नाटक - आइए! गणेश जी महाराज से बहुत कुछ सीखें!
लेखक - केशव राम सिंघल
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प्रस्तुति संबंधी सामान्य निर्देश
* यह नाटक गणेश चतुर्थी के अवसर पर या किसी अन्य अवसर पर बच्चों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।
* बाल कलाकारों की संख्या: 5 से 10 (सूत्रधार सहित) रहे।
* मंच के बीच में सामने गणेश जी की सुंदर मूर्ति रखी जाए।
* सभी बाल कलाकार मूर्ति के सामने अर्ध-चंद्राकार में खड़े हों, ताकि मूर्ति और कलाकारों के चेहरे दोनों दर्शकों को साफ दिखें।
* जयकारे के समय ढोल-मंजीरा या गणेश भजन का उपयुक्त संगीत बजे।
* बोलते समय कलाकार संबंधित इशारे अवश्य करें (कान पर हाथ, पेट दिखाना, सूँड का इशारा आदि)।
* आवाज़ साफ़, धीमी-तेज़ का संतुलन और भावपूर्ण हो।
नेपथ्य से सूत्रधार - भाइयों और बहनों! यहाँ उपस्थित सभी दर्शकों को नमस्कार। आज का दिन बहुत ही शुभ दिन है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर शिव-पार्वती नंदन सिद्धि-विनायक गणेश जी हमारे बीच आए हुए हैं। आइए! सभी मिलकर गणेश जी महाराज का जयकारा लगाएँ—
सभी (मंच पर प्रवेश करते हुए, संगीत के साथ) - “गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया! गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया!”
(जिस समय जयकारा हो रहा हो, एक-एक कर सभी बाल कलाकार मंच पर आते हैं। वे गणेश जी की मूर्ति के सामने झुककर आदर व्यक्त करते हैं और अर्ध-चंद्राकार में मूर्ति के दोनों ओर खड़े हो जाते हैं। सूत्रधार भी मंच पर आ जाता है।)
सूत्रधार - गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया! भगवान् गणेश जी पूजा-पाठ के प्रथम देवता हैं। साथ ही वे हमारे अनमोल गुरु भी हैं।
बाल कलाकार 1 - (हाथ से मस्तक का इशारा करते हुए) - बहुत कुछ सीख सकते हैं हम गणेश जी महाराज से और अपने जीवन में सफल हो सकते हैं। देखो, गणेश जी का हाथी जैसा बड़ा मस्तक! यह हमें सिखाता है कि हमें बड़ी सोच रखनी चाहिए और हर फैसला सोच-समझकर लेना चाहिए।
बाल कलाकार 2 - (मस्तक की ओर इशारा करते हुए) - यह विशाल मस्तक हमें विशाल बुद्धि, दूर दृष्टि और गहरी समझ का संदेश देता है। इसलिए भावनाओं में बहकर नहीं, सोच-समझकर फैसला लें।
बाल कलाकार 3 - (दोनों हाथों से कानों को छूते हुए और फिर मुँह की ओर इशारा करते हुए) - गणेश जी महाराज के बड़े कान और छोटा मुँह हमें सिखाते हैं— सफल होना है तो सुनो अधिक, बोलो कम।
सूत्रधार - गणेश जी महाराज की लंबी सूँड छोटी और बड़ी दोनों तरह की चीजें उठा सकती है। क्या सीख सकते हैं हम इससे?
बाल कलाकार 4 - (हाथ से सूँड का इशारा करते हुए) - मित्रों, यही तो गणेश जी महाराज का लचीलापन है। हर सवाल का एक ही समाधान नहीं हो सकता। बदलते हालात के अनुसार हमें अपनी रणनीति बदलनी चाहिए।
बाल कलाकार 5 - (दृढ़ स्वर में) - गणेश जी महाराज विघ्नहर्ता हैं। वे सिखाते हैं कि हमें अपनी मुश्किलों को समझना चाहिए और उनका हल खोजने का उपाय सोचना चाहिए।
बाल कलाकार 6 - (हाथ जोड़कर विनम्र भाव से) - गणेश जी महाराज विनम्रता सिखाते हैं। कितने बड़े देवता हैं गणेश जी, फिर भी उनका वाहन छोटा चूहा है। यही तो असली विनम्रता है।
सूत्रधार - अरे वाह! क्या बात कही मेरे मित्र ने। गणेश जी महाराज की जय हो! साथियों, उनका पेट भी कितना बड़ा है।
बाल कलाकार 7 - (दोनों हाथों से पेट की ओर इशारा करते हुए) - गणेश जी का बड़ा पेट हमें सिखाता है कि हमें सभी तरह के अनुभवों— अच्छे और बुरे— को पचाने की क्षमता विकसित करनी चाहिए।
बाल कलाकार 8 - (आश्चर्य व्यक्त करते हुए, एक हाथ से दाँत का इशारा करते हुए) - पता है, गणेश जी महाराज ने महाभारत लिखते समय अपना एक दाँत तोड़कर लेखनी बनाई थी। कुछ पाने के लिए कुछ त्याग करना पड़ता है। लक्ष्य पाने के लिए एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है।
बाल कलाकार 9 - (हाथ जोड़कर) - हर शुभ कार्य से पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है। हमें हर नए काम की शुरुआत सही तरीके से करनी चाहिए। अच्छी शुरुआत ही आधा काम है।
सूत्रधार - गणेश जी के चार हाथों में अलग-अलग वस्तुएँ हैं, जो जीवन में हमें संतुलन रखने का पाठ पढ़ाती हैं। आइए, हम अपने जीवन में काम, परिवार, टीम और अपने विकास में यथोचित संतुलन बनाए रखें।
सभी बाल कलाकार (एक स्वर में, हाथ जोड़कर) - सिद्धि विनायक गणेश जी महाराज की जय हो!
सूत्रधार - विघ्न हरने वाले, मंगल कर्ता, सिद्धि के दाता, बुद्धि के दाता गणेश जी महाराज की जय हो! आइए, आज हम सब गणेश जी से ये पाठ सीखकर अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।(संगीत के साथ सभी फिर से जयकारा लगाते हैं— “गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया!”)
अंत में, नाटक के निर्देशक मंच पर आते हैं और सभी कलाकारों का संक्षिप्त परिचय दर्शकों से कराते हैं। सभी कलाकार मूर्ति की ओर झुककर प्रणाम करते हैं और मंच से विदा होते हैं।
(नाटक समाप्त)
कलाकारों के लिए अतिरिक्त निर्देश -
* बोलते समय चेहरे पर भाव रखें— गंभीरता, आश्चर्य, विनम्रता और उत्साह।
* अर्ध-चंद्राकार में खड़े रहते हुए एक-दूसरे को ढकें नहीं।
* जयकारे के समय ताली या हाथ हिलाकर उत्साह दिखाएँ।
* मूर्ति के सामने झुकते समय सम्मान का भाव बनाए रखें।
* अभ्यास करते समय इशारों को स्वाभाविक बनाने का प्रयास करें।
यह नाटक लगभग 8 से 10 मिनट में आसानी से मंचित हो जाएगा।
इस नाटक के गैरव्यावसायिक मंचन के लिए लेखक की सामान्य स्वीकृति है। कृपया मंचन की जानकारी लेखक को ईमेल से या इस पोस्ट की टिप्पणी में देने का प्रयास करें। धन्यवाद।
शुभकामनाओं के साथ,
केशव राम सिंघल

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