कोरोना काल के संस्मरण - 3
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कोरोना महामारी ने मनुष्य को जीवन जीने के नए और अनपेक्षित तरीके सिखा दिए। अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में वह 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) और 'मास्क प्रोटोकॉल' जैसी नई शब्दावलियों को आत्मसात करने लगा। देखते ही देखते दुनिया का स्वरूप बदल गया; बैठकें 'ज़ूम मीटिंग्स' में सिमट गईं, दफ्तर घर के किसी कोने में तब्दील हो गए और शिक्षा का मंदिर मोबाइल की स्क्रीन बन गया। लोग अब डॉक्टर से ऑनलाइन परामर्श ले रहे थे और घर की बुनियादी ज़रूरतें भी डिजिटल माध्यमों से पूरी होने लगी थीं।
यह सब केवल विवशता नहीं थी, बल्कि मनुष्य की वह जिजीविषा थी जिसके सहारे वह कोरोना के उस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु को पछाड़ने का संकल्प लिए हुए था। हालाँकि, इस कालखंड का दुःखद पक्ष किसी से छिपा नहीं है। संक्रमण की पीड़ा और अपनों को खोने का असहनीय शोक हर किसी ने महसूस किया। किंतु प्रकृति का शाश्वत नियम है कि स्थायित्व शाश्वत नहीं है, हर काली रात के बाद एक उजली सुबह आती है और दुःख के बाद सुख का चक्र अवश्य घूमता है। इसी विश्वास के साथ मनुष्य इस महासंकट से जूझता रहा। वास्तव में, मानव जाति की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि उसमें गहरा दर्द और अपार नुकसान को अपने भीतर 'ज़ज्ब' कर लेने की अकूत क्षमता है। वह गिरकर संभलना और मलबे से नया संसार खड़ा करना बखूबी जानता है।
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वर्ष 2020 का अंत होते-होते भारत की स्थिति वैश्विक मानचित्र पर अत्यंत चिंताजनक हो चुकी थी। 31 दिसंबर 2020 तक देश में कोरोना संक्रमण के मामले एक करोड़ दो लाख छियासठ हजार छह सौ चौहत्तर (1,02,66,674) तक जा पहुँचे थे, जिसने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे अधिक प्रभावित देश बना दिया था। किंतु, इन भयावह आँकड़ों के बीच एक बड़ी राहत यह रही कि कुल एक लाख अड़तालीस हजार सात सौ अड़तीस (1,48,738) मौतों के साथ हमारा देश दुनिया में सबसे कम 'मृत्यु दर' वाले देशों में से एक था। यह तथ्य हमारे स्वास्थ्य तंत्र की अटूट जिजीविषा और देशवासियों के सामूहिक प्रयासों का एक सकारात्मक परिणाम था।
इसी अंधकारमय समय में वैक्सीन की खोज ने मानव जाति के खोए हुए विश्वास को पुनः जागृत किया। यह वैज्ञानिकों के प्रयासों का ही फल था कि 'आशा' अब एक मूर्त रूप ले रही थी। भारत सरकार ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए टीकाकरण अभियान को एक विशाल राष्ट्रीय मिशन के रूप में आयोजित करने का सफल प्रयास किया। यह सुनिश्चित किया गया कि तकनीक और सुलभता के माध्यम से देश की आम जनता तक बचाव का यह सुरक्षा कवच पहुँच सके। वैक्सीन केवल एक दवा नहीं थी, वह तो 'जीवन-अमृत' था; उस लंबी और थका देने वाली लड़ाई को जीतने का एक अमोघ अस्त्र, जिसका इंतज़ार हर भारतीय बड़ी बेसब्री से कर रहा था।
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कोरोना महामारी का सबसे घातक प्रहार बुजुर्गों पर हुआ, जिन्हें न केवल शारीरिक जोखिम बल्कि एक गहरी मानसिक वेदना से भी गुज़रना पड़ा। सुरक्षा के नाम पर उन्हें घर की चारदीवारी में 'कैद' होकर रहना पड़ा। सबसे विकट परिस्थिति उन बुजुर्गों की थी, जिनके बच्चे आजीविका के कारण दूसरे शहरों या विदेशों में थे और वे घरों में अकेले रह गए थे। महामारी से पूर्व बच्चे सप्ताहांत या महीने-दो महीने में आकर माँ-बाप का हाल-चाल ले लिया करते थे, किंतु उन दिनों यातायात के साधनों पर पाबंदी और संक्रमण के खौफ ने इस मिलन पर भी ताला लगा दिया था।
वृद्ध आँखें हर दिन दरवाज़े पर टकटकी लगाए अपने बच्चों की राह देखतीं, पर अंततः उन्हें मोबाइल की निर्जीव आवाज़ों से ही संतोष करना पड़ता था। जिन्हें तकनीक की विशेष जानकारी नहीं थी, उनके लिए सही सूचनाएँ प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती था। 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) की अनिवार्यता ने उन्हें एक ऐसे अकेलेपन में धकेल दिया जहाँ केवल चिंताएँ और अनिश्चितता ही उनकी साथी थीं। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि मानसिक तनाव शरीर की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' को क्षीण कर देता है, और इसी कारण बुजुर्गों के लिए संक्रमण का खतरा और भी भयावह हो गया था।
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मैं स्वयं भी इस विषम परिस्थिति का साक्षी रहा। 2020 के प्रारम्भ में जब कोरोना ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू किया, उस समय मैं अजमेर स्थित अपने घर में अकेला था। मेरी पत्नी एक बेटी के पास गोवा गई हुई थीं और शेष दो बेटियाँ भी दूसरे शहरों में थीं। उस एकांत में मेरे लिए सबसे बड़ी राहत बेटियों का वह स्नेह और चिंता थी, जो रोज़ाना मोबाइल के माध्यम से मुझ तक पहुँचती थी। उन्होंने ही मुझ पर प्यार भरा दबाव डाला और मुझे किसी एक बेटी के पास चले जाने के लिए प्रेरित किया। अंततः, मैंने उनकी सलाह मानी और अहमदाबाद अपनी उस बेटी के पास चला गया, जो उस समय अविवाहित थी और वहाँ अकेली रह रही थी। वह निर्णय न केवल शारीरिक सुरक्षा के लिए, बल्कि मानसिक संबल के लिए भी मुझे अनिवार्य लग रहा था।
उस समय मेरी आयु 69 वर्ष थी। यद्यपि मैं सुरक्षित परिवेश में पहुँच गया था, किंतु पीछे छूट गए बंद घर की चिंता रह-रहकर मन को सताने लगती। वह घर जिसे तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, जहाँ मेरी स्मृतियाँ और जीवन की तमाम ज़रूरी चीज़ें रखी थीं, उसकी सुरक्षा का विचार मन को भारी कर देता था। नियति का खेल देखिए, उस प्रवास के बाद एक लंबे अरसे तक मेरा अजमेर लौटना संभव न हो सका। वह 'बंद घर' और उसकी प्रतीक्षा, मेरे कोरोना काल के प्रवास की एक लंबी और व्याकुल कर देने वाली कहानी बन गई।
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लॉकडाउन की आकस्मिक घोषणा के बाद देश ने वह मंज़र भी देखा जब हजारों लोग भूखे-प्यासे, नंगे पाँव सड़कों पर बेबस भटकने को मजबूर थे। यह कोरोना काल की विडंबना ही थी कि जब पूरा देश अपनी आँखों से और सोशल मीडिया के माध्यम से मजदूरों के महा-पलायन के कारुणिक दृश्य देख रहा था, ठीक उसी समय सरकार के नुमाइंदे देश की सर्वोच्च अदालत में यह दलील दे रहे थे कि "सड़कों पर कोई नहीं है।"
प्रशासनिक दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की यह खाई उस समय पूरी तरह बेपर्दा हो गई, जब एक रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर अपनी मरी हुई माँ की चादर खींचते एक मासूम बच्चे का वीडियो सामने आया। वह दृश्य इतना मर्मभेदी था कि पूरा देश सकते में आ गया। सोशल मीडिया पर दिख रहे महा-पलायन के दृश्य और वह बच्चा अदालत में दिए गए उन सरकारी बयानों को झुठला रहा था, जो मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर थे। यह वह दौर था जब सरकारी तंत्र की आँखों पर पट्टी बँधी थी और सड़कों पर बिखरा आम आदमी केवल अपनी नियति के भरोसे छोड़ दिया गया था।
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कोरोना महामारी के उस खौफनाक दौर में बहुत से 'अपने' परायों जैसा व्यवहार कर रहे थे, वहीं मानवता की कुछ ऐसी मिसालें भी सामने आईं जिन्होंने समाज का मस्तक ऊँचा कर दिया। महाराष्ट्र के पुणे में कोरोना संक्रमित एक डॉक्टर की दुःखद मृत्यु हो गई। विडंबना देखिए, जिस डॉक्टर ने उम्र भर लोगों का उपचार किया, उसके अंतिम संस्कार के लिए कोई भी परिचित या सम्बन्धी आगे आने को तैयार नहीं था। जानकारी के अनुसार, डॉक्टर का इकलौता पुत्र अमेरिका में था और यात्रा प्रतिबंधों के कारण भारत आने में असमर्थ था और उनकी 74 वर्षीय पत्नी असहाय महसूस कर रही थीं।
कोरोना संक्रमण के भय ने रिश्तों की गर्माहट को इस कदर सोख लिया था कि डॉक्टर का कोई भी संबंधी शव को कंधा देने या अंतिम संस्कार में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। ऐसी विषम परिस्थिति में मुस्लिम समुदाय के युवाओं ने न केवल संवेदनशीलता दिखाई, बल्कि आगे बढ़कर अंतिम संस्कार की पूरी ज़िम्मेदारी संभाली। उन्होंने न केवल शव को कंधा देकर श्मशान घाट पहुँचाया, बल्कि हिन्दू विधि-विधान के साथ अंतिम विदाई भी दी। यह घटना उस दौर के उस 'डर' पर एक करारी चोट थी जिसने रिश्तों को दरका दिया था, और उस 'सांझी विरासत' का प्रमाण थी जो धर्म से ऊपर उठकर केवल मानवता को पहचानती है।
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काव्य-संस्मरण
मेरी पत्नी और मैंने, कोविड की वैक्सीन लगवाई,
सर्वव्यापी इस व्याधि से, कुछ हद तक मुक्ति पाई।
कुछ हद तक मुक्ति पाई, अभी तो एक और लगवानी है,
अट्ठाईस दिनों के बाद फिर, अस्पताल की राह बनानी है।
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काव्य-संस्मरण
हे कृपा निधान!
मरने से पहले, हर पल मर रहा हूँ मैं,
अब खुद में ही सिमटा-सहमा रहता हूँ मैं,
हर दूसरे को शक की निगाह से देखता हूँ मैं,
कोई पास आ जाए तो कोरोना से डरता हूँ मैं!
हालात बहुत ख़राब हैं, मंज़र डरा रहे हैं,
दुःखद समाचार हर पल मन को रुला रहे हैं,
जीवन में ऐसा दौर कभी पहले देखा न था,
हर तरफ लोग बेबस ठोकरें खा रहे हैं!
चाहता हूँ कि अब कोई 'प्रणय-गीत' लिखूँ,
रिश्तों के प्यार और 'सद्भाव' का संगीत रचूँ,
मगर क्या करूँ कि हालात बहुत बेहाल हैं,
नहीं चाहता कि कोई 'शोक-गीत' लिखूँ!
दुःखों का सैलाब है... हर ओर बस रोना है,
चैन छीना, सुख लूटा, यह कैसा कोरोना है?
हे कृपा निधान! बस यही एक प्रार्थना है,
इस महामारी से शीघ्र छुटकारा देना है!
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काव्य-संस्मरण
आपदाकाल में प्रकृति स्वयं अपना उपचार करती है,
खुद को अधिक स्वच्छ, पोषक और निर्मल बनाती है!
दिन सुधरेंगे, निश्चित रहें -
कोरोना का यह काल भी जाएगा,
और फिर वही सुनहरे दिन लौट आएँगे,
जिनका हमें बेसब्री से इंतज़ार है।
डर ही वायरस है,
विश्वास ही वैक्सीन है,
सकारात्मकता ही वास्तविक दवा है।
आजकल कमरे में ही बंद रहता हूँ,
शायद इसीलिए खूब पढ़ता और लिखता हूँ।
यही एक सार्थक काम अब मेरे हिस्से बचा है,
मन में जो भी विचार आए,
बस उसे कागज़ पर उकेरता रहता हूँ!
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काव्य-संस्मरण
कोरोना...
कोरोना एक भीषण युद्ध है,
लोग मर रहे हैं, लोग जी भी रहे हैं,
मगर समय का पहिया, क्रूरता से चल रहा है!
वैक्सीन गायब, दवा गायब,
यहाँ तक कि प्राण-वायु (ऑक्सीजन) गायब!
अस्पतालों से बेड गायब,
श्मशानों से सूखी लकड़ी गायब,
और सबसे बढ़कर... संकट के समय राजनेता गायब!
वे बैठे हैं सुरक्षित अपने घरों में दुबके हुए,
एक अस्पष्ट टीकाकरण नीति, परदों में छुपाए हुए।
इधर 'आपदा में अवसर' खोज रहे कुछ लोग कहते हैं—
"नकारात्मकता मत फैलाओ,
सकारात्मकता को तवज्जो दो!"
वे चाहते हैं—
दवा न मिले, तो भी संतुष्ट रहो,
अस्पताल में बेड न मिले, तो भी संतुष्ट रहो,
ऑक्सीजन के बिना दम घुट जाए, फिर भी संतुष्ट रहो!
वे कहते हैं— नकारात्मकता फैलाने वाले 'गिद्धों' से बचो,
काहे परेशान होते हो भाई, यह तो सब भाग्य का खेल है!
आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......
सादर,
केशव राम सिंघल

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