कोरोना काल के संस्मरण - 8
71
एक युग का अंत और 'गुड्डी' की अंतिम यात्रा
28 जनवरी 2021 को अजमेर नगर निगम के चुनाव थे। मधु और मैंने अपने नागरिक धर्म का पालन करते हुए वोट डाला। उसी दौरान मधु जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल से मिलने उनके घर गई। शरीर में एक अजीब सी थकान महसूस हो रही थी। बच्चों से लंबी चर्चा के बाद एक भारी मन से निर्णय लिया गया कि अब 70 की इस उम्र में हमारा अकेले अजमेर रहना ठीक नहीं। तय हुआ कि हम बारी-बारी से बेटियों के पास आते-जाते रहेंगे और बीच-बीच में अजमेर भी आते रहेंगे। अपनी जड़ों को छोड़ना कठिन था, पर बढ़ती उम्र और व्यावहारिकता के आगे झुकना पड़ा। 30 जनवरी 2021 को हम प्रदीप, दीप्ति और इनु के साथ बंगलुरु के लिए रवाना हो गए।
अभी बंगलुरु पहुँचे दो ही दिन हुए थे कि 1 फरवरी को मोहन का संदेश मिला—गुड्डी ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया था। वह निरंतर बेहोशी की स्थिति में थी और उसे नली के जरिए लिक्विड आहार दिया जा रहा था। अगले ही दिन, 2 फरवरी को उसका 62वाँ जन्मदिन था, पर नियति का क्रूर मजाक देखिए कि वह होश में भी नहीं थी। 3 फरवरी की सुबह 10 बजे हमें वह दुखद समाचार मिला जिसका अंदेशा तो था, पर मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था—गुड्डी हमें छोड़कर जा चुकी थी।
मैं बंगलुरु में होने के कारण जयपुर नहीं पहुँच सका। माघ कृष्ण षष्ठी, संवत 2077 के उस दिन तीनों भाइयों ने चाँदपोल शमशान घाट पर अपनी बहन का अंतिम संस्कार किया। गुड्डी का पूरा जीवन (62 वर्ष) शारीरिक कष्टों और दूसरों पर निर्भरता में बीता, पर उसका स्वभाव अत्यंत शांत था। अपनी कॉपी में निरंतर 'राम-राम' लिखना उसकी वह मूक प्रार्थना थी, जिससे शायद वह अपने अगले जन्म की राह सुगम कर रही थी। 9 फरवरी को पुष्कर में भाइयों द्वारा अस्थि-विसर्जन और 14 फरवरी को पैतृक घर में शांति हवन के साथ उसकी इस लोक की यात्रा पूर्ण हुई। मैंने बंगलुरु में रहकर प्रार्थना की। ईश्वर उसकी पुण्यात्मा को सद्गति प्रदान करे। सादर नमन, ओम शांति।
72
टीकाकरण की सुरक्षा और विदाई का अंतहीन सिलसिला
2021 की शुरुआत उम्मीद की एक नई किरण 'टीकाकरण' के साथ हुई। मार्च और अप्रैल 2021 में मधु और मैंने बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड स्थित कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल में वैक्सीन की दोनों डोज़ लगवाईं। सुरक्षा का कवच तो मिल गया था, पर नियति का क्रूर प्रहार थमा नहीं था। 26 अप्रैल को इंदौर से मधु के भाई अशोक अग्रवाल जी के निधन का समाचार मिला, और अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि 22 मई को अजमेर के मित्तल हॉस्पिटल में जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल भी हमें छोड़कर चले गए। अगस्त 2021 में मित्र ओम प्रकाश जी की पत्नी और जनवरी 2022 में भाई मोहन के साले डॉ. हेमंत अग्रवाल का देहावसान हुआ। ऐसा लगता था जैसे इंसान और कोरोना के बीच एक अंतहीन युद्ध चल रहा है, जहाँ कभी हम जीतते, तो कभी हार जाते। नियति की आगे किसी का वश नहीं, यही सोच कर मन को तसल्ली दे लेते। भगवान् सभी दिवंगत आत्माओं को शान्ति प्रदान करे। ओम शान्ति।
सरकार टीकाकरण को लेकर अत्यंत सजग थी। हम बेंगलुरु में थे, पर अजमेर के बीएलओ (BLO) ने फोन कर हमारी वैक्सीनेशन स्थिति की पुष्टि की। नवंबर 2021 में जब हम वापस अजमेर पहुँचे, तो बंद घर की उदासी दीमक के रूप में दीवारों पर चिपकी मिली। सीलन और दीमक ने मेरी प्रिय पुस्तकों को काफी नुकसान पहुँचाया था, जो मेरे लिए एक व्यक्तिगत आघात था। पेस्ट कंट्रोल के बाद हम कुछ दिन वहाँ रुककर अहमदाबाद होते हुए गोवा आ गए।
अब कोरोना जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका था। शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा हो जिसने इस महामारी में अपना कोई प्रिय न खोया हो। गोवा के सांखली स्थित सरकारी अस्पताल में 20 जनवरी 2022 को हमने 'प्रिकॉशन डोज़' (तीसरी खुराक) भी लगवाई। इसी बीच अहमदाबाद से शिव्या के संक्रमित होने की खबर ने फिर बेचैन किया, पर सात दिनों के एकांतवास और दवाओं के बाद वह 'नेगेटिव' आ गई। धीरे-धीरे समय का पहिया घूमा, प्रकोप कम हुआ और देश की गतिविधियाँ पुनः पटरी पर लौटने लगीं। 70 वर्ष की दहलीज पर, हालाँकि कई बार मुझे हल्का बुखार हुआ, कभी-कभी खाँसी भी हुई, बहुत बार नकसीर भी आई, पर स्थितियाँ हर बार परिवार वालों के सहयोग से संभलती रहीं और मैं कोरोना की चपेट में आने से बचा रहा। परिवार के सहयोग और सजगता ने मुझे इस अदृश्य शत्रु से बचाए रखा।
73
इतिहास का आईना और भविष्य की सीख
वर्ष 2021 के बीतते-बीतते जीवन की पटरी पर रौनक लौटने लगी थी। स्कूल, दफ्तर और बाज़ार अपनी पुरानी गहमा-गहमी में वापस आ रहे थे। अंततः 5 मई 2023 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोविड-19 को 'वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल' की श्रेणी से बाहर कर दिया। आंकड़ों की नज़र से देखें तो इस महामारी ने विश्व भर में लगभग 7.1 मिलियन (71 लाख) और भारत में आधिकारिक तौर पर 5.34 लाख से अधिक जीवन निगल लिए।
इतिहास के पन्ने पलटें, तो ठीक सौ साल पहले 1918-19 के 'स्पेनिश फ्लू' ने इससे भी भयानक तांडव मचाया था। उस समय न कोई वैक्सीन थी, न एंटीबायोटिक्स। भारत तब ब्रिटिश दासता में था और एक अनुमान के अनुसार सवा करोड़ भारतीयों ने अपनी जान गंवाई थी। मेरे परिवार का इतिहास भी उस त्रासदी से अछूता नहीं रहा; मेरे दादा-दादी बताते थे कि मेरे परदादा जी का देहांत उसी महामारी के दौरान हुआ था।
कोविड-19 की इस अग्निपरीक्षा ने मानव सभ्यता को दस अमूल्य पाठ पढ़ाए हैं -
(1) पूर्व तैयारी - एक मज़बूत स्वास्थ्य ढांचा और आकस्मिक चुनौतियों के लिए सदैव तत्पर रहना अनिवार्य है।
(2) विज्ञान की शक्ति - त्वरित अनुसंधान और वैक्सीन निर्माण ही जीवन रक्षक कवच हैं।
(3) स्वास्थ्य समानता (Equity) - दवाओं और टीकों का वितरण न्यायसंगत होना चाहिए, ताकि अमीर-गरीब का भेद जान न ले।
(4) मानसिक स्वास्थ्य - अलगाव और आर्थिक तनाव से उपजी एंग्जायटी को गंभीरता से लेना ज़रूरी है।
(5) सामुदायिक विश्वास - स्थानीय नेतृत्व और आपसी भरोसे ने ही संकट में ढाल का काम किया।
(6) सटीक सूचना - 'इन्फोडेमिक' (गलत सूचनाओं) से लड़ना और सही जानकारी पहुँचाना जान बचाने जितना ही महत्वपूर्ण है।
(7) अनुकूलनशीलता - मनुष्य ने ऑनलाइन शिक्षा और टेलीवर्क के ज़रिए साबित किया कि वह बदलती स्थितियों में ढल सकता है, पर विज्ञान के प्रति अनुकूलनशीलता सदैव आवश्यक है।
(8) आपूर्ति शृंखला - आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला को संकट के लिए और अधिक लचीला बनाना होगा।
(9) धैर्य और सेवा - मुश्किल हालात में घबराने के बजाय एक-दूसरे का संबल बनना ही असली मानवता है।
(10) वैश्विक सहयोग - सीमाएँ देशों को बांट सकती हैं, पर वायरस सीमाओं को नहीं मानता; अतः वैश्विक एकजुटता ही हमारा भविष्य है।
74
उपसंहार - स्मृतियों का पाथेय और एक नई सुबह
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो 2020 से 2022 का वह समय किसी डरावने सपने जैसा लगता है, लेकिन उस सपने में भी अपनों के प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की सुहानी धूप खिली हुई थी। वह 10x10 का कमरा, हाथ पर बँधा वह स्टेप-काउंटर, 'इनु' की मासूम चहक, बेटियों की वह चिंता भरी झिड़की और सभी का वह निस्वार्थ सेवा भाव—ये सब अब मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं।
बहन 'गुड्डी' का जाना एक व्यक्तिगत शून्य छोड़ गया, पर संतोष इस बात का है कि उसके 'शेष' समय को हम 'विशेष' बना सके। कोरोना ने हमसे बहुत कुछ छीना, हमारे कई प्रियजनों को हमसे दूर कर दिया, लेकिन उसने हमें 'ठहरना' भी सिखाया। उसने हमें बताया कि तकनीक कितनी भी आगे निकल जाए, अंततः एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ और प्रकृति के सान्निध्य की ही आवश्यकता होती है।
अब जीवन फिर से अपनी पुरानी लय में है। अजमेर की गलियों में फिर वही रौनक है, गोवा के समुद्र में वही संगीत है और अहमदाबाद की व्यस्तता वैसी ही है। पर हम वह पुराने इंसान नहीं रहे; हम अब अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक कृतज्ञ हैं। विज्ञान ने हमें वैक्सीन दी, तो ईश्वर ने हमें एक-दूसरे का हाथ थामने का साहस दिया।
यह संस्मरण केवल मेरी डायरी के पन्ने नहीं हैं, बल्कि उस ऐतिहासिक कालखंड का एक छोटा सा दस्तावेज़ है, जिसे मैंने जिया है। मेरी लेखनी यहाँ विराम लेती है, पर स्मृतियाँ सदैव जीवंत रहेंगी। आशा है कि आने वाली पीढ़ियाँ जब इन पन्नों को पलटेंगी, तो वे केवल महामारी का डर नहीं, बल्कि मानवता की उस अजेय शक्ति को देखेंगी जिसने हारना नहीं सीखा। "रात कितनी भी काली क्यों न हो, सुबह का सूरज उगना तय है।"
संकट में सृजन - समय का सदुपयोग
इस महामारी के दौर ने जहाँ सभी के लिए शारीरिक सीमाएँ तय कर दी थीं, वहीं मानसिक विस्तार के नए द्वार भी खोले। मैंने उस एकांत और अनिश्चितता के समय को पाठन और लेखन के नाम कर दिया। मुझे संतोष है कि कोरोना काल के उस कठिन समय में लिखीं मेरी निम्नलिखित पुस्तकें 'अमेज़न किंडल' पर प्रकाशित हुईं, जो आज भी पाठकों के लिए उपलब्ध हैं -
(1) अजमेर की दास्ताँ (3 मई 2021) - अपनी जड़ों और शहर की जानकारी को समर्पित।
(2) Training Handbook on ISO 9001:2015 QMS Awareness (6 मई 2021) - गुणवत्ता प्रबंधन जागरूकता के लिए।
(3) बिटकॉइन क्या है? (10 जून 2021) - नई डिजिटल अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास।
(4) Future Banking is Lean Banking (10 सितम्बर 2021) - बैंकिंग क्षेत्र में प्रक्रियाओं को समझने और सुधारने का एक प्रयास।
(5) Understanding Circular Economy (25 अप्रैल 2022) - सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अध्ययन।
(6) Implementing An Effective Quality Management System (7 सितम्बर 2023) - प्रभावशाली गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली लागू करने के लिए।
उपर्युक्त पुस्तकें महामारी के उस दौर के मेरे 'लेखन पुरुषार्थ' का प्रमाण हैं, जिसने मुझे टूटने नहीं दिया और महामारी के दौरान मुझे व्यस्त रखा। मेरी ये किताबें केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि उस अंधकार में जलाई गई मेरी अपनी मशालें थीं।
आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ।
सादर,
केशव राम सिंघल

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें