कोरोना काल के संस्मरण - 2
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यह सत्य है कि कोरोना ने मानवीय संबंधों के ताने-बाने में अविश्वास और भय का अंधेरा फैलाया, किंतु इसी अंधकार के बीच संवेदनाओं के कुछ 'रोशनी के कण' भी छितराए हुए दिखाई दिए। जहाँ एक ओर आपस में दूरियाँ बढ़ीं, वहीं दूसरी ओर मध्य-वर्ग के भीतर 'पारिवारिकता' और 'सामुदायिक सहयोग' की एक नई चेतना भी जाग्रत हुई। संकट ने सिखाया कि जब बाहर के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब केवल 'आपसी जुड़ाव' ही एक-दूसरे के लिए संबल बनता है।
इसका एक जीवंत उदाहरण उस कॉलोनी में देखने को मिला, जहाँ एक पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आ गया था। उस एकाकीपन और बीमारी के दौर में उनके अपने सगे-संबंधी भले ही भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन पड़ोसियों ने 'पड़ोस-धर्म' की एक नई इबारत लिख दी। उन पड़ोसियों ने न केवल संक्रमित परिवार के लिए भोजन और दवाइयों का प्रबंध किया, बल्कि उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखा। ऐसे समय में मोबाइल की घंटियाँ केवल हाल-चाल पूछने का जरिया नहीं थीं, बल्कि वे संक्रमित परिवार को यह अहसास दिलाती रहीं कि "आप अकेले नहीं हैं।" यह सहयोग का भाव यह बताता है कि कोरोना जैसी आपदा ने जहाँ हमारे कुछ पुराने मूल्यों को झकझोरा, वहीं 'सह-अस्तित्व' और 'निःस्वार्थ सेवा' के कुछ नए अंकुर भी हमारे भीतर फूटने लगे हैं।
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कोरोना काल ने आदमी को यह अहसास करा दिया कि उसका अस्तित्व कितना भंगुर है, कुछ भी स्थाई नहीं है। इस आपदा में मानवता ने बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया—किसी ने अपने प्रियजन खोए, तो किसी की जीवन भर की जमा-पूंजी इलाज की भेंट चढ़ गई। आर्थिक गतिविधियाँ रुक जाने से मध्यम और निम्न वर्ग के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। लेकिन, जहाँ आदमी के लिए यह समय 'महाविनाश' जैसा था, वहीं प्रकृति के लिए यह 'पुनर्जन्म' का काल सिद्ध हुआ।
जब आदमी अपनी सुरक्षा के लिए घरों में कैद हुआ, तो प्रकृति मानो अपनी बेड़ियाँ तोड़कर मुस्कुराने लगी। वर्षों से धुएँ और शोर से घुट रहे पेड़ों में एक नई जान आ गई; उनकी हरियाली में एक अनोखी चमक लौट आई। सड़कों का सन्नाटा पक्षियों के कलरव से भर गया। वे चिड़ियाँ, जो शहरों के कंक्रीट के जंगलों में कहीं खो गई थीं, अब बालकनियों और छतों पर बेखौफ़ चहकने लगीं। प्रदूषण कम हुआ, तो आसमान का नीला रंग अपनी असली आभा में दिखने लगा। चिमनियों से उगलते विषैले धुएँ पर विराम लगा, तो नदियों का जल भी साफ दिखने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति मानो यह संदेश दे रही हो कि आदमी के बिना वह फल-फूल सकती है, लेकिन प्रकृति के बिना आदमी का कोई अस्तित्व नहीं। यह उस दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास था—इंसान वेंटिलेटर के सहारे था और प्रकृति गहरी सांसें ले रही थी।
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लॉकडाउन की अचानक हुई घोषणा ने उन प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया, जो शहरों की चकाचौंध और विकास के असली शिल्पकार थे। देखते ही देखते सड़कें, पगडंडियाँ, खेतों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते और रेल की पटरियाँ एक बेबस भीड़ के सैलाब से भर गईं। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं था, बल्कि व्यवस्था पर से आम आदमी के भरोसे का सामूहिक बिखराव था। इनमें से कई अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रेल की पटरियों पर कट मरे या सड़क हादसों का शिकार हो गए, पर विडंबना देखिए कि सरकारी संवेदनाओं का ग्राफ 'शून्य' ही रहा।
आजादी के पिचहत्तर वर्षों के गौरवशाली उत्सवों के बीच भारत के औसत मजदूर की यह नियति मन को व्यथित करती है। आज भी हमारे देश में मजदूर की छवि एक लाचार और बेबस इकाई बनकर रह गई है। वह चाहे अपने गाँव में पसीना बहाए या किसी महानगर के निर्माण में अपना रक्त-स्वेद दे, बुनियादी तौर पर वह 'असंगठित' और 'उपेक्षित' ही है। संकट के उन दिनों में यह साफ हो गया कि मजदूर शायद कभी सरकारों की प्राथमिक सूची में थे ही नहीं। अचानक लगे लॉकडाउन ने वह अनिश्चितता पैदा की, जिसने लाखों लोगों को नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर चलने पर मजबूर कर दिया। न तो राज्य सरकारों के पास कोई ठोस राहत योजना थी और न ही केंद्र के पास कोई प्रभावी समन्वय। जब सब कुछ 'भगवान भरोसे' छोड़ दिया गया था, तब देश के सत्ताधीशों ने जनता से थाली और बर्तन बजवाकर कोरोना भगाने का एक अतार्किक मूलमंत्र सामने रखा। विज्ञान और चिकित्सा की इस सदी में प्रतीकों का ऐसा प्रदर्शन एक मजाक जैसा लग रहा था।
एक तरफ प्रवासी मजदूरों की आँखों में कोरोना का खौफ था और दूसरी तरफ परिवार के भरण-पोषण की चिंता उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। उनके लिए 'घर' ही आखिरी उम्मीद थी, लेकिन घर लौटने की राह लहूलुहान थी। इस त्रासदी ने यह अनिवार्य प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हमें अब भी एक व्यापक 'राष्ट्रीय मजदूर नीति' की जरुरत नहीं है? क्या हम केवल राष्ट्रीय उत्सवों के शोर में डूबे रहेंगे या उस हाथ को भी गरिमा देंगे, जो इस राष्ट्र की नींव का पत्थर है?
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कोरोना काल के दौरान हुए कुछ अध्ययनों ने एक भयावह सत्य को उजागर किया। आंकड़ों के अनुसार, असंगठित क्षेत्र के केवल 17 प्रतिशत मजदूर ऐसे थे, जिनके 'नियोक्ता' (Employers) की पहचान की जा सकती थी। शेष 83 प्रतिशत मजदूर एक ऐसे 'अदृश्य गलियारे' में काम कर रहे थे, जिनका न कोई आधिकारिक रिकॉर्ड था और न ही कोई ज़िम्मेदार मालिक। जब संकट आया, तो इन मजदूरों को यह भी नहीं पता था कि वे अधिकार के साथ मदद के लिए किसका दरवाजा खटखटाएं। अधिकतर मजदूर दैनिक मजदूरी पर आश्रित थे, जिनके लिए 'अगले दिन की रोटी' हमेशा एक अनिश्चित और डरावना सवाल बनी रहती थी।
कोरोना ने केवल स्वास्थ्य पर हमला नहीं किया, बल्कि श्रमिकों की कमर ही तोड़ दी। विशेषकर निर्माण उद्योग और परिवहन जैसे क्षेत्रों के अचानक ठप हो जाने से करोड़ों हाथ अचानक बेरोजगार हो गए। जिस मजदूर का जीवन 'रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीना' था, उसके लिए लॉकडाउन एक ऐसी कैद बन गया जहाँ भूख की दीवारें सबसे ऊँची थीं। शहरों की ऊँची इमारतों को बनाने वाले ये मजदूर रातों-रात बेगाने हो गए; जिस तंत्र के लिए उन्होंने अपना पसीना बहाया, उसी ने संकट की घड़ी में उन्हें पहचानने तक से इनकार कर दिया। ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उस त्रासदी की सच्चाई हैं जो बताती हैं कि जो हाथ देश के विकास का पहिया घुमाते हैं, विपत्ति के समय उन्हें ही सबसे पहले हाशिए के बाहर धकेल दिया जाता है।
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कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र के लगभग समस्त संसाधनों और कार्मिकों को केवल कोरोना संक्रमण से निपटने के मोर्चे पर तैनात कर दिया गया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अन्य गंभीर बीमारियों—जैसे हृदय रोग, कैंसर और गुर्दा रोगों—से जूझ रहे मरीज पूरी तरह हाशिए पर चले गए। वे अपने इलाज और उपचार के लिए अंतहीन प्रतीक्षा करने को मजबूर हो गए। अस्पतालों में ओपीडी (OPD) सेवाएँ ठप थीं और जीवन रक्षक सर्जरी लगभग बंद कर दी गई थीं। वह समय ऐसा था जब व्यवस्था ने केवल एक बीमारी को 'संकट' माना और बाकी बीमारियों के मरीजों को उनकी नियति के भरोसे छोड़ दिया। यह स्वास्थ्य तंत्र की विवशता थी या दूरदर्शिता का अभाव, कह नहीं सकते, पर इसने कई उन मरीजों की जान जोखिम में डाल दी, जो अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे।
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लॉकडाउन के दौरान
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आसमान में दिखा आसमान का असल नीला रंग
और सड़कों का मौन अब मुखरित हुआ जाता था।
मौन जब मुखरित होने लगे,
तब समझना कि क्रांति आने वाली है।
तो क्या कोरोना-काल सचमुच क्रांति का समय था?
या किसी आने वाली आँधी का आहट-भरा अहसास था?
कोरोना भी ताक रहा था अचरज से—ये कैसे लोग हैं,
जो मेरे साये में भी, खुश रहने की राह खोज रहे हैं?
आशा और निराशा की सड़क पर
सँभलकर चलते हुए सोच रहे लोग—
एक न एक दिन इस महामारी का अंत होगा,
और जीवन फिर से खुशहाल हो जाएगा।
आदमी डटा था, लड़ रहा था,
हर विषम परिस्थिति से,
वह घर की चहारदीवारी से काम कर रहा था,
अस्तित्व बचाने के नए रास्ते तलाश रहा था
और संहारक कोरोना के विरुद्ध
वैक्सीन के रूप में—
'जीवन का अमृत' खोज रहा था।
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देश जनता से निर्मित होता है और उसका अस्तित्व जनता के कल्याण के लिए ही है। काश, संसार के राजनेता 'वोट बैंक' की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर कुछ व्यापक सोच पाते। सत्य तो यह है कि देश और जनता—दोनों में से किसी की भी अनदेखी आत्मघाती है। हम जानते हैं कि एकता में अटूट शक्ति होती है, किंतु कोरोना के नाम पर संसार के अधिकांश शासकों ने 'असीमित अधिकार' अपने हाथों में केंद्रित कर लिए।
कोरोना के साये के साथ-साथ 'निरंकुशता' का काला खतरा भी दुनिया पर मंडराने लगा था। कुछ वैश्विक विचारकों ने इस ओर संकेत किया कि कोरोना से लड़ने के बहाने कई देशों के शासकों ने जो असाधारण शक्तियाँ अर्जित की हैं, वे लोकतंत्र के लिए आने वाले समय में घातक सिद्ध हो सकती हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता जब एक बार असीमित अधिकारों का स्वाद चख लेती है, तो वह उन्हें स्वेच्छा से आसानी से नहीं त्यागती। आशंका यही थी कि सुरक्षा के नाम पर कहीं वैयक्तिक स्वतंत्रता की बलि न चढ़ जाए। आने वाले समय में सत्ताधीश राजनेताओं के एकाधिकारवादी रवैये से लोकतांत्रिक मूल्यों का नुकसान और महामारी का अदृश्य दुष्प्रभाव की आशंका लगने लगी थी।
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कोरोना काल में हम सब कोरोना महामारी से होने वाली मौतों की दैनिक संख्या और डरावने आंकड़ों के मायाजाल में उलझकर रह गए थे। दुर्भाग्य यह था कि महामारी के उस प्रारंभिक दौर में इस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु शत्रु का कोई निश्चित इलाज नहीं था और न ही कोई सुरक्षात्मक टीका बन पाया था। दुःख इस बात का था कि हमारा देश, भारत, दुनिया भर में संक्रमण से सबसे अधिक ग्रस्त देशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुँच गया था।
संख्याओं के वे आकड़े तब दुःख में बदल गए, जब हर व्यक्ति ने अपना कोई न कोई नजदीकी इस महामारी की भेंट चढ़ते देखा। मौतें अब केवल सरकारी बुलेटिन के 'आंकड़े' नहीं थे, बल्कि वे हमारे घरों के उजड़ते हुए प्रियजन थे। मैंने स्वयं इस क्रूर कालखंड में अपनी छोटी दिव्यांग बहन को खोया —एक ऐसा शून्य जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। केवल वही नहीं, अपनी पत्नी के भाई और उनके जीजा जी को भी इसी महामारी ने हमसे छीन लिया। अपनों को खोने का वह खालीपन और अंतिम विदा में उनके पास न जा पाने की लाचारी—यह वह टीस है, जो इस सदी के इतिहास और हमारे हृदय में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है।
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कोरोना महामारी ने विश्व अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी, साथ ही आगामी पीढ़ी की नींव—शिक्षा—को भी गहरे संकट में डाल दिया। यद्यपि तकनीक के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प सामने आया, किंतु 'डिजिटल इंडिया' की यह चमक देश के बड़े हिस्से के लिए बेमानी सिद्ध हुई। वास्तविकता यह थी कि करोड़ों बच्चों के पास न तो स्मार्टफोन थे और न ही इंटरनेट कनेक्शन।
विभिन्न अनुमानों और नीति आयोग की रिपोर्टों के भयावह आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान भारत के लगभग 75 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन कक्षाओं की पहुँच से बाहर रहे। ग्रामीण अंचलों में स्थिति और भी विकट थी, जहाँ मात्र 15 फीसदी लोगों के पास फोन कनेक्टिविटी थी। 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में लगभग पचपन हजार गाँवों में तो मोबाइल नेटवर्क तक नहीं था। विडंबना देखिए, जिस दौर में पूरी शिक्षा 'बिजली और इंटरनेट' पर निर्भर हो गई, उस समय देश के 36 प्रतिशत स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं था।
इस डिजिटल रिक्तता का परिणाम यह हुआ कि लगभग 28.6 करोड़ छात्र-छात्राओं का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में फंस गया। उच्च शिक्षा के प्रति भी छात्रों का मोहभंग हुआ और करीब 47 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरे शहरों में जाकर पढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मानव जाति ने प्रगति तो बहुत की है, लेकिन तकनीक और उसकी पहुँच के बीच की रिक्तता को वह आज तक नहीं भर पाई। तकनीक तो खोज ली जाती है, पर उसे खरीदने और उपयोग करने की आर्थिक शक्ति आधी आबादी के पास आज भी नहीं है। महामारी ने गरीबी बढ़ाई और बाजारों को सीमित कर दिया, जिससे 3 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चे केवल डिजिटल उपकरणों के अभाव में शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित रह गए। इसकी वजह से आने वाले समय में एक बड़ी सामाजिक असमानता आ सकती है।
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बाजार के सिकुड़ने और आर्थिक गतिविधियों के थम जाने से आम आदमी के रोजगार छिन गए और बेरोजगारी बढ़ गई। वहीं दूसरी ओर आश्चर्य यह रहा कि जहाँ मध्यम और निम्न वर्ग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, वहीं कॉर्पोरेट सेक्टर की बड़ी कंपनियों की आय में बेतहाशा वृद्धि हो रही थी। आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2020 से जुलाई 2020 की संक्षिप्त अवधि के बीच ही भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 423 अरब डॉलर की भारी वृद्धि दर्ज की गई।
इसे पूँजीवाद का चरित्र कहें या विडंबना, कि पूँजीपतियों ने इस वैश्विक त्रासदी को भी एक 'सुनहरे अवसर' के रूप में भुनाया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा दाने-दाने को मोहताज था, तब इन औद्योगिक घरानों ने अपनी आय को कई गुना बढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कोरोना काल का यह कालखंड गवाह है कि कैसे एक ही संकट ने गरीब को और अधिक गरीब बना दिया और धनी को और अधिक धनी। 'आपदा में अवसर' खोजने की यह होड़ दरअसल उस आर्थिक विषमता की ओर इशारा करती है, जो किसी भी महामारी से अधिक संक्रामक और घातक हो सकती है।
आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ।
सादर,
केशव राम सिंघल

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