रविवार, 7 जून 2026

खरगोश और कछुए की कहानी

खरगोश और कछुए की कहानी 

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मित्रों,


आपने कछुए और खरगोश की पारंपरिक कहानी तो सुनी ही होगी। जब दोनों में पहली बार दौड़ हुई, तो कछुआ इसलिए जीत गया क्योंकि खरगोश अति-आत्मविश्वास में दौड़ के दौरान सो गया था। उस दिन खरगोश बहुत दुखी हुआ कि वह धीमी गति से चलने वाले कछुए से हार गया। उसने अपनी गलती पर विचार किया और अगले दिन कछुए को दोबारा दौड़ लगाने की चुनौती दी। इस बार खरगोश ने अपनी एकाग्रता बनाए रखी, वह बिना रुके लगातार भागा और आसानी से जीत गया। अब कछुआ हार के कारण दुखी था।


कछुए ने ठंडे दिमाग से सोचा कि खरगोश से उसकी तेज गति के रहते कैसे जीता जाए। अगले दिन कछुए ने खरगोश से कहा, "चलो आज फिर दौड़ लगाते हैं, पर इस बार दौड़ का लक्ष्य वह सामने दिखने वाला पेड़ होगा।" खरगोश तुरंत तैयार हो गया और दौड़ शुरू हुई।


खरगोश हमेशा की तरह बहुत तेजी से भागा, पर कुछ ही दूरी पर जाकर अचानक रुक गया। रास्ते में एक चौड़ी नदी आ गई थी। वह सोचने लगा कि बिना किसी पुल के नदी के उस पार पेड़ तक कैसे पहुँचा जाए? खरगोश नदी के इसी किनारे लाचार होकर बैठ गया। दूसरी ओर, कछुआ अपनी धीमी लेकिन निरंतर गति से चलता हुआ नदी के किनारे पहुँचा, आसानी से तैरकर नदी पार की और लक्ष्य (पेड़) तक पहुँचकर दौड़ जीत गया। इस बार खरगोश अपनी इस कमजोरी पर उदास था कि उसे तैरना नहीं आता, पर यह उसके बस में नहीं था। 


अगले दिन खरगोश और कछुआ दोबारा मिले। खरगोश ने व्यावहारिक होकर कहा, "कछुए भाई! नदी के इस पार की दौड़ में मैं जीता और नदी के उस पार की दौड़ में तुम जीते। इस तरह तो हम एक-दूसरे को नीचा ही दिखाते रहेंगे।"


इस पर कछुआ मुस्कुराकर बोला, "खरगोश भाई! यदि हम दोनों एक-दूसरे की ताकत को अपनी ताकत बना लें, तो हम दोनों हर बार जीत सकते हैं और अन्य लोगों को एक सीख दे सकते हैं।"


दोनों ने मिलकर एक नई योजना बनाई और आखिरी बार फिर दौड़ शुरू हुई। इस बार, ज़मीन पर दौड़ते समय खरगोश की पीठ पर कछुआ बैठा था, जिससे वे पलक झपकते ही नदी के किनारे पहुँच गए। नदी आते ही खरगोश कछुए की पीठ पर बैठ गया और दोनों ने आसानी से नदी पार कर ली। नदी पार करने के बाद फिर कछुआ खरगोश की पीठ पर सवार हुआ और दोनों एक साथ, एक ही समय पर लक्ष्य (पेड़) तक पहुँच गए।


इस बार दोनों ही विजेता थे। 


मेरी सीख 


जब हम व्यक्तिगत स्पर्धा से ऊपर उठकर एक टीम के रूप में काम करते हैं, तो हर कठिन परिस्थिति को जीत सकते हैं। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

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