शनिवार, 27 अगस्त 2022

कथा-श्रृंखला - हमारी अम्मा और पड़ौस की चाची की चौपाल - 2

कथा-श्रृंखला - हमारी अम्मा और पड़ौस की चाची की चौपाल

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लेखक - केशव राम सिंघल

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ये अखबारवाला भी अजीब है, कभी तड़के पाँच बजे अखबार डाल जाता है तो कभी आठ बजे। चाची को अखबार पढ़ने का मौक़ा तभी मिल पाता है यदि अखबार सुबह जल्दी आ जाए। घर के और सभी देर से उठते हैं और एक बार उठ गए तो उनकी चीख-पुकार से घर में कोहराम मचा रहता है।  कभी यह करो तो कभी वो करो। समय ही नहीं मिलता अखबार पढ़ने का। वैसे भी अखबार में पिछले दिन की खबर पढ़ने को मिलती है और पढ़ने में देरी कर दी तो फिर बासी खबर और बासी हो जाती है, फिर बासी खबर पढ़ने के बाद दूसरों को सुनाने का मजा नहीं रहता। आज तो चाची को सुबह-सुबह अखबार पढ़ने को मिल गया और जल्दी-जल्दी उन्होंने अखबार पढ़ ही डाला। अखबार पढ़ने के बाद चाची सोचने लगी की आज तो इस खबर से मेरी धाक जम ही जाएगी। सुबह से ही चाची सोच रही थीं कि ये सब बातें वे अम्मा जी को बताएँगी जो उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से सम्बंधित एक खबर में पढ़ी है और ऐसी जानकारी हैं, जो अम्मा जी ने कभी सुनी ना होगी। खबर पढ़ने के बाद चाची अपना लैपटॉप खोलकर बैठ गईं, पता नहीं क्या कर रहीं थीं। दोपहर में जब वक्त मिला तो  चाची ने अम्मा जी को बताया - भाभी, जानती हो अंतरराष्ट्रीय पलायन के मामले में भारत सबसे आगे हैं।

 


अम्मा की उम्र हो गई अस्सी से ज्यादा, वैसे तो बोलने सुनने में ठीक हैं पर कई बार कोई शब्द अनसुना रह जाता है उम्र का तकाजा हो शायद। पलायन शब्द उन्होंने सुना या नहीं सुना मुझे नहीं मालूम, पर अम्मा ने पूछा - वो कैसे? छोटी तू कई बार बात घुमा फिरा के कहती है। सीधे-सीधे बता कि कोई मैडल जीता है क्या हमारे देश ने?

 

चाची ने कहा - नहीं अम्मा, कोई मैडल की बात नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के जनसंख्या विभाग ने इंटरनेशनल माइग्रेशन रिपोर्ट 2020 में बताया था कि अंतरराष्ट्रीय आबादी के पलायन के मामले में भारत के प्रवासियों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। एक जानकारी के अनुसार 2017 में एक लाख तेतीस हजार से अधिक,  2018 में एक लाख चौंतीस हजार से अधिक, 2019 में एक लाख चवालीस हजार से अधिक, 2020 में पिचासी हजार से अधिक, और 2021 में 9 दिसंबर 2021 तक एक लाख ग्यारह हजार से अधिक लोगों  ने भारतीय नागरिकता छोड़कर विदेशी नागरिकता ले ली है।  

 

अम्मा जी को चाची की बात में रूचि होने लगी तो उन्होंने कहा - एक ज़माना था, जब दूसरे देशों के लोग भारत आकर बसते थे और अब भारत से लोग दूसरे देशों में जाकर बसते हैं। पहले भारत सोने की चिड़िया थी और अब तो आर्थिक हालत अच्छे नहीं हैं। अच्छा, छोटी, एक बात बता कितने विदेशियों ने 2017 से अब तक भारत की नागरिकता ग्रहण की है?

 

चाची कहने लगीं - मुझे पता था आप यह सवाल जरूर पूछोगी। मैं भी चालाक हूँ यह सब जानकारी गूगल गुरूजी से खोजकर लाई हूँ। साल 2010 से 2019 तक दस साल में इक्कीस हजार से अधिक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी गई, जिसमें पंद्रह हजार बांग्लादेशी भी शामिल हैं।

 

अम्मा जी ने कहा - दस साल में केवल इक्कीस हजार विदेशियों, जिसमें भी बांग्लादेशी अधिक हैं, ने भारत की नागरिकता ली है और एक साल में एक लाख से अधिक भारतीयों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी। यह सब बताता है कि लोग भारत को अब महफूज जगह नहीं मानते।

 


अम्मा जी की बात सुनकर चाची ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा - अम्मा, क्या खराबी है यहाँ। सब कुछ मिले है। बोलने की आजादी, घूमने-फिरने की आजादी, नारे लगाने की आजादी, आजादी ही आजादी, सब कुछ है यहाँ, फिर भी लोग अपना देश छोड़ विदेश में बस रहे हैं। अम्मा मेरा बस चले तो ऐसे लोगों को कभी भारत आने का वीसा भी ना दूँ, एक बार भारत की नागरिकता छोड़ी तो छोड़ी। तुम तुम्हारे नए देश में रहो, हम अपने देश में। जय हिन्द, जय भारत।

 

चाची की बात सुनकर अम्मा जी ने दार्शनिक अंदाज में कहा - छोटी, तेरे को गुस्सा बहुत जल्दी आ जावे है। नागरिकों का पलायन तो सदियों से होता रहा है। यह इंसानों की प्रवृति होती है। जब नागरिकों को अपनी जगह उचित रोजगार, व्यवसाय या नौकरी नहीं मिलती तो वह दूसरी जगह जाने की सोचता है। अब देख ना, पड़ौस में मिश्रा जी का बेटा नौकरी के खातिर पुणे गया है ना और गुज्जु हलवाई की पोती तो अमेरिका गई है।

 

अम्मा जी की बात से सहमति जताते हुए चाची बोलीं - अम्मा, आप बात तो सही कहे हो। फिर उन्होंने एक प्रश्न भी पूछ लिया - अच्छा, अम्मा जी, एक बात बताओ, इस बार जनगणना नहीं होगी क्या? पिछली जनगणना 2011 में हुई थी और इस बार 2021 में होनी थी, जिसके लिए 2020 में ही सरकार ने तैयारी कर ली थी, पर सारा मामला कोरोना की महामारी की वजह से स्थगित हो गया।

अम्मा जी को जितनी जानकारी थी, वह बताते हुए उन्होंने कहा - सरकार खुद चाहती है कि जनगणना का कार्य जल्द पूरा कर लिया जाए। मार्च 2022 में ही सरकार ने जनगणना नियमों में संशोधन किया है। सरकार डिजिटल माध्यम से जनगणना कार्य में तेजी लाएगी। मुझे सुदर्शन बता रहा था कि कोई भी नागरिक खुद डिजिटल माध्यम का उपयोग कर जनगणना अनुसूची भर सकेगा और जमा करा सकेगा। अब देखो, कब शुरू होता है यह काम?

 

अम्मा जी की बात सुनकर चाची कहने लगीं  - आपने अच्छी बात बताई। पिछली बार पड़ौस के अग्रवाल साहब और उनकी पत्नी का नाम 2011 की जनगणना में नहीं शामिल हो पाया था, क्योंकि दोनों कुछ दिनों के लिए विदेश गए थे और जो भी सरकारी कर्मचारी जनगणना के लिए आया होगा, उसने लिख दिया होगा कि यहाँ नहीं रहते। अब कम् से कम ऐसे लोग अपना नाम जनगणना में शामिल कर पाएंगे।

 

अम्मा - सो तो अच्छा है।

 

तभी सब्जी वाला उधर से निकला तो अम्मा और चाची घर वालों को यह बताने कि सब्जीवाला आया है, सब्जी खरीद लो, अपने-अपने घर में घुस गईं और इस तरह चौपाल समाप्त हुई।

 

यह कथा-श्रृंखला, पाठको को समर्पित है। आप पढ़े, आनंद लें, टिप्पणी करें, दूसरों को पढ़ाएँ, अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा करें। स्वागत है आपके सुझावों का और टिप्पणियों का।

 

कल्पना और तथ्यों के घालमेल से लिखी यह कथा-श्रृंखला रुचिकर लगेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।


सभी चित्र प्रतीकात्मक - साभार इंटरनेट 

 

कथा-श्रृंखला - हमारी अम्मा और पड़ौस की चाची की चौपाल - 1

 कथा-श्रृंखला - हमारी अम्मा और पड़ौस की चाची की चौपाल

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लेखक - केशव राम सिंघल

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कथा-श्रृंखला के किरदार

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- अम्मा जी

- चाची

- लेखक

- शैलबाला

- सुमन मामी

- सरोज बुआ

- गुल्लू

- इनु

- अम्मा जी का बड़ा बेटा

- अम्मा जी के बड़े बेटे की पत्नी दर्शना

- चाची के पति

- तिरंगा बेचने वाला युवा

- भार्गव आंटी

- सुरुचि

- राजरानी

- चाची का बेटा मुन्ना

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कुछ और किरदार जो भविष्य में आएँगे।

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लेखन - जुलाई 2022 से प्रारम्भ हुआ।

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मैं जब बच्चा था, तब बड़ों से कहानी सुनता था। अक्सर सोने से पहले। कभी परियों की कहानी, कभी किसी राजा-रानी की कहानी, कभी चूहे-शेर की कहानी, कछुए-खरगोश की कहानी, कभी ये कहानी, कभी वो कहानी। कहीं किसी की अम्मा कहानी सुनाती थीं तो कहीं दादी, दादा, मौसी, बुआ, या कोई और पर कहानी सुनने-सुनाने का प्रचलन खूब था। जब भी कहानी सुनने-सुनाने का वक्त आता तो बच्चे घेर लेते थे, कहते - दादी कहानी सुनाओ,,,,, दादी, ये तो पुरानी है, आपसे कई बार सुन ली, नई कहानी सुनाओ ,,,,,,,,,, क्या वही पुरानी कहानी सुना रही हो ,,,,,, अब कोई ना तो कहानी सुनता है, और ना ही कोई कहानी सुनाता है। अब कहानी सुनने-सुनाने का वक्त तो रहा नहीं। हाँ, लिखने और पढ़ने में आज भी कहानी ज़िंदा है।

 

राजा-रानी तो अब इतिहास हो गए हैं और उन्हें इतिहास में ही पढ़ा जाए तो अच्छा रहेगा। परियाँ सपनों की दुनिया में रहती हैं, उनकी कहानी में वास्तविकता नहीं होती, इसलिए कहने-सुनने में मजा नहीं। अब तो जीवंत विषयों पर कहानी लिखने-पढ़ने सुनने-सुनाने का वक्त है और यही सोचकर कि जो कहानी आसपास है उसे ही सुनाया जाए या लिखा जाए तो उसे सुनने या पढ़ने में आनंद आएगा।

 


अब मैं शुरू करता हूँ अपने आसपास की कहानी। ऐसी कहानी जो देश, काल, समाज, परिवार, घर, आप, मैं, नेता, अभिनेता, राजनीति, खेल, व्यवसाय आदि की बात करेगी, जिसके विविध पक्ष होंगे। कहानी का कथानक आपको रुचिकर लगेगा, तो कभी आप कहेंगे कि ऐसा नहीं, ऐसा होता, खैर कहानी तो कहानी है लेखक का कथानक विस्तृत हो इसकी भरपूर कोशिश होगी।

 

हमारी अम्मा और पड़ौस की चाची जब भी समय मिलता है आपस में बातें करती हैं और बातें भी अपने घर के दरवाजे पर करती हैं। कभी-कभी तो हमारे मोहल्ले के दूसरे घरों की औरतें भी बातों में शामिल हो जाती हैं। ज्यादातर तो वे दोपहर की नींद निकालने के बाद साढ़े तीन-चार बजे चाय पीते-पीते करती हैं। कभी-कभार वे एक दूसरे के घर भी चली जाती हैं। अम्मा और चाची कभी भी किसी के घर बिना रोक-टोक आती-जाती हैं। उनकी उम्र के कारण सभी उन्हें आदर देते हैं। क्या दिन हो या रात वे भी सभी की सहायता के लिए उपलब्ध रहती हैं। उनकी बातचीत के विषय विस्तृत होते हैं। वे बातचीत स्वास्थ्य, शिक्षा, राजनीति, संस्कृति, आर्थिक हालातों, पास-पड़ौस की घटनाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय विषयों पर करती हैं। एक विशेष बात उनकी बातचीत में दिखा करती है कि उनमें से कोई भी कभी आपको सरकार के समर्थन में दिखेंगी तो कभी सरकार के विरोध में। कभी कोई एक दूसरे का साथ देंगी तो कभी किसी की बातें एक दूसरे का विरोध करेंगी। उनकी बातें मौहल्ले की चर्चा का विषय भी होती हैं। लोग बात करते हैं कि आज अम्मा जी ने क्या कहा, चाची ने क्या कहा और किसने क्या कहा। मैं भी अकसर उनकी बातें सुना करता हूँ या किसी से पता लगाता हूँ कि आज क्या हुआ। आज के जमाने में अधिकतर औरतें सीरियल देखने के लिए अपने घरों में टीवी के सामने बैठी दिखती हैं और पास-पड़ौस में औरतों की बातचीत आजकल देखने-सुनने को नहीं मिला करती है, जो चालीस-पचास साल पहले तो हुआ करती थीं, पर हमारे मोहल्ले में तो यह अभी भी जीवित है। और इसका श्रेय हमारी अम्मा और हमारे पड़ौस की चाची को जाता है, जो न केवल पढ़ी-लिखी हैं बल्कि बालिका शिक्षा में उनका जीवन पर्यन्त योगदान रहा है। दोनों ही शिक्षा विभाग से सेवानिवृत अध्यापिका रही हैं। हमारी अम्मा की उम्र बहत्तर साल और चाची की उम्र छियासठ साल है। आस-पड़ौस के सभी लोग हमारी अम्मा को अम्मा जी और पड़ौस की चाची को चाची कहते हैं, पर हमारी अम्मा चाची को छोटी कहकर सम्बोधित करती हैं। कभी कभी उनकी बात अधूरी रह जाती है। कभी कभी वे बातों ही बातों में गूढ़ बातें कह देती हैं। गाँवों-मोहल्लों में चौपाल वहाँ के जीवन का हिस्सा थी। वहीं सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक बातें हुआ करती थीं। हाल के वर्षों में चौपाल अतीत की बात हो गई हैं, पर हमारे मोहल्ले में यह अभी भी ज़िंदा है।

 


ऐसा नहीं है की केवल हमारे मोहल्ले में औरतें ही बातें करती हैं। आदमी लोग भी बातें करते हैं, पर वे कभी-कभार ही करते हैं। हमारे मोहल्ले में औरतों की तो यह दैनिक दिनचर्या है। बच्चे तो अपनी पढ़ाई और खेल में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें वक्त ही नहीं मिलता गप-शप करने का। मोहल्ले में मैं ही एक ऐसा बुजुर्ग हूँ, जिसकी उम्र चाची से पांच-छह साल कम ही है और चलने-फिरने के हिसाब से मैं चुस्त-दुरुस्त हूँ। कुछ समय पहले हमारे मोहल्ले के कोने वाले मकान में एक दादा जी अपने परिवार के साथ रहते थे। वे काफी सामाजिक थे। हमारे शहर में जल-वितरण अनियमित रहता है। नलों में पानी दो दिन में एक बार केवल एक घंटे के लिए आता है, पर उसका भी कोई निश्चित समय नहीं, ऐसे में दादा जी मोहल्ले के सभी घरों में एलान करते फिरते कि पानी आ गया है, भर लो। उन्हीं से मोहल्ले के लोगों को पता चलता था आज बिजली कितने समय गुल रहेगी। वे नियमित रोज अखबार पढ़ते थे। उन्हें शहर, देश, विदेश के साथ-साथ पूरे मोहल्ले की खबर रहती थी कि कौन आया कौन गया। मुझे तो उनसे बहुत ही फ़ायदा था। मैं दिन में एक बार उनसे जरूर मिलता था। पिछले दिनों उनका देहावसान हो गया तो उनकी कमी हमारा पूरा मोहल्ला महसूस करता है। दादा जी के देहावसान के बाद से मैं दिन में एक बार अम्मा जी के पास हो आता हूँ। वे ज्यादातर बाहर बरामदे में बैठी रहती हैं मुढ्ढे पर या अपनी चारपाई पर। कोई भी मिलने आए, आते ही उसे एक इलायची पकड़ा देती हैं। चाची से भी बात होती है पर कभी कभार। उनसे हुई बातचीत से बहुत सी बातें पता चलती हैं। वैसे एक और बुजुर्ग भी हैं मोहल्ले में, वे पास के मकान में ही रहते हैं, पर वे अक्सर बीमार रहते हैं और उन्हें लोगों से ज्यादा मतलब नहीं रहता। अब दादा जी की कमी तो मैं पूरी नहीं कर सकता, फिर भी विभिन्न मामलो पर मोहल्ले के लोगों से संवाद कायम करने की कोशिश करता हूँ। जब भी मैं लोगों की बातें सुनता हूँ, कोई खबर पढ़ता हूँ या किसी घटना को देखता हूँ तो तरह -तरह के विचार मेरे मन में आते हैं। ये विचार कभी-कभी मैं सोशल मीडिया के माध्यम से व्यक्त कर देता हूँ, किसी से कह देता हूँ या कभी-कभी नहीं भी करता हूँ। मुझे लगा कि रोजमर्रा की हमारे मोहल्ले की बातों और मन में आए विचारों को कलमबद्ध कर लिया जाए तो अच्छा रहेगा। और इसी तरह शुरू हुई यह कथा-श्रृंखला, पाठको को समर्पित है। आप पढ़े, आनंद लें, टिप्पणी करें, दूसरों को पढ़ाएँ, अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा करें। स्वागत है आपके सुझावों का और टिप्पणियों का।


कल्पना और तथ्यों के घालमेल से लिखी यह कथा-श्रृंखला रुचिकर लगेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। 

सभी चित्र प्रतीकात्मक - साभार इंटरनेट


 

बुधवार, 29 जून 2022

अतीत के मोती - एक लेखक - एक कहानी : पैसठ-सत्तर साल पहले लिखी एक कहानी - पुराना आदमी

अतीत के मोती - एक लेखक - एक कहानी

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पैसठ-सत्तर साल पहले लिखी एक कहानी -

पुराना आदमी

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उस दिन एक लम्बे अरसे के बाद गांगुली बाबू ने अपना वह कोट निकाला, जो तह करके पेटी में रख दिया गया था। पेटी में रखे-रखे उसमें शिकनें पड़ गयी थी। वह कोट उन्होंने पंद्रह वर्ष पहले, जब वह हरिद्वार की यात्रा पर गये थे, बीस रुपये में बना-बनाया खरीदा था।  उस कोट से वह कई सर्दियाँ काट चुके थे। सर्दियों के दिनों में वह कोट हमेशा उनके तन पर रहता था। जब जाड़े बीत जाते, तो उसे ता करके पेटी में रख दिया जाता।

 

हमेशा की तरह पिछली सर्दियों के ख़त्म होने पर उन्होंने यह कोट धुलवाकर पेटी में रख दिया था। लेकिन इन सर्दियों के आने से पहले ही उन्हें दफ्तर से अवकाश प्राप्त हो गया था। इसलिए वह कोट, जो जाड़े के दिनों में दफ्तर जाने के समय उनके शरीर पर होता, पेटी से निकाला ही नहीं गया था, जैसे अब उन्हें  उसकी आवश्यकता ही न पडी हो। किन्तु उस दिन उन्हें अपनी बिदाई की पार्टी में सम्मिलित होना था, इसलिए दफ्तर जाने से पहले वह अपना पुराना कोट पहने बिना नहीं रह सके। 

 

पहले हमेशा जब वह इसी प्रकार दफ्तर जाने के लिए तैयार बैठे रहते, श्रीमती गांगुली उन्हें पान का बीड़ा लाकर थमाती, और उनका पोता आकर उनकी टांगों से लिपट जाता और अपनी कोमल, मधुर भाषा में उन्हें उनका वादा याद दिलाते हुए कहता, बाबा, मेरे लिए मिठाई लाना न भूलना। और वह प्यार से बच्चे का मुँह चूमकर, मुस्कराकर कहते, हाँ-हाँ, बेटा, जरूर मिठाई लाऊँगा। और वह अपने काम पर चले जाते। 

 

उस दिन भी वह दफ्तर जाने की तैयारी में बैठे हुए थे। श्रीमती गांगुली हमेशा की तरह उनके लिए पान का बीड़ा बनाकर लाईन और एक तश्तरी में उनके सामने रख दिया। उन्होंने एक नजर उस पान के बीड़े की तरफ देखा, और फिर देखते ही रह गये। फिर उनकी नजरें कमरे में चारों ओर घूम गयीं कि कहीं से नटखट गोपाल निकल आय और उनके पैरों में लिपट जाय, वादा याद दिलाये और जिद करे। आज वह जीवन में अंतिम बार दफतर जा रहे हैं, आज वह उससे बहुत बड़ा वादा करेंगे, उसके लिए बहुत-सारी मिठाइयाँ लायेंगे। ,,,,,,, किन्तु उनकी नजरें चारों ओर भटक कर रह गयी। गोपाल कहीं भी नजर नहीं आया, न कहीं से उसके रोने-चिल्लाने की आवाज ही आती सुनाई दी। श्रीमती गांगुली ने टोका, तो अचानक उन्हें ख्याल आया, मैं भी कितना बड़ा बेवकूफ हूँ ! जिस गोपाल को आँखे यहां ढूँढ रही हैं, वह तो अपने बाप के साथ अलग रहता है। काश, उनका बेटा अलग न होता, बहु यही रहती , गोपाल यही रहता, गोपाल का बाप यही रहता, यह घर वीरान न होता। 

 

उन्होंने अपनी जेब घड़ी में समय देखा, सवा चार बज रहे थे। पाँच बजे उन्हें दफ्तर पहुँच जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें बिदाई की पार्टी ठीक पाँच बजे दी जाने वाली थी।

 

वह जाने के लिए उठ खड़े हुए। तभी श्रीमती गांगुली उनसे बोली - अजी, क्या आज यह पुराना कोट पहनकर जाना आपके लिए जरूरी है?

 

- क्यों? - उनके मुँह से निकला और उन्होंने एक नजर अपने कोट पर डाली।  फिर बोले - क्या तुम्हें यह कोट अच्छा नहीं लगता? यह तो वही पुराना कोट है, जिसे मैं हमेशा सर्दियों में पहनकर दफ्तर जाया करता था।

 

- अब यह बहुत पुराना हो गया है।

 

- मैं भी तो अब बहुत पुराना हो गया हूँ। ,,,,,, क्या नया कोट पहन लेने से मैं नया आदमी बन जाऊँगा? - और वह जाने कैसी हँसी हँस पड़े।

 

- नहीं मैं यह नहीं कहती। ,,,, आज आप काम पर थोड़े ही जा रहे हैं, आप तो पार्टी में जा रहे हैं। क्या यह जरूरी है कि आप उसी पुराने कोट में जायँ ? वही पुराना कोट और वही पुरानी छतरी ! भला संध्या के समय भी कोई छतरी लेकर चलता है और अभी सर्दी भी कहाँ शुरू हुई हैं ! इस कोट और छतरी के बिना क्या लोग आपको पहचानने में भूल कर बैठेंगे?

 

गांगुली बाबू हँसे। शांतिपूर्वक बोले - हाँ, भाई, यह भी हो सकता है। अगर अपनी पुरानी वेश-भूषा में नहीं गया, तो संभव है, मेरे साथी मुझे पहचानने में भूल कर बैठे। किरानी बनकर कभी दफ्तर में गया था, और किरानी ही रहकर आज वहाँ से निकल भी रहा हूँ। जो पहले था, सो अब भी हूँ। ऐसे पहनावे में जाने से कोई मानहानि की बात नहीं। मैं तो पहचाना ही इन्हीं कपड़ों में जाता हूँ। 

 

इतना कहकर वह धीरे-धीरे घर से बाहर निकल आये, गृहिणी पीछे-पीछे आयी और द्वार के निकट खड़ी हो उन्हें जाते देखती रही।

 

जब वह दफ्तर पहुँचे, तो उनके साथियों ने उन्हें बड़े आदर और श्रद्धा से लिया। उन्होंने उनको चारों ओर से घेर लिया और समाचार पूछने लगे। गांगुली बाबू ने अपने आपको फिर उसी वातावरण में पाया, जहाँ से अलग होने के बाद उनकी हालत किसी ऐसे राजनीतिक कैदी जैसी हो गयी थी, जिसे उसके साथियों से विलग कर किसी एकांत कोठरी में डाल दिया गया हो। इसलिए वह भी उनसे मिलकर बहुत खुश हुए। ,,,,, ज़रा देर बाद बड़े साहब भी आ गये। वही बिदाई पार्टी के सभापति थे।

 

सभा की कार्रवाई आरम्भ हुई। गांगुली बाबू को एक मान पत्र भेंट किया जा रहा था। मान-पत्र उनके एक पुराने मित्र पढ़ रहे थे। उस पत्र में उनका संक्षिप्त परिचय था और उनके कामों की चर्चा थी, जो उन्होंने अपनी चालीस वर्ष की नौकरी में वहाँ अंजाम दिए थे। उस पत्र में उनके उस सरल स्वभाव, सचाई, सहयोग और मित्रता का वर्णन था, जिसके नाते वह सबके दिलों में जगह बना चुके थे। वह बड़े ही भले आदमी कहलाते थे। अपनी चालीस वर्ष की नौकरी में वह कभी अपने किसी साथी से नहीं झगड़े थे, कभी किसी के खिलाफ उन्होंने कोई शिकायत नहीं की थी। वह हमेशा अपने साथियों की हर तरह से मदद करते थे। उन्होंने जैसे अपने आपको एक अच्छा आदमी बहाने का प्रयत्न किया था, वैसे ही अपने साथियों के बीच भी एक हमदर्दी का वातावरण पैदा कर दिया था। वह जब क्लर्क बनकर उस दफ्तर में आये थे, एक बड़े ही गरीब और तंगहाल आदमी थे। दिन-भर काम करते थे और अफसरों की झिड़कियाँ सुना करते थे। वह उन दिनों के कटु अनुभव अपने मन से कभी नहीं भुला पाए थे। 

 

इसी बीच जब उनकी शादी हुई थी, घर की चिंता बढ़ गयी थी। गृहस्थ जीवन के झंझटों ने उन्हें दिन-रात परेशान कर रखा था। तब भी दफ्तर को उन्होंने सबके ऊपर रखा जैसे दफ्तर उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग हो।

 

उनके सहयोगी मान-पत्र में उनकी बड़ी तारीफ़ कर रहे थे, उनकी सचाई, साहस और सरलता की प्रशंसा कर रहे थे। गांगुली बाबू सब कुछ सुन रहे थे। उनका माथा झुका हुआ था, और मित्र के मुख से निकले प्रशंसा के शब्द उनके कानों में करुण संगीत की तरह गूँज रहे थे। 

 

उन्हें याद है। एक बार एक साहब ने उन्हें 'नानसेंस' कह दिया था, तो वे गुस्से में फाइलें मेज पर पटककर साहब से अपने शब्द वापस लेने के लिए उसके स्वरों से भी अधिक तेज स्वर में चीखने लगे थे। सारे दफ्तर में एक हंगामा-सा मच गया था। और आखिर साहब को 'सारी' कहकर अपने शब्द वापस लेने ही पड़े थे। उस समय गांगुली बाबू ने सोचा था, मनुष्य परिस्थितियों में घिर कर कभी पराजय मान लेता है, किन्तु जब उसका आत्माभिमान उसे उकसाता है, तो वह गुलामी के वातावरण के होते हुए भी विद्रोह कर बैठता है। जिस मनुष्य में विद्रोह का कुछ अंश नहीं, वह कायर है, जीना उसके लिए निरर्थक है।

 

उनके मित्र उनके बारे में बहुत-कुछ कहते जा रहे थे। सुन-सुनकर गांगुली बाबू को ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे वे एक बहुत बड़े आदमी हैं और दफ्तर के वह एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। अब उनके वहाँ से चले जाने के बाद उन जैसा कोई दूसरा आदमी नहीं रह गया है, जो दफ्तर में अपना सर ऊँचा कर बैठ सक। उन्होंने एक नजर अपने सभी साथियों की ओर देखा और मन ही मन सोचने लगे, उनमें और मुझमे क्या अंतर है? ,,,,, कुछ भी तो नही।  मैं उम्र-भर किरानी रहा हूँ और आज एक किरानी से भी गया गुजरा हूँ। तब मैं कैसे बड़ा बन गया? वह सोचने लगे, क्या एक मेरे न होने से दफ्तर का काम रुक गया है? नहीं, वही दफ्तर है और कर्मचारी भी वही। काम सलीके से चल रहा है। इसलिए मेरे होने या न होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। न तो मैं पहले कभी बड़ा आदमी था और न अब हूँ, और न कभी बन सकूँगा। मुझ में कोई ऐसी खूबी नहीं है, जो मुझे बड़ा बना दे। साठ वर्ष का बूढ़ा हो चुका हूँ। चालीस वर्ष इसी दफ्तर में बिताएं हैं। जिंदगी में कोई बड़ा काम नहीं किया। आज मुझे मेरे साथियों ने आमंत्रित किया है। आज इनका स्नेह मुझे यहाँ बाँध लाया है। यह जो मेरी प्रशंसा कर रहे हैं, यह तो इन्हीं की बड़ाई है, इन्ही के मन की श्रद्धा है। इन्हीं की दृष्टि ऊँची है, जो मुझे मंच पपर बैठकर मुझे श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। 

 

जब मान-पत्र का पढ़ना समाप्त हुआ, तो बड़े साहब कुर्सी पर से उठ खड़े हुए।  उन्होंने गांगुली बाबू की प्रशंसा करते हुए सबको यह बताया कि वह कितने सीधे और मन लगाकर काम करने वाले व्यक्ति थे। वह फार्म के बहुत पुराने और अच्छे सेवक थे। दफ्तर का सारा स्टाफ उनकी अनुपस्थिति सदा अनुभव करता रहेगा। उनके प्रति सारा स्टाफ श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भगवान् से उनके स्वास्थ्य के लिए कामना और दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। 

 

साहब ने अंत में उन्हें एक जेब-घड़ी भेंट की और कहा - यह एक छोटी-सी भेंट मैं स्टाफ की ओर से इन्हें भेंट करता हूँ। आशा है इसे स्वीकार कर गांगुली बाबू हमें अनुगृहीत करेंगे और इसके निमित्त हम सबको बराबर याद करते रहेंगे। 

 

गांगुली बाबू ने वह घड़ी अपने दोनो हाथों में ले ली। सारे साथियों ने जोर से तालियाँ बजायी। साहब बैठ गयेऔर गांगुली बाबू धन्यवाद के रूप में दो शब्द कहने के लिए खड़े रह गये।

 

एक बार उन्होंने अपने सभी साथियों की ओर देखा और सोचने लगे कि क्या बोलूँ? ,,,,, ये दोस्त, मित्र और साथी, कल मैं उनमें से एक था और आज से नहीं रहूँगा। यह जिंदगी कितनी अजीब है ! इसे न जाने कितने अलग-अलग रास्तों पर चलना पड़ता है। इसकी मंजिल का कोई पता नहीं। ,,,,,,,,, मैं अपने साथियों से क्या बोलूँ?

 

सभी साथी उनके मुँह की ओर देख रहे थे, देखते रहे, और फिर उन्होंने देखा, गांगुली बाबू की आँखों से टप-टप आँसू झड़ रहे हैं। ,,,,,, गांगुली बाबू मुँह से कुछ नहीं बोले, और वह दोनों हाथों से सबको प्रणाम करते हुए कुर्सी पर बैठ गये।

 

उनके साथी शायद गांगुली बाबू की आँखों की भाषा समझ गये थे, क्योंकि उनकी आँखों में भी आँसू भर आये थे। 

 

- गुरुबचन सिंह

(सितम्बर 1958 में नई दिशा प्रकाशन, जमशेदपुर से प्रकाशित कहानी संग्रह 'नीम की निबौलियाँ' से साभार)

 

बीसवीं सदी के लेखक गुरुबचन सिंह

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शमशेदपुर निवासी गुरुबचन सिंह ने बीसवीं सदी के छठे दशक में कई कहानियाँ लिखीं, जिसका एक संग्रह "नीम की निबौलियाँ" अपने समय में काफी चर्चित रहा। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से भारतीय सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं का वर्णन किया। उनकी भाषा सरल और स्पष्ट वर्णन करती है। लेखक के बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है। संभवतः जमशेदपुर के मित्र कुछ और जानकारी दे सकें तो कृपया साझा करें।

 

धन्यवाद,

केशव राम सिंघल