पौराणिक कथा — रावण के शिव-भक्त होने की कथा
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रावण हिमालय-अंचल में विचरण कर रहा था। तभी नंदी ने पूछा - कौन है तू? इस अगम वन में क्यों घूम रहा है? रावण ने निर्भय कहा - तू कौन है ऐसा पूछने वाला? यह वन अगम कैसे? नंदी बोला - यहाँ देव-दैत्य-पूजित भगवान् शिव का धाम है। यह निषिद्ध क्षेत्र है। भाग जा यहाँ से।
मैं उन्हें देखना चाहता हूँ। तू कौन है मुझे रोकने वाला? यह कहकर रावण कैलाश की ओर चढ़ने लगा। नंदी ने उसे पीछे ठेल दिया। रावण ने क्रोध में नंदी को दूर फेंक दिया। मल्लयुद्ध हुआ; रावण विजयी रहा। तब नंदी उसे शिव के पास ले गया। रावण ने अपना परिचय दिया। शिव ने पूछा - क्या तूने ज्येष्ठ कुबेर की अवज्ञा की? रावण बोला - मैं ऐसा नहीं मानता। कुबेर ने यक्ष-संस्कृति रखी, मैंने रक्ष-संस्कृति। मूलमंत्र है—वयं रक्षामः। जो सहमत, उसे अभय; जो नहीं, वह शत्रु। शिव ने कहा - मैं तुझसे सहमत नहीं। रावण बोला - तो युद्ध करें।
शिव ने त्रिशूल उठाया, रावण ने कुठार। युद्ध चला। शीघ्र ही रावण थककर हाँफने लगा, बोला - विराम चाहता हूँ। आप युद्ध नहीं, खिलवाड़ करते हैं। आप देव हैं, मैं सेवक। कल्याण कीजिए।
शिव ने हाथ उठाया और कहा - कल्याण हो। तेरा शौर्य स्तुत्य है, तू अजेय है। तेरी रक्ष-संस्कृति क्या है?
रावण ने कहा - वयं रक्षामः—हम रक्षा करते हैं। आर्यों ने आर्यावर्त बनाकर जनों को दक्षिणारण्य में बहिष्कृत किया। सागर के द्वीपों में आर्य-अनार्य अनेक जातियाँ बसती हैं, परस्पर विवाह भी होता है। रक्ष-संस्कृति में सबका समावेश हो, सभी की रक्षा हो—यही मेरा उद्देश्य है।
शिव प्रसन्न हुए और बोले - तेरा प्रयास स्तुत्य है। मैं तुझसे प्रसन्न हूँ।
रावण घुटनों के बल बैठकर चरणों में सिर नवाया। शिव ने कहा - कल्याणं ते भवतु! शिवं ते अस्तु!
इस प्रकार रावण शिव का भक्त बना।
सादर,
केशव राम सिंघल

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