शुक्रवार, 20 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 7

 कोरोना काल के संस्मरण - 7 


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मजदूरों का पैदल महाप्रयाण और व्यवस्था की दरारें


24 मार्च की रात आठ बजे घोषणा हुई और केवल चार घंटे बाद ही देश थम गया। इस 'थमे हुए देश' में जो सबसे तेज़ गति से चला, वह था 'बेबस मजदूर'। हजारों-लाखों प्रवासी श्रमिक अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए, सिर पर गृहस्थी की पोटली रखे, हजारों किलोमीटर के सफर पर पैदल ही निकल पड़े। उनके लिए न तो रोज़गार बचा था, न ही छत की गारंटी। परिवहन के सारे साधन—रेल, सड़क, वायु—बंद थे।


हमारी सोसायटी के घरों में अखबारों का वितरण थम चुका था, इसलिए खबरों के लिए ई-पेपर और टीवी ही मेरा सहारा थे। बरेली में मजदूरों पर केमिकल छिड़काव की खबरें हों या बिहार में उन्हें जेल भेजे जाने की बेबसी—हर सूचना मन को विचलित कर रही थी। अनुमानतः दस करोड़ प्रवासी मजदूरों को जैसे व्यवस्था ने उनके हाल पर छोड़ दिया था। एक ओर केंद्र सरकार ने जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत आवंटित किया, वहीं ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने बीस प्रतिशत तक का प्रावधान किया था।


उत्तर प्रदेश और दिल्ली राज्य सरकारों के बीच समन्वय का अभाव और एक-दूसरे पर दोषारोपण ने इस मानवीय संकट को और गहरा कर दिया। केंद्र का 'जहाँ हैं वहीं रुकें' का आदेश और राज्यों की 'घर वापसी' की आधी-अधूरी तैयारी के बीच मजदूर पिसता रहा। 30 मार्च आते-आते विभिन्न राज्यों से उठता हुआ यह जनसैलाब राजनीति का मोहरा बन गया। उन मजदूरों के पैरों के छाले दरअसल हमारे तंत्र की विफलता के गवाह थे।

 

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सृजन का सम्बल और 'भीलवाड़ा मॉडल' की धमक


अहमदाबाद के उस फ्लैट में स्थितियाँ विकट थीं, पर मैंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। नकारात्मक खबरों के बीच मन को शांत रखने के लिए मैंने कई लघु-कथाएँ और कहानियाँ लिखीं, फेसबुक और अपने ब्लॉग पर साझा किया। उस दौर में पढ़ना और लिखना ही मेरे लिए 'क्वालिटी टाइम' की एक छोटी सी खिड़की थी।


इसी दौरान मेरे गृह-राज्य राजस्थान से एक आशा की किरण दिखी—'भीलवाड़ा मॉडल'। तत्कालीन जिलाधीश राजेंद्र भट्ट और मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मुश्ताक खान के नेतृत्व में भीलवाड़ा ने जो 'महाकर्फ्यू' और 'स्क्रीनिंग' का साहस दिखाया, वह पूरे देश के लिए नज़ीर बन गया। 24 लाख लोगों की स्क्रीनिंग करना कोई साधारण बात नहीं थी। जब देश कोरोना संक्रमण से लड़ना सीख ही रहा था, तब भीलवाड़ा प्रशासन ने अपनी सीमाएं सील कर वायरस को वहीं रोकने का अभूतपूर्व प्रयास किया।


मार्च 2020 का अंत आर्थिक और कानूनी मोर्चों पर भी उथल-पुथल भरा था। वित्तीय वर्ष 2019-20 के समापन पर केंद्र सरकार ने 'अनुपालन' (Compliance) की तारीखें आगे बढ़ाईं, जिससे आम आदमी को थोड़ी राहत मिली। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि शेल्टर होम का प्रबंधन पुलिस नहीं, बल्कि स्वयंसेवक करें और वहां 'शक्ति' का प्रयोग वर्जित हो। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के वे शब्द आज भी कानों में गूँजते हैं कि गाँवों की ओर लौटते हर दस में से तीन मजदूर संक्रमित हो रहे थे। यह एक ऐसी लड़ाई थी जहाँ दुश्मन अदृश्य था और डर साक्षात।


उस समय की एक लघु कथा - राजा की मुनादी - सभी होशियार रहें !

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सभी जगह सन्नाटा पसरा है। राज्य में राजा ने मुनादी करवा दी है कि जो जहां है, उसी जगह रुक जाए। कोई आना जाना नहीं। एक भयंकर सूक्ष्म जीवाणु निकला है घूमने। जो उसके रास्ते में आएगा, उसका वह काल बन जाएगा।

सूक्ष्म जीवाणु स्वतंत्र घूम रहा है और प्रकृति पर विजय की चाह रखने वाला अहंकारी मानव अपने घरों में कैद है। हा ... हा ... हा ...!

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मन में कैदी-जेलर द्वंद्व और सेवाभाव को सलाम


अहमदाबाद के उस फ्लैट में रहते हुए मुझे कभी-कभी लगता था कि मैं स्वयं की कैद में हूँ। वह फ्लैट मेरा जेलखाना बन गया था, जहाँ मैं ही कैदी था और मैं ही जेलर। मेरा मन कैद को छोड़कर भाग जाना चाहता था, पर विवेक का जेलर उसे सुरक्षा के नाम पर वापस पकड़ लेता था।


इस कठिन समय में 'डिजिटल इंडिया' का एक वरदान रूप सामने आया। शिव्या घर की ज़रूरतें और दवाइयाँ ऑनलाइन ऑर्डर कर देती थी। रात नौ बजे से पहले किया गया ऑर्डर अगली सुबह दरवाज़े पर टंगे थैले में मिल जाता था। दूधवाला हो या डिलीवरी बॉय, ये वे 'अदृश्य कोरोना योद्धा' थे जो अपनी जान हथेली पर रखकर हमें जीवन की सुगमता दे रहे थे। इन सेवाभावियों को मेरा शत-शत नमन।


परंतु, हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं था। उसी दौरान 'लाइव हिन्दुस्तान' की एक रिपोर्ट पढ़कर मन कराह उठा। नोएडा से जालौन तक 200 किलोमीटर का सफर पैदल तय करने वाली एक 8 माह की गर्भवती महिला की कहानी व्यवस्था की विफलता और मानवीय जिजीविषा का चरम थी। ठेकेदार द्वारा पैसे रोके जाने के कारण उन्हें निकलने में देरी हुई, फिर भी दो दिन-रात पैदल चलकर वे अपने गाँव पहुँचे। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि उस अवस्था में उस महिला ने किन परिस्थितियों का सामना किया होगा।


इन विचलित करने वाली खबरों के बीच मैंने तय किया कि समय का सदुपयोग किया जाए। एक प्रोफेशनल होने के नाते मैंने ISO 9001:2015 QMS Awareness पर एक निःशुल्क ऑनलाइन ट्रेनिंग कोर्स शुरू करने का निश्चय किया। अपने ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी साझा की और ट्रेनिंग मटेरियल तैयार करने में जुट गया। आपदा के उस सन्नाटे में 'सृजन' ही मेरा संबल बना। ट्रेनिंग मटीरियल, आवश्यक सम्प्रेषण और असाइनमेंट मैं ईमेल से भेजता था। ट्रेनर-ट्रेनी के बीच बातचीत का माध्यम WhatsApp था। इस ट्रेनिंग में देश के विभिन्न भागों से लोगों ने भाग लिया। एक ट्रेनी तो विदेश (Phillipines) से भी था। 


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विचलित मन, विसंगतियां और 5 अप्रैल की वह रोशनी


अहमदाबाद के सरखेज सर्कल के पास उस एकांत सोसाइटी में मेरा जीवन घर की दीवारों तक सिमट गया था। शिव्या ही बाहरी दुनिया और सोसाइटी के वॉट्सएप्प ग्रुप की खबरों का मेरा एकमात्र सेतु थी। मन बाहर टहलने को मचलता, पर अंततः घर के भीतर ही टहलकदमी कर शांत हो जाता।


खबरों का संसार उस समय हृदय विदारक था। आंध्र प्रदेश में एक पिता का अपने मासूम बेटे के शव को कंधे पर रखकर 88 किलोमीटर पैदल चलना व्यवस्था की शून्यता को दर्शाता था। जहाँ एक ओर साधन संपन्न लोग पान जैसी मामूली चीज़ों के लिए कंट्रोल रूम को परेशान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर हजारों किलोमीटर दूर से ठेला चलाकर घर लौटते मजदूरों की दास्ताँ मानवता की परीक्षा ले रही थी। सरकार ने हरिद्वार में फंसे श्रद्धालुओं को तो बसों से घर पहुँचाया, पर सड़कों पर पैदल चलते उन बेबस मजदूरों के लिए समन्वय की भारी कमी दिखी।


उसी दौरान हमारे दूधवाले का फोन आया। उसने पूछा कि क्या हमें और अधिक दूध चाहिए? उसकी बातों से पता चला कि लॉकडाउन ने ग्रामीण दूध व्यवसाय की कमर तोड़ दी थी। ग्राहकों के न मिलने और परिवहन ठप होने से दूध वाले औने-पौने दामों पर दूध बेचने को मजबूर थे। यह देखना दुःखद था कि जहाँ शहरों में लोग दूध के लिए परेशान थे, वहीं गाँवों में पशुपालकों का निवेश मिट्टी में मिल रहा था।


इन नकारात्मकताओं के बीच मैंने अपना 'डिजिटल मोर्चा' संभाला। फेसबुक पर "तालाबंदी के दौरान की कविता" समूह बनाकर कवियों को एक मंच दिया। उधर, प्रकृति ने अपनी छटा बिखेरनी शुरू की—प्रदूषण मुक्त हवा के कारण जालंधर से हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दिखने लगीं और गंगा का पानी आचमन योग्य हो गया।


5 अप्रैल 2020 की रात ठीक 9 बजे, प्रधानमंत्री के आह्वान पर हमने भी अपनी रसोई की खिड़की पर नौ दीये जलाए। मन में एक तार्किक प्रश्न जरूर उठा कि क्या इन दीयों से वायरस भागेगा? पर जब खिड़की से बाहर देखा, तो हर घर से आती वह रोशनी उस सामूहिक संकल्प और अकेलेपन के विरुद्ध एक युद्ध जैसी लग रही थी। वह दीया वायरस मारने के लिए नहीं, शायद उम्मीद को जीवित रखने के लिए था।


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कृतज्ञता के नौ दीये, घर की कैद और व्यवस्था का द्वंद्व


5 अप्रैल 2020 की रात ठीक नौ बजे, हमने नौ दीये जलाए। वे केवल रोशनी नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रार्थना थी। पहला दीया देश और समाज कल्याण के लिए था, तो अन्य दीये स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों, पुलिस, मीडिया, दूधवालों और बैंक कर्मचारियों की सलामती के लिए थे। अंतिम दीया अपनों और मित्रों की कुशलता के लिए समर्पित था।


उस समय केवल लोग ही नहीं, बीमा कंपनियाँ भी इस वायरस से सहमी हुई थीं। उन्हें चिंता थी कि निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर आने वाले लाखों के बिल उनके बजट को बिगाड़ देंगे। भय ऐसा था कि लोग पूरी तरह घरों में कैद थे। मैं भी 19 मार्च से अहमदाबाद में शिव्या के साथ था। वह दिनभर एक कमरे में ऑफिस का काम करती और मैं दूसरे कमरे में रहता। मेरा वह 10x10 वर्गफुट का कमरा ही मेरी दुनिया थी। शिव्या मुझे घर का काम नहीं करने देती थी, पर मैं मन बहलाने के लिए कभी मेथी-पालक साफ़ कर देता, कभी सब्जी काट देता या आटा गूँथ देता। बर्तन धोने की तो सख्त मनाही थी। घर से बाहर निकलना वर्जित था, इसलिए मैं कमरे से हॉल तक ही चहल-कदमी करता। मेरा 'हैंड-बैंड' रोज़ाना लगभग 6000 कदम दर्ज करता था—यही मेरा एकमात्र व्यायाम था।


एकांत के उन दिनों में जयपुर से मित्र ओम प्रकाश स्वर्णकार का फोन आना या बेटियों से वीडियो कॉल पर बात करना सुकून देता था। उधर, वैश्विक स्थिति भयावह थी। अप्रैल के प्रारंभ तक लाखों संक्रमित हो चुके थे, पर शीर्ष नेता किसी अंधेरे कमरे में उस 'काली बिल्ली' को ढूंढ रहे थे जो वहाँ थी ही नहीं। भारत में 4 अप्रैल तक केवल 75 हज़ार टेस्ट हुए थे, जबकि अमेरिका और जर्मनी लाखों में जाँचें कर रहे थे। 'सीआईआई' की रिपोर्ट 52 प्रतिशत नौकरियों के जाने का खतरा जता रही थी।


डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने 'राष्ट्रदूत' में सटीक लिखा था कि यह 'साँप-सीढ़ी' का खेल बन गया है, जहाँ एक चूक हमें वापस नीचे पटक देती है। 5 अप्रैल की रात को लेकर समाज बँटा हुआ था। किसी ने इसे 'नीरो के बंशी बजाने' जैसा बताया, तो किसी ने पटाखों के शोर पर व्यंग्य किया। विडंबना देखिए—देश में लोग ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे थे और कुछ लोग दीये के नाम पर पटाखे फोड़कर जश्न मना रहे थे। किसी ने चुटकी ली कि हनुमान जी की तरह हम भी अति-उत्साही भक्त हैं—प्रभु ने दीया जलाने को कहा और हमने लंका फूँकने जैसा माहौल बना दिया।


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टोटकों का देश, कड़वा सच और लॉकडाउन का अनंत विस्तार


उस दौर के भारीपन को कम करने के लिए हास्य-व्यंग्य ही एक सहारा था। उन दिनों मैंने एक कविता लिखी, जो उस समय के सामूहिक मनोविज्ञान को दर्शाती थी -


टोटकों वाला देश है मेरा


टोटकों वाला देश है मेरा, 

टोटका करने में क्या जाता है मेरा?

जब दिखता नहीं कोई रास्ता, 

तब टोटका जोड़ देते हैं बचाव का वास्ता।


विश्व में हमारे देश का नाम है, 

हमारी अनूठी परम्पराओं की अलग पहचान है।

टोटकों से बनती हमारी अपनी आन-बान-शान है, 

लगता है टोटकों से बचेगी हमारी जान है।


कोरोना से बचना है तो, बार-बार हाथ धोना सीख ले,

लोगों से दूर एकांत में अकेला रहना सीख ले।

बचाव का अभी तक कोई टीका बना नहीं, 

बचना है तो ताली-थाली बजाना सीख ले,

खुद अंधेरे में दीया जलाना सीख ले।


जान ले, कोरोना ने बहुतों को मारा है, 

अब संक्रमण से बचना ही एकमात्र सहारा है।

रास्ता कोई और दिखता नहीं, 

टोटका भी एक सहारा है।


लिखने-पढ़ने की इस व्यस्तता ने मुझे सुस्ती और मानसिक बोझ से बचाए रखा। मुझे बरसों से 'नकसीर' (नाक से खून आने) की समस्या थी, जिससे मेरी तीनों बेटियाँ सदैव चिंतित रहती थीं। पर मैंने स्वयं को ISO 9001 QMS Awareness ट्रेनिंग प्रोग्राम में पूरी तरह झोंक दिया था। ट्रेनिंग मटेरियल तैयार करना और देश-विदेश से आए प्रतिभागियों के असाइनमेंट जाँचना—यही मेरी दिनचर्या थी। बस दुःख एक ही था कि उस 10x10 के कमरे वाले फ़्लैट से बाहर कदम रखना मुमकिन न था।


वैश्विक परिदृश्य भी कम विचित्र न था। शक्तिशाली अमेरिका अपने नागरिकों को विमान भरकर भारत से निकाल रहा था। उधर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी चिर-परिचित आदत के अनुसार 'हाइड्रोक्लोरोक्वीन' दवा के निर्यात को लेकर भारत को धमकी भरे लहजे में चेतावनी दे रहे थे। हमारी 'वसुधैव कुटुम्बकम' की संस्कृति ने उस दबाव को भी झेला और व्यापक मानवीय जरूरतों को देखते हुए निर्यात से रोक हटा ली।


समाज का एक कड़वा सच यह भी दिखा कि इस महामारी की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी। विडंबना देखिए—संक्रमण अमीर लाए, जो विदेश यात्राओं से हवाई जहाज में बैठकर आए थे और जिन्होंने क्वारंटाइन नियमों का पालन नहीं किया था, पर तोहमत उन गरीबों पर मढ़ी गई जो सड़क पर पैदल चलने को मजबूर थे। वाराणसी की वह हृदय विदारक घटना जिसमें एक पत्नी को अपने पति की अर्थी के लिए चार कंधे तक नसीब नहीं हुए और उसे स्वयं मुखाग्नि देनी पड़ी, यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के टूटने का चरम था।


15 अप्रैल से ट्रेनों के चलने की एक धुंधली सी आस थी, पर 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने राज्यों की सिफारिश पर लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया। इसके बाद यह सिलसिला थमा नहीं—1 मई को इसे 17 मई तक और फिर 17 मई को इसे 31 मई तक बढ़ा दिया गया। पूरा देश लाल, नारंगी और हरे ज़ोन में बँट चुका था। 'अजमेर वापसी' का सपना अब तारीखों के इस जाल में कहीं उलझ कर रह गया था।


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बेबसी और 'गुड्डी'  


अहमदाबाद की गर्मी मुझे अजमेर से कहीं अधिक प्रतीत हुई, पर सौभाग्य से फ्लैट के दोनों कमरों में एसी (AC) होने के कारण शारीरिक राहत मिली। मन तो बार-बार अजमेर के बंद घर की ओर भागता, पर लॉकडाउन की बंदिशों और बच्चों की जायज़ झिड़कियों के आगे मैं विवश था। उनकी अपनी मजबूरियाँ थीं और बाहर के हालात भी अनुकूल नहीं थे।


इसी बीच जून 2020 में एक ऐसी पारिवारिक खबर आई जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। मेरी छोटी दिव्यांग बहन सुधा (गुड्डी), जो 60 वर्ष की थी और जयपुर के पैतृक मकान में भाई मोहन के साथ रहती थी, के सीने में 'ब्रेस्ट ट्यूमर' का पता चला। पूरा देश कोरोना से लहूलुहान था और उसी दौरान गुड्डी के कैंसर की स्थिति गंभीर बताई गई। 22 जून 2020 को जयपुर स्थित भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल में उसका टेस्ट हुआ और दुर्भाग्य से वह कोरोना पॉजिटिव भी पाई गई।


23 जून को भाई मोहन और महेश उसे लेकर सीतापुरा स्थित महात्मा गाँधी हॉस्पिटल (MGH) पहुँचे। वहाँ एक अजीब प्रशासनिक बाधा आई; शाम तक उसका नाम कोरोना मरीजों की सरकारी लिस्ट में अपडेट नहीं हुआ था, जिस कारण उसे भर्ती करने में घंटों की देरी हुई। अंततः जब उसे भर्ती किया गया, तो नियम इतने सख्त थे कि मरीज के साथ कोई अटेंडेंट नहीं रह सकता था। वह अपाहिज बहन, जो ठीक से सीधी लेट भी नहीं सकती थी, अस्पताल के कमरे में 'भगवान भरोसे' अकेले छोड़ दी गई। मोहन रात 11 बजे घर पहुँच पाया क्योंकि कर्फ्यू और टैक्सी न मिलने के कारण रास्ते बंद थे।


अहमदाबाद में बैठा मैं व्याकुल था। मेरे तीनों भाई—मोहन, महेश और गोपाल—जयपुर में थे, पर संक्रमण के डर और सरकारी गाइडलाइन्स के कारण वे सब 'होम क्वारंटाइन' में थे। मेरी व्याकुलता देख शिव्या ने तुरंत मोहन के खाते में सहायता राशि भेजी ताकि इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सके। गोवा से दिव्या ने अस्पताल के डॉक्टर शशांक मेहरा से संपर्क किया और बुआ की दिव्यांगता के बारे में बताया, जिस पर उन्होंने नर्सिंग स्टाफ द्वारा विशेष ध्यान रखने का आश्वासन दिया।


गुड्डी अकेले उस 6500 रुपये प्रतिदिन वाले कमरे में कैसे समय बिताती होगी, यह सोचकर मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहता। 30 जून को राहत मिली जब उसके दो कोविड टेस्ट नेगेटिव आए। 1 जुलाई को वह घर लौटी, पर संकट टला नहीं था। ट्यूमर से ब्लीडिंग इतनी ज्यादा थी कि बिस्तर लाल हो जाता। बायोप्सी रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कैंसर अंतिम चरण में था। अपाहिज होने के कारण न तो उसका ऑपरेशन संभव था और न ही वह कीमोथेरेपी सहन कर पाती। गुड्डी को आयुर्वेद अस्पताल भी दिखाया गया। डॉक्टरों ने केवल दवाइयाँ ही उचित समझीं। उन दिनों वीडियो कॉल पर गुड्डी से बात होती, तो उसकी तकलीफ देख गला भर आता। अस्पताल से लौटने के बाद उसे दस्त भी हो गए थे। शिव्या ने पुनः सहायता राशि भेजी, क्योंकि कैंसर की दवाइयाँ बहुत महँगी थीं। मैं अलग शहर में था, बस दुआ ही कर सकता था— "हे भगवान! अब तेरा ही आसरा है।" 


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दुःखद समाचार और परिस्थितियों के बीच 


जुलाई 2020 का अंत एक दुःखद समाचार लेकर आया। अजमेर के प्रतिष्ठित समाजसेवी और मेरे प्रिय मित्र नवीन सोगानी जी का देहावसान हो गया। मन अत्यंत व्यथित हुआ; समाज ने एक सच्चा सेवाभावी खो दिया था। नियति के आगे किसी का वश नहीं चलता, यही सोचकर स्वयं को ढांढस बंधाया। सादर नमन, ओम शांति।


अगस्त के अंत में जानकारी मिली कि दीप्ति के ससुर (जो बांसवाड़ा के गढ़ी गाँव में रहते थे) का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। 1 सितंबर 2020 को उनके बड़े बेटे प्रमोद उन्हें टैक्सी से लेकर अहमदाबाद के 'किडनी हेल्थ हॉस्पिटल' पहुँचे। रास्ते में दोनों की तबीयत भी नासाज थी। स्थिति की गंभीरता देख प्रदीप, दीप्ति और छोटी इनु तुरंत बंगलुरु से फ्लाइट पकड़कर अहमदाबाद आ गए। इनु को हमारे पास छोड़कर दोनों अस्पताल की व्यवस्थाओं में जुट गए। दीप्ति के मौसी के बेटे अनुज ने अपनी कार उन्हें उपलब्ध कराई, जिससे इस कठिन समय में आवाजाही आसान हो गई। प्रमोद भी पाँच-छह दिन अस्पताल में भर्ती रहे, आखिरकार कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट आने पर हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर गढ़ी लौट सके। 


अस्पताल में ससुर जी को 'प्लाज्मा' चढ़ाने की नितांत आवश्यकता थी। उस समय प्लाज्मा डोनर मिलना किसी चुनौती से कम नहीं था। अंततः सोशल मीडिया पर की गई अपील रंग लाई और एक निस्वार्थ डोनर मिल गया। उधर प्रमोद की तबीयत खराब होने के कारण उन्हें भी भर्ती करना पड़ा, पर ईश्वर की कृपा रही कि उनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई और वे डिस्चार्ज होकर गढ़ी लौट सके। प्रदीप के पिताजी कई दिनों तक जीवन और संक्रमण के बीच जूझते रहे। उन्हें प्लाज्मा के अलावा रक्त भी चढ़ाया गया, पर उनके जुझारूपन, अपनों और अस्पताल-कर्मियों की सेवा ने रंग दिखाया। 22 सितंबर 2020 को उन्होंने संक्रमण को मात दे दी और अस्पताल से डिस्चार्ज हुए। प्रदीप और दीप्ति उन्हें सकुशल गढ़ी छोड़ने गए। कई दिनों के तनाव के बाद, यह हम सभी के लिए बड़ी राहत और संतोष का क्षण था।


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कन्टेनमेंट ज़ोन की घोषणा और गोवा की अचानक यात्रा


सितंबर 2020 के वे दिन छोटी इनु की चहक और उसकी व्यस्तताओं के बीच बीते। वह हमारे साथ हॉल में रहकर अपनी ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेती और वहीं जिम्नास्टिक का अभ्यास भी करती। उसे देख मन को थोड़ा सुकून मिलता, पर बाहर का खतरा अब हमारी दहलीज तक आ पहुँचा था।


4 सितंबर 2020 को खबर मिली कि हमारे ही बी-ब्लॉक के ऊपर वाले फ्लैट में एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। प्रशासन ने तुरंत हमारे ब्लॉक को 'कन्टेनमेंट ज़ोन' घोषित कर दिया। 20 फ्लैट्स वाली उस ब्लॉक-बिल्डिंग में सन्नाटा पसर गया। अगले 14 दिनों के लिए बाहरी सामान की डिलीवरी बंद कर दी गई। यहाँ तक कि दूध के लिए भी शिव्या को रोज़ाना नीचे जाना पड़ता था। उसी दोपहर मेडिकल टीम आई और ब्लॉक के सभी निवासियों की टेस्टिंग हुई। वह दौर ऐसा था कि हर टेस्ट रिपोर्ट के आने तक सांसें अटकी रहती थीं।


अभी अहमदाबाद की पाबंदियाँ खत्म ही हुई थीं कि 23 सितंबर की सुबह गोवा से दिव्या का फोन आया। उसने बताया कि वह और पदमनाभन दोनों कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं। यह सुनते ही मेरे होश फाख्ता हो गए। चिंता केवल उनकी नहीं थी, बल्कि वहाँ रह रही दीक्षा (दोहती) और मेरी पत्नी मधु की भी थी। मन में बस यही डर था कि कहीं वे भी संक्रमित न हो गई हों। बिना देर किए, हम शाम की फ्लाइट से गोवा पहुँचे। 25 सितंबर की रात तक जब रिपोर्ट आई कि मधु और दीक्षा की रिपोर्ट 'नेगेटिव' है, तब जाकर जान में जान आई। हम कई दिनों तक गोवा में ही रुके। डॉक्टरों के मार्गदर्शन में दिव्या और पदमनाभन का घर पर ही इलाज चला और कुछ समय बाद वे स्वस्थ होकर 'नेगेटिव' आ गए। वह हमारे लिए ईश्वर का बड़ा आशीर्वाद था।


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अजमेर की पुकार और 'गुड्डी' की सेवा 


अक्टूबर 2020 का अंत मेरे लिए एक नई सुबह लेकर आया। महीनों की तड़प के बाद 27 अक्टूबर को मैं, मधु और शिव्या अंततः अपने अजमेर वाले घर पहुँच गए। घर धूल-मिट्टी से अटा पड़ा था, पर अपनी जड़ों की उस महक ने मन को असीम शांति दी। उधर मोहन ने बताया कि उसके बेटे उत्कर्ष की शादी पुणे में तय हुई, तो गुड्डी (दिव्यांग बहन सुधा) की जिम्मेदारी का प्रश्न खड़ा हुआ। मोहन ने छोटे भाई महेश से आग्रह किया, पर किन्हीं कारणों से उसने मना कर दिया। ऐसे में मधु ने छोटे भाई गोपाल की पत्नी कंचन से बात की। कंचन ने रिश्तों का मान रखते हुए सहर्ष स्वीकार किया और 12 अक्टूबर को गुड्डी को पैतृक घर गोविन्द नगर से अपने घर मालवीय नगर ले आई।


मैं अजमेर घर पहुँचने के लिए व्याकुल था ही और गुड्डी को भी वहाँ लाने की तैयारी थी। 3 नवंबर 2020 को कंचन और पलाश अपनी कार से गुड्डी को सुरक्षित अजमेर छोड़ गए। गुड्डी का अजमेर से पुराना नाता था; 2006 में बाऊजी के निधन के बाद वह और अम्मा यहाँ करीब ढाई साल रहे थे। पिछले साल 2019 में भी गुड्डी कुछ समय हमारे पास रही थी, जब मोहन अपने दूसरे बेटे सार्थक के पास अमेरिका गया था। इस बार भी हमने उसके लिए वही कमरा चुना जहाँ से वह टीवी भी देख सके और पीछे नींबू के पेड़ के पास धूप भी सेंक सके। हमने उसकी मरहम-पट्टी, नहलाने-धुलाने और देखभाल के लिए एक कुशल परिचायिका (Attendant) लगा ली थी, जो पास की बस्ती में ही रहती थी। कैंसर की अंतिम अवस्था और उस असह्य पीड़ा के बावजूद गुड्डी हमारे पास आकर बहुत खुश थी। जैसा कि मैंने महसूस किया—"जो उसका शेष था, वही उसके लिए विशेष था।" गुड्डी के साथ हमने नवम्बर 2020 की दीपावली और भाई दूज अपने अजमेर घर में मनाई, जो हमारे एक यादगार बन गई। यही उसकी इस जीवन की अंतिम दीपावली और भाई दूज थी। 


इसी बीच 8 नवंबर 2020 को एक हृदय विदारक खबर मिली। मधु की बड़ी बहन मालती दीदी ने बताया कि जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। वह दौर चिकित्सा व्यवस्था की लाचारी का चरम था; उन्हें अजमेर के कई अस्पतालों में भर्ती करने से मना कर दिया गया। अंततः उन्हें जयपुर के एपेक्स अस्पताल ले जाना पड़ा। व्यवस्था इतनी बेबस थी कि डॉक्टरों को भी इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा था।


शिव्या को अपने काम के सिलसिले में अहमदाबाद लौटना जरूरी था, इसलिए बंगलुरु से दीप्ति ने अजमेर आने का प्रोग्राम बना लिया। कुछेक दिनों बाद वह और प्रदीप अपनी बेटी प्रगन्या (इनु) के साथ अजमेर आ गए और शिव्या अहमदाबाद लौट गई। पुणे में उत्कर्ष की शादी 10-11 दिसंबर को हो गई थी। हम वहाँ नहीं जा सके। 


जनवरी 2021 के दूसरे पखवाड़े में जब भाई मोहन पुणे से वापस लौटा, तो गुड्डी की विदाई की बेला आ गई। प्रदीप और दीप्ति ने जिम्मेदारी ली और 26 जनवरी 2021 को वे स्वयं कार से गुड्डी को जयपुर छोड़ आए। वह कुछ महीने जो गुड्डी ने हमारे सानिध्य में बिताए, वे मेरे जीवन के सबसे संतोषजनक पन्ने बन गए। 2010 में अम्मा के जाने के बाद वह अधिकतर जयपुर ही रही थी, पर इस अंतिम पड़ाव में उसकी सेवा का अवसर मिलना ईश्वर की विशेष कृपा थी। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


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