सोमवार, 7 जून 2021

छह माह से चल रहा किसान आंदोलन

 छह माह से चल रहा किसान आंदोलन 


पिछले सवा साल से कोरोना काल चल रहा है और पिछले छह माह से किसान आंदोलन भी चल रहा है। एक ऐसा आंदोलन, जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला अभूतपूर्व, शांतिपूर्ण और अनुशासित है। कई बार इस आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश भी की गयी और लोगों ने यह भी सोचा कि आंदोलनकारी किसान थक-हारकर आंदोलन समाप्त कर अपने घर चले जाएंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। कोरोना काल में किसी आंदोलन का लम्बे समय तक चलना किसी भी हालत में किसी के भी हित में नहीं है। आंदोलनकारी किसान कोरोना संक्रमण के ग्रसित हो सकते हैं। सरकार लम्बे समय से मौन साधे हुए है और उसने किसान संगठनों से बातचीत प्रारम्भ करने के लिए कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाए हैं। 


किसानों से सम्बंधित तीन कानूनों के बारे में आंदोलनकारी किसानों का पक्ष नीचे दिया जा रहा है। आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि -


- उन्होंने केंद्र सरकार से इन कानूनों की कभी कोई मांग नहीं की। 

- सरकार द्वारा लाए गए तीनों कृषि कानूनों से उनका कोई भला नहीं होने वाला। 

-  सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले किसानों से कोई चर्चा नहीं की। 

- इन कानूनों के लागू होने से कुछ समय बाद मंडी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। 

- किसान पूंजीपतियों की मनमर्जी पर अपने कृषि उत्पाद बेचने को मजबूर हो जाएंगे। 

- न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रावधानों की कोई गारंटी नए कृषि कानूनों में नहीं है। 

- आवश्यक वस्तु कानून के अंतर्गत किए संशोधन से जमाखोरी और कालाबाजारी बढ़ेगी। 

- कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून किसान के पक्ष में कम दूसरे पक्षों के पक्ष में अधिक है और किसान को एक अत्यंत कमजोर पक्षकार बना दिया गया है। 

- कृषि विषय राज्यों से सम्बंधित विषय है अतः केंद्र को इस सम्बन्ध में कानून बनाने से पहले राज्यों से विचार विमर्श करना चाहिए था, जो नहीं किया गया। 

- केंद्र को चाहिए था कि वे कृषि से सम्बंधित मॉडल कानून बनाकर राज्यों को भेजते और राज्य उसे अपने स्तर पर पारित करते। 

- स्वामीनाथन आयोग की संस्तुति के अनुसार कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम लाभकारी मूल्य तय हो, उस पर खरीदी की गारंटी हो और कोई इससे नीचे खरीदी करे तो उसे सजा का प्रावधान हो। 


सरकार के अपने तर्क रहे हैं। सरकार का कहना कि लाए गए कृषि कानून किसानों के हित में हैं। उनका कहना है कि इस तरह के कानूनों की मांग अनेक अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों ने की जो खुले बाजार के हिमायती हैं। सरकार का सबसे बड़ा तर्क है कि संसद को देश हित में कानून बनाने का अधिकार है। किसी भी आंदोलन द्वारा कानूनों को चुनौती देना दुर्भाग्यपूर्ण है और संसद की सर्वोच्च सत्ता को नकारने की कोशिश है। 


हालांकि सरकार कह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद चलती रहेगी और किसानों को खुले बाजार में लाभकारी मूल्य मिलता रहेगा, पर किसानों का मानना है कि दो-चार सालों में देश के कृषि बाजार पर पूंजीपतियों का कब्जा हो जाएगा और वर्तमान मंडी व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी, उसके बाद किसानों को पूंजीपतियों की शर्तों पर अपना कृषि उत्पाद बेचना होगा।  


किसान आंदोलन को चलते हुए छह से अधिक माह हो गए हैं और ऐसा लगता है कि किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए सरकार कोई निर्णय नहीं ले पा रही है। सरकार से यह आशा है कि आंदोलनकारी किसान संगठनों से बात प्रारम्भ करे और सभी के हित में निर्णय लेकर अन्नदाता किसानों का आंदोलन समाप्त करने में पहल  करे। 


इसी ब्लॉग में किसान आंदोलन और कृषि कानूनों से सम्बंधित निम्न पूर्व लेख आप क्लिक कर पढ़ सकते है :-

- तीन कृषि कानून और किसान संगठनों की मांग 

- कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया 

- किसान आंदोलन 


आशा है पाठक अपने विचार कमेंट बॉक्स में लिखेंगे। 


धन्यवाद,

केशव राम सिंघल 


सोमवार, 10 मई 2021

आत्मनिर्भरता

आत्मनिर्भरता 


मैं आपको एक मध्यम-वर्गीय परिवार की कहानी सुनाता हूँ। उस परिवार का मुखिया अपने पर बहुत अधिक ध्यान देता था। सारा समय दूसरों के यहाँ जाने, उनसे बड़ी-बड़ी बाते करने में बिताता। घर के लोगों को भी अपने मन की बात कहकर ऐसा साबित करने का प्रयास करता कि उसे परिवार की ही नहीं पूरे संसार की चिंता है और यह जताता कि इसके लिए वह दिन में वह छब्बीस घंटे काम करता है। पर असल में वह आदमी अपनी मौज मस्ती में व्यस्त रहता, अच्छे से अच्छे कपडे पहनना उसका शौक है। वह जो कमाई करता, उसे अपने पर ही खर्च करता, जब भी जरुरत पड़ती तो घर वालों से भी पैसे आदि ले लेता। यदि पैसों की ज्यादा जरुरत होती और कहीं से कोई जुगाड़ नहीं होता तो घर का कोई कीमती सामान वह बेच देता। घर का कोई सदस्य कभी उससे किसी वजह से पैसे मांगता तो वह आत्मनिर्भरता का अच्छा सा भाषण उस सदस्य को दे देता। परिवार के सदस्य भी अब समझ गए कि अब परिवार के मुखिया को पूरे संसार की चिंता रहने लगी है।   


इधर कुछ दिनों से परिवार के मुखिया को सनक चढ़ी है कि वह अपने लिए एक महंगी कार खरीदेगा और आलीशान हवेली बनाएगा। उसने लोन लेकर कार खरीद भी ली है और हवेली निर्माण का काम चालू करवा दिया है। वह बहुत खुश है कि गाड़ी और घर होते हुए भी उसने आस-पड़ौस में अपनी इज्जत बढ़ाने के लिए एक और महंगी कार खरीद ली है और अब वह एक आलीशान घर भी बनवा रहा है। लेकिन घर के सदस्य परेशान हैं। घर का रोजमर्रा का खर्चा वे कैसे जुटाएं, इसी को लेकर घर में हाहाकार मचा हुआ है। घर के लोग अपनी दैनिक आवश्यकताएं पूरी नहीं कर पा रहे हैं। मुखिया घर पर रहता नहीं, दूर दोस्तों के घर अपनी नई गाड़ी से चला जाता। पुरानी गाड़ी गैराज में सड़ रही है क्यों कि घर वाले पहले ही आर्थिक तंगी से परेशान हैं। हर दिन घर में चिल्ल-पौं होती और आस-पड़ौसी घरवालों का रोना सुनते। आसपास के सभी पड़ौसी बहुत अच्छे हैं, हालांकि बहुत संपन्न तो नहीं पर परिवार की हालत को देख-सुन उन्हें तरस आ जाता और वे कुछ न कुछ छोटी-मोटी चीज मदद में दे ही देते। परिवार का मुखिया बहुत खुश है, उसके मौज में कोई कमी नहीं है, वह तो आगे के सपने देखने में व्यस्त है।  यह बात अलग है कि नए कार की कई किश्तें अभी चुकाना बाकी है और उसका दिमाग इसी सोच में लगा है कि नयी बनने वाली हवेली में क्या-क्या लगवाना है। 


- केशव राम सिंघल 


कहानीकार लेखक - केशव राम सिंघल ©

प्रकाशन / साझा करने की अनुमति - कहानीकार लेखक के नाम के साथ इस कहानी के प्रकाशन / साझा करने की अनुमति है।

डिस्क्लेमर - यह कहानी कहानीकार लेखक की कल्पना के आधार पर लिखी गई है। किसी भी घटना से इस कहानी की कोई भी प्रासंगिकता होना एक संयोग है।


रविवार, 25 अप्रैल 2021

चिड़िया मुझसे बोली

चिड़िया मुझसे बोली 


आज एक चिड़िया उड़ती हुई मेरी खिड़की की ओर आई, पास की मुंडेर पर बैठ गई और फिर धीरे से चहचहाते मुझसे बोली - "कैसे हो? अभी तक तुम परिंदों को कैद करते रहे। अब तुम्हें कैसा लग रहा है जब एक अदृश्य जीव ने तुम्हें कैद कर रखा है? निरुत्तर सा मैं उसे देख रहा था, यकायक फिर चहचहाई - "दूर कहीं मुझे है जाना, आकाश की ऊँचाई मुझे है नापना।" और फुर्र से उड़ गई।

- केशव राम सिंघल



चित्र साभार - इंटरनेट

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट

 

कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट  

 

माँ-बाप दोनों परेशान कि उनके बेटे को तीन-चार दिन से बुखार है। वीडियो चैटिंग से लिए डाक्टरी परामर्श के अनुसार वे बेटे को दवा दे रहें हैं पर बुखार उतर ही नहीं रहा। पड़ौसियों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि बेटे को अस्पताल ले जाओ, कहीं कोरोना ना हो। कोरोना का डर ऐसा कि कोई पास आना ही नहीं चाहता। पिता एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते हैं और माता गृहणी, मध्यमवर्गीय परिवार है और नौकरी के कारण पिछले पांच साल से इस शहर में रह रहे हैं। बेटे का एक मित्र है, जो इसी शहर में पला-बढ़ा है, शायद उससे कुछ मदद मिल जाए, यही सोच कर उसे फोन किया। उसने फोन पर कहा, अंकल चिंता मत करो मैं आता हूँ। माता-पिता दोनों को आशा की किरण दिखाई दी, ऐसे समय जब पड़ौसियों से अपेक्षित सहायता नहीं मिल पा रही हो। कष्ट के समय कोई साथ हो तो बहुत ढांढस मिलता है। 

 

करीब आध घंटा भी नहीं बीता होगा, बेटे का मित्र घर पर अपने एक और मित्र के साथ आ गया। माँ-बाप दोनों आश्वस्त हुए। मित्र ने बीमार को देखा और फिर बोला - अंकल, इसे हॉस्पिटल लेकर चलते हैं। प्राइवेट एम्बुलेंस फोन कर मंगाई, मरीज को एम्बुलेंस में लिटाया और चल पड़े शहर के एक अच्छे अस्पताल की ओर। मित्र ने अपने मित्र को हॉस्पिटल का नाम बताकर वहीं स्कूटर से पहुँचने के लिए कहा। पंद्रह मिनट में वे सभी अस्पताल पहुँच गए थे। अस्पताल वालों ने देखने से मना कर दिया, कहा कोविड-19 की टेस्ट रिपोर्ट लाओ। बिना कोविड-19 नेगेटिव रिपोर्ट के हम किसी मरीज को भर्ती नहीं कर सकते। सभी ने हॉस्पिटल प्रबंधन से बात करने की कोशिश की, पर प्रबंधन कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट देखे बिना मरीज को भर्ती करने के लिए तैयार नहीं। पिता ने, मित्र ने और उसके साथी ने खूब मिन्नतें की, पर अस्पताल वाले मरीज देखने के लिए तैयार नहीं। फिर दूसरे अस्पताल की ओर भागे तो वहाँ भी वही जवाब मिला। एम्बुलेंस में लेटे मरीज को हल्की खाँसी आ रही थी, गला सूख रहा था, साँस लेने में दिक्कत महसूस हो रही थी। प्राइवेट एम्बुलेंस में ऑक्सीजन की सुविधा नहीं। इधर मरीज की साँस उखड़ रही थी और अस्पताल वाले कानून समझा रहे थे। कई हॉस्पिटल वालों को मोबाइल फोन से संपर्क किया, सभी से वही नकारात्मक उत्तर कि बिना कोविड-19 नेगेटिव रिपोर्ट के हम मरीज नहीं भर्ती कर सकते। सरकारी अस्पताल से भी संपर्क किया गया। जहाँ भी बात की गई सब जगह यही जवाब, बेड खाली नहीं हैं, रिपोर्ट लाओ तब देखेंगे। एक हॉस्पिटल वाले जैसे-तैसे तैयार हुए, फिर उसी हॉस्पिटल की ओर भागे। अस्पताल वालों ने मरीज को आईसीयू में भर्ती कर लिया। अस्पताल वालों ने तुरत-फुरत मरीज को देखा, कोविड टेस्ट के लिए सैंपल लिया और साथ ही ऑक्सीजन लेवल जाँचा तो पाया कि वह पचास-साठ के बीच था। हॉस्पिटल वालों ने ऑक्सीजन लगा दी। अस्पताल वालों ने बीस हजार रुपये पेशगी जमा करने को कहा जो जमा करा दिए।  सभी निश्चिन्त हुए कि अब सब कुछ ठीक होगा।

 

रात को अस्पताल से फोन आया कि उनके पास सीमित मात्रा में ऑक्सीजन है, इसलिए ऑक्सीजन की व्यवस्था करने को कहा। सभी ने अपने स्तर पर कोशिश की। पर कोई स्रोत नहीं पता चल रहा था जहाँ से ऑक्सीजन उपलब्ध हो सके। अस्पताल वालों से कहा कि अपने सप्लायर को निवेदन करो तो जवाब मिला, उससे संपर्क कर लिया, उसके पास नहीं है, इन दिनों शॉर्टेज चल रही है। रात को और क्या हुआ, पता नहीं। सुबह मरीज की साँस फिर से उखड़ने लगी। हॉस्पिटल वालों ने फिर ऑक्सीजन की व्यवस्था करने को कहा। फिर सुबह दस बजे बोले - हमारी ऑक्सीजन ख़त्म हो गयी है, आप मरीज को कहीं और ले जाइये। कहीं और कहाँ ले जाते, सब जगह से नकारात्मक उत्तर मिल रहा था। सबने कोशिश की, कहीं एक बेड मिल जाए, एक वेंटिलेटर मिल जाए, कुछ हो न हो एक ऑक्सीजन सिलेंडर ही मिल जाए। सभी ने अपने जानकारों के मार्फ़त चीफ मेडिकल अफसर और प्रशासन के लोगों से भी संपर्क किया। कहीं से कोई सकारात्मक पहल होती दिखाई नहीं दी। खूब कोशिश की पर सभी अपनी कोशिशों में असफल।

 

करीब बारह बजे अस्पताल वालों ने एक एम्बुलेंस से मरीज को शहर के सरकारी अस्पताल को रेफर कर दिया। उसी सरकारी अस्पताल को जहाँ कल संपर्क किया था और उन्होंने बेड खाली नहीं है का उत्तर दिया था। मरीज की साँसे उखड़ रही थीं। अस्पताल वालों ने जिस एम्बुलेंस में मरीज को सरकारी अस्पताल भेजा, उस एम्बुलेंस में भी ऑक्सीजन की सुविधा नहीं थी। रास्ते में मरीज का शरीर ठंडा पड़ने लगा, मूँह से झाग निकले और फिर कुछ देर में दिल की धड़कन बंद हो गयी।

 

बिना उपयुक्त इलाज के चला गया वह पच्चीस साल का युवा। किसे दोष दें, देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को या अपने भाग्य को? हाँ, एक बात और, उस युवा की कोविड-19 टेस्ट रिपोर्ट उसके मरने के बाद आ ही गयी, जो नेगेटिव थी।

 

कहानीकार लेखक - केशव राम सिंघल ©

प्रकाशन / साझा करने की अनुमति - कहानीकार लेखक के नाम के साथ इस कहानी के प्रकाशन / साझा करने की अनुमति है।

डिस्क्लेमर - यह कहानी कहानीकार लेखक की कल्पना के आधार पर लिखी गई है। किसी भी घटना से इस कहानी की कोई भी प्रासंगिकता होना एक संयोग है।

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