मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 4

कोरोना काल के संस्मरण - 4 

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काव्य-संस्मरण


हे कोरोना अदृश्य जीवाणु !


कहाँ तक तू हमारे बीच चलेगा,

कभी तो कहीं हमसे दूर भागेगा!


तू हमें मिटाने आया है,

तू हमसे भिड़ने आया है?


याद रख, हस्ती मिटती नहीं हमारी,

हम बुलबुलें हैं इस की, यह गुलसिताँ हमारा, 

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा! 


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काव्य-संस्मरण: मेरा माफीनामा


मैं यह माफीनामा लिख रहा हूँ,

हर उस व्यक्ति के नाम—

जो कोविड काल की क्रूरता में, 

यह दुनिया छोड़ चला गया। 


मुझे गहरा दुःख है,

कि तुम अचानक चले गए...

और हम तुम्हारी विदाई को,

न ढंग से स्वीकार कर सके,

न तुम्हारे सम्मान में दो शब्द बोल सके।


शोक की उस घड़ी में,

बहुतों को अपनों का कंधा तक नसीब न हुआ।

सत्य तो यही है कि जो भी इस कालखंड में,

हमसे सदा के लिए दूर चले गए—

वे सभी इस 'व्यवस्था की विफलता' के जीवित दस्तावेज़ हैं।


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काव्य-संस्मरण: कोरोना काल


दिन हो या रात,

शमशानों में अब अनगिनत चिताएँ जल रही हैं,

गलियों से जनाज़े उठ रहे हैं,

और विडम्बना देखिए...

मुर्दे भी अब कतारों में पड़े हैं, 

अपनी बारी के इंतज़ार में!


तुम्हें अब अस्पताल चाहिए?

तुम्हें अस्पताल में ऑक्सीजन और बेड चाहिए?

पर याद करो—तुमने वोट तो मंदिर के नाम पर दिया था,

तुमने वोट अस्पताल के लिए तो कभी दिया ही नहीं था!

फिर आज किस हक से अस्पताल और बेड मांगते हो? 


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कोरोना काल में वह दौर भी था, जब चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल था। एक व्यक्ति की पत्नी कोरोना से संक्रमित हुईं और बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें अस्पताल में एक बेड मिल सका। डॉक्टर ने उपचार के लिए 'रेमडेसिविर' इंजेक्शन की तत्काल व्यवस्था करने को कहा। वह व्यक्ति जब बाज़ार निकला, तो उसे पता चला कि उस जीवनरक्षक दवा की भारी कालाबाज़ारी हो रही है। अपनी जीवनसंगिनी की जान बचाने की खातिर उसने अपनी उम्र भर की सारी जमा-पूँजी उस इंजेक्शन को खरीदने और इलाज में झोंक दी।


विडंबना और त्रासदी की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब बाद में उसे पता चला कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 'रेमडेसिविर' को कोरोना के प्रभावी इलाज की सूची से बाहर कर दिया है। यह जानकर वह शख्स अपना माथा पकड़कर बैठ गया। उसकी बरसों की मेहनत की कमाई उस भ्रम की भेंट चढ़ गई थी, जिसे तंत्र ने समय रहते स्पष्ट नहीं किया था। वह हताश था, पर अपनी नियति के आगे कर भी क्या सकता था?


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यह एक ऐसा कड़वा सत्य है कि आज इस पूरे देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिले, जो यह कह सके कि उसने कोरोना काल की विभीषिका में अपने किसी परिचित, मित्र या सगे-संबंधी को नहीं खोया है। इस महामारी ने हर घर के आँगन में शोक की एक ऐसी लकीर खींच दी, जो दशकों तक हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन की स्मृतियों में दर्ज रहेगी।


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न केवल कोरोना, गरीबी भी महामारी है। कोरोना काल के दौरान सबसे पीड़ित गरीब ही रहा। उसके पास न तो संचित पूँजी थी और नहीं कल के भोजन का कोई जुगाड़ या भरोसा। कोरोना वायरस ने तो शरीर पर वार किया, पर गरीबी ने उसकी गरिमा और अस्तित्व पर ही प्रहार कर दिया। 


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कोरोना काल में हर व्यक्ति दूसरे के लिए सलाहकार, वैद्य या डॉक्टर बन गया था। चारों ओर नुस्खों और मशवरों का अंबार लगा था।


लोगों का मानना था कि साँस लेने में ज़रा सी भी दिक्कत कोविड का संकेत है। सलाह दी जाती थी कि एसी और फ्रिज के ठंडे खाने से बचें और सामान्य तापमान में रहने की आदत डालें। उस समय कुछ 'घरेलू उपाय' और 'नुस्खे' रामबाण की तरह प्रचारित हो रहे थे -


अग्निबाण - लहसुन, प्याज और अदरक के रस में नींबू, काला नमक और काली मिर्च का मिश्रण—इसे हर रोग की काट माना जाने लगा।


प्राकृतिक चटनी - 11 तुलसी के पत्ते, 11 नीम के पत्ते और 11 काली मिर्च के दानों को पीसकर बनाई गई चटनी लोगों को भाने लगी। 


बच्चों के लिए - लहसुन, प्याज और अदरक की चटनी शहद के साथ लोग बच्चो को चटाने लगे।


त्रिवेणी - अदरक, प्याज और लहसुन की चटनी में नींबू रस और मसालों का संगम लोगों ने खूब उपयोग में लिया।


लोग इन उपायों को एक सुरक्षा कवच की तरह अपना रहे थे, क्योंकि उस समय 'भरोसा' ही सबसे बड़ी औषधि थी। ये वे विशिष्ट नुस्खे थे, जो कोरोना काल में सोशल मीडिया में गूँज रहे थे। ये नुस्खे देसी उपचार की महत्ता को जनता के बीच रख रहे थे। भले ही ये वैज्ञानिक रूप से सटीक इलाज न हों, लेकिन अदरक, तुलसी और काली मिर्च ने लोगों की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' (Immunity) और 'मनोबल' को बढ़ाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई। अंकों का मनोविज्ञान लोगों को खूब भाया - "11 पत्ते, 11 दानों" ने भारतीय मानसिकता में शुभ और सटीक होने का अहसास कराया। 


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काव्य-संस्मरण


कई बार दुआ ही सबसे बड़ी दवा बन जाती है,

जहाँ विज्ञान और औषधि हार मान लें, 

वहाँ मौन प्रार्थना भी काम कर जाती है।


औरों के सुख के लिए की गई हमारी निस्वार्थ दुआ,

अक्सर हमारे स्वयं के दुःखों की दवा बन जाती है।


शुभ भावनाओं में एक असीम, अलौकिक शक्ति होती है,

इसलिए मन में हमेशा सबके लिए कल्याणकारी भाव रखें।


शायद यही वो कल्याणकारी 'अभय कवच' था,

जो उस भीषण कोरोना काल में हमारे काम आया।


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सत्य तो यह है कि चिकित्सा पद्धति चाहे कोई भी रही हो, कोरोना के इलाज में अधिकतर चिकित्सक 'अँधेरे में तीर' ही चला रहे थे। उस अनिश्चित कालखंड में चिकित्सक मुख्य रूप से अपने विवेक और पिछले अनुभवों के सहारे ही उपचार कर रहे थे, क्योंकि वे स्वयं भी इस नई महामारी की सटीक चिकित्सा विधि से अनभिज्ञ थे।


एलोपैथी के क्षेत्र में भी विरोधाभासों का अंबार था। हज़ारों मरीज़ों को महँगी 'प्लाज्मा थेरेपी' देने के बाद अंततः विशेषज्ञों ने स्वीकार किया कि यह कोरोना के इलाज में प्रभावी नहीं है। ऐसा प्रतीत होता था मानो लाचार जनता को प्रयोगशाला बना दिया गया हो। जहाँ कुछ चिकित्सक पूरी निष्ठा से जूझ रहे थे, वहीं कुछ ने इन विषम हालातों का लाभ उठाने में भी संकोच नहीं किया।


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कोरोना काल की एक समीक्षा -


कोरोना महामारी ने न केवल आम जन को, बल्कि विश्व की तथाकथित सर्वशक्तिमान सरकारों को भी घुटनों पर ला दिया था। हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकारों ने प्रयास तो किए, पर वे उस स्तर के नहीं थे जितनी संकट की गंभीरता थी। इच्छाशक्ति का अभाव और भविष्य की स्पष्ट योजनाओं की कमी ने आम नागरिक को बेसहारा छोड़ दिया।


इस दौर की कुछ कड़वी सच्चाइयाँ - 


- अर्थव्यवस्था और शिक्षा - रोजगार पटरी से उतर गया, महँगाई बढ़ी और आय के स्रोत सिमट गए। शिक्षण संस्थानों में ताले लटकने से बच्चों का भविष्य धुंधला गया।


- स्वास्थ्य और टीकाकरण - स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गईं और विशाल जनसंख्या का टीकाकरण एक अभूतपूर्व चुनौती बनकर उभरा।


- दिवंगतों को अंतिम गरिमा - सबसे हृदयविदारक बात वह थी कि महामारी की भेंट चढ़े बहुत से दिवंगतों को एक सम्मानजनक विदाई तक नसीब न हो सकी।


- आंकड़ों का शोर - सरकारी अनुमानों के अनुसार चार करोड़ से अधिक संक्रमण के मामले और पाँच लाख से अधिक मौतें दर्ज हुईं, पर वास्तविक टीस इन आंकड़ों से कहीं अधिक गहरी थी।


भले ही महामारी का प्रकोप कम हो गया है, पर संक्रमण का डर आज भी शेष है। अब हमें सजग रहकर ही जीवन बिताना होगा। कुछ बुनियादी नियम जो आज भी हमारा 'अभय कवच' हैं -


- सीमित आवागमन - अनावश्यक यात्राओं से आज भी बचना ही श्रेयस्कर है।


- शारीरिक दूरी - भौतिक संपर्क में दूरी बनाए रखना अभी भी सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है।


- मास्क का महत्त्व - भीड़भाड़ वाले स्थानों पर मास्क का प्रयोग अब भी लाभदायक है।


- टीकाकरण - जिन्होंने टीका नहीं लगवाया है, उन्हें इसे अवश्य लगवाना चाहिए। टीकाकरण ही इस अदृश्य शत्रु के विरुद्ध हमारा वास्तविक सुरक्षा कवच है।


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


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