बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) 2020


राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) 2020

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) 2020 क्या है?

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) भारत में रहने वाले स्वाभाविक निवासियों का एक रजिस्टर है। इसे ग्राम पंचायत, तहसील, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया जाता है। राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के निर्माण की योजना नागरिकता अधिनियम, 1955 और नागरिकता नियम, 2003 के प्रावधानों के तहत शुरू की जा रही है। राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) 2020 में देश के सभी 'सामान्य निवासियों' का विवरण होगा, चाहे वे नागरिक हों या नहीं। इसमें भारत के गैर-नागरिकों का विवरण होगा, जो भारत में सामान्य निवासी हैं।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का उद्देश्य क्या है?

देश के हर निवासी (विदेशी सहित) की पूरी पहचान और अन्य जानकारियों के आधार पर उनका डेटाबेस तैयार करना इसका अहम उद्देश्य है। सरकार अपनी योजनाओं को तैयार करने, धोखाधड़ी को रोकने और हर परिवार तक स्कीमों का लाभ पहुंचाने के लिए इसका इस्तेमाल करती है।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) से सम्बंधित प्रावधान

नागरिकता कानून, 1955 को 2004 में संशोधित किया गया था, जिसके तहत राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के प्रावधान जोड़े गए। नागरिकता कानून, 1955 के सेक्शन 14A में निम्न प्रावधान तय किए गए -
- केंद्र सरकार देश के हर नागरिक का अनिवार्य पंजीकरण कर राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी कर सकती है।
- सरकार देश के हर नागरिक का रजिस्टर तैयार कर सकती है और इसके लिए राष्ट्रीय पंजीकरण प्राधिकरण (नैशनल रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी) भी गठित की जा सकती है।

क्या राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के तहत पंजीकरण अनिवार्य है?

नागरिकता कानून में 2004 में हुए संशोधन के अनुसार सेक्शन 14 के तहत हर नागरिक के लिए एनपीआर में पंजीकरण अनिवार्य है। देश के हर नागरिक को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) में अपना नाम दर्ज करवाना होगा। साल 2021 में भारत की जनगणना से पहले अप्रैल 2020 से सितंबर 2020 तक रजिस्टर को अद्यतन किया जाएगा।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) में कौन सी जानकारियां एकत्र की जाएँगी?

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) में निम्न जानकारियाँ एकत्र की जाएँगी -
- जनगणना घर का नंबर,
- हाउस होल्ड नंबर,
- जनगणना घर का पता, पिन कोड,
- हाउस होल्ड की स्थिति (पुराना हाउस होल्ड / बंद घर / रहने वाला चला गया /अवधि के दौरान हाउसहोल्ड की गणना नहीं की जा सकी / नया हाउसहोल्ड)
- सदस्यों की संख्या

रहने वाले सदस्यों की संख्या के बाद प्रत्येक सदस्य से सम्बंधित निम्न जानकारियाँ एकत्र की जाएँगी -
- सदस्य की क्रम संख्या और उसका पूरा नाम (यह बहुत ही आवश्यक है कि जनगणना के दौरान नाम सही लिखा जाए। इसके लिए विशेष सावधानी बरतने के निर्देश हैं।)
- घर के सदस्य की उपलब्धता (उपलब्ध है / मृत्यु हो गयी / चला गया / नया),
- मुखिया से सम्बन्ध (मुखिया, पति/पत्नी, बेटा/बेटी, पोता/पोती, माता/पिता, भाई/बहन, बेटे की पत्नी/बेटी का पति, दादा/दादी, सास/ससुर, अन्य रिश्तेदार, घरेलु नौकर, अन्य जो रिश्तेदार नहीं),
- लिंग,
- वैवाहिक स्थिति (कभी शादी नहीं हुई, वर्तमान में विवाहित, विधवा, अलग हुए, तलाकशुदा),
- जन्म तिथि और जन्म स्थान - राज्य, जिला,
- राष्ट्रीयता जो घोषित की,
- पासपोर्ट नंबर,
- शैक्षणिक योग्यता,
- व्यवसाय / गतिविधि,
- मातृभाषा और उसका कोड,
- स्थाई घरेलु पता (संगणक यह जानकारी लेगा कि हाउसहोल्ड का पता ही स्थाई पता है - हाँ या नहीं, यदि नहीं तो वह स्थाई घरेलु का पूरा पता नोट करेगा),
- रहने की अवधि (संगणक यह जानकारी लेगा कि क्या आप वर्तमान पते पर जन्म से रहते हैं, यदि नहीं तो वर्तमान पते पर रहने की अवधि की जानकारी लेगा) और रहने का पिछला निवास स्थान (स्थान, जिला और राज्य),
- पिता, माता और जीवन साथी के विवरण - इस सन्दर्भ में उनके नाम, जन्म तिथि और जन्म स्थान (जिला और राज्य) की जानकारी ली जाएगी,
- यदि उपलब्ध हों तो आपसे आपके आधार नंबर, मोबाईल नंबर, वोटर आईडी कार्ड नंबर और ड्राइविंग लाइसेंस नंबर की जानकारी भी ली जाएगी।

वर्तमान स्थिति

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए जानकारियाँ (Data), साल 2010 में भारत की जनगणना के लिए घरों के सूचीकरण की प्रक्रिया के दौरान ही एकत्र कर ली गयी थीं। इस जानकारियों (Data) के अद्यतन का काम साल 2015 में हुए घर-घर सर्वेक्षण (डोर-टू-डोर सर्वे) के दौरान ही कर लिया गया था। इस अपडेटेड जानकारी का डिजिटलीकरण भी पूरा हो चुका है। इसके बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को भी अद्यतन करने का निर्णय केंद्र सरकार ने ले लिया है।

अप्रैल 2020 से सितंबर 2020 के बीच होगा सर्वेक्षण

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अद्यतन करने का काम साल 2021 की जनगणना के लिए अप्रैल 2020 से सितंबर 2020 के बीच होने वाली घरों की सूचीकरण प्रक्रिया के साथ होगा। केंद्र सरकार इस आशय को लेकर एक राजपत्रित अधिसूचना पहले ही प्रकाशित कर चुकी है। ये प्रक्रिया असम को छोड़कर देश के अन्य सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में होगी। असम को बाहर इसलिए रखा गया है क्योंकि अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए वहां एनआरसी (नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर) की प्रक्रिया पहले ही हो चुकी है।

प्रक्रिया के चरण

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होगी। पहला चरण 1 अप्रैल 2020 लेकर से 30 सितंबर 2020 के बीच होगा, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारी घर-घर जाकर आंकड़े जुटाएंगे। दूसरा चरण 9 फरवरी 2021 से 28 फरवरी 2021 के बीच पूरा होगा। तीसरे चरण में 1 मार्च 2021 से 5 मार्च 2021 के बीच संशोधन की प्रक्रिया होगी।

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) से कितना अलग है राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर)?

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। एनआरसी का मकसद देश में अवैध रूप से रह रहे बाहरी नागरिकों की पहचान करना है, वहीं राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का उद्देश्य किसी स्थान पर छह महीने या उससे ज्यादा वक्त से रह रहे निवासियों की जानकारी एकत्र करना है। अगर कोई बाहरी नागरिक भी देश के किसी हिस्से में छह महीने से ज्यादा वक्त से रह रहा हो तो उसका नाम भी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) में दर्ज होगा।


संगणकों के लिए नियमावली

संगणकों की जानकारी के लिए नियमावली के तौर पर रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त का कार्यालय (गृह मंत्रालय, भारत सरकार) ने 'Instruction Manual for Updation of National Population Register (NPR) 2020 (For Enumerators and Supervisirs)' प्रकाशित की है। अधिक जानकारी के लिए आप जनगणना विभाग की वेबसाइट http://censusindia.gov.in/ देख सकते हैं।

अन्य

पिछली जनगणनाओं में कभी भी पिता और माता की जन्म तिथि और जन्मस्थान की जानकारियाँ एकत्र नहीं की गईं, जो इस बार की जा रही हैं। एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के चलते यह विवाद का विषय बन गया है। इस जानकारी-लेख के लेखक का मानना है कि बहुत से नागरिक इस बात से डर रहे हैं कि इन जानकारियों की वजह से उनकी भारतीय नागरिकता जा सकती है, क्योंकि उनके पास इस सम्बन्ध में दिखाने के लिए कोई कागजात नहीं हैं। केंद्र सरकार के एक मंत्री का यह कहना कि पैन कार्ड, आधार कार्ड आदि नागरिकता के मान्य दस्तावेज नहीं हैं। यह बयान बहुत से नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यक वर्ग, में डर और संशय पैदा कर रहा है। जिस प्रकार असम में अभी भी उन्नीस लाख लोग अभी भी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर हैं, उससे उनकी चिंता और बढ़ रही है। इस सम्बन्ध में नागरिकों की चिंता को ख़त्म करने के लिए सरकार को विशेष घोषणा करनी चाहिए, जिससे देश में विरोध का वातावरण समाप्त हो सके।

- केशव राम सिंघल

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

बजट कैसा है?


बजट कैसा है?

मेरे पास मेरे एक मित्र का फोन आया और उसने पूछा कि बजट कैसा है। मैंने कहा - अखबारों की हैडलाइन पढ़ लो, समझ आ जाएगा। फिर भी कुछ-कुछ मैं बताता हूँ। एक अखबार लिखता है - रिकार्ड इतिहास का सबसे बड़ा बजट, वित्त मंत्री दो घंटे इकतालीस मिनट बोलीं, फिर भी आख़िरी दो पन्ने नहीं पढ़े। पहली बार दो टैक्स स्लैब - करदाता खुद चुन सकेंगे, लेकिन नियम और शर्तें लागू। दूसरा अखबार लिखता है - चुनने की आजादी या उलझन? खुद गणित लगाइये, फिर टैक्स स्लैब चुनिए। तीसरे अखबार ने लिखा - बजट का सन्देश - जितना कमाओ पूरा खर्च करो। कल किसने देखा ! सरकार का दावा - मकसद आमदनी और खर्च बढ़ाना। अब बचत बंदी, नए स्लैब में बचत पर टैक्स छूट के रास्ते बंद, लेकिन पुराने स्लैब का विकल्प भी खुला। आप हर साल विकल्प बदल सकते हैं, धीरे-धीरे सभी कर छूट ख़त्म करने की तैयारी। चौथे अखबार ने लिखा - रेल सेक्टर को आवंटित राशि केवल आकड़ों का मायाजाल। अब तक का सबसे लंबा बजट भाषण भी आशा का संचार नहीं कर पाया।

मैं समझ नहीं पाया कि बजट अच्छा है या बुरा। पर एक बात साफ़ देखने को मिली कि शेयर बाजार के सेंसेक्स में बजट के दिन दस साल की सबसे बड़ी गिरावट (-) 987.96 अंकों की देखने को मिली अर्थात् बाजार को बजट नहीं भाया। वित्त मंत्री ने रोजगार और नौकरियों के कई सपने दिखाए हैं, पर उन्होंने न तो इनकी संख्या और न ही समय सीमा स्पष्ट की। एलआईसी और आईडीबीआई में सरकार अपनी हिस्सेदारी कम करेगी अर्थात् सरकारी परिसम्पत्तियाँ अब प्राइवेट हाथों में बेचेगी।

एक ज़माना था जब रेल बजट अलग दिन रेल मंत्री द्वारा पेश किया जाता था, पर अब रेल बजट मुख्य बजट में ही समाहित कर लिया जाता है। पूरा एक दिन रेल बजट पेश करने में लगता था, पर इस बार रेल के बारे में वित्त मंत्री कुछ मिनट ही बोलीं। एक अच्छी खबर बजट भाषण से सुनने को मिली - जमा बीमा की सीमा को एक लाख रुपये से बढ़ाकर पांच लाख कर दिया गया है।

इस सरकार की खासियत रही है कि बजट आवंटन में यह सरकार बहुत खुले हाथों वाली है, पर खर्चा करते समय अपनी मुट्ठी बंद कर लेती है। उदाहरण के लिए - पिछली बार के बजट में किसानों के लिए वित्त मंत्री ने एक लाख अड़तीस हजार करोड़ रुपये आवंटित किए थे, पर इसमें इस साल अभी तक इक्यावन प्रतिशत राशि खर्च नहीं हुई। ऐसे ही बहुत से मदों में आवंटित राशि से बहुत कम खर्च किया गया। यह बहुत ही चिंता की बात है। अल्पसंख्यक मामलात विभाग में कल्याण मद में आवंटित राशि का मात्र 30 प्रतिशत राशि ही खर्च की गयी। खाद्य प्रसंस्करण के बजट आवंटन का 57 प्रतिशत खर्च नहीं किया गया है। महिला सशक्तिकरण योजना में 1330 करोड़ रुपये आवंटन किया गया था, किन्तु इसकी लगभग 84 प्रतिशत राशि अभी खर्च की जानी शेष है। ये तो कुछ ही उदाहरण हैं। वित्त मंत्री की एक घोषणा के अनुसार हर जिलें में आयुष्मान भारत अस्पताल और जन औषधी केंद्र खुलेंगे। यह सुनकर ऐसा लगा कि अब हर जिले के एक सरकारी अस्पताल के नाम के साथ 'आयुष्मान भारत' पद का जुड़ाव हो जाएगा और बजट की इस घोषणा की अनुपालना बहुत ही आसानी से शत-प्रतिशत हो जाएगी।

बजट में की गयी घोषणाओं के अनुसार संक्षेप में -
- प्रदूषण से निबटने के लिए 4,400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
- बैंक भर्ती के लिए राष्ट्रीय एजेंसी बनेगी।
- आधार के साथ ही पैन कार्ड बनेगा।
- शिक्षा में एफडीआई आएगा।
- अब शीर्ष शिक्षा संस्थान ऑनलाइन डिग्री दे सकेंगे।
- फल-सब्जी का परिवहन विमान से होगा।
- रेफ्रिजरेटेड बोगी वाली किसान रेलगाड़ियां चलेगी।
- परिवहन के लिए छह हजार किलोमीटर लम्बे बारह हाईवे बनाए जाएंगे।
- एक पुरानी घोषणा को दुहराते हुए वित्त मंत्री ने दो साल की समय सीमा बढ़ाते हुए कहा कि 2025 तक 100 नए एयरपोर्ट बनाए जाएंगे।
- 1150 रेलगाड़ियां पीपीपी मॉडल पर चलेगीं।
- एक तरफ किसानों की आय दुगुनी करने का वादा पुनः दुहराया गया, पर कृषि बजट में केवल पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी।
- बजट में पेश नई आयकर व्यवस्था में आयकर दरें कम हैं, पर कई छूटें (रियायतें) अब नहीं मिलेंगी। 80 सी, 80 सीसीसी, 80 डी, स्टैण्डर्ड डिडक्शन जैसी अनेक रियायतें उन करदाताओं को नहीं मिलेंगी, जो आयकर के नए स्लैब का चयन करेंगे।
- कंपनियों के लिए पंद्रह प्रतिशत लाभांश वितरण कर समाप्त और अब लाभांश पर कर लाभांश पाने वाले को देना होगा।
- नई कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स पच्चीस प्रतिशत से घटाकर पंद्रह प्रतिशत और मौजूद कंपनियों के लिए तीस प्रतिशत से घटाकर बाईस प्रतिशत करने की घोषणा हुई।
- अखबारी कागज़ पर आयात शुल्क दस प्रतिशत से घटाकर पांच प्रतिशत किया गया।
- बजट भाषण में सोलर एनर्जी पर विश्वास व्यक्त करते हुए किसान की आय बढ़ाने और रेल पटरियों के दोनों ओर सोलर उपकरण लगाकर बिजली उत्पादन की बात कही गयी।
- कर परिहार (avoidance) को रोकने के लिए एनआरआई (NRI) की परिभाषा बदल दी गई है। बजट में उन लोगों पर शिकंजा कस दिया गया है जो अपनी अनिवासी स्थिति का अनुचित लाभ उठाकर आयकर से बचने की कोशिश करते हैं।

एक फरवरी 2020 को जब बजट आया, तब मेरी बेटी की नए बजट पर त्वरित टिप्पणी यह रही - "नए बजट के तीन प्रमुख विषय बताए गए हैं (i) महत्वाकांक्षी भारत, (ii) सभी के लिए आर्थिक विकास और (iii) देखभाल करने वाला समाज - यह एक अच्छा सैद्धांतिक ढांचा लगता है। लेकिन सवाल यह है कि वास्तविक कार्यान्वयन में इस रूपरेखा को कार्यान्वित कैसे किया जाता है। एक बात जो मुझे पसंद है, वह यह है कि एसडीजी 4 के लिए कुछ दिलचस्प योजनाएँ हैं, जिनमें डिग्री स्तर का पूरा ऑनलाइन शिक्षा कार्यक्रम शामिल है और शिक्षुता पर ध्यान केंद्रित किया गया है। कौशल बढ़ाने के बारे में भी बात की गयी है। नई कम आयकर दर का नियमन करना अच्छा लगता है, लेकिन संदेह है कि इससे किसी भी तरह की कर बचत होगी क्योंकि वेतनभोगी वर्ग को इसके लिए लगभग सभी कर छूटों को छोड़ना पडेगा, जैसे कि सेक्शन 80C, 80D आदि। हाँ, नयी कर दरों में 5 लाख तक की आय पर कोई कर नहीं है, जो यह सुनिश्चित करता है कि उस वर्ग में आने वाले लोगों के लिए यह एक खुशहाल संकेत है।"

आयकर पर मेरी टिप्पणी - "कानून ऐसे होने चाहिए जो समझने में आसान और जिनकी अनुपालना आसान हो। आयकर दरों को इतना जटिल बनाने की क्या जरुरत है? मेरी समझ में देश के लाखों घंटे इसी बात में बरबाद होंगे कि कौन सा आयकर दर पसंद किया जाए। 80C आदि के इंवेस्टमेंट्स में कमी आएगी, जिसका पैसा राष्ट्र हित और विकास कार्यों में उपयोग होता रहा है।"

वित्त मंत्री ने अब तक का सबसे लंबा बजट भाषण दिया। उन्होंने तमिल कवि तिरुवल्लुवर का जिक्र करते हुए कहा कि तिरुवल्लुवर कहते थे - "देश के लिए पांच चीजें जरूरी हैं। बीमारियां नहीं होनी चाहिए, संपत्ति होनी चाहिए, अच्छी फसलें होनी चाहिए, खुशी होनी चाहिए और सुरक्षा होनी चाहिए।" साथ ही उन्होंने कश्मीरी कवि दीनानाथ कौल 'नदीम' की नज्म पढ़ी - "हमारा वतन खिलते हुए शालीमार बाग़ जैसा, हमारा वतन डल झील में खिलते हुए कमल जैसा, नौजवानों के गर्म खून जैसा, मेरा वतन, तेरा वतन, हमारा वतन, दुनिया का सबसे प्यारा वतन !"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट से आशा की है कि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उन्होंने कहा - "जिन सुधारों का ऐलान किया है, वे अर्थव्यवस्था को गति देने, हर नागरिक को आर्थिक सशक्त बनाने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का काम करेंगे।" देखना है कि बजट अपना घोषित उद्देश्य पूरा कर पाता है या नहीं, इस पर संशय बहुत है।

- केशव राम सिंघल

(साभार स्रोत - राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर, राष्ट्रदूत, The Times of India)

शनिवार, 11 जनवरी 2020

नागरिकता और नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (CAA)


नागरिकता और नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 (CAA)

सामान्यता किसी भी देश की नागरिकता प्राप्त करने के चार प्रचलित आधार होते हैं - देश के नागरिक (स्त्री-पुरुष) की संतति, देश के भौगोलिक क्षेत्र में जन्म, एक निश्चित अवधि तक विधि सम्मत निवास और देश के नागरिक से विवाह। भारतीय संविधान में नागरिकता के बारे में भाग दो में धारा 5 से 11 तक सभी नियम दिए गए हैं। हमारे संविधान के अनुच्छेद 5 में नागरिकता के तीन स्पष्ट आधार लिखे गए थे। इसके अनुसार - 'इस संविधान के प्रारम्भ पर प्रत्येक व्यक्ति जिसका भारत के अधिक्षेत्र में अधिवास है और 1. जो भारत में जन्मा था, 2. जिसके माता या पिता में से कोई भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा था, या 3. जो ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले कम से कम पांच बरस तक भारत के राज्य-क्षेत्र में मामूली तौर पर निवासी रहा है। साथ ही धारा 6 में पाकिस्तान से भारत आने वालों को नागरिकता देने और धारा 7 में भारत से पाकिस्तान जाने वालों की नागरिकता की समाप्ति के नियम हैं। इसी के साथ धारा 8 में विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों को नागरिकता देने और धारा 9 में स्वेच्छा से दूसरे देशों की नागरिकता लेने वाले भारतीयों की नागरिकता रद्द करने के नियम हैं। धारा 10 में नागरिकता की निरंतरता के आधारों का निर्देश है। धारा 11 स्पष्ट करती है कि भविष्य में देश की नागरिकता के नियमों के बारे में संसद ही सर्वेसर्वा है।' इस प्रकार नागरिकता से सम्बन्धित प्रावधानों को भारत के संविधान के द्वितीय भाग के अनुच्छेद 5 से 11 में दिया गया है। प्रासंगिक भारतीय कानून नागरिकता अधिनियम 1955 है, जिसे नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1986, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1992, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2003 और नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश 2005 और नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के द्वारा संशोधित किया गया। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2003 को 7 जनवरी 2004 को भारत के राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकृति प्रदान की गयी और 3 दिसम्बर 2004 को यह अस्तित्व में आया। नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश 2005 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित किया गया था और यह कानून 28 जून 2005 को अस्तित्व में आया। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम बना और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह अधिनियम 10 जनवरी 2020 से अस्तित्व में आ गया है।

दिसंबर 2019 में बने नागरिकता संशोधन अधिनियम से केवल हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध,पारसी और ईसाई शरणार्थी लाभान्वित होंगे, जो अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आये और जिन्होंने 2015 से पहले भारत में शरण माँगी थी। इस अधिनियम के प्रावधानों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों और अन्य लोगों के साथ श्रीलंका के तमिल शरणार्थियों, म्यांमार के रोहिंग्याओं, चीन में धार्मिक कारणों से प्रताड़ित तिब्बती बौद्ध शरणार्थियों और सिक्यांग के मुस्लिम उग्यूओरों को शामिल नहीं किया गया। साथ ही पड़ौसी देशों में अंतर्धार्मिक हिंसा (शिया-सुन्नी-अहमदिया-कादियानी आदि), राजनीतिक उत्पीड़न (पख्तून, बलूच आदि) और सांस्कृतिक भेदभाव के कारण (मुहाजिर, बिहारी मुसलमान आदि) आए लोगों को शामिल नहीं किया गया। इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अफगानिस्तान, पाकिस्तान या बांग्लादेश से 31 दिसंबर 2014 तक आने वाले हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को अवैध शरणार्थी नहीं माना जाएगा। इनके खिलाफ घुसपैठ या नागरिकता को लेकर कोई कार्रवाई चल रही है तो नागरिकता देने के साथ वह कार्रवाई ख़त्म मानी जाएगी। इन्हे भारत में रहने के जरिये नागरिकता देने की न्यूनतम समय सीमा ग्यारह साल के बजाय पांच साल होगी। यह कानून छठी अनुसूची में शामिल असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के जनजातीय इलाकों में लागू नहीं होगा।

इस अधिनियम के विरुद्ध पूरे देश में विरोध का वातावरण है। एक ओर भाजपा-आरआरएस के लोग अधिनियम का समर्थन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पूरे भारत में विरोध के स्वर उठाने लगे। असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में रहने वाले लोग नहीं चाहते की किसी भी शरणार्थी या अप्रवासी को भारतीय नागरिकता दी जाए, चाहे उसका धर्म कोई भी हो। इन राज्यों में रहने वाले लोगों को डर है कि इससे उनके क्षेत्र में जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा होगा, जिससे उनके राजनीतिक अधिकारों, संस्कृति और भूमि पर बुरा प्रभाव पडेगा। इन राज्यों के लोग चिंतित हैं कि इस अधिनियम के कारण बांग्लादेश से बहुत अधिक प्रवासन होगा, जिससे असम समझौते का उल्लंघन होने की संभावना है। भारत के अन्य हिस्सों के लोग इस अधिनियम को धार्मिक भेदभाव वाले कानून के रूप में देखते हैं और इसे असंवैधानिक मानते हैं। ऐसे लोगों का स्पष्ट मत है कि केंद्र सरकार को इस अधिनियम को वापिस ले लेना चाहिए। वे इस कानून को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) से जोड़ कर देख रहे हैं। उनकी चिंता है कि इस अधिनियम के आने से हिंदूवादी सोच वाले अधिकारी मुस्लिम नागरिकों को निशाना बनाएंगे और आने वाले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) में बहुत से नागरिकों को नागरिकता से वंचित करेंगे। इस भ्रम का कारण केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का संसद में वह बयान था जिसमें उन्होंने कहा था कि एनआरसी आएगा।

संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 पेश होने के साथ ही असम में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे और बाद में पूरे भारत में फ़ैल गए। बिना किसी विशेष नेतृत्व के युवा छात्रों ने नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 का विरोध बड़े पैमाने पर किया। विरोध प्रदर्शन के दौरान अनेक जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर डंडे बरसाए और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। कई जगहों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ भी केस दर्ज करने की कुछ खबरें चिंता की बात है। कई लोगों को हिरासत में भी रखा गया। कुछ राज्यों में भाजपा की राज्य सरकारें नहीं हैं। ऐसे कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने घोषणा की है कि वे नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 और एनआरसी को अपने राज्यों में लागू नहीं करेंगे। असम में भाजपा के साथ सरकार चला रहा असम गण परिषद (अगप) भी नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को स्थानीय लोगों की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध कर रहा है।

यह अधिनियम व्यापक तौर से CAA के तौर पर जाना जाता है। यह अधिनियम नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों में संशोधन कर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से 31 दिसंबर 2014 को या इससे पूर्व आए हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाईयों (जो इन देशों में अल्पसंख्यक हैं) को धार्मिक उत्पीड़न की धारणा के तहत भारतीय नागरिकता देने का कानूनी प्रावधान है। इस अधिनियम में मुस्लिमों का उल्लेख नहीं है। इस अधिनियम में श्रीलंका से आए तमिल शरणार्थियों के लिए किसी लाभ का उल्लेख नहीं है, जो भारत में रह रहे हैं। इसी प्रकार रोहिंग्या मुस्लिनों, म्यांमार से आए हिन्दू शरणार्थियों और तिब्बत से आए बौद्ध शरणार्थियों आदि को इस विधेयक का लाभ नहीं मिलेगा।

इस विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि इस विधेयक में धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करने वाला प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए समानता के अधिकार के विरुद्ध है। सरकार का तर्क है कि यह विधेयक किसी की नागरिकता छीनने के लिए नहीं, धर्म के नाम पर प्रताड़ित शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए है। इस अधिनियम के आलोचकों का आरोप है कि यह अधिनियम भारत के मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का प्रयास करता है। आलोचकों का यह भी कहना है कि एनआरसी के तहत मुसलमानों को नागरिकता से वंचित किया जा सकता है, जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 अन्य धर्म (हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के लोगों को नागरिकता प्रदान करने में सक्षम होगा। असम में एनआरसी का कड़वा अनुभव हमारे पास है और वहाँ एनआरसी का प्रयोग विवादास्पद रहा। विधेयक का विरोध करने वालों का कहना है कि भारतीय संविधान मानवतावादी और सांप्रदायिकता विरोधी है। इसलिए प्रताड़ित हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई आदि को नागरिकता देने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन मुसलमान होने के नाते किसी को नागरिकता नहीं देना संविधान सम्मत नहीं है। क्या भारत मुस्लिम-निरपेक्ष देश है? हमारी बुनियाद सर्वधर्म समभाव है और 'वसुधैव कुटुम्बकम' की व्यापकता हमारे मूल में है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 से पहले नागरिकता कानूनों में कभी भी नागरिकता के लिए धार्मिक आधार नहीं रहा। ऐसा पहली बार हुआ कि धार्मिक आधार जोड़ा गया।

भारत की संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पारित कर नागरिकता अधिनियम 1955 संशोधित किया है। संशोधन लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित हो चुका है। संशोधित अधिनियम के अनुसार पाक, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले आए हिन्दू, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन को नागरिकता देने का प्रावधान है। इस नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 की वैधानिकता को संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 के विरुद्ध होने के कारण चुनौती दी गयी है और मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है।

जय हिन्द! जय भारत!

- केशव राम सिंघल

नोट - भारतीय नागरिक रजिस्टर (NRC) पर लेख यहाँ लिंक क्लिक कर पढ़े। आपकी राय का स्वागत है। धन्यवाद।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)


राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)

भारत के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में उन भारतीय नागरिकों के नाम हैं, जो असम में रहते हैं। असम भारत का पहला ऐसा राज्य है जिसके पास राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) है। इसे पहली बार भारत की जनगणना 1951 के बाद 1951 में तैयार किया गया था। असम में जनगणना के दौरान वर्णित सभी व्यक्तियों के विवरणों के आधार पर यह रजिस्टर तैयार किया गया था। असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को पिछली बार 1951 में अद्यतन किया गया था, उस समय असम में कुल 80 लाख नागरिकों के नाम इस रजिस्टर में पंजीकृत किए गये थे।

1979 में अखिल आसाम छात्र संघ (AASU) द्वारा अवैध आप्रवासियों की पहचान और निर्वासन की मांग करते हुए एक 6 वर्षीय आन्दोलन चलाया गया था। यह आन्दोलन 15 अगस्त, 1985 को असम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद समाप्त हुआ था।

बांग्लादेश की स्थापना 25 मार्च 1971 को हुई थी और भारतीय कानून में यह तय किया गया कि जो लोग असम में बांग्लादेश बनने के पहले (25 मार्च 1971 के पहले) आए थे और रह रहे हैं, केवल उन्हें ही भारत का नागरिक माना जाएगा।

नागरिकता हेतु प्रस्तुत लगभग दो करोड़ से अधिक दावों की जाँच पूरी होने के बाद न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के पहले मसौदे को 31 दिसंबर 2017 तक प्रकाशित करने का आदेश दिया गया था। इन दो करोड़ से अधिक दावों में से लगभग 38 लाख लोग ऐसे भी थे, जिनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावजों पर संदेह था या उनके दस्तावेजों में कुछ कमी थी या वे मांगे गए दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाए। 31 दिसंबर 2017 को बहु-प्रतीक्षित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का पहला ड्राफ्ट प्रकाशित किया गया। कानूनी तौर पर भारत के नागरिक के रूप में पहचान प्राप्त करने हेतु असम में लगभग 3.29 करोड आवेदन प्रस्तुत किये गए थे, जिनमें से कुल 1.9 करोड़ लोगों के नाम को ही इसमें शामिल किया गया है।

असम एक सीमावर्ती राज्य होने के नाते असम में अवैध आव्रजन की अनूठी समस्याएं रहती हैं। 1951 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर 1951 में राज्य के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) बनाया गया था। लेकिन बाद में इसका उचित रख-रखाव नहीं किया गया। 1983 में अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम को संसद द्वारा पारित किया गया था ताकि असम में अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए एक अलग न्यायाधिकरण प्रक्रिया बनाई जा सके। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में इसे असंवैधानिक करार दिया, जिसके बाद भारत सरकार ने असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अद्यतन करने पर सहमति व्यक्त की। एक दशक में अद्यतन प्रक्रिया पर असंतोषजनक प्रगति के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में प्रक्रिया का निर्देशन किया और उस पर निगरानी शुरू की। असम के लिए अंतिम अद्यतित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित हुई, जिसमें 3.3 करोड़ आबादी में से 3.1 करोड़ नाम थे, जिसमें लगभग 19 लाख आवेदक शामिल थे अर्थात् लगभग 19 लाख लोग रजिस्टर में अपना नाम नागरिक के तौर पर नहीं लिखवा सके।

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को पूरे भारत में लागू करने का वादा किया है, लेकिन असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। अब भी यह आशंका है कि कई वैध नागरिक बाहर रह गए, जबकि अनेक अवैध प्रवासी शामिल हो गए।

पिछले दिनों फेसबुक पर दीपक असीम की एक पोस्ट दिनांक 16 अक्टूबर (लिंक - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1276148229226680&id=100004945449390) पढ़ने को मिली, जो यह कहती है कि एनआरसी हमारी बहुत बड़ी गलती है। आप यह पोस्ट फेसबुक पर पढ़ सकते हैं, फिर भी जागरूकता के लिए इसके कुछ अंश नीचे दिए जा रहे हैं -

"मृणाल तालुकदार, असम के जाने-माने पत्रकार, ने अपनी सारी जवानी असम से घुसपैठियों को निकालने की मुहिम में लगा दी हो और अंत में वही निराश होकर कहे कि हमने एक पागलपन में जिंदगी बर्बाद कर दी। एनआरसी पर इनकी लिखी किताब 'पोस्ट कोलोनियल असम' का विमोचन' चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने दिल्ली में किया था । इनकी दूसरी किताब,जिसका नाम है - 'एनआरसी का खेल' कुछ दिनों बाद आने वाली है। वह एनआरसी मामले में केंद्र सरकार को सलाह देने वाली कमेटी में भी नामित हैं। वे आल असम स्टूडेंट यूनियन (आसु) से जुड़े रहे।

उन्होंने कहा - मेरी और मेरे जैसे हजारों लोगों की जवानी असम से घुसपैठियों को निकालने कि आंदोलन की भेंट चढ़ गई। हममें जोश था, मगर होश नहीं था। पता नहीं था कि हम जिनको असम से बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, उन्हें किस तरह पहचाना जाएगा और उन्हें बाहर करने की प्रक्रिया क्या होगी। 1979 में हमारा आंदोलन शुरू हुआ और 1985 में हम ही असम की सरकार थे। प्रफुल्ल महंत हॉस्टल में रहते थे हॉस्टल से सीधे सीएम हाउस में रहने पहुंचे। 5 साल कैसे गुजर गए हमें पता ही नहीं चला। राजीव गांधी ने सही किया कि हमें चुनाव लड़ा कर सत्ता दिलवाई। सत्ता पाकर हमें एहसास हुआ कि सरकार के काम और मजबूरियां क्या होती हैं। अगला चुनाव हम हारे मगर 5 साल बाद फिर सत्ता में आए। इन दूसरे 5 सालों में भी हमें समझ नहीं आया कि बांग्लादेशियों को पहचानने की प्रक्रिया क्या हो। लोग हमसे और हम अपने आप से निराश थे। मगर घुसपैठियों के खिलाफ हमारी मुहिम जारी थी। बहुत बाद में हमें इसकी प्रक्रिया सुझाई भारत के होम सेक्रेटरी रहे गोपाल कृष्ण पिल्लई ने। उन्होंने हमें समझाया कि आप सब की नागरिकता चेक कराओ। अपने आप की भी नागरिकता चेक कराओ और जो रह जाएं वह बाहरी।

चोर को पकड़ने के लिए क्लास रूम में सभी की तलाशी लेने वाला यह आइडिया हमें खूब जँचा, मगर तब नहीं मालूम था कि सवा तीन करोड़ लोग जब कागजों के लिए परेशान इधर-उधर भागेंगे तब क्या होगा? बाद में रंजन गोगोई ने कानूनी मदद की और खुद इसमें रुचि ली। इसमें असम के एक शख्स प्रदीप भुइँया की खास भूमिका रही। वे स्कूल के प्रिंसिपल हैं उन्होंने ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और अपनी जेब से 60 लाख खर्च किए। बाद में उन्हीं की याचिका पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट एनआरसी के आदेश दिए एक और शख्स अभिजीत शर्मा ने भी एनआरसी के ड्राफ्ट को जारी कराने के लिए खूब भागदौड़ की। तो इस तरह एनआरसी वजूद में आया और वजूद में आते ही हम सब सोचने लगे कि यह हमने क्या कर डाला?

खुद हमारे घर के लोगों के नाम गलत हो गए। सोचिए कैसी बात है कि जो लोग घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, उन्हीं के घर वालों के नाम एनआरसी की लिस्ट में नहीं आएं? बहरहाल यह गलतियां बाद में दूर हुईं। बयालीस हज़ार कर्मचारी 4 साल तक करोड़ों कागजों को जमा करते रहे और उनका वेरिफिकेशन चलता रहा। आसाम जैसे पागल हो गया था। एक एक कागज की पुष्टि के लिए दूसरे राज्य तक दौड़ लगानी पड़ती थी। जैसे किसी के दादा 1971 के पहले राजस्थान के किसी स्कूल में पढ़े तो उसे दादा का स्कूल सर्टिफिकेट लेने के लिए कई बार राजस्थान जाना पड़ा। लोगों ने लाखों रुपया खर्च किया। सैकड़ों लोगों ने दबाव में आत्महत्या कर ली। कितने ही लाइनों में लगकर मर गए। कितनों को ही इस दबाव में अटैक आया दूसरी बीमारियां हुई। मैं कह नहीं सकता कि हमने अपने लोगों को कितनी तकलीफ दी। और फिर अंत में हासिल क्या हुआ? पहले चालीस लाख लोग एनआरसी में नहीं आए। अब 19 लाख लोग नहीं आ रहे हैं। चलिए मैं कहता हूं अंत में पांच लाख या तीन लाख लोग जाएंगे तो हम उनका क्या करेंगे? हमने यह सब पहले से नहीं सोचा था। हमें नहीं पता था कि यह समस्या इतनी ज्यादा मानवीय पहलुओं से जुड़ी हुई है। मुझे लगता है की हम इतने लोगों को ना वापस बांग्लादेश भेज सकेंगे न जेल में रख सकेंगे और ना ही इतने लोगों को ब्रह्मपुत्र में फेंका जा सकता है। ....." (साभार - दीपक असीम की फेसबुक पोस्ट दिनांक 16 अक्टूबर 2019 - https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1276148229226680&id=100004945449390)

केंद्र सरकार पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लाने की बात कर रही है, जबकि उसे असम का अनुभव हो चुका है। असम के अनुभव के बाद देश के गृह मंत्री अमित शाह संसद में कहते हैं कि अब पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लाया जाएगा। लगता है कि सरकार अपने ही नागरिकों को डराने की बात सोच रही है। यदि कोई नागरिक अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं जुटा पाया तो उसका क्या होगा? क्या उसे यह देश छोड़ना होगा? वह कहाँ जाएगा? ऐसे बहुत से अनुत्तरित प्रश्न हैं, जो भारतीय नागरिकों के मन में डर पैदा कर रहे हैं।

वे चाहते हैं कि नागरिकों को डरते रहना चाहिए
और
साथ ही उन्हें व्यस्त भी रहना चाहिए।

नागरिकों का डरते रहना और व्यस्त रहना
बढ़ती बेरोजगारी
और
बिगड़ती अर्थव्यवस्था में कैसे होगा?
यह
'नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर'
को पूरे देश में लागू कर आसानी से किया जा सकेगा।

लोग रजिस्टर में अपना नाम लिखाने के लिए
डरते रहेंगे,
डाक्यूमेंट्स ढूंढने में व्यस्त रहेंगे
और
लाइनों में खड़े रहेंगे,
इस प्रकार
रोजमर्रा के मुद्दे भूल जाएंगे।

राज्यसभा में नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित हो जाने के बाद देश के विभिन्न भागों में नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन प्रारम्भ हो गए। इसका मुख्य कारण संभवतः 11 दिसंबर 2019 को राज्यसभा में गृहमंत्री की वह घोषणा रही, जिसमें उन्होंने कहा कि एनआरसी आएगा। गृह मंत्री के बयान के बाद लोगों में डर पैदा हुआ कि यदि एनआरसी लागू हुआ तो दस्तावेजों की अनुपलब्धता और जांच प्रक्रिया की खामियों की वजह से करोड़ों लोगों की नागरिकता छिन सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने इस सम्बन्ध में कहा कि देश में एनआरसी नहीं लाया जा रहा है, पर गृह मंत्री अमित शाह के बयानों ने भ्रम पैदा किया। नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के खिलाफ देश भर में फैले विरोध को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार 22 दिसंबर 2019 को आयोजित भाजपा की रैली में पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम से भारत के किसी मुस्लिम नागरिक को कोई खतरा नहीं हैं और जहाँ तक राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का सवाल है तो अभी तक सरकार ने इसका कोई खाका ही नहीं खींचा है। प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री के संसद में दिए बयान पर कोई टिप्पणी भी नहीं की और यह भी नहीं कहा कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर नहीं आएगा। देशभर में सरकार द्वारा अखबारों में दिए विज्ञापन (स्रोत - दैनिक नवज्योति, दिनांक 24 दिसंबर 2019) में यह कहा गया है कि यह गलत अफवाह है कि ऐसे दस्तावेज जिनसे नागरिकता प्रमाणित होती हो, उन्हें अभी जुटाने होंगे अन्यथा लोगों को निर्वासित कर दिया जाएगा। साथ ही विज्ञापन में सरकार की ओर से भरोसा दिलाया गया कि किसी राष्ट्रव्यापी एनआरसी की घोषणा नहीं की गई है। अगर कभी इसकी घोषणा की जाती है तो ऐसी स्थिति में नियम और निर्देश ऐसे बनाए जाएंगे ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को परेशानी न हो। प्रधानमंत्री का बयान और सरकार द्वारा अखबारों में दिए विज्ञापन से ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने फिलहाल कुछ समय के लिए एनआरसी के विषय को त्यागने का मानस बनाया है। लेकिन आगे क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में है। दिनांक 4 फरवरी 2020 को लोकसभा में मोदी सरकार की तरफ से एक बयान आया, जिसमें कहा गया है कि देशभर में एनआरसी नहीं लागू होगा। संसद सत्र के चौथे दिन लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने जवाब दिया कि सरकार ने एनआरसी को लेकर अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। अभी देश भर में एनआरसी लागू करने का कोई विचार नहीं है।

जय हिन्द! जय भारत!

- केशव राम सिंघल
(नोट - लेख का अंतिम पैरा बाद में जोड़ा गया।)

(अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास, चाहे वे आपके विचारों से भिन्न ही क्यों ना हों .... पाठकों की टिप्पणी का स्वागत है, पर भाषा शालीन हो, इसका निवेदन है।)

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

*गांधीजी*


*गांधीजी*

गांधीजी को सशरीर मैंने देखा नहीं। मेरा जन्म 1951 में हुआ था और गांधीजी की ह्त्या मेरे जन्म से पहले 30 जनवरी 1948 को हुई थी। वैसे भी गांधीजी को सशरीर देखने वाले लोग अब बहुत कम होंगे। आजादी के बाद जन्म लेने वाले लोगों के लिए गांधीजी एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं। एक विचार और एक दर्शन के रूप में गांधीजी को हमने पढ़ा है। मूर्तियों, स्मारकों, चित्रों, लाठी और चश्मे जैसे प्रतीकों से गांधीजी की पहचान हमसे कराई जाती रही। गांधीजी के विचारों का भारतीय समाज और इसकी मिली-जुली, साझा संस्कृति से गहरा और न टूटने वाला रिश्ता रहा है। गांधीजी ने अपने जीवनकाल में अपने विचारों को बोलकर या लिखकर अभिव्यक्त किया। उनका बोला और लिखा साहित्य पचास हजार पृष्ठों से भी अधिक का है।

गांधीजी भारत को आतंरिक भेदभावों से मुक्त कर आजाद मुल्क में समानता, समान अवसर और समान हैसियत वाले समाज की संरचना का सपना देखा करते थे। वे महिलाओं को बराबरी का हक़ और सम्मान देने के पक्ष में थे। वे धार्मिक घृणा-द्वेष का अंत चाहते थे। वे छुआछूत और गैर-बराबरी की कालिख से मुक्ति चाहते थे। आज भी गांधीजी एक विचार और एक दर्शन के रूप में पूरे विश्व में छाए हुए हैं।

इतिहास के कुछ गिने-चुने व्यक्तियों में से गांधीजी एक ऐसी शख्सयत थे, जिन्होंने नैतिक, धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मोर्चों पर एक साथ अहिंसक लड़ाईयाँ लड़ी। वे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किए जाते हैं, जिनके बारे में विश्व की लगभग सभी भाषाओं में सबसे अधिक लिखा गया है और लिखा जा रहा है। गांधी जी आज भी प्रासंगिक हैं। अहिंसा पर उनके विचारों के कारण ही संयुक्त राष्ट्र ने गांधीजी के जन्मदिन दो अक्टूबर को 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' घोषित किया है।

इतिहास गवाह है कि अधिकतर सत्ताधीश तानाशाह बल और हिंसा द्वारा अपने अस्तित्व और अपनी सत्ता को बचाए रखने की कोशिश करते रहे हैं। बल और हिंसा के उलट गांधीजी ने जीवन के सभी पहलुओं में अहिंसा और नैतिकता का उपयोग करना सिखाया। गांधीजी के अनुसार, "प्राणीमात्र के प्रति समभाव या अनुकूल भाव न रखना हिंसा है। .... किसी का खून करना यह तो हिंसा है ही, किन्तु किसी मनुष्य के श्रम का नाजायज लाभ उठाना भी हिंसा है। .... किसी का बुरा होने की इच्छा करना भी हिंसा है।" वे कहते थे, "अहिंसा के बिना सत्य ढूंढना असंभव है। अहिंसा साधन है। साधन सदा अपने हाथ में होता है। उसका उपयोग करने का दायित्व हम पर होता है।"

1909 में जब गांधीजी लन्दन से अफ्रीका समुद्र के रास्ते जहाज से यात्रा कर रहे थे, तब उन्होंने गुजराती में 'हिन्द स्वराज' नामक एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी। 110 वर्ष पुरानी इस पुस्तिका में व्यक्त विचार आज भी उपयोगी और प्रासंगिक लगते हैं। वे कहते थे, "हमारा उद्देश्य चाहे कितना भी महान हो, लेकिन उसे प्राप्त करने का तरीका अगर गलत हो तो उसका परिणाम अवश्य दुःखदायी होगा।" 'हिन्द स्वराज' पुस्तक द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है, हिंसा की जगह बलिदान की बात रखती है और पशुबल से मुकाबला करने के लिए आत्मबल को महत्व देती है।

दकियानूसी विचारों की वजह से बहुत से लोग पुरानी परम्पराओं को बिना सोचे-समझे अपना लेते हैं और उनमें ऐसे फंस जाते हैं कि उन परम्पराओं के अलावा उन्हें बाहर की दुनिया दिखती नहीं। इस सम्बन्ध में चेतावनी देते हुए गांधीजी अपने विचार रखते कि परम्परा के पानी में तैरना अच्छी बात है, लेकिन उसमें डूब जाना आत्महत्या है। इस प्रकार हम देखते हैं कि दकियानूसी विचारों को गांधीजी ने मान्यता नहीं दी, इसके उलट गांधीजी आधुनिक विचारों के प्रणेता रहे।

गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका के अपने प्रवास के दौरान दासता और दमन की जंजीरों के बीच 'स्वतंत्रता और स्वाभिमान' का पाठ सीखा, जिससे उनमें आत्म-बोध और आत्म-बल उत्पन्न हुआ। 1919 में जलियांवाला बाग़ में हो रही विरोधसभा में अंग्रेजों के अत्याचार और नरसंहार ने गांधीजी की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया था और उसके बाद वे समूचे स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर संभाल खुलम-खुल्ला स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में कूद पड़े थे।

गांधीजी के विचार और विचारधारा हर जगह लागू हो सकते हैं, जीवन में और प्रशासन में, लेकिन दुःख है कि ऐसा नहीं हो रहा। गांधीजी की विचारधारा में निरंतरता है और एक ऐसे समय में जब असहिष्णुता और चरमपंथी विचारधाराएं सामने दिख रही हैं, पूरी दुनिया में गांधीजी के विचारों की स्वीकार्यता बढ़ रही है।

- केशव राम सिंघल