सोमवार, 16 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 6

कोरोना काल के संस्मरण - 6  

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कोरोना महामारी की दुःख भरी दास्तानों का कोई अंत नहीं था, गाजियाबाद की एक घटना ने लोगों को रुला दिया। महज दस-ग्यारह दिनों के भीतर एक पूरा परिवार काल के गाल में समा गया। पहले दिन परिवार के मुखिया की मृत्यु हुई, अभी मातम शुरू ही हुआ था कि आठवें दिन जवान बेटे ने दम तोड़ दिया। नौवें दिन पत्नी चल बसी और ग्यारहवें दिन बेटे की पत्नी (बहू) भी नहीं रही।


अब उस परिवार में केवल दो मासूम जिंदगियाँ बची हैं—आठ साल और छह साल की दो नन्हीं बेटियाँ। स्थितियाँ इतनी नाजुक और हृदयविदारक हैं कि कल्पना मात्र से गला रुँध जाता है। ऐसी अनगिनत कहानियाँ सुनकर हर दिन आँखें आँसुओं से भीग जाती थीं। कोरोना केवल एक बीमारी नहीं, एक ऐसी त्रासदी थी जिसने मासूमों के सिर से एक झटके में पूरा आसमान ही छीन लिया। यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि कोरोना काल की उस क्रूरता का चेहरा है जिसने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़कर रख दिया। परिवार में किसी पालनकर्ता का न रहना और पीछे केवल दो मासूम कलियों का रह जाना—यह सुन कर वाकई आँखें भीग जाती हैं।


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काव्याभिव्यक्ति 


सकारात्मक रहिए, 

एक-दूसरे की मदद करते रहिए। 


याद रखिये—

हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह आती ही है।

एक ऐसी सुबह, जो नई किरणों के साथ नई उम्मीदें लाती है,

हम फिर मिलेंगे, फिर खिलखिलाएंगे, खेलेंगे-कूदेंगे,

और मिलकर एक बेहतर समाज बनाएंगे!


अभी आस बाकी है, आशाओं की ज़मीन बंजर नहीं,

थोड़ा हौसला रखें, नई सुबह दस्तक देने ही वाली है।

सत्य को आत्मसात करें—स्थायित्व शाश्वत नहीं है,

केवल 'परिवर्तन' ही इस सृष्टि का अटल नियम है, यह ध्यान रखें।


मैं रहूँ या न रहूँ, पर यह दुनिया और बेहतर होनी चाहिए।

माना कि जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते,

पर उनकी यादें हमारे संघर्षों को बल देती रहेंगी।

यह भी स्वीकार करें कि सब कुछ हमारे वश में नहीं,

मगर जो हमारे हाथ में है, वह है—सावधानी और संकल्प।


मन का भ्रम त्यागें, भय को दूर भगाएँ,

जब भी बारी आए, वैक्सीन का सुरक्षा कवच ज़रूर लगवाएँ!

(मैंने अपनी दोनों डोज़ लगवा ली हैं, अब आपकी बारी है)।


आज ही लापरवाही छोड़ें, संक्रमण की कड़ी को तोड़ें,

अनुशासन का दीप जलाकर, जीत की राह को मोड़ें।

उम्मीद रखो कि कल का दिन आज से बेहतर होगा। 


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काव्याभिव्यक्ति 


सुरक्षा ही समाधान है !


अपना और अपनों का ध्यान रखें,

मन से भय को निकालें, 

सावधानी अपनाएँ।


कोविड-अनुकूल व्यवहार को जीवन का हिस्सा बनाएँ—

चेहरे पर मास्क हो, हाथों में स्वच्छता का संस्कार हो,

सैनिटाइजर का साथ हो और 'शारीरिक दूरी' का आधार हो।


भीड़ का हिस्सा बनने से बचें, 

एकांत में शक्ति और साहस खोजें,

गुनगुने जल का सेवन करें, 

अपनी देह को भीतर से सींचें।


आत्मानुशासन ही इस युद्ध का सबसे बड़ा शस्त्र है,

और याद रहे—

प्रतिदिन नियमित व्यायाम ही स्वास्थ्य का मूलमंत्र है।


इस महामारी से पार पाने का हमें सामूहिक प्रयत्न करना है,

स्वयं पर अनुशासन का पहरा लगा, जीत का जतन करना है।

जब हम सतर्क होंगे, 

तभी हम, देश और समाज सुरक्षित होगा। 


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सकारात्मकता का सम्बल और मानवता का धर्म - दुःखद समाचारों के बीच सुखद पक्ष यह है कि अधिकतर लोग कोरोना संक्रमण को हरा रहे हैं—अस्पतालों में भी और घरों में भी। आवश्यकता है कि हम सोशल मीडिया का उपयोग भय फैलाने के लिए नहीं, बल्कि सकारात्मकता के प्रसार के लिए करें। नकारात्मकता मन को कमजोर करती है, जबकि ये कठिन परिस्थितियाँ ही हमें जीने की नई राह दिखाती हैं।


अकेलापन इस दौर की बड़ी चुनौती है, जिसे रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहकर दूर किया जा सकता है। याद रहे, 'सोशल डिस्टेंसिंग' का अर्थ समाज से कटना नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच केवल भौतिक दूरी बनाए रखना है। तकनीक के माध्यम से अपनों से जुड़े रहें और मन की दूरियों को मिटाएं।


हमारी कॉलोनी का एक उदाहरण मन को सुकून देता है, जहाँ एक संक्रमित परिवार के लिए पड़ोसियों ने मिलकर भोजन और दवाई की व्यवस्था की। इस सामूहिक सहयोग ने उस परिवार को वह आत्मबल दिया कि वे घर पर ही स्वस्थ हो गए। यही हमारे समाज की असली शक्ति है।


सावधानी के स्तर पर, यह छूत की बीमारी है, अतः स्वच्छता और 'कोरोना प्रोटोकॉल' का पालन अनिवार्य है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है— "समदुःखसुखं धीरं सोअमृतत्वाय कल्पते" (2/15) अर्थात जो सुख-दुःख में धैर्य के साथ अडिग रहता है, वही अमरत्व का अधिकारी है। इस आपदा में धैर्य रखना ही ईश्वर का सबसे उपयुक्त संदेश है। 


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जीवन दर्शन का अंतिम सत्य - 

"जीवन है जो शेष,

बस वही है विशेष।" 


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कोविड महामारी ने केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि आम आदमी की कमर भी तोड़ दी। इस आर्थिक बर्बादी का सबसे बुरा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ा। बहुत से अभिभावक स्कूल की फीस जमा करने में असमर्थ रहे, और विडंबना देखिए—प्राइवेट स्कूल संवेदनहीन होकर उन बच्चों के नाम ऑनलाइन कक्षाओं से काटने लगे।


स्थिति यहाँ तक भयावह हो गई कि बकाया फीस न दे पाने के कारण बहुत से स्कूल प्रबंधन ने बच्चों को 'टीसी' (TC) तक देने से मना कर दिया, जिससे उनका भविष्य अधर में लटक गया। यहाँ तक कि 'ईडब्ल्यूएस' (EWS) श्रेणी के छात्रों को भी, जिन्हें अब तक मुफ्त शिक्षा मिल रही थी, कुछ स्कूलों ने ऑनलाइन पढ़ाई के अधिकार से वंचित किया। सरकार को चाहिए कि इस दिशा में एक ठोस और सकारात्मक नीति बनाए, ताकि किसी भी बच्चे की पढ़ाई आर्थिक तंगी की भेंट न चढ़े। कलम और किताब पर सबका अधिकार सुरक्षित होना ही चाहिए।


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अगस्त 2021 का समय था। मन में एक द्वंद्व चल रहा था कि क्या बच्चों को स्कूल भेजना अब सुरक्षित है? विश्लेषण करने पर समझ आया कि जोखिम स्कूल से ज्यादा समुदाय और परिवार में है। बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य, उनका सामाजिक विकास और उनकी आँखों की रोशनी—सब कुछ ऑनलाइन शिक्षा की भेंट चढ़ रहा था। 


संसद के आँकड़े गवाह थे कि भारत में 3 करोड़ बच्चों के पास डिजिटल साधन ही नहीं थे। ऐसे में शिक्षा केवल एक खास वर्ग तक सिमट रही थी। मेरी आठ वर्षीय नातिन इसका जीवंत उदाहरण थी; स्कूल बंद थे, पर वह जिम्नास्टिक सीखने जाती थी। कोविड प्रोटोकॉल के साथ बाहर निकलने के कारण उसमें वह डर और अकेलापन नहीं था, जो घर में कैद बच्चों में दिख रहा था। साथ ही मुझे लगता है कि जिम्नास्टिक स्कूल जाने वाली मेरी आठ वर्षीय नातिन का मानसिक स्वास्थ्य उन बच्चों से कहीं बेहतर था जो केवल चार दीवारों के बीच और स्क्रीन में कैद होकर पढ़ाई कर रहे थे।


मेरा स्पष्ट मानना था कि स्कूलों को खोलने का निर्णय दिल्ली या जयपुर के बंद कमरों से नहीं, बल्कि ग्राम पंचायतों और नगर निगमों के स्तर पर होना चाहिए। विकेंद्रीकरण, टीकाकरण और स्वच्छता—यही वे तीन स्तंभ थे जिनके आधार पर हम बच्चों को उनका बचपन और उनकी शिक्षा वापस लौटा सकते थे। यह केवल पढ़ाई का नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को 'अवसाद' से बचाने का प्रश्न था। 


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अजमेर से विदा और 'जनता कर्फ्यू' की आहट


मार्च 2020 की वह दहलीज, जिसने हम सबकी जिंदगी की दिशा बदल दी। मैं एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी और मेरी पत्नी मधु, एक सेवानिवृत्त शिक्षिका, अपने-अपने दायित्वों से मुक्त होकर एक शांत जीवन जी रहे थे। हमारी तीन बेटियाँ—दिव्या, शिव्या और दीप्ति—अपने जीवन में व्यस्त थीं। उस समय मधु गोवा में बड़ी बेटी दिव्या के पास थी, और मैं अजमेर में अकेला था। मँझली बेटी शिव्या तब अविवाहित थी और अहमदाबाद में अकेले रह रही थी।


विश्व भर में कोरोना के पैर पसारने की खबरों के बीच बच्चों का प्रेमपूर्ण दबाव बढ़ने लगा कि मैं अकेले अजमेर में न रहकर अहमदाबाद शिव्या के पास चला जाऊँ। मन घर छोड़ने को राजी न था, पर बच्चों की चिंता के आगे झुकना पड़ा। अंततः 18 मार्च 2020 को मैंने अजमेर-दादर सुपरफास्ट से अहमदाबाद का सफर तय किया। बच्चों ने पहले ही मास्क और सैनिटाइजर जैसी जरूरी चीजें ऑनलाइन भेज दी थीं—वे उस आने वाले संकट को शायद मुझसे पहले भांप चुके थे।


19 मार्च को मैं अहमदाबाद पहुँचा और उसी शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन सुना। उन्होंने 22 मार्च को 'जनता कर्फ्यू' का आह्वान करते हुए जो सावधानियाँ बताईं—चाहे वह घर से न निकलना हो, सेवाभावियों का आभार जताना हो या सामान का संग्रह न करना—उनसे हवा में घुली गंभीरता साफ महसूस होने लगी थी। प्रधानमंत्री का वह भाषण सुनकर पहली बार मुझे इस बात का संतोष हुआ कि बच्चों का आग्रह मानकर मैंने सही किया; संकट अब दरवाजे पर खड़ा था। यह संयोग और समय का अद्भुत तालमेल था कि मैंने 18 मार्च को यात्रा की और 19 मार्च को प्रधानमंत्री का भाषण हुआ। यदि मैं एक-दो दिन और रुक जाता, तो शायद लॉकडाउन के कारण मेरा अजमेर से निकलना असंभव हो जाता। बच्चों की सजगता देखिए कि उन्होंने मुझे ऑनलाइन मास्क और सेनेटाइजर भेज दिए। नई पीढ़ी तकनीक और सूचना के बारे में कितनी चौकस थी।  


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मन का वहम और 69 वर्ष का वह पड़ाव


शिव्या अहमदाबाद की जिस सोसाइटी में रहती थी, वहाँ आठ ब्लॉक्स में करीब 160 फ्लैट्स थे। लगभग 600 लोगों की उस सोसायटी में शिव्या का फ्लैट, अजमेर के मेरे फैलाव भरे घर के मुकाबले छोटा तो था, पर हम दो लोगों के लिए पर्याप्त था। अजमेर से अहमदाबाद की रेल यात्रा के बाद मुझे खांसी हो गई। शिव्या ने हिदायत दी कि मैं घर के भीतर ही रहूँ और उसने दवा भी दे दी। साथ ही उसने यह भी कहा कि यदि दो दिन में आराम न मिला, तो कोरोना टेस्ट कराना होगा।


'कोरोना टेस्ट' का नाम सुनते ही मेरे भीतर एक अनजाना डर बैठ गया। इस डर के पीछे एक पुराना मनोवैज्ञानिक कारण था। 1970 के दशक में, बैंक में कार्यरत रहते हुए एक ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर भविष्यवाणी की थी कि मेरी आयु 69 वर्ष रहेगी। मार्च 2020 में मैं ठीक 69 वर्ष का ही था। मुझे लगा कि क्या उस ज्योतिषी की बात सच होने वाली है? वह पुरानी भविष्यवाणी उस समय साक्षात यमराज का बुलावा जैसी लगने लगी।


जब मैंने यह बात बच्चों को बताई, तो उन्होंने बड़े धैर्य से मुझे संभाला। उन्होंने समझाया कि ये सब बेबुनियाद बातें हैं और इस समय केवल आत्मबल और सावधानी की जरूरत है। शिव्या और अन्य बेटियों ने आश्वस्त किया कि हाथ धोते रहने, मास्क पहनने और घर में सुरक्षित रहने से ही इस संकट को टाला जा सकता है। वह क्षण मेरे लिए एक बड़ी मानसिक परीक्षा का था—जहाँ एक तरफ विज्ञान था और दूसरी तरफ बरसों पुराना वहम। 


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सन्नाटा, प्रकृति और 21 दिनों का वह 'लक्ष्मण-रेखा'


22 मार्च 2020—जनता कर्फ्यू का दिन। उस दिन सुबह जब आँख खुली, तो इंसानी शोर की जगह पक्षियों के चहचहाने की सुरीली आवाज़ें सुनाई दीं। प्रदूषण और कोलाहल थमते ही जैसे प्रकृति ने चैन की साँस ली थी। हमारा फ्लैट दूसरी मंज़िल पर था, जहाँ से दूर तक फैला जंगल सा दृश्य दिखता था। मैंने अपनी खिड़की से नीलगायों को बिना किसी डर के सोसाइटी के पास विचरण करते देखा। इंसानी गतिविधियाँ थमीं, तो बेज़ुबान जानवर आज़ाद हो गए। मेरी खांसी धीरे-धीरे ठीक हो रही थी, पर मन का डर अब भी कोरोना की खबरों के साथ बढ़ रहा था।


24 मार्च को प्रधानमंत्री ने रात आठ बजे दोबारा राष्ट्र को संबोधित किया और रात 12 बजे से '21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन' की घोषणा कर दी। उन्होंने इसे 'लक्ष्मण-रेखा' की तरह बताया और स्पष्ट किया कि 'सोशल डिस्टेंसिंग' ही एकमात्र विकल्प है। डब्लूएचओ के भयावह आँकड़े और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 15 हज़ार करोड़ के बजट की बात सुनकर मन सिहर उठा।


प्रधानमंत्री के भाषण के बाद जेहन में बस एक ही सवाल कौंधा— "हे भगवान, यह क्या हो रहा है? दुनिया कैसे चलेगी?" तब शिव्या ने एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ मुझे संभाला। उसने साफ़ कह दिया, "पापा, अब सब कुछ हमारे अपने अनुशासन पर निर्भर है। आप बस पढ़ने-लिखने में मन लगाएँ और बाहरी दुनिया के डर को घर के भीतर न आने दें।" वह क्षण अनिश्चितता और अपनों के प्रति अगाध प्रेम का मिला-जुला अहसास था। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


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