जीवन का यथार्थ
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पिचहत्तर पार कर चुकने के बाद जीवन अब किसी दौड़ का मैदान नहीं, बल्कि एक शांत नदी सा प्रतीत होता है। अब किसी के बदल जाने से न कोई हूक उठती है, और न ही लोगों के दूर चले जाने से कोई अचरज होता है। समय ने यह पाठ पढ़ा दिया है कि इस दुनिया में अधिकाँश संबंधों की नींव निष्ठा, त्याग या समर्पण पर नहीं, बल्कि स्वार्थ और सुविधा की जमीन पर टिकी होती है। यह जीवन का एक शाश्वत सत्य है जिसे स्वीकार कर लेने मात्र से मन का सारा कोहरा छट जाता है। मनुष्य का साथ भी अमूमन वहीं तक ही रहता है, जहाँ तक उसके निजी हित, उसकी भावनाएँ और उसकी सुविधाएँ सुरक्षित रहती हैं। जब तक स्वार्थ की डोर बंधी है, तब तक अपने हैं; जैसे ही सुविधा का दायरा सिमटा, साथ छूटने लगता है।
शुरुआती दौर में इन सच्चाइयों से सामना होने पर आघात पहुँचता था, मन विचलित होता था। किंतु अब भ्रम के वे आवरण एक-एक करके उतर चुके हैं। सबसे सुखद बात यह है कि भ्रम टूटने के बाद अब लोग बुरे नहीं लगते—न ही उनसे कोई द्वेष रहता है और न ही कोई शिकायत। बस, अब उनके मुखौटे उतर जाते हैं और उनके वास्तविक स्वरूप साफ-साफ दिखाई देने लगते हैं। अब न किसी से कोई अपेक्षा है, न किसी से कोई गिला-शिकवा। जीवन के इस संध्याकाल में यह तटस्थ भाव रखना ही सबसे बड़ी शांति है।
सादर,
केशव राम सिंघल


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