फादर्स डे पर विशेष
बाऊजी की प्रेरणा
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सन 1972 की बात है। बैंक की नौकरी में मुझे मात्र छह महीने ही हुए थे। नए परिवेश से तालमेल बैठ ही रहा था कि अचानक ब्रांच मैनेजमेंट ने एक आदेश जारी कर दिया कि सभी कर्मचारियों की ड्यूटी रोटेट (बदल) की जा रही है। इस अप्रत्याशित निर्णय से शाखा में खलबली मच गई। अनेक पुराने कर्मचारी इस व्यवस्था से बेहद नाराज थे और सबने मिलकर तय किया कि अगले दिन प्रबंधन को एक संयुक्त विरोध-पत्र दिया जाएगा।
सच कहूँ तो, असमंजस में मैं भी था। छह महीने से मैं जिस सीट पर काम कर रहा था, उस पर मेरी पकड़ मजबूत हो चुकी थी। मैं उस आरामदेह दायरे (कंफर्ट जोन) से बाहर नहीं निकलना चाहता था। मन में डर था कि नई सीट पर नए सिरे से सब सीखना होगा। इसलिए, मैं भी अंदर ही अंदर इस रोटेशन के खिलाफ था।
दिनभर के मानसिक तनाव के बोझ तले दबा जब मैं शाम को घर पहुँचा, तो उदासी चेहरे पर साफ झलक रही थी। मुझे तनाव में देखकर बाऊजी भांप गए कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने स्नेहपूर्वक पूछा, "क्या बात है बेटा, आज कुछ परेशान दिखाई दे रहे हो?" मैंने बिना कुछ छुपाए बैंक की पूरी घटना उन्हें बता दी।
बाऊजी ने मेरी बात धैर्य से सुनी और मुस्कुराते हुए वात्सल्य भाव से कहा, "बेटा, वास्तव में यह रोटेशन तो तुम्हारे हित में है। करियर की शुरुआत में एक ही सीट पर बंध जाना तुम्हारी प्रतिभा को सीमित कर देगा। तुम जितनी अधिक सीटों पर काम करोगे, बैंकिंग के अलग-अलग विभागों को समझोगे, उतनी ही अधिक कार्य में तुम्हारी प्रवीणता बढ़ेगी। बहुमुखी प्रतिभा ही तुम्हें भविष्य में सफल बनाएगी।"
बाऊजी के इन व्यावहारिक और दूरदर्शी शब्दों ने मानो मेरी आँखों से संकीर्णता का पर्दा हटा दिया। उन्होंने मुझे बदलाव को सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा दी। अगले दिन, मैं एक नए उत्साह के साथ अपनी नई सीट की ओर बढ़ गया।
सादर,
केशव राम सिंघल

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