्ति से होने वाली किसी भी आय की गणना के लिए अधिग्रहण की लागत के अलावा किसी भी अन्य कटौती की अनुमति नहीं होगी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि बिना किसी प्रतिफल के, उदाहरण के लिए उपहार के माध्यम से, हस्तांतरित ऐसी किसी भी संपत्ति के प्राप्तकर्ता पर कर लगाने का प्रस्ताव किया है। वित्त मंत्री ने अपने प्रस्तावों में यह भी कहा है कि आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण से होने वाली किसी भी हानि को आय के किसी अन्य स्रोत के विरुद्ध समायोजित नहीं किया जा सकता। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT – Central Board of Direct Taxes) ने भी आभासी डिजिटल परिसम्पत्तियों के कराधान के सम्बन्ध में और अन्य दिशानिर्देश जारी करने की योजना बनाई है, ताकि जो कुछ छूट गया है, उसे शामिल किया जा सके। 

 

आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण पर उसे हासिल करने के लिए भुगतान करने वाले व्यक्ति को 1 प्रतिशत की दर स्रोत पर कर (TDS) काटने के लिए उत्तरदायी होगा। हालांकि जो व्यक्ति टैक्स ऑडिट के अधीन नहीं हैं, उन्हें स्रोत पर कर (TDS) अनुपालन करने से छूट दी गयी है, यदि अधिग्रहण आभासी डिजिटल संपत्ति का मूल्य 50,000 रूपये से कम है। ऐसे मामलों में जहाँ आभासी डिजिटल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए भुगतान पूरी तरह से वस्तु के रूप में है या कोई अन्य आभासी डिजिटल संपत्ति के रूप में है, तब भी स्रोत पर कर काटने (TDS) का दायित्व भुगतान करने वाले व्यक्ति पर है।

 

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में सेन्ट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) डिजिटल रुपया जारी करने का प्रस्ताव किया है। इस प्रकार भारत सरकार ने ब्लॉकचेन-संचालित डिजिटल रुपया जारी करने के प्रस्ताव से अपने को ब्लॉकचेन तकनीक में डुबो दिया है। ब्लॉकचेन-संचालित डिजिटल रुपया भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 2022-23 के दौरान जारी किए जाने की उम्मीद है। हालांकि भारत सरकार का यह कदम उन्नत प्रौद्योगिकी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है और इस प्रकार देश को नवाचार के लिए अगली पंक्ति में रखता है, लेकिन यह उत्साह केवल भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले डिजिटल रुपये तक ही सीमित रहेगा और निश्चित रूप से अन्य क्रिप्टोकरेंसी के लिए भारत सरकार की किसी उत्साह-भावना को नहीं दर्शाता है। इससे ऐसा लगता है कि भारत सरकार डिजिटल रूपये को तो बढ़ावा देना चाहती है, पर अन्य क्रिप्टोकरेंसी के प्रसार को रोकना चाहती है।

 

- केशव राम सिंघल

साभार -

- वित्त मंत्री का बजट भाषण 

- इकोनॉमिक टाइम्स 

 

यदि आप आभासी डिजिटल मुद्रा 'बिटकॉइन' के बारे में जानना चाहते हैं तो किंडल पुस्तक 'बिटकॉइन क्या है?' पढ़े, जो अमेजन पर उपलब्ध है। कृपया अमेजन लिंक क्लिक करें। धन्यवाद। 

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

निजीकरण

 निजीकरण

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निजीकरण और राष्ट्रीयकरण की बहस बहुत पुरानी है। कुछ लोग निजीकरण को और कुछ लोग राष्ट्रीयकरण को देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर मानते हैं। पूरा संसार इस समय पूंजीवाद की गिरफ्त में है और हर जगह आपको निजीकरण की बातें सुनने को मिलेगी। वर्तमान प्रधानमंत्री निजीकरण के पक्के समर्थक हैं। उनका मानना है और वे कहते भी हैं कि व्यवसाय करना सरकार का काम नहीं है।

सभी को यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि इस समय केंद्र सरकार रणनीतिक क्षेत्रों में कुछ सार्वजनिक उपक्रमों को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में सरकारी इकाइयों का निजीकरण करने को प्रतिबद्ध है। साथ ही केंद्र सरकार विनिवेश पर ज्यादा ध्यान दे रही है। सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी बेचकर सरकार राजस्व को बढ़ाना चाहती है। इसी साल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में एलान किया था कि दो सरकारी बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी का निजीकरण किया जाएगा। पर सरकार ने यह घोषित नहीं किया है कि किन बैंकों की वह पूरी हिस्सेदारी या कुछ हिस्सा बेचने वाली है। हालांकि बैंकों के नामों की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन चार बैंकों (बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र, बैंक ऑफ़ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक और सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया) के लगभग एक लाख तीस हज़ार कर्मचारियों के साथ ही दूसरे सरकारी बैंकों में भी इस चर्चा से खलबली मची हुई है।

ऐसा नहीं है कि विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण की अनुमति या प्रक्रिया केवल वर्तमान सरकार के कार्यकाल में प्रारम्भ हुई, दर असल इसकी शुरुआत काफी पहले से हो गयी थी। बैंकिंग क्षेत्र में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 1993 में 13 नए घरेलू बैंकों को बैंकिंग गतिविधियां करने की अनुमति दी। दूरसंचार क्षेत्र में 1991 से पहले तक बीएसएनएल का एकाधिकार था। 1999 में नई टेलीकॉम नीति लागू होने के बाद निजी कंपनियां आईं। बीमा क्षेत्र में 1956 में लाइफ इंश्योरेंस एक्ट के बाद एक सितंबर 1956 को भारतीय जीवन बीमा निगम की स्थापना हुई थी। 1999 में मल्होत्रा समिति की सिफारिशों के बाद बीमा क्षेत्र में निजी क्षेत्र को अनुमति मिली। विमानन क्षेत्र में 1992 में सरकार ने खुला आसमान नीति (Open Sky Policy) बनाई और बहुत सी निजी विमानन कंपनियों ने इस क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ किया। प्रसारण क्षेत्र में 1991 तक दूरदर्शन ही था। 1992 में पहला निजी चैनल जीटीवी शुरू हुआ। आज देश में 1000 से ज्यादा चैनल हैं।

वर्तमान में सरकार को विकास नीतियों (तथा अपने प्रचार-प्रसार) के लिए धन की आवश्यकता है, जो उसके कर-राजस्व से पूरी नहीं पड़ पा रही है, इसलिए सरकार को अपने संस्थानों का निजीकरण करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है।

बैंकों के कर्मचारियों ने दो दिन 16 और 17 दिसंबर 2021 को हड़ताल की और हड़ताल सफल भी रही। पर क्या सरकार अपने फैसले से पीछे हटेगी? मुझे तो नहीं लगता।

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद तमाम तरह के सुधार और कई बार सरकार की तरफ़ से पूंजी डाले जाने के बाद भी ज्यादातर सरकारी बैंकों की समस्याएं ख़त्म नहीं हो पाई हैं। सरकारी बैंकों में प्रबंधन (विशेषकर ऋण प्रबंधन) में कुशलता का अभाव है। पिछले तीन सालों में ही केंद्र सरकार बैंकों में डेढ़ लाख करोड़ रुपए की पूंजी डाल चुकी है और एक लाख करोड़ से ज़्यादा की रक़म रीकैपिटलाइजेशन बॉंड के ज़रिए भी दी गई है। फिर भी बैंकों की आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार नहीं हो पा रहा।  

मेरा मानना है कि हर विकासशील देश में शिक्षा, रेल परिवहन, सड़क परिवहन, बैंकिंग, स्वास्थ्य, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति आदि क्षेत्रों में सरकार की भागीदारी अवश्य होनी चाहिए क्योंकि बड़ी जनसंख्या के लिए निम्न आर्थिक स्थिति के कारण पूंजीवादी व्यवस्था के तहत मांग और आपूर्ति के अनुसार बाजार कीमते चुकाना संभव नहीं है तथा निजी क्षेत्रों के बैंक गरीब लोगों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध नहीं कराते हैं। क्या राष्ट्रीयकृत बैंकों का निजीकरण होना चाहिए? यह प्रश्न बहुत ही महत्त्व का है। एक राष्ट्रीयकृत बैंक के पूर्व-अधिकारी होने के नाते मैं नहीं चाहूँगा कि सरकारी बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो, पर सरकार की मंशा बहुत ही साफ़ है और अब निजीकरण को कोई भी नहीं रोक पाएगा। 

- केशव राम सिंघल

(यह लेखक के निजी विचार हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप टिप्पणी आमंत्रित हैं)

गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

सरकार द्वारा किसानों की मांगों पर सकारात्मक रुख

सरकार द्वारा किसानों की मांगों पर सकारात्मक रुख 

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संसद में तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद भी किसान आंदोलन समाप्त नहीं हुआ था, क्योंकि किसान संगठनों ने कुछ मांगें सरकार के समक्ष रखीं थीं। अब भारत सरकार के कृषि और किसान मंत्रालय ने अपने एक पत्र क्रमांक सचिव (एएफडब्लू)/2021/मिस/1 दिनांक 9 दिसम्बर, 2021 से सूचित किया है कि वर्तमान गतिशील किसान आंदोलन के लंबित विषयों के सम्बन्ध में समाधान की दृष्टि से निम्न प्रस्ताव रखे हैं -


- न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर एक समिति गठन की जाएगी, जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधि और कृषि वैज्ञानिक सम्मलित किए जाएंगे। पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसान प्रतिनिधि में संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। समिति इस बात पर विचार करेगी कि किसानों को एमएसपी मिलना किस तरह सुनिश्चित किया जाए। देश में एमएसपी पर खरीदी की वर्तमान स्थिति को जारी रखा जाएगा। 


- तत्काल प्रभाव से किसान आंदोलन से सम्बंधित केसों को वापस लिया जाएगा। इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा सरकार ने केसों को वापस लेने के लिए पूर्ण सहमति दी है और केंद्र सरकार अन्य राज्यों से भी अपील करेगी कि वे भी किसान आंदोलन से सम्बंधित केसों को वापस ले लें। 


- किसानों को मिलने वाले मुआवजे का जहाँ तक सवाल है, उसके लिए उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकार ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है। किसान आंदोलन से सम्बंधित केसों को वापस लेने और मुआवजे के सम्बन्ध में पंजाब सरकार ने भी सार्वजनिक घोषणा की है। 


- बिजली बिल में किसान पर असर डालने वाले प्रावधानों पर पहले सभी स्टेकहोल्डर्स / संयुक्त किसान मोर्चा से चर्चा होगी। मोर्चा से चर्चा होने बाद ही संसद में बिल पेश किया जाएगा।  


- जहाँ तक पराली के मुद्दे का सवाल है, भारत सरकार ने जो कानून पारित किया है उसकी धारा 14 और 15 में क्रिमिनल लायबिलिटी से किसान को मुक्ति दी है। 


भारत सरकार ने पत्र में यह भी कहा है कि इस प्रकार लंबित पांचों मांगों का समाधान हो जाता है। अब किसान आंदोलन को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं रहता है। भारत सरकार ने संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व से यह अनुरोध किया है कि अब किसान आंदोलन समाप्त करें। 


एक साल 14 दिन की लंबे संघर्ष के बाद आज 9 दिसम्बर 2021 को सरकार ने संयुक्त किसान मोर्चा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने घोषणा की है कि 11 दिसंबर 2021 को सभी किसान मोर्चों पर जीत का जश्न मनाया जाएगा, उसके बाद आंदोलन की वापसी होगी।


कृपया क्लिक कर पढ़े पिछला लेख - तीन कृषि कानूनों की वापसी। 


- केशव राम सिंघल