मंगलवार, 7 जुलाई 2015

एक नजर यह भी .... विकास की अंधाधुंध दौड़


एक नजर यह भी ....

विकास की अंधाधुंध दौड़


भारतीय बैंक क़रीब तीन लाख करोड़ का कर्ज़ फंसाए बैठे हैं, जिनमें 40 फीसदी कर्ज़ सिर्फ़ 30 बड़ी कंपनियों पर बकाया है. भारत में बैंक नहीं डूबते क्योंकि सरकार बजट से पैसा देती रही है. (इंडिया टुडे, अंक 15 जुलाई 2015)

हमें ग्रीस (यूनान) से सीखना चाहिए कि विकास के बाद भी एक विकसित देश दिवालिया हो सकता है. हमें विकास की अंधाधुंध दौड़ में शामिल नहीं होना चाहिए, वरन् सतत् विकास (sustainable development) की ओर ध्यान देना चाहिए, ऐसा आर्थिक विकास जो प्राकृतिक संसाधनों की कमी के बिना आयोजित किया जाता है.

- केशव राम सिंघल
(कृपया अपनी टिप्पणी से अवगत कराएँ. धन्यवाद)
समय-समय पर 'एक नजर यह भी' के अंतर्गत लघु-लेखों के लिए 'अपनी बात' ब्लॉग http://krsinghal.blogspot.in/ देखने का निवेदन है.

एक नजर यह भी ..... राजनीति में नैतिक मूल्य


एक नजर यह भी .....

राजनीति में नैतिक मूल्य


भ्रष्टाचार समाप्त करने और शासन में पारदर्शिता लाने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दावे अब छिन्न-भिन्न हो गए लगते हैं. मोदी सरकार के गठन के 14 महीनों के अन्दर ही भाजपा शासित राज्यों में घोटालों का पर्दाफाश हो रहा है.

विदेशमंत्री सुषमा स्वराज व राजस्थान मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे द्वारा ललित मोदी की तरफदारी, मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा शैक्षणिक योग्यता के लिए दिए गए हलफनामें, मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाला तथा छत्तीसगढ़ में पीडीएस चावल घोटाला ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर संसद के आगामी मानसून सत्र में विपक्ष तीखे तेवर दिखा सकता है, पर लोकसभा में विपक्ष संख्याबल के आधार पर कमजोर स्थिति में है. इन सब मुद्दों के कारण जनता के बीच नरेन्द्र मोदी सरकार की छवि तेजी से गिरने लगी है.

व्यापम घोटाला उजागर होने के बाद घोटाले से संबंधित 45 से अधिक लोग रहस्यमय परिस्थितियों में मर चुके हैं. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सीबीआई जाँच की माँग ठुकरा दी है. 'मन की बात' कहने वाले प्रधानमंत्री इन मुद्दों पर चुप हैं. नैतिक रुप से तीनों मुख्यमंत्रियों और दोनों केंद्रीय मंत्रियों को अपने पदों से इस्तीफा देकर स्वतंत्र जाँच में सहयोग करना चाहिए, पर वर्तमान भारतीय राजनीति में ऐसा संभव नहीं लग रहा क्योंकि राजनीति में नैतिक मूल्यों का बहुत तेजी से ह्रास होता दिख रहा है.

- केशव राम सिंघल
(कृपया अपनी टिप्पणी से अवगत कराएँ. धन्यवाद)
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सोमवार, 29 जून 2015

एक नजर यह भी .... आम नागरिक टकटकी लगाए देख रहा है ....


एक नजर यह भी ....

मुझे अभी-अभी इंडिया टुडे 8 जुलाई अंक देखने का अवसर मिला और मै अंशुमान तिवारी की बातों से सहमत हूँ. मोदी सरकार में साहसी बदलावों की जरूरत है, अन्यथा देश को एक कमजोर और लिजलिजी सरकार को अगले चार सालों तक झेलना होगा. वास्तव में नरेन्द्र मोदी के लिए अपनी सरकार की सर्जरी करने का वक्त आ गया है. सुषमा, वसुन्धरा, स्मृति. पंकजा ऐसे विवाद हैं जिनसे मोदी सरकार की साफ़-सुथरी छवि अब दागी हो गई है. अपेक्षा और मंशा के मुकाबले नतीजे कमजोर हैं. कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ. पिछले तेरह महीनों में मोदी सरकार के दो चेहरे देखने को मिलें. पहला, भव्य और शानदार आयोजनों वाला चेहरा, और दूसरा, गवर्नेंस में यथास्थिति - कोई बदलाव नहीं दिखा. महत्वपूर्ण संस्थाओं में खाली शीर्ष पद यह बता रहे हैं कि सरकार का आकार अभी तक पूरा नहीं हो सका है. मोदी सरकार के कई मिथक अब टूटते प्रतीत हो रहे हैं. सरकार और बीजेपी दोनों मोदी में समाहित हैं, इसलिए जो कुछ करना है नरेन्द्र मोदी को करना है और आम नागरिक उनकी ओर टकटकी लगाए देख रहा है.

- केशव राम सिंघल

एक नजर यह भी ....




वाराणसी के ट्रॉमा सेंटर का उद्‍घाटन पिछले वर्ष 2014 में होना था, पर तैयारियाँ पूरी न होने के कारण उद्‍घाटन कार्यक्रम संपन्न नही हो पाया. यह ट्रॉमा सेंटर यूपीए - 2 के कार्यकाल में 2013 में ही तैयार हो गया था, जो उद्‍घाटन समारोह की बाट जो रहा है. 28 जून 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों ट्रॉमा सेंटर का उद्‍घाटन होना था और इस बार बारिश की वजह उद्‍घाटन फिर टल गया.

2013 में तैयार ट्रॉमा सेंटर का उद्‍घाटन मोदी सरकार अपने कार्यकाल के 13 महीनों में भी नही कर पाई है. यहाँ महत्वपूर्ण यह भी है कि वाराणसी नरेन्द्र मोदी का संसदीय निर्वाचन क्षेत्र भी है.

- केशव राम सिंघल

शुक्रवार, 12 जून 2015

जाने किस उम्मीद में ....


ख्वाबों में खोजता गुजरा वो पल धुँधला है अब फिर भी,
जाने किस उम्मीद में यादों का बहाना बन जाता हूँ मैं !

जानता हूँ बदलाव जरूरी / न पा सकने का दु:ख बहुत / फिर भी,
जाने किस उम्मीद में छलकते हैं आँसू और हल्का हो जाता हूँ मैं !

दर्द है, गम है, घुटन और मुश्किलें बहुत फिर भी
जाने किस उम्मीद में हँसकर सबकुछ छुपाता हूँ मैं !

- केशव राम सिंघल