शनिवार, 21 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - विषय-सूची (Index), प्रस्तावना (Preface) और समर्पण

कोरोना काल के संस्मरण 


विषय-सूची (Index)


लेखक - केशव राम सिंघल

प्रस्तावना (Preface) 

समर्पण

कोरोना काल के संस्मरण - भाग 1 - अंश 1 से 10 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 1 - उलझन के साथ भ्रम की स्थिति 

अंश 2 - स्पर्श खतरनाक 

अंश 3 - नर्स की व्यथा 

अंश 4 - मजदूर की व्यथा 

अंश 5 - स्पर्श की मनाही 

अंश 6 - देश की संसद मौन 

अंश 7 - बहुत से सवाल 

अंश 8 - सामूहिक शोक पर विराम 

अंश 9 - मुश्किल वक्त में लोगों की मदद 

अंश 10 - संवेदनाओं का अकाल 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 2 - अंश 11 से 20 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 11 - रोशनी के कण 

अंश 12 - अस्तित्व का संकट और प्रकृति का पुनर्जन्म 

अंश 13 - भरोसे का बिखराव 

अंश 14 - हाशिए के बार श्रमिक 

अंश 15 - अन्य बीमारियों के मरीज नियति के भरोसे 

अंश 16 - आसमान में दिखा आसमान का नीला रंग (काव्य) 

अंश 17 - राजनेताओं का एकाधिकारवादी रवैया 

अंश 18 -  कोई निश्चित इलाज नहीं 

अंश 19 - शिक्षा का संकट 

अंश 20 - बेरोजगारी 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 3 - अंश 21 से 30 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 21 - अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद 

अंश 22 - चिंताजनक वैश्विक स्थिति 

अंश 23 - बुजुर्ग 

अंश 24 - बेटियों का दवाब 

अंश 25 - प्रशासनिक दावों और जमीनी हकीकत की खाई 

अंश 26 - मानवता की मिसाल 

अंश 27 - कोविड वैक्सीन (काव्य) 

अंश 28 - प्रार्थना (काव्य) 

अंश 29 - डर ही वायरस है (काव्य) 

अंश 30 - कोरोना एक भीषण युद्ध (काव्य) 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 4 - अंश 31 से 40 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 31 - हे कोरोना (काव्य) 

अंश 32 - मेरा माफीनामा (काव्य) 

अंश 33 - कोरोना काल (काव्य) 

अंश 34 - विडम्बना और त्रासदी 

अंश 35 - कड़वा सत्य 

अंश 36 - गरीबी भी महामारी 

अंश 37 - मशवरों का अम्बार 

अंश 38 - दुआ ही दवा (काव्य) 

अंश 39 - अँधेरे में तीर 

अंश 40 - एक समीक्षा 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 5 - अंश 41 से 50 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 41 - इतिहास की चेतावनी - 1918 की सीख 

अंश 42 - नियमों की व्याख्या 

अंश 43 - अनसुलझा प्रश्न 

अंश 44 - बुनियादी शिक्षा 

अंश 45 - श्रद्धांजलि 

अंश 46 - परिवर्तन - शाश्वत सत्य (काव्य) 

अंश 47 - सांसद की कोठी के बाहर (काव्य) 

अंश 48 - कफनखसोटों का मुल्क 

अंश 49 - वह देश का गरीब था (काव्य) 

अंश 50 - भयावह कालखंड 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 6 - अंश 51 से 60 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 51 - दुःख भरी दास्ताँ 

अंश 52 - सकारात्मक रहिए (काव्य) 

अंश 53 - सुरक्षा ही समाधान (काव्य) 

अंश 54 - सकारात्मकता और मानवता 

अंश 55 - जीवन दर्शन 

अंश 56 - बच्चों की शिक्षा 

अंश 57 - क्या स्कूल भेजना सुरक्षित?

अंश 58 - अजमेर से विदा और जनता कर्फ्यू की आहट 

अंश 59 - मन का वहम और 69 वर्ष का वह पड़ाव 

अंश 60 - सन्नाटा, प्रकृति और 21 दिनों की लक्ष्मण रेखा 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 7 - अंश 61 से 70 (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 61 - पैदल महाप्रयाण और  व्यवस्था 

अंश 62 - सृजन और 'भीलवाड़ा मॉडल' 

अंश 63 - कैदी-जेलर द्वन्द और सेवाभाव को सलाम 

अंश 64 - विचलित मन, विसंगतियाँ और 5 अप्रेल की रोशनी 

अंश 65 - कृतज्ञता की दीये, घर की कैद और व्यवस्था का द्वन्द 

अंश 66 - टोटकों का देश 

अंश 67 - बेबसी और गुड्डी 

अंश 68 - दुःखद समाचार और परिस्थितियों के बीच 

अंश 69 - कन्टेनमेंट ज़ोन की घोषणा और अचानक यात्रा 

अंश 70 - अजमेर की पुकार और गुड्डी की सेवा 


कोरोना काल के संस्मरण - भाग 8 - अंश 71 से 74  (पढ़ने के लिए यहॉं क्लिक करें)

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अंश 71 - युग का अंत और गुड्डी की अंतिम यात्रा 

अंश 72 - टीकाकरण की सुरक्षा और विदाई का अंतहीन सिलसिला 

अंश 73 - इतिहास का आइना और भविष्य की सीख 

अंश 74 - उपसंहार - स्मृतियों का पाथेय और एक नई सुबह - संकट में सृजन और समय का सदुपयोग 

लेखक परिचय 

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प्रस्तावना (Preface)

"कोरोना काल के संस्मरण - एक अंतर्यात्रा"

वर्ष 2020 की वह आहट, जिसने पूरी दुनिया की रफ्तार थाम दी थी, मेरे लिए केवल एक वैश्विक महामारी नहीं, बल्कि आत्म-मंथन और स्मृतियों को सहेजने का एक पड़ाव बन गई। आज जब मैं इन 74 अंशों की श्रृंखला को पाठकों के सम्मुख रख रहा हूँ, तो मन में संतोष और कृतज्ञता का मिला-जुला भाव है।


संस्मरण लिखना कितना कठिन कार्य है, इसका आभास मुझे तब हुआ जब मैंने कलम उठाई। डायरी के पन्नों में दर्ज नोट्स संक्षिप्त होते हैं, पर उन पन्नों के पीछे छिपी संवेदनाओं और विस्तार को शब्दों में ढालना एक बड़ी चुनौती थी। लिखते समय मैंने इस बात पर बहुत विचार किया कि अभिव्यक्ति की विधा क्या हो? अंततः मैंने तय किया कि जैसे-जैसे भाव मन में आएँगे, उन्हें वैसे ही कागज़ पर उतारूँगा। यही कारण है कि इस यात्रा में पाठकों को कभी गद्य मिलेगा, तो कभी पद्य।


इन संस्मरणों की विषयवस्तु केवल मेरी स्मृतियों तक सीमित नहीं है। इसमें मेरे स्वयं के लिखे नोट्स के साथ-साथ विभिन्न पुस्तकें, समाचार-पत्र, लेख, व्याख्यान और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का समावेश है। विशेष रूप से, आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), विशेषकर 'गूगल जैमिनी' के साथ हुए निरंतर संवाद ने मुझे कई स्थानों पर मार्गदर्शन और जानकारी प्रदान की है। मैं इन सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों के प्रति हृदय से आभार प्रकट करता हूँ।


प्रस्तुत संस्मरणों में दिए गए आँकड़े विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और तत्कालीन सूचनाओं पर आधारित हैं, जो अनुमानित हो सकते हैं। अतः यदि कोई पाठक इस विषय पर अकादमिक शोध या गंभीर विश्लेषण करना चाहे, तो उन्हें अधिकृत एवं आधिकारिक सरकारी स्रोतों से प्रमाणित आँकड़े प्राप्त करने की सलाह दी जाती है। यह संस्मरण सांख्यिकीय दस्तावेज़ से अधिक एक मानवीय अनुभव का जीवंत चित्र है।


70 वर्ष की आयु के इस पड़ाव पर, 'अहमदाबाद के उस 10x10 के कमरे' से लेकर 'अजमेर की पुकार' तक का यह सफर मेरे जीवन का सबसे संतोषजनक अध्याय है। उम्मीद है कि ये संस्मरण यह बता पाने में सफल रहेंगे कि आपदा के उस घने अंधेरे और डर के माहौल में भी हमने अपनों के साथ और सृजन की मशाल के सहारे रास्ता ढूँढ ही लिया।


सादर,

केशव राम सिंघल 

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समर्पण


यह संस्मरण श्रृंखला सादर समर्पित है—


मेरी प्रिय दिवंगत बहन 'गुड्डी' (सुधा) की पावन स्मृति को, जिनका शांत स्वभाव और कष्टों के बीच भी 'राम-राम' जपना मेरे लिए जीवन की सबसे बड़ी सीख बना। जिनके अंतिम पड़ाव में सेवा का अवसर मिलना मैं ईश्वर की विशेष कृपा मानता हूँ।


उन सभी 'कोरोना योद्धाओं' (चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, पुलिस और सफाईकर्मियों) को, जिन्होंने स्वयं के प्राणों की परवाह किए बिना मानवता की मशाल को जलाए रखा। साथ ही मैं मेरी बेटियों, दामादों और पत्नी का, जिनकी देखरेख के कारण मैं कोरोना काल में टूटने से बचता रहा और पढ़ने-लिखने में व्यस्त रहा। 


और उन अनगिनत दिवंगत आत्माओं को, जिन्होंने इस वैश्विक आपदा में हमसे विदा ली।यह लेखनी उन सभी के प्रति मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है।


सादर, 

केशव राम सिंघल

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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 8

कोरोना काल के संस्मरण - 8 


71

एक युग का अंत और 'गुड्डी' की अंतिम यात्रा


28 जनवरी 2021 को अजमेर नगर निगम के चुनाव थे। मधु और मैंने अपने नागरिक धर्म का पालन करते हुए वोट डाला। उसी दौरान मधु जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल से मिलने उनके घर गई। शरीर में एक अजीब सी थकान महसूस हो रही थी। बच्चों से लंबी चर्चा के बाद एक भारी मन से निर्णय लिया गया कि अब 70 की इस उम्र में हमारा अकेले अजमेर रहना ठीक नहीं। तय हुआ कि हम बारी-बारी से बेटियों के पास आते-जाते रहेंगे और बीच-बीच में अजमेर भी आते रहेंगे। अपनी जड़ों को छोड़ना कठिन था, पर बढ़ती उम्र और व्यावहारिकता के आगे झुकना पड़ा। 30 जनवरी 2021 को हम प्रदीप, दीप्ति और इनु के साथ बंगलुरु के लिए रवाना हो गए।


अभी बंगलुरु पहुँचे दो ही दिन हुए थे कि 1 फरवरी को मोहन का संदेश मिला—गुड्डी ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया था। वह निरंतर बेहोशी की स्थिति में थी और उसे नली के जरिए लिक्विड आहार दिया जा रहा था। अगले ही दिन, 2 फरवरी को उसका 62वाँ जन्मदिन था, पर नियति का क्रूर मजाक देखिए कि वह होश में भी नहीं थी। 3 फरवरी की सुबह 10 बजे हमें वह दुखद समाचार मिला जिसका अंदेशा तो था, पर मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था—गुड्डी हमें छोड़कर जा चुकी थी।


मैं बंगलुरु में होने के कारण जयपुर नहीं पहुँच सका। माघ कृष्ण षष्ठी, संवत 2077 के उस दिन तीनों भाइयों ने चाँदपोल शमशान घाट पर अपनी बहन का अंतिम संस्कार किया। गुड्डी का पूरा जीवन (62 वर्ष) शारीरिक कष्टों और दूसरों पर निर्भरता में बीता, पर उसका स्वभाव अत्यंत शांत था। अपनी कॉपी में निरंतर 'राम-राम' लिखना उसकी वह मूक प्रार्थना थी, जिससे शायद वह अपने अगले जन्म की राह सुगम कर रही थी। 9 फरवरी को पुष्कर में भाइयों द्वारा अस्थि-विसर्जन और 14 फरवरी को पैतृक घर में शांति हवन के साथ उसकी इस लोक की यात्रा पूर्ण हुई। मैंने बंगलुरु में रहकर प्रार्थना की। ईश्वर उसकी पुण्यात्मा को सद्गति प्रदान करे। सादर नमन, ओम शांति।


72

टीकाकरण की सुरक्षा और विदाई का अंतहीन सिलसिला


2021 की शुरुआत उम्मीद की एक नई किरण 'टीकाकरण' के साथ हुई। मार्च और अप्रैल 2021 में मधु और मैंने बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड स्थित कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल में वैक्सीन की दोनों डोज़ लगवाईं। सुरक्षा का कवच तो मिल गया था, पर नियति का क्रूर प्रहार थमा नहीं था। 26 अप्रैल को इंदौर से मधु के भाई अशोक अग्रवाल जी के निधन का समाचार मिला, और अभी एक महीना भी नहीं बीता था कि 22 मई को अजमेर के मित्तल हॉस्पिटल में जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल भी हमें छोड़कर चले गए। अगस्त 2021 में मित्र ओम प्रकाश जी की पत्नी और जनवरी 2022 में भाई मोहन के साले डॉ. हेमंत अग्रवाल का देहावसान हुआ। ऐसा लगता था जैसे इंसान और कोरोना के बीच एक अंतहीन युद्ध चल रहा है, जहाँ कभी हम जीतते, तो कभी हार जाते। नियति की आगे किसी का वश नहीं, यही सोच कर मन को तसल्ली दे लेते। भगवान् सभी दिवंगत आत्माओं को शान्ति प्रदान करे।  ओम शान्ति।


सरकार टीकाकरण को लेकर अत्यंत सजग थी। हम बेंगलुरु में थे, पर अजमेर के बीएलओ (BLO) ने फोन कर हमारी वैक्सीनेशन स्थिति की पुष्टि की। नवंबर 2021 में जब हम वापस अजमेर पहुँचे, तो बंद घर की उदासी दीमक के रूप में दीवारों पर चिपकी मिली। सीलन और दीमक ने मेरी प्रिय पुस्तकों को काफी नुकसान पहुँचाया था, जो मेरे लिए एक व्यक्तिगत आघात था। पेस्ट कंट्रोल के बाद हम कुछ दिन वहाँ रुककर अहमदाबाद होते हुए गोवा आ गए।


अब कोरोना जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका था। शायद ही कोई ऐसा परिवार बचा हो जिसने इस महामारी में अपना कोई प्रिय न खोया हो। गोवा के सांखली स्थित सरकारी अस्पताल में 20 जनवरी 2022 को हमने 'प्रिकॉशन डोज़' (तीसरी खुराक) भी लगवाई। इसी बीच अहमदाबाद से शिव्या के संक्रमित होने की खबर ने फिर बेचैन किया, पर सात दिनों के एकांतवास और दवाओं के बाद वह 'नेगेटिव' आ गई। धीरे-धीरे समय का पहिया घूमा, प्रकोप कम हुआ और देश की गतिविधियाँ पुनः पटरी पर लौटने लगीं। 70 वर्ष की दहलीज पर, हालाँकि कई बार मुझे हल्का बुखार हुआ, कभी-कभी खाँसी भी हुई, बहुत बार नकसीर भी आई, पर स्थितियाँ हर बार परिवार वालों के सहयोग से संभलती रहीं और मैं कोरोना की चपेट में आने से बचा रहा। परिवार के सहयोग और सजगता ने मुझे इस अदृश्य शत्रु से बचाए रखा।  


73

इतिहास का आईना और भविष्य की सीख


वर्ष 2021 के बीतते-बीतते जीवन की पटरी पर रौनक लौटने लगी थी। स्कूल, दफ्तर और बाज़ार अपनी पुरानी गहमा-गहमी में वापस आ रहे थे। अंततः 5 मई 2023 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोविड-19 को 'वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल' की श्रेणी से बाहर कर दिया। आंकड़ों की नज़र से देखें तो इस महामारी ने विश्व भर में लगभग 7.1 मिलियन (71 लाख) और भारत में आधिकारिक तौर पर 5.34 लाख से अधिक जीवन निगल लिए।


इतिहास के पन्ने पलटें, तो ठीक सौ साल पहले 1918-19 के 'स्पेनिश फ्लू' ने इससे भी भयानक तांडव मचाया था। उस समय न कोई वैक्सीन थी, न एंटीबायोटिक्स। भारत तब ब्रिटिश दासता में था और एक अनुमान के अनुसार सवा करोड़ भारतीयों ने अपनी जान गंवाई थी। मेरे परिवार का इतिहास भी उस त्रासदी से अछूता नहीं रहा; मेरे दादा-दादी बताते थे कि मेरे परदादा जी का देहांत उसी महामारी के दौरान हुआ था।


कोविड-19 की इस अग्निपरीक्षा ने मानव सभ्यता को दस अमूल्य पाठ पढ़ाए हैं -


(1) पूर्व तैयारी - एक मज़बूत स्वास्थ्य ढांचा और आकस्मिक चुनौतियों के लिए सदैव तत्पर रहना अनिवार्य है।

(2) विज्ञान की शक्ति - त्वरित अनुसंधान और वैक्सीन निर्माण ही जीवन रक्षक कवच हैं।

(3) स्वास्थ्य समानता (Equity) - दवाओं और टीकों का वितरण न्यायसंगत होना चाहिए, ताकि अमीर-गरीब का भेद जान न ले।

(4) मानसिक स्वास्थ्य - अलगाव और आर्थिक तनाव से उपजी एंग्जायटी को गंभीरता से लेना ज़रूरी है।

(5) सामुदायिक विश्वास - स्थानीय नेतृत्व और आपसी भरोसे ने ही संकट में ढाल का काम किया।

(6) सटीक सूचना - 'इन्फोडेमिक' (गलत सूचनाओं) से लड़ना और सही जानकारी पहुँचाना जान बचाने जितना ही महत्वपूर्ण है।

(7) अनुकूलनशीलता - मनुष्य ने ऑनलाइन शिक्षा और टेलीवर्क के ज़रिए साबित किया कि वह बदलती स्थितियों में ढल सकता है, पर विज्ञान के प्रति अनुकूलनशीलता सदैव आवश्यक है।

(8) आपूर्ति शृंखला - आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला को संकट के लिए और अधिक लचीला बनाना होगा।

(9) धैर्य और सेवा - मुश्किल हालात में घबराने के बजाय एक-दूसरे का संबल बनना ही असली मानवता है।

(10) वैश्विक सहयोग - सीमाएँ देशों को बांट सकती हैं, पर वायरस सीमाओं को नहीं मानता; अतः वैश्विक एकजुटता ही हमारा भविष्य है।


74

उपसंहार - स्मृतियों का पाथेय और एक नई सुबह


आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो 2020 से 2022 का वह समय किसी डरावने सपने जैसा लगता है, लेकिन उस सपने में भी अपनों के प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की सुहानी धूप खिली हुई थी। वह 10x10 का कमरा, हाथ पर बँधा वह स्टेप-काउंटर, 'इनु' की मासूम चहक, बेटियों की वह चिंता भरी झिड़की और सभी का वह निस्वार्थ सेवा भाव—ये सब अब मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन चुके हैं।


बहन 'गुड्डी' का जाना एक व्यक्तिगत शून्य छोड़ गया, पर संतोष इस बात का है कि उसके 'शेष' समय को हम 'विशेष' बना सके। कोरोना ने हमसे बहुत कुछ छीना, हमारे कई प्रियजनों को हमसे दूर कर दिया, लेकिन उसने हमें 'ठहरना' भी सिखाया। उसने हमें बताया कि तकनीक कितनी भी आगे निकल जाए, अंततः एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ और प्रकृति के सान्निध्य की ही आवश्यकता होती है।


अब जीवन फिर से अपनी पुरानी लय में है। अजमेर की गलियों में फिर वही रौनक है, गोवा के समुद्र में वही संगीत है और अहमदाबाद की व्यस्तता वैसी ही है। पर हम वह पुराने इंसान नहीं रहे; हम अब अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक कृतज्ञ हैं। विज्ञान ने हमें वैक्सीन दी, तो ईश्वर ने हमें एक-दूसरे का हाथ थामने का साहस दिया।


यह संस्मरण केवल मेरी डायरी के पन्ने नहीं हैं, बल्कि उस ऐतिहासिक कालखंड का एक छोटा सा दस्तावेज़ है, जिसे मैंने जिया है। मेरी लेखनी यहाँ विराम लेती है, पर स्मृतियाँ सदैव जीवंत रहेंगी। आशा है कि आने वाली पीढ़ियाँ जब इन पन्नों को पलटेंगी, तो वे केवल महामारी का डर नहीं, बल्कि मानवता की उस अजेय शक्ति को देखेंगी जिसने हारना नहीं सीखा। "रात कितनी भी काली क्यों न हो, सुबह का सूरज उगना तय है।"


संकट में सृजन - समय का सदुपयोग 


इस महामारी के दौर ने जहाँ सभी के लिए शारीरिक सीमाएँ तय कर दी थीं, वहीं मानसिक विस्तार के नए द्वार भी खोले। मैंने उस एकांत और अनिश्चितता के समय को पाठन और लेखन के नाम कर दिया। मुझे संतोष है कि कोरोना काल के उस कठिन समय में लिखीं मेरी निम्नलिखित पुस्तकें 'अमेज़न किंडल' पर प्रकाशित हुईं, जो आज भी पाठकों के लिए उपलब्ध हैं -


(1) अजमेर की दास्ताँ (3 मई 2021) - अपनी जड़ों और शहर की जानकारी को समर्पित।

(2) Training Handbook on ISO 9001:2015 QMS Awareness (6 मई 2021) - गुणवत्ता प्रबंधन जागरूकता के लिए।

(3) बिटकॉइन क्या है? (10 जून 2021) - नई डिजिटल अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास।

(4) Future Banking is Lean Banking (10 सितम्बर 2021) - बैंकिंग क्षेत्र में प्रक्रियाओं को समझने और सुधारने का एक प्रयास।

(5) Understanding Circular Economy (25 अप्रैल 2022) - सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अध्ययन।

(6) Implementing An Effective Quality Management System (7 सितम्बर 2023) - प्रभावशाली गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली लागू करने के लिए।


उपर्युक्त पुस्तकें महामारी के उस दौर के मेरे 'लेखन पुरुषार्थ' का प्रमाण हैं, जिसने मुझे टूटने नहीं दिया और महामारी के दौरान मुझे व्यस्त रखा। मेरी ये किताबें केवल ज्ञान का संग्रह नहीं, बल्कि उस अंधकार में जलाई गई मेरी अपनी मशालें थीं।


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 

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लेखक परिचय 

केशव राम सिंघल 

बहुमुखी प्रतिभा, मानवतावादी दृष्टिकोण और निरंतर सृजनशील व्यक्तित्व


केशव राम सिंघल एक ऐसी विलक्षण प्रतिभा हैं, जिनका जीवन विविध क्षेत्रों के गहन ज्ञान और अनुभवों का संगम है। बैंकिंग, गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (QMS), ऑडिटिंग, प्रकाशन, संपादन और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में आपकी विशेषज्ञता समाज के लिए प्रेरणादायी है।


अनुभवी बैंकर - 'बैंक ऑफ इंडिया' से मिडल मैनेजमेंट (ग्रेड-II) अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त, जहाँ आपने वित्तीय तंत्र की सूक्ष्मताओं को आत्मसात किया।


विशेषज्ञता - गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (ISO 9001:2015) और क्यूएमएस ऑडिट में दीर्घकालीन अनुभव।


सृजनशील लेखक व प्रशिक्षक - जटिल अवधारणाओं को सीखकर उन्हें सरल भाषा में जनमानस तक पहुँचाने की अद्भुत क्षमता।


14 मार्च 1951 (गाजियाबाद) में जन्मे श्री सिंघल एक ध्येयनिष्ठ, आशावादी और सामाजिक व्यक्तित्व हैं। व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की आपकी दूरदृष्टि ही आपको निरंतर सक्रिय रखती है। एक संवेदनशील श्रोता और समर्पित कार्यकर्ता के रूप में आप विभिन्न संगठनों से जुड़कर 'मानवता के कल्याण' हेतु कार्यरत हैं।


सृजन पथ - कोरोना काल की आपदा को 'अवसर' और 'अध्ययन' में बदलकर आपने 6 पुस्तकें 'अमेज़न किंडल' पर प्रकाशित कीं, जो आपके अटूट 'लेखन पुरुषार्थ' का प्रमाण हैं।


🔗 विस्तृत परिचय: https://profile-keshavramsinghal.blogspot.com/

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कोरोना काल के संस्मरण - 7

 कोरोना काल के संस्मरण - 7 


61

मजदूरों का पैदल महाप्रयाण और व्यवस्था की दरारें


24 मार्च की रात आठ बजे घोषणा हुई और केवल चार घंटे बाद ही देश थम गया। इस 'थमे हुए देश' में जो सबसे तेज़ गति से चला, वह था 'बेबस मजदूर'। हजारों-लाखों प्रवासी श्रमिक अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए, सिर पर गृहस्थी की पोटली रखे, हजारों किलोमीटर के सफर पर पैदल ही निकल पड़े। उनके लिए न तो रोज़गार बचा था, न ही छत की गारंटी। परिवहन के सारे साधन—रेल, सड़क, वायु—बंद थे।


हमारी सोसायटी के घरों में अखबारों का वितरण थम चुका था, इसलिए खबरों के लिए ई-पेपर और टीवी ही मेरा सहारा थे। बरेली में मजदूरों पर केमिकल छिड़काव की खबरें हों या बिहार में उन्हें जेल भेजे जाने की बेबसी—हर सूचना मन को विचलित कर रही थी। अनुमानतः दस करोड़ प्रवासी मजदूरों को जैसे व्यवस्था ने उनके हाल पर छोड़ दिया था। एक ओर केंद्र सरकार ने जीडीपी का मात्र एक प्रतिशत आवंटित किया, वहीं ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों ने बीस प्रतिशत तक का प्रावधान किया था।


उत्तर प्रदेश और दिल्ली राज्य सरकारों के बीच समन्वय का अभाव और एक-दूसरे पर दोषारोपण ने इस मानवीय संकट को और गहरा कर दिया। केंद्र का 'जहाँ हैं वहीं रुकें' का आदेश और राज्यों की 'घर वापसी' की आधी-अधूरी तैयारी के बीच मजदूर पिसता रहा। 30 मार्च आते-आते विभिन्न राज्यों से उठता हुआ यह जनसैलाब राजनीति का मोहरा बन गया। उन मजदूरों के पैरों के छाले दरअसल हमारे तंत्र की विफलता के गवाह थे।

 

62

सृजन का सम्बल और 'भीलवाड़ा मॉडल' की धमक


अहमदाबाद के उस फ्लैट में स्थितियाँ विकट थीं, पर मैंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। नकारात्मक खबरों के बीच मन को शांत रखने के लिए मैंने कई लघु-कथाएँ और कहानियाँ लिखीं, फेसबुक और अपने ब्लॉग पर साझा किया। उस दौर में पढ़ना और लिखना ही मेरे लिए 'क्वालिटी टाइम' की एक छोटी सी खिड़की थी।


इसी दौरान मेरे गृह-राज्य राजस्थान से एक आशा की किरण दिखी—'भीलवाड़ा मॉडल'। तत्कालीन जिलाधीश राजेंद्र भट्ट और मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मुश्ताक खान के नेतृत्व में भीलवाड़ा ने जो 'महाकर्फ्यू' और 'स्क्रीनिंग' का साहस दिखाया, वह पूरे देश के लिए नज़ीर बन गया। 24 लाख लोगों की स्क्रीनिंग करना कोई साधारण बात नहीं थी। जब देश कोरोना संक्रमण से लड़ना सीख ही रहा था, तब भीलवाड़ा प्रशासन ने अपनी सीमाएं सील कर वायरस को वहीं रोकने का अभूतपूर्व प्रयास किया।


मार्च 2020 का अंत आर्थिक और कानूनी मोर्चों पर भी उथल-पुथल भरा था। वित्तीय वर्ष 2019-20 के समापन पर केंद्र सरकार ने 'अनुपालन' (Compliance) की तारीखें आगे बढ़ाईं, जिससे आम आदमी को थोड़ी राहत मिली। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाते हुए स्पष्ट आदेश दिया कि शेल्टर होम का प्रबंधन पुलिस नहीं, बल्कि स्वयंसेवक करें और वहां 'शक्ति' का प्रयोग वर्जित हो। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के वे शब्द आज भी कानों में गूँजते हैं कि गाँवों की ओर लौटते हर दस में से तीन मजदूर संक्रमित हो रहे थे। यह एक ऐसी लड़ाई थी जहाँ दुश्मन अदृश्य था और डर साक्षात।


उस समय की एक लघु कथा - राजा की मुनादी - सभी होशियार रहें !

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सभी जगह सन्नाटा पसरा है। राज्य में राजा ने मुनादी करवा दी है कि जो जहां है, उसी जगह रुक जाए। कोई आना जाना नहीं। एक भयंकर सूक्ष्म जीवाणु निकला है घूमने। जो उसके रास्ते में आएगा, उसका वह काल बन जाएगा।

सूक्ष्म जीवाणु स्वतंत्र घूम रहा है और प्रकृति पर विजय की चाह रखने वाला अहंकारी मानव अपने घरों में कैद है। हा ... हा ... हा ...!

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मन में कैदी-जेलर द्वंद्व और सेवाभाव को सलाम


अहमदाबाद के उस फ्लैट में रहते हुए मुझे कभी-कभी लगता था कि मैं स्वयं की कैद में हूँ। वह फ्लैट मेरा जेलखाना बन गया था, जहाँ मैं ही कैदी था और मैं ही जेलर। मेरा मन कैद को छोड़कर भाग जाना चाहता था, पर विवेक का जेलर उसे सुरक्षा के नाम पर वापस पकड़ लेता था।


इस कठिन समय में 'डिजिटल इंडिया' का एक वरदान रूप सामने आया। शिव्या घर की ज़रूरतें और दवाइयाँ ऑनलाइन ऑर्डर कर देती थी। रात नौ बजे से पहले किया गया ऑर्डर अगली सुबह दरवाज़े पर टंगे थैले में मिल जाता था। दूधवाला हो या डिलीवरी बॉय, ये वे 'अदृश्य कोरोना योद्धा' थे जो अपनी जान हथेली पर रखकर हमें जीवन की सुगमता दे रहे थे। इन सेवाभावियों को मेरा शत-शत नमन।


परंतु, हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं था। उसी दौरान 'लाइव हिन्दुस्तान' की एक रिपोर्ट पढ़कर मन कराह उठा। नोएडा से जालौन तक 200 किलोमीटर का सफर पैदल तय करने वाली एक 8 माह की गर्भवती महिला की कहानी व्यवस्था की विफलता और मानवीय जिजीविषा का चरम थी। ठेकेदार द्वारा पैसे रोके जाने के कारण उन्हें निकलने में देरी हुई, फिर भी दो दिन-रात पैदल चलकर वे अपने गाँव पहुँचे। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि उस अवस्था में उस महिला ने किन परिस्थितियों का सामना किया होगा।


इन विचलित करने वाली खबरों के बीच मैंने तय किया कि समय का सदुपयोग किया जाए। एक प्रोफेशनल होने के नाते मैंने ISO 9001:2015 QMS Awareness पर एक निःशुल्क ऑनलाइन ट्रेनिंग कोर्स शुरू करने का निश्चय किया। अपने ब्लॉग और सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी साझा की और ट्रेनिंग मटेरियल तैयार करने में जुट गया। आपदा के उस सन्नाटे में 'सृजन' ही मेरा संबल बना। ट्रेनिंग मटीरियल, आवश्यक सम्प्रेषण और असाइनमेंट मैं ईमेल से भेजता था। ट्रेनर-ट्रेनी के बीच बातचीत का माध्यम WhatsApp था। इस ट्रेनिंग में देश के विभिन्न भागों से लोगों ने भाग लिया। एक ट्रेनी तो विदेश (Phillipines) से भी था। 


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विचलित मन, विसंगतियां और 5 अप्रैल की वह रोशनी


अहमदाबाद के सरखेज सर्कल के पास उस एकांत सोसाइटी में मेरा जीवन घर की दीवारों तक सिमट गया था। शिव्या ही बाहरी दुनिया और सोसाइटी के वॉट्सएप्प ग्रुप की खबरों का मेरा एकमात्र सेतु थी। मन बाहर टहलने को मचलता, पर अंततः घर के भीतर ही टहलकदमी कर शांत हो जाता।


खबरों का संसार उस समय हृदय विदारक था। आंध्र प्रदेश में एक पिता का अपने मासूम बेटे के शव को कंधे पर रखकर 88 किलोमीटर पैदल चलना व्यवस्था की शून्यता को दर्शाता था। जहाँ एक ओर साधन संपन्न लोग पान जैसी मामूली चीज़ों के लिए कंट्रोल रूम को परेशान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर हजारों किलोमीटर दूर से ठेला चलाकर घर लौटते मजदूरों की दास्ताँ मानवता की परीक्षा ले रही थी। सरकार ने हरिद्वार में फंसे श्रद्धालुओं को तो बसों से घर पहुँचाया, पर सड़कों पर पैदल चलते उन बेबस मजदूरों के लिए समन्वय की भारी कमी दिखी।


उसी दौरान हमारे दूधवाले का फोन आया। उसने पूछा कि क्या हमें और अधिक दूध चाहिए? उसकी बातों से पता चला कि लॉकडाउन ने ग्रामीण दूध व्यवसाय की कमर तोड़ दी थी। ग्राहकों के न मिलने और परिवहन ठप होने से दूध वाले औने-पौने दामों पर दूध बेचने को मजबूर थे। यह देखना दुःखद था कि जहाँ शहरों में लोग दूध के लिए परेशान थे, वहीं गाँवों में पशुपालकों का निवेश मिट्टी में मिल रहा था।


इन नकारात्मकताओं के बीच मैंने अपना 'डिजिटल मोर्चा' संभाला। फेसबुक पर "तालाबंदी के दौरान की कविता" समूह बनाकर कवियों को एक मंच दिया। उधर, प्रकृति ने अपनी छटा बिखेरनी शुरू की—प्रदूषण मुक्त हवा के कारण जालंधर से हिमालय की बर्फीली चोटियाँ दिखने लगीं और गंगा का पानी आचमन योग्य हो गया।


5 अप्रैल 2020 की रात ठीक 9 बजे, प्रधानमंत्री के आह्वान पर हमने भी अपनी रसोई की खिड़की पर नौ दीये जलाए। मन में एक तार्किक प्रश्न जरूर उठा कि क्या इन दीयों से वायरस भागेगा? पर जब खिड़की से बाहर देखा, तो हर घर से आती वह रोशनी उस सामूहिक संकल्प और अकेलेपन के विरुद्ध एक युद्ध जैसी लग रही थी। वह दीया वायरस मारने के लिए नहीं, शायद उम्मीद को जीवित रखने के लिए था।


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कृतज्ञता के नौ दीये, घर की कैद और व्यवस्था का द्वंद्व


5 अप्रैल 2020 की रात ठीक नौ बजे, हमने नौ दीये जलाए। वे केवल रोशनी नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रार्थना थी। पहला दीया देश और समाज कल्याण के लिए था, तो अन्य दीये स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों, पुलिस, मीडिया, दूधवालों और बैंक कर्मचारियों की सलामती के लिए थे। अंतिम दीया अपनों और मित्रों की कुशलता के लिए समर्पित था।


उस समय केवल लोग ही नहीं, बीमा कंपनियाँ भी इस वायरस से सहमी हुई थीं। उन्हें चिंता थी कि निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर आने वाले लाखों के बिल उनके बजट को बिगाड़ देंगे। भय ऐसा था कि लोग पूरी तरह घरों में कैद थे। मैं भी 19 मार्च से अहमदाबाद में शिव्या के साथ था। वह दिनभर एक कमरे में ऑफिस का काम करती और मैं दूसरे कमरे में रहता। मेरा वह 10x10 वर्गफुट का कमरा ही मेरी दुनिया थी। शिव्या मुझे घर का काम नहीं करने देती थी, पर मैं मन बहलाने के लिए कभी मेथी-पालक साफ़ कर देता, कभी सब्जी काट देता या आटा गूँथ देता। बर्तन धोने की तो सख्त मनाही थी। घर से बाहर निकलना वर्जित था, इसलिए मैं कमरे से हॉल तक ही चहल-कदमी करता। मेरा 'हैंड-बैंड' रोज़ाना लगभग 6000 कदम दर्ज करता था—यही मेरा एकमात्र व्यायाम था।


एकांत के उन दिनों में जयपुर से मित्र ओम प्रकाश स्वर्णकार का फोन आना या बेटियों से वीडियो कॉल पर बात करना सुकून देता था। उधर, वैश्विक स्थिति भयावह थी। अप्रैल के प्रारंभ तक लाखों संक्रमित हो चुके थे, पर शीर्ष नेता किसी अंधेरे कमरे में उस 'काली बिल्ली' को ढूंढ रहे थे जो वहाँ थी ही नहीं। भारत में 4 अप्रैल तक केवल 75 हज़ार टेस्ट हुए थे, जबकि अमेरिका और जर्मनी लाखों में जाँचें कर रहे थे। 'सीआईआई' की रिपोर्ट 52 प्रतिशत नौकरियों के जाने का खतरा जता रही थी।


डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने 'राष्ट्रदूत' में सटीक लिखा था कि यह 'साँप-सीढ़ी' का खेल बन गया है, जहाँ एक चूक हमें वापस नीचे पटक देती है। 5 अप्रैल की रात को लेकर समाज बँटा हुआ था। किसी ने इसे 'नीरो के बंशी बजाने' जैसा बताया, तो किसी ने पटाखों के शोर पर व्यंग्य किया। विडंबना देखिए—देश में लोग ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे थे और कुछ लोग दीये के नाम पर पटाखे फोड़कर जश्न मना रहे थे। किसी ने चुटकी ली कि हनुमान जी की तरह हम भी अति-उत्साही भक्त हैं—प्रभु ने दीया जलाने को कहा और हमने लंका फूँकने जैसा माहौल बना दिया।


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टोटकों का देश, कड़वा सच और लॉकडाउन का अनंत विस्तार


उस दौर के भारीपन को कम करने के लिए हास्य-व्यंग्य ही एक सहारा था। उन दिनों मैंने एक कविता लिखी, जो उस समय के सामूहिक मनोविज्ञान को दर्शाती थी -


टोटकों वाला देश है मेरा


टोटकों वाला देश है मेरा, 

टोटका करने में क्या जाता है मेरा?

जब दिखता नहीं कोई रास्ता, 

तब टोटका जोड़ देते हैं बचाव का वास्ता।


विश्व में हमारे देश का नाम है, 

हमारी अनूठी परम्पराओं की अलग पहचान है।

टोटकों से बनती हमारी अपनी आन-बान-शान है, 

लगता है टोटकों से बचेगी हमारी जान है।


कोरोना से बचना है तो, बार-बार हाथ धोना सीख ले,

लोगों से दूर एकांत में अकेला रहना सीख ले।

बचाव का अभी तक कोई टीका बना नहीं, 

बचना है तो ताली-थाली बजाना सीख ले,

खुद अंधेरे में दीया जलाना सीख ले।


जान ले, कोरोना ने बहुतों को मारा है, 

अब संक्रमण से बचना ही एकमात्र सहारा है।

रास्ता कोई और दिखता नहीं, 

टोटका भी एक सहारा है।


लिखने-पढ़ने की इस व्यस्तता ने मुझे सुस्ती और मानसिक बोझ से बचाए रखा। मुझे बरसों से 'नकसीर' (नाक से खून आने) की समस्या थी, जिससे मेरी तीनों बेटियाँ सदैव चिंतित रहती थीं। पर मैंने स्वयं को ISO 9001 QMS Awareness ट्रेनिंग प्रोग्राम में पूरी तरह झोंक दिया था। ट्रेनिंग मटेरियल तैयार करना और देश-विदेश से आए प्रतिभागियों के असाइनमेंट जाँचना—यही मेरी दिनचर्या थी। बस दुःख एक ही था कि उस 10x10 के कमरे वाले फ़्लैट से बाहर कदम रखना मुमकिन न था।


वैश्विक परिदृश्य भी कम विचित्र न था। शक्तिशाली अमेरिका अपने नागरिकों को विमान भरकर भारत से निकाल रहा था। उधर, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपनी चिर-परिचित आदत के अनुसार 'हाइड्रोक्लोरोक्वीन' दवा के निर्यात को लेकर भारत को धमकी भरे लहजे में चेतावनी दे रहे थे। हमारी 'वसुधैव कुटुम्बकम' की संस्कृति ने उस दबाव को भी झेला और व्यापक मानवीय जरूरतों को देखते हुए निर्यात से रोक हटा ली।


समाज का एक कड़वा सच यह भी दिखा कि इस महामारी की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी। विडंबना देखिए—संक्रमण अमीर लाए, जो विदेश यात्राओं से हवाई जहाज में बैठकर आए थे और जिन्होंने क्वारंटाइन नियमों का पालन नहीं किया था, पर तोहमत उन गरीबों पर मढ़ी गई जो सड़क पर पैदल चलने को मजबूर थे। वाराणसी की वह हृदय विदारक घटना जिसमें एक पत्नी को अपने पति की अर्थी के लिए चार कंधे तक नसीब नहीं हुए और उसे स्वयं मुखाग्नि देनी पड़ी, यह हमारे सामाजिक ताने-बाने के टूटने का चरम था।


15 अप्रैल से ट्रेनों के चलने की एक धुंधली सी आस थी, पर 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने राज्यों की सिफारिश पर लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ा दिया। इसके बाद यह सिलसिला थमा नहीं—1 मई को इसे 17 मई तक और फिर 17 मई को इसे 31 मई तक बढ़ा दिया गया। पूरा देश लाल, नारंगी और हरे ज़ोन में बँट चुका था। 'अजमेर वापसी' का सपना अब तारीखों के इस जाल में कहीं उलझ कर रह गया था।


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बेबसी और 'गुड्डी'  


अहमदाबाद की गर्मी मुझे अजमेर से कहीं अधिक प्रतीत हुई, पर सौभाग्य से फ्लैट के दोनों कमरों में एसी (AC) होने के कारण शारीरिक राहत मिली। मन तो बार-बार अजमेर के बंद घर की ओर भागता, पर लॉकडाउन की बंदिशों और बच्चों की जायज़ झिड़कियों के आगे मैं विवश था। उनकी अपनी मजबूरियाँ थीं और बाहर के हालात भी अनुकूल नहीं थे।


इसी बीच जून 2020 में एक ऐसी पारिवारिक खबर आई जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। मेरी छोटी दिव्यांग बहन सुधा (गुड्डी), जो 60 वर्ष की थी और जयपुर के पैतृक मकान में भाई मोहन के साथ रहती थी, के सीने में 'ब्रेस्ट ट्यूमर' का पता चला। पूरा देश कोरोना से लहूलुहान था और उसी दौरान गुड्डी के कैंसर की स्थिति गंभीर बताई गई। 22 जून 2020 को जयपुर स्थित भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल में उसका टेस्ट हुआ और दुर्भाग्य से वह कोरोना पॉजिटिव भी पाई गई।


23 जून को भाई मोहन और महेश उसे लेकर सीतापुरा स्थित महात्मा गाँधी हॉस्पिटल (MGH) पहुँचे। वहाँ एक अजीब प्रशासनिक बाधा आई; शाम तक उसका नाम कोरोना मरीजों की सरकारी लिस्ट में अपडेट नहीं हुआ था, जिस कारण उसे भर्ती करने में घंटों की देरी हुई। अंततः जब उसे भर्ती किया गया, तो नियम इतने सख्त थे कि मरीज के साथ कोई अटेंडेंट नहीं रह सकता था। वह अपाहिज बहन, जो ठीक से सीधी लेट भी नहीं सकती थी, अस्पताल के कमरे में 'भगवान भरोसे' अकेले छोड़ दी गई। मोहन रात 11 बजे घर पहुँच पाया क्योंकि कर्फ्यू और टैक्सी न मिलने के कारण रास्ते बंद थे।


अहमदाबाद में बैठा मैं व्याकुल था। मेरे तीनों भाई—मोहन, महेश और गोपाल—जयपुर में थे, पर संक्रमण के डर और सरकारी गाइडलाइन्स के कारण वे सब 'होम क्वारंटाइन' में थे। मेरी व्याकुलता देख शिव्या ने तुरंत मोहन के खाते में सहायता राशि भेजी ताकि इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सके। गोवा से दिव्या ने अस्पताल के डॉक्टर शशांक मेहरा से संपर्क किया और बुआ की दिव्यांगता के बारे में बताया, जिस पर उन्होंने नर्सिंग स्टाफ द्वारा विशेष ध्यान रखने का आश्वासन दिया।


गुड्डी अकेले उस 6500 रुपये प्रतिदिन वाले कमरे में कैसे समय बिताती होगी, यह सोचकर मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहता। 30 जून को राहत मिली जब उसके दो कोविड टेस्ट नेगेटिव आए। 1 जुलाई को वह घर लौटी, पर संकट टला नहीं था। ट्यूमर से ब्लीडिंग इतनी ज्यादा थी कि बिस्तर लाल हो जाता। बायोप्सी रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कैंसर अंतिम चरण में था। अपाहिज होने के कारण न तो उसका ऑपरेशन संभव था और न ही वह कीमोथेरेपी सहन कर पाती। गुड्डी को आयुर्वेद अस्पताल भी दिखाया गया। डॉक्टरों ने केवल दवाइयाँ ही उचित समझीं। उन दिनों मोबाइल पर मोहन और गुड्डी से बात होती, तो उसकी तकलीफ सुन गला भर आता। अस्पताल से लौटने के बाद उसे दस्त भी हो गए थे। शिव्या ने पुनः सहायता राशि भेजी, क्योंकि कैंसर की दवाइयाँ बहुत महँगी थीं। मैं अलग शहर में था, बस दुआ ही कर सकता था— "हे भगवान! अब तेरा ही आसरा है।" 


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दुःखद समाचार और परिस्थितियों के बीच 


जुलाई 2020 का अंत एक दुःखद समाचार लेकर आया। अजमेर के प्रतिष्ठित समाजसेवी और मेरे प्रिय मित्र नवीन सोगानी जी का देहावसान हो गया। मन अत्यंत व्यथित हुआ; समाज ने एक सच्चा सेवाभावी खो दिया था। नियति के आगे किसी का वश नहीं चलता, यही सोचकर स्वयं को ढांढस बंधाया। सादर नमन, ओम शांति।


अगस्त के अंत में जानकारी मिली कि दीप्ति के ससुर (जो बांसवाड़ा के गढ़ी गाँव में रहते थे) का स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। 1 सितंबर 2020 को उनके बड़े बेटे प्रमोद उन्हें टैक्सी से लेकर अहमदाबाद के 'किडनी हेल्थ हॉस्पिटल' पहुँचे। रास्ते में दोनों की तबीयत भी नासाज थी। स्थिति की गंभीरता देख प्रदीप, दीप्ति और छोटी इनु तुरंत बंगलुरु से फ्लाइट पकड़कर अहमदाबाद आ गए। इनु को हमारे पास छोड़कर दोनों अस्पताल की व्यवस्थाओं में जुट गए। दीप्ति के मौसी के बेटे अनुज ने अपनी कार उन्हें उपलब्ध कराई, जिससे इस कठिन समय में आवाजाही आसान हो गई। प्रमोद भी पाँच-छह दिन अस्पताल में भर्ती रहे, आखिरकार कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट आने पर हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर गढ़ी लौट सके। 


अस्पताल में ससुर जी को 'प्लाज्मा' चढ़ाने की नितांत आवश्यकता थी। उस समय प्लाज्मा डोनर मिलना किसी चुनौती से कम नहीं था। अंततः सोशल मीडिया पर की गई अपील रंग लाई और एक निस्वार्थ डोनर मिल गया। उधर प्रमोद की तबीयत खराब होने के कारण उन्हें भी भर्ती करना पड़ा, पर ईश्वर की कृपा रही कि उनकी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई और वे डिस्चार्ज होकर गढ़ी लौट सके। प्रदीप के पिताजी कई दिनों तक जीवन और संक्रमण के बीच जूझते रहे। उन्हें प्लाज्मा के अलावा रक्त भी चढ़ाया गया, पर उनके जुझारूपन, अपनों और अस्पताल-कर्मियों की सेवा ने रंग दिखाया। 22 सितंबर 2020 को उन्होंने संक्रमण को मात दे दी और अस्पताल से डिस्चार्ज हुए। प्रदीप और दीप्ति उन्हें सकुशल गढ़ी छोड़ने गए। कई दिनों के तनाव के बाद, यह हम सभी के लिए बड़ी राहत और संतोष का क्षण था।


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कन्टेनमेंट ज़ोन की घोषणा और गोवा की अचानक यात्रा


सितंबर 2020 के वे दिन छोटी इनु की चहक और उसकी व्यस्तताओं के बीच बीते। वह हमारे साथ हॉल में रहकर अपनी ऑनलाइन कक्षाओं में भाग लेती और वहीं जिम्नास्टिक का अभ्यास भी करती। उसे देख मन को थोड़ा सुकून मिलता, पर बाहर का खतरा अब हमारी दहलीज तक आ पहुँचा था।


4 सितंबर 2020 को खबर मिली कि हमारे ही बी-ब्लॉक के ऊपर वाले फ्लैट में एक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। प्रशासन ने तुरंत हमारे ब्लॉक को 'कन्टेनमेंट ज़ोन' घोषित कर दिया। 20 फ्लैट्स वाली उस ब्लॉक-बिल्डिंग में सन्नाटा पसर गया। अगले 14 दिनों के लिए बाहरी सामान की डिलीवरी बंद कर दी गई। यहाँ तक कि दूध के लिए भी शिव्या को रोज़ाना नीचे जाना पड़ता था। उसी दोपहर मेडिकल टीम आई और ब्लॉक के सभी निवासियों की टेस्टिंग हुई। वह दौर ऐसा था कि हर टेस्ट रिपोर्ट के आने तक सांसें अटकी रहती थीं।


अभी अहमदाबाद की पाबंदियाँ खत्म ही हुई थीं कि 23 सितंबर की सुबह गोवा से दिव्या का फोन आया। उसने बताया कि वह और पदमनाभन दोनों कोविड पॉजिटिव पाए गए हैं। यह सुनते ही मेरे होश फाख्ता हो गए। चिंता केवल उनकी नहीं थी, बल्कि वहाँ रह रही दीक्षा (दोहती) और मेरी पत्नी मधु की भी थी। मन में बस यही डर था कि कहीं वे भी संक्रमित न हो गई हों। बिना देर किए, हम शाम की फ्लाइट से गोवा पहुँचे। 25 सितंबर की रात तक जब रिपोर्ट आई कि मधु और दीक्षा की रिपोर्ट 'नेगेटिव' है, तब जाकर जान में जान आई। हम कई दिनों तक गोवा में ही रुके। डॉक्टरों के मार्गदर्शन में दिव्या और पदमनाभन का घर पर ही इलाज चला और कुछ समय बाद वे स्वस्थ होकर 'नेगेटिव' आ गए। वह हमारे लिए ईश्वर का बड़ा आशीर्वाद था।


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अजमेर की पुकार और 'गुड्डी' की सेवा 


अक्टूबर 2020 का अंत मेरे लिए एक नई सुबह लेकर आया। महीनों की तड़प के बाद 27 अक्टूबर को मैं, मधु और शिव्या अंततः अपने अजमेर वाले घर पहुँच गए। घर धूल-मिट्टी से अटा पड़ा था, पर अपनी जड़ों की उस महक ने मन को असीम शांति दी। उधर मोहन ने बताया कि उसके बेटे उत्कर्ष की शादी पुणे में तय हुई, तो गुड्डी (दिव्यांग बहन सुधा) की जिम्मेदारी का प्रश्न खड़ा हुआ। मोहन ने छोटे भाई महेश से आग्रह किया, पर किन्हीं कारणों से उसने मना कर दिया। ऐसे में मधु ने छोटे भाई गोपाल की पत्नी कंचन से बात की। कंचन ने रिश्तों का मान रखते हुए सहर्ष स्वीकार किया और 12 अक्टूबर को गुड्डी को पैतृक घर गोविन्द नगर से अपने घर मालवीय नगर ले आई।


मैं अजमेर घर पहुँचने के लिए व्याकुल था ही और गुड्डी को भी वहाँ लाने की तैयारी थी। 3 नवंबर 2020 को कंचन और पलाश अपनी कार से गुड्डी को सुरक्षित अजमेर छोड़ गए। गुड्डी का अजमेर से पुराना नाता था; 2006 में बाऊजी के निधन के बाद वह और अम्मा यहाँ करीब ढाई साल रहे थे। पिछले साल 2019 में भी गुड्डी कुछ समय हमारे पास रही थी, जब मोहन अपने दूसरे बेटे सार्थक के पास अमेरिका गया था। इस बार भी हमने उसके लिए वही कमरा चुना जहाँ से वह टीवी भी देख सके और पीछे नींबू के पेड़ के पास धूप भी सेंक सके। हमने उसकी मरहम-पट्टी, नहलाने-धुलाने और देखभाल के लिए एक कुशल परिचायिका (Attendant) लगा ली थी, जो पास की बस्ती में ही रहती थी। कैंसर की अंतिम अवस्था और उस असह्य पीड़ा के बावजूद गुड्डी हमारे पास आकर बहुत खुश थी। जैसा कि मैंने महसूस किया—"जो उसका शेष था, वही उसके लिए विशेष था।" गुड्डी के साथ हमने नवम्बर 2020 की दीपावली और भाई दूज अपने अजमेर घर में मनाई, जो हमारे एक यादगार बन गई। यही उसकी इस जीवन की अंतिम दीपावली और भाई दूज थी। 


इसी बीच 8 नवंबर 2020 को एक हृदय विदारक खबर मिली। मधु की बड़ी बहन मालती दीदी ने बताया कि जीजाजी डॉ. के.के. अग्रवाल की तबीयत अचानक बिगड़ गई है। वह दौर चिकित्सा व्यवस्था की लाचारी का चरम था; उन्हें अजमेर के कई अस्पतालों में भर्ती करने से मना कर दिया गया। अंततः उन्हें जयपुर के एपेक्स अस्पताल ले जाना पड़ा। व्यवस्था इतनी बेबस थी कि डॉक्टरों को भी इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा था।


शिव्या को अपने काम के सिलसिले में अहमदाबाद लौटना जरूरी था, इसलिए बंगलुरु से दीप्ति ने अजमेर आने का प्रोग्राम बना लिया। कुछेक दिनों बाद वह और प्रदीप अपनी बेटी प्रगन्या (इनु) के साथ अजमेर आ गए और शिव्या अहमदाबाद लौट गई। पुणे में उत्कर्ष की शादी 10-11 दिसंबर को हो गई थी। हम वहाँ नहीं जा सके। 


जनवरी 2021 के दूसरे पखवाड़े में जब भाई मोहन पुणे से वापस लौटा, तो गुड्डी की विदाई की बेला आ गई। प्रदीप और दीप्ति ने जिम्मेदारी ली और 26 जनवरी 2021 को वे स्वयं कार से गुड्डी को जयपुर छोड़ आए। वह कुछ महीने जो गुड्डी ने हमारे सानिध्य में बिताए, वे मेरे जीवन के सबसे संतोषजनक पन्ने बन गए। 2010 में अम्मा के जाने के बाद वह अधिकतर जयपुर ही रही थी, पर इस अंतिम पड़ाव में उसकी सेवा का अवसर मिलना ईश्वर की विशेष कृपा थी। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


सोमवार, 16 मार्च 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 6

कोरोना काल के संस्मरण - 6  

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कोरोना महामारी की दुःख भरी दास्तानों का कोई अंत नहीं था, गाजियाबाद की एक घटना ने लोगों को रुला दिया। महज दस-ग्यारह दिनों के भीतर एक पूरा परिवार काल के गाल में समा गया। पहले दिन परिवार के मुखिया की मृत्यु हुई, अभी मातम शुरू ही हुआ था कि आठवें दिन जवान बेटे ने दम तोड़ दिया। नौवें दिन पत्नी चल बसी और ग्यारहवें दिन बेटे की पत्नी (बहू) भी नहीं रही।


अब उस परिवार में केवल दो मासूम जिंदगियाँ बची हैं—आठ साल और छह साल की दो नन्हीं बेटियाँ। स्थितियाँ इतनी नाजुक और हृदयविदारक हैं कि कल्पना मात्र से गला रुँध जाता है। ऐसी अनगिनत कहानियाँ सुनकर हर दिन आँखें आँसुओं से भीग जाती थीं। कोरोना केवल एक बीमारी नहीं, एक ऐसी त्रासदी थी जिसने मासूमों के सिर से एक झटके में पूरा आसमान ही छीन लिया। यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि कोरोना काल की उस क्रूरता का चेहरा है जिसने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़कर रख दिया। परिवार में किसी पालनकर्ता का न रहना और पीछे केवल दो मासूम कलियों का रह जाना—यह सुन कर वाकई आँखें भीग जाती हैं।


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काव्याभिव्यक्ति 


सकारात्मक रहिए, 

एक-दूसरे की मदद करते रहिए। 


याद रखिये—

हर अंधेरी रात के बाद एक नई सुबह आती ही है।

एक ऐसी सुबह, जो नई किरणों के साथ नई उम्मीदें लाती है,

हम फिर मिलेंगे, फिर खिलखिलाएंगे, खेलेंगे-कूदेंगे,

और मिलकर एक बेहतर समाज बनाएंगे!


अभी आस बाकी है, आशाओं की ज़मीन बंजर नहीं,

थोड़ा हौसला रखें, नई सुबह दस्तक देने ही वाली है।

सत्य को आत्मसात करें—स्थायित्व शाश्वत नहीं है,

केवल 'परिवर्तन' ही इस सृष्टि का अटल नियम है, यह ध्यान रखें।


मैं रहूँ या न रहूँ, पर यह दुनिया और बेहतर होनी चाहिए।

माना कि जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते,

पर उनकी यादें हमारे संघर्षों को बल देती रहेंगी।

यह भी स्वीकार करें कि सब कुछ हमारे वश में नहीं,

मगर जो हमारे हाथ में है, वह है—सावधानी और संकल्प।


मन का भ्रम त्यागें, भय को दूर भगाएँ,

जब भी बारी आए, वैक्सीन का सुरक्षा कवच ज़रूर लगवाएँ!

(मैंने अपनी दोनों डोज़ लगवा ली हैं, अब आपकी बारी है)।


आज ही लापरवाही छोड़ें, संक्रमण की कड़ी को तोड़ें,

अनुशासन का दीप जलाकर, जीत की राह को मोड़ें।

उम्मीद रखो कि कल का दिन आज से बेहतर होगा। 


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काव्याभिव्यक्ति 


सुरक्षा ही समाधान है !


अपना और अपनों का ध्यान रखें,

मन से भय को निकालें, 

सावधानी अपनाएँ।


कोविड-अनुकूल व्यवहार को जीवन का हिस्सा बनाएँ—

चेहरे पर मास्क हो, हाथों में स्वच्छता का संस्कार हो,

सैनिटाइजर का साथ हो और 'शारीरिक दूरी' का आधार हो।


भीड़ का हिस्सा बनने से बचें, 

एकांत में शक्ति और साहस खोजें,

गुनगुने जल का सेवन करें, 

अपनी देह को भीतर से सींचें।


आत्मानुशासन ही इस युद्ध का सबसे बड़ा शस्त्र है,

और याद रहे—

प्रतिदिन नियमित व्यायाम ही स्वास्थ्य का मूलमंत्र है।


इस महामारी से पार पाने का हमें सामूहिक प्रयत्न करना है,

स्वयं पर अनुशासन का पहरा लगा, जीत का जतन करना है।

जब हम सतर्क होंगे, 

तभी हम, देश और समाज सुरक्षित होगा। 


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सकारात्मकता का सम्बल और मानवता का धर्म - दुःखद समाचारों के बीच सुखद पक्ष यह है कि अधिकतर लोग कोरोना संक्रमण को हरा रहे हैं—अस्पतालों में भी और घरों में भी। आवश्यकता है कि हम सोशल मीडिया का उपयोग भय फैलाने के लिए नहीं, बल्कि सकारात्मकता के प्रसार के लिए करें। नकारात्मकता मन को कमजोर करती है, जबकि ये कठिन परिस्थितियाँ ही हमें जीने की नई राह दिखाती हैं।


अकेलापन इस दौर की बड़ी चुनौती है, जिसे रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहकर दूर किया जा सकता है। याद रहे, 'सोशल डिस्टेंसिंग' का अर्थ समाज से कटना नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच केवल भौतिक दूरी बनाए रखना है। तकनीक के माध्यम से अपनों से जुड़े रहें और मन की दूरियों को मिटाएं।


हमारी कॉलोनी का एक उदाहरण मन को सुकून देता है, जहाँ एक संक्रमित परिवार के लिए पड़ोसियों ने मिलकर भोजन और दवाई की व्यवस्था की। इस सामूहिक सहयोग ने उस परिवार को वह आत्मबल दिया कि वे घर पर ही स्वस्थ हो गए। यही हमारे समाज की असली शक्ति है।


सावधानी के स्तर पर, यह छूत की बीमारी है, अतः स्वच्छता और 'कोरोना प्रोटोकॉल' का पालन अनिवार्य है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है— "समदुःखसुखं धीरं सोअमृतत्वाय कल्पते" (2/15) अर्थात जो सुख-दुःख में धैर्य के साथ अडिग रहता है, वही अमरत्व का अधिकारी है। इस आपदा में धैर्य रखना ही ईश्वर का सबसे उपयुक्त संदेश है। 


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जीवन दर्शन का अंतिम सत्य - 

"जीवन है जो शेष,

बस वही है विशेष।" 


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कोविड महामारी ने केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि आम आदमी की कमर भी तोड़ दी। इस आर्थिक बर्बादी का सबसे बुरा असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ा। बहुत से अभिभावक स्कूल की फीस जमा करने में असमर्थ रहे, और विडंबना देखिए—प्राइवेट स्कूल संवेदनहीन होकर उन बच्चों के नाम ऑनलाइन कक्षाओं से काटने लगे।


स्थिति यहाँ तक भयावह हो गई कि बकाया फीस न दे पाने के कारण बहुत से स्कूल प्रबंधन ने बच्चों को 'टीसी' (TC) तक देने से मना कर दिया, जिससे उनका भविष्य अधर में लटक गया। यहाँ तक कि 'ईडब्ल्यूएस' (EWS) श्रेणी के छात्रों को भी, जिन्हें अब तक मुफ्त शिक्षा मिल रही थी, कुछ स्कूलों ने ऑनलाइन पढ़ाई के अधिकार से वंचित किया। सरकार को चाहिए कि इस दिशा में एक ठोस और सकारात्मक नीति बनाए, ताकि किसी भी बच्चे की पढ़ाई आर्थिक तंगी की भेंट न चढ़े। कलम और किताब पर सबका अधिकार सुरक्षित होना ही चाहिए।


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अगस्त 2021 का समय था। मन में एक द्वंद्व चल रहा था कि क्या बच्चों को स्कूल भेजना अब सुरक्षित है? विश्लेषण करने पर समझ आया कि जोखिम स्कूल से ज्यादा समुदाय और परिवार में है। बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य, उनका सामाजिक विकास और उनकी आँखों की रोशनी—सब कुछ ऑनलाइन शिक्षा की भेंट चढ़ रहा था। 


संसद के आँकड़े गवाह थे कि भारत में 3 करोड़ बच्चों के पास डिजिटल साधन ही नहीं थे। ऐसे में शिक्षा केवल एक खास वर्ग तक सिमट रही थी। मेरी आठ वर्षीय नातिन इसका जीवंत उदाहरण थी; स्कूल बंद थे, पर वह जिम्नास्टिक सीखने जाती थी। कोविड प्रोटोकॉल के साथ बाहर निकलने के कारण उसमें वह डर और अकेलापन नहीं था, जो घर में कैद बच्चों में दिख रहा था। साथ ही मुझे लगता है कि जिम्नास्टिक स्कूल जाने वाली मेरी आठ वर्षीय नातिन का मानसिक स्वास्थ्य उन बच्चों से कहीं बेहतर था जो केवल चार दीवारों के बीच और स्क्रीन में कैद होकर पढ़ाई कर रहे थे।


मेरा स्पष्ट मानना था कि स्कूलों को खोलने का निर्णय दिल्ली या जयपुर के बंद कमरों से नहीं, बल्कि ग्राम पंचायतों और नगर निगमों के स्तर पर होना चाहिए। विकेंद्रीकरण, टीकाकरण और स्वच्छता—यही वे तीन स्तंभ थे जिनके आधार पर हम बच्चों को उनका बचपन और उनकी शिक्षा वापस लौटा सकते थे। यह केवल पढ़ाई का नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को 'अवसाद' से बचाने का प्रश्न था। 


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अजमेर से विदा और 'जनता कर्फ्यू' की आहट


मार्च 2020 की वह दहलीज, जिसने हम सबकी जिंदगी की दिशा बदल दी। मैं एक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी और मेरी पत्नी मधु, एक सेवानिवृत्त शिक्षिका, अपने-अपने दायित्वों से मुक्त होकर एक शांत जीवन जी रहे थे। हमारी तीन बेटियाँ—दिव्या, शिव्या और दीप्ति—अपने जीवन में व्यस्त थीं। उस समय मधु गोवा में बड़ी बेटी दिव्या के पास थी, और मैं अजमेर में अकेला था। मँझली बेटी शिव्या तब अविवाहित थी और अहमदाबाद में अकेले रह रही थी।


विश्व भर में कोरोना के पैर पसारने की खबरों के बीच बच्चों का प्रेमपूर्ण दबाव बढ़ने लगा कि मैं अकेले अजमेर में न रहकर अहमदाबाद शिव्या के पास चला जाऊँ। मन घर छोड़ने को राजी न था, पर बच्चों की चिंता के आगे झुकना पड़ा। अंततः 18 मार्च 2020 को मैंने अजमेर-दादर सुपरफास्ट से अहमदाबाद का सफर तय किया। बच्चों ने पहले ही मास्क और सैनिटाइजर जैसी जरूरी चीजें ऑनलाइन भेज दी थीं—वे उस आने वाले संकट को शायद मुझसे पहले भांप चुके थे।


19 मार्च को मैं अहमदाबाद पहुँचा और उसी शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन सुना। उन्होंने 22 मार्च को 'जनता कर्फ्यू' का आह्वान करते हुए जो सावधानियाँ बताईं—चाहे वह घर से न निकलना हो, सेवाभावियों का आभार जताना हो या सामान का संग्रह न करना—उनसे हवा में घुली गंभीरता साफ महसूस होने लगी थी। प्रधानमंत्री का वह भाषण सुनकर पहली बार मुझे इस बात का संतोष हुआ कि बच्चों का आग्रह मानकर मैंने सही किया; संकट अब दरवाजे पर खड़ा था। यह संयोग और समय का अद्भुत तालमेल था कि मैंने 18 मार्च को यात्रा की और 19 मार्च को प्रधानमंत्री का भाषण हुआ। यदि मैं एक-दो दिन और रुक जाता, तो शायद लॉकडाउन के कारण मेरा अजमेर से निकलना असंभव हो जाता। बच्चों की सजगता देखिए कि उन्होंने मुझे ऑनलाइन मास्क और सेनेटाइजर भेज दिए। नई पीढ़ी तकनीक और सूचना के बारे में कितनी चौकस थी।  


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मन का वहम और 69 वर्ष का वह पड़ाव


शिव्या अहमदाबाद की जिस सोसाइटी में रहती थी, वहाँ आठ ब्लॉक्स में करीब 160 फ्लैट्स थे। लगभग 600 लोगों की उस सोसायटी में शिव्या का फ्लैट, अजमेर के मेरे फैलाव भरे घर के मुकाबले छोटा तो था, पर हम दो लोगों के लिए पर्याप्त था। अजमेर से अहमदाबाद की रेल यात्रा के बाद मुझे खांसी हो गई। शिव्या ने हिदायत दी कि मैं घर के भीतर ही रहूँ और उसने दवा भी दे दी। साथ ही उसने यह भी कहा कि यदि दो दिन में आराम न मिला, तो कोरोना टेस्ट कराना होगा।


'कोरोना टेस्ट' का नाम सुनते ही मेरे भीतर एक अनजाना डर बैठ गया। इस डर के पीछे एक पुराना मनोवैज्ञानिक कारण था। 1970 के दशक में, बैंक में कार्यरत रहते हुए एक ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर भविष्यवाणी की थी कि मेरी आयु 69 वर्ष रहेगी। मार्च 2020 में मैं ठीक 69 वर्ष का ही था। मुझे लगा कि क्या उस ज्योतिषी की बात सच होने वाली है? वह पुरानी भविष्यवाणी उस समय साक्षात यमराज का बुलावा जैसी लगने लगी।


जब मैंने यह बात बच्चों को बताई, तो उन्होंने बड़े धैर्य से मुझे संभाला। उन्होंने समझाया कि ये सब बेबुनियाद बातें हैं और इस समय केवल आत्मबल और सावधानी की जरूरत है। शिव्या और अन्य बेटियों ने आश्वस्त किया कि हाथ धोते रहने, मास्क पहनने और घर में सुरक्षित रहने से ही इस संकट को टाला जा सकता है। वह क्षण मेरे लिए एक बड़ी मानसिक परीक्षा का था—जहाँ एक तरफ विज्ञान था और दूसरी तरफ बरसों पुराना वहम। 


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सन्नाटा, प्रकृति और 21 दिनों का वह 'लक्ष्मण-रेखा'


22 मार्च 2020—जनता कर्फ्यू का दिन। उस दिन सुबह जब आँख खुली, तो इंसानी शोर की जगह पक्षियों के चहचहाने की सुरीली आवाज़ें सुनाई दीं। प्रदूषण और कोलाहल थमते ही जैसे प्रकृति ने चैन की साँस ली थी। हमारा फ्लैट दूसरी मंज़िल पर था, जहाँ से दूर तक फैला जंगल सा दृश्य दिखता था। मैंने अपनी खिड़की से नीलगायों को बिना किसी डर के सोसाइटी के पास विचरण करते देखा। इंसानी गतिविधियाँ थमीं, तो बेज़ुबान जानवर आज़ाद हो गए। मेरी खांसी धीरे-धीरे ठीक हो रही थी, पर मन का डर अब भी कोरोना की खबरों के साथ बढ़ रहा था।


24 मार्च को प्रधानमंत्री ने रात आठ बजे दोबारा राष्ट्र को संबोधित किया और रात 12 बजे से '21 दिनों के पूर्ण लॉकडाउन' की घोषणा कर दी। उन्होंने इसे 'लक्ष्मण-रेखा' की तरह बताया और स्पष्ट किया कि 'सोशल डिस्टेंसिंग' ही एकमात्र विकल्प है। डब्लूएचओ के भयावह आँकड़े और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 15 हज़ार करोड़ के बजट की बात सुनकर मन सिहर उठा।


प्रधानमंत्री के भाषण के बाद जेहन में बस एक ही सवाल कौंधा— "हे भगवान, यह क्या हो रहा है? दुनिया कैसे चलेगी?" तब शिव्या ने एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ मुझे संभाला। उसने साफ़ कह दिया, "पापा, अब सब कुछ हमारे अपने अनुशासन पर निर्भर है। आप बस पढ़ने-लिखने में मन लगाएँ और बाहरी दुनिया के डर को घर के भीतर न आने दें।" वह क्षण अनिश्चितता और अपनों के प्रति अगाध प्रेम का मिला-जुला अहसास था। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 5

कोरोना काल के संस्मरण - 5 

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इतिहास की चेतावनी - 1918 की सीख


मानवता को कभी भी 1918 की उन गलतियों को दोहराने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जिनका खामियाजा हमारे पूर्वजों ने भुगता था। इतिहास गवाह है कि सबसे गंभीर महामारी 'स्पैनिश फ्लू' ने दो वर्षों में तीन लहरों के दौरान 50 करोड़ लोगों को संक्रमित किया था और करीब 5 करोड़ जानें लीं। विडंबना देखिए, सर्वाधिक मौतें दूसरी लहर में हुईं। जब पहली लहर के बाद प्रतिबंध हटाए गए, तो लोग सड़कों पर उत्सव मनाने निकल पड़े। इसी सामूहिक लापरवाही का परिणाम था कि अगली लहर में करोड़ों लोग काल के गाल में समा गए।


हमें याद रखना होगा कि नियमों में ढील केवल सरकार ने दी है, वायरस ने नहीं। सरकारी दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य है, पर अपने विवेक का उपयोग करना उससे भी अधिक आवश्यक है।


विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वे मूल मंत्र, जो आज भी प्रासंगिक हैं - 


टीकाकरण - कोविड-19 के टीके डेल्टा और ओमिक्रॉन जैसे घातक स्वरूपों से सुरक्षा का 'अभय कवच' प्रदान करते हैं। टीका लगवाकर आप न केवल स्वयं को, बल्कि समाज को भी सुरक्षित करते हैं।


सावधानी ही बचाव - संक्रमण को रोकने का हर छोटा प्रयास नए स्वरूपों (Variants) के उभरने के जोखिम को कम करता है।


बुनियादी अनुशासन - सुरक्षित शारीरिक दूरी, चेहरे पर सही ढंग से लगा मास्क, बंद जगहों पर हवा का आवागमन (Ventilation), बार-बार हाथ धोना और खांसते-छींकते समय सावधानी—ये सामान्य व्यवहार ही हमारी सबसे बड़ी जीत हैं। 


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कोरोना काल में नियमों की व्याख्या भी अक्सर सुविधा और दृष्टिकोण के अनुसार बदलती रही। मार्च 2020 में जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्थित 'तबलीगी जमात' के कार्यक्रम में नियमों का उल्लंघन हुआ, तो लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर पूरे देश में एक कोहराम मच गया। उस घटना को लेकर जिस तरह का सामाजिक और मीडिया विमर्श बना, उसने एक गहरा तनाव पैदा कर दिया था।


किंतु विडंबना देखिए, इसके ठीक एक महीने बाद अप्रैल 2020 में जब कर्नाटक के कलबुर्गी में लॉकडाउन के बावजूद सैकड़ों लोगों ने एकत्र होकर 'रथ उत्सव' मनाया और सोशल डिस्टेंसिंग की सरेआम धज्जियाँ उड़ाईं, तब वैसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। प्रशासन और विमर्श के स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी साध ली गई। यह दोहरापन दर्शाता है कि आपदा के समय भी सरकार ने नियमों को निष्पक्षता से लागू करने के बजाय, उन्हें चश्मे बदल-बदल कर देखा। 


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इतिहास की कड़ियाँ जोड़ें तो याद आता है कि अमेरिका में कोरोना से पहली मृत्यु जनवरी 2020 में ही दर्ज हो चुकी थी। इसके ठीक बाद, 24 फरवरी 2020 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने विशाल काफिले के साथ अहमदाबाद पहुँचे थे। साबरमती की धरती पर 'नमस्ते ट्रम्प' के भव्य आयोजन में लाखों की भीड़ उमड़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रम्प ने अहमदाबाद की सड़कों पर रोड-शो किया और मोटेरा स्टेडियम में जनसभा को संबोधित किया।


ट्रम्प आगरा और दिल्ली भी गए और 25 फरवरी को वापस लौटे। आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या उस अंतरराष्ट्रीय आवाजाही और भारी भीड़ ने कोरोना संक्रमण का द्वार नहीं खोला होगा? बहुत संभव है कि उस काफिले और विदेशी मेहमानों की आवाजाही के साथ ही कोरोना का संक्रमण भारत की गलियों तक पहुँच गया हो। यह केवल एक अनुमान नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए एक गंभीर संदेह है, जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। अहमदाबाद का वह भव्य आयोजन अनसुलझा प्रश्न छोड़ गया है। 


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कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 से लगभग दो वर्षों तक स्कूलों के द्वार बंद रहे। इस लंबी अवधि में देश के करोड़ों गरीब बच्चों को न केवल बुनियादी शिक्षा से वंचित होना पड़ा, बल्कि उनके पोषण और स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा का ढांचा भी चरमरा गया।


शहरों में भले ही 'ऑनलाइन कक्षाओं' का शोर रहा, लेकिन ग्रामीण भारत की हकीकत इससे कोसों दूर थी। गाँवों में न तो बिजली और इंटरनेट की सुचारु सुविधा थी और न ही उन बच्चों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप जैसे आवश्यक संसाधन थे। विडंबना तो यह भी थी कि बहुत से अध्यापक, जो पारंपरिक शिक्षण पद्धति में माहिर थे, वे स्वयं भी तकनीक के माध्यम से शिक्षा देने के इस नए तरीके से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। इस तकनीकी कमी ने अमीर और गरीब के बीच की शैक्षिक दूरी को और अधिक गहरा कर दिया।


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अदृश्य कोरोना जीवाणु का क्रूर पंजा न जाने कितने ही मनीषी लेखकों और साहित्यकारों को हमसे छीन ले गया। यह एक अत्यंत दुखद और कड़वा सत्य है कि साहित्य जगत की कई आवाज़ें इस महामारी के शोर में हमेशा के लिए खामोश हो गईं। उन सभी दिवंगत आत्माओं को मैं सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।


उन विदा होते रचनाकारों से मेरा एक विनम्र निवेदन है—जाते-जाते अपनी कलम की उस ओजस्वी शक्ति का कुछ अंश मुझे सौंपते जाना। आपकी अधूरी रह गई 'दास्तानों' और आपकी समृद्ध विरासत को मैं अपनी लेखनी के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहता हूँ। जब भी आपका लिखा कुछ पढूँ आपकी लेखनी के शब्द मैं आत्मसात कर पाऊँ। ॐ शान्ति!


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काव्य-संस्मरण 


कुछ तो सब्र करो।

इतिहास गवाह है कि समय ढूंढ ही लेता है अपनी जरूरतें।

हरेक का अपना समय होता है।

कोई ना कोई तो आएगा।

कोरोना काल भी गुजर जाएगा।

एक आंधी के बाद वातावरण में शान्ति आती है।

याद रखो - स्थाईत्व शाश्वत नहीं है।

परिवर्तन शाश्वत है।  


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काव्य-संस्मरण


कुछ तो सब्र करो, ऐ मन!

इतिहास गवाह है कि समय स्वयं ढूँढ ही लेता है अपनी ज़रूरतें।

सृष्टि के रंगमंच पर हर पात्र और हर दौर का अपना एक समय होता है।

अंधेरे के बीच से ही कोई न कोई राह दिखाने वाला आ ही जाता है,

और यह भीषण कोरोना काल भी अंततः गुज़र जाएगा।


याद रखो, विनाश की एक प्रचंड आँधी के बाद ही

वातावरण में एक गहरी शांति आती है।

सत्य भी यही है कि स्थायित्व शाश्वत नहीं है,

'परिवर्तन' ही इस संसार का शाश्वत सत्य है। 


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काव्य-संस्मरण 


पिछली सरकारों को कोसते हुए,

स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार का दंभ भरा गया।

सांसद निधि से ढेरों एम्बुलेंस खरीदी गईं,

पर विडंबना देखिए...

उन जीवनदायिनी एम्बुलेंसों से बीमारों को नहीं,

मंत्रीजी के नए महल के लिए 'बजरी' ढोई गई!


जब महल खड़ा हो गया और ढोने का काम पूरा हुआ,

तो बड़ी सहजता से कह दिया गया— "ड्राइवर नहीं हैं!"

भीषण कोरोना काल में, जब साँसें उखड़ रही थीं,

वे एम्बुलेंसें सांसद के आवास के बाहर तिरपाल में लिपटी 'घूँघट' ओढ़े खड़ी थीं,

और लाचार जनता के लिए अस्पताल की दहलीज पर सिर्फ 'ठेला गाड़ियाँ' उपलब्ध थीं।


बीमार जीवित हो या देह निर्जीव,

सबके नसीब में या तो कंधे थे, या साइकिल,

या फिर मिन्नत-अर्जी से मांगी गई कोई रेहड़ी या ठेला गाड़ी।

पर वे एम्बुलेंसें?

वे तो सांसद की कोठी के बाहर चैन की नींद सो रही थीं,

क्योंकि सिस्टम की फाइलों में 'ड्राइवर' उपलब्ध नहीं थे!


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कफनखसोटों का मुल्क और व्यवस्था का काला चेहरा


कोरोना काल में जहाँ एक ओर मानवता सिसक रही थी, वहीं दूसरी ओर कुछ दरिंदे 'लाशों के ढेर' पर अपना व्यापार चमका रहे थे। उस विद्रूप समय को  इन पंक्तियों में दर्ज किया जा सकता है। 


यह कफनखसोटों का मुल्क है भाई!


यह कफनखसोटों का मुल्क है भाई,

कोरोना काल भी युद्धकालीन समय है भाई,

नरभक्षियों के लिए आपदा उपयुक्त समय है भाई,

युद्ध के मैदान से लूट बटोरने-खसोटने का।


दवा, ऑक्सीजन और अस्पताल के बिस्तर,

सब 'ब्लैक' में उपलब्ध कराए जाएँगे,

एम्बुलेंस के दाम ऊँचाई पर होंगे,

बेबसी की आँच पर फायदे की मिठाई बनाई जाएगी।


एक ओर कोरोना से युद्ध और मौत का तांडव है,

दूसरी ओर कोरोना संक्रमित बीमार 'अवसर' है,

यह मातम का नहीं, जश्न का मौका है दरिंदों के लिए,

लाशों के ढेर पर ही इनका व्यापार फलता-फूलता है।


यह कफनखसोटों का मुल्क है भाई!


ऐतिहासिक संदर्भ - इतिहास गवाह है कि युद्ध की विभीषिका के दौरान नीच प्रवृत्ति के लोग सक्रिय हो जाते थे, जो रणभूमि में वीरगति प्राप्त शूरवीरों के शरीर से कीमती वस्त्र और आभूषण तक लूट लेते थे। दुर्भाग्यवश, कोरोना काल में दवाइयों, इंजेक्शन और ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों ने उसी आदिम और क्रूर मानसिकता का परिचय दिया। जब सांसें बिकने लगीं और मजबूरी का मोल भाव होने लगा, तब लगा कि सभ्यता चाहे कितनी भी आगे बढ़ जाए, ये 'कफनखसोट' हर युग में मौजूद रहते हैं। 


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काव्य-संस्मरण


वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था,

साँस उसकी उखड़ रही थी, पर पास में अस्पताल न था।

जैसे-तैसे अस्पताल पहुँचा, तो वहाँ बेड कोई खाली न था,

जैसे-तैसे हुआ जुगाड़, तो वहाँ 'प्राण-वायु' का इंतजाम न था।

न हो सका इलाज समय पर, और 'ब्लैक' में थी हवा और दवा,

वह मर गया सपने देखते-देखते, पर कसूर किसी का भी न था।

वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था।


वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था,

मर गया तो मर गया, पर पास में श्मशान भी न था।

अंतिम सफर पर विदा करने को अपनों का साथ भी न था,

जैसे-तैसे श्मशान पहुँचा, तो वहाँ भी नंबर अभी न था।

जैसे-तैसे नंबर आया, तो पूरी लकड़ी का इंतजाम न था,

जैसे-तैसे रात में हुआ संस्कार, पर वह शास्त्रोक्त विधान न था।

वह देश का गरीब था, कोई राजनेता या अमीर न था।

  

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मानव जाति के ज्ञात इतिहास में कोरोना काल एक ऐसा भयावह कालखंड था, जब भारत का लगभग हर नागरिक इस आशंका से घिरा था कि वह कभी भी संक्रमित हो सकता है और अंततः मौत के मुँह में जा सकता है। यह केवल एक शारीरिक बीमारी का दौर नहीं, बल्कि मानसिक प्रताड़ना का चरम था।


तकरीबन हर व्यक्ति अपना एक-एक दिन यह गईं कर बिता रहा था कि— "चलो, सुरक्षित तरीके से एक दिन और बीत गया।" शायद मानव सभ्यता के इतिहास में मृत्यु कभी इतनी 'करीब' और इतनी 'आम' नहीं रही होगी, जितनी इन दिनों देखने को मिली। हर आहट, हर छींक और हर एम्बुलेंस की आवाज़ मौत का संदेश देती प्रतीत होती थी। हर दिन मृत्यु का साया दिखता था और ऐसा लगता था हम एक जंग लड़ रहे हों। हम सब जीवन नहीं जी रहे थे, बल्कि केवल मौत को टाल रहे थे। 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


कोरोना काल के संस्मरण - 4

कोरोना काल के संस्मरण - 4 

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काव्य-संस्मरण


हे कोरोना अदृश्य जीवाणु !


कहाँ तक तू हमारे बीच चलेगा,

कभी तो कहीं हमसे दूर भागेगा!


तू हमें मिटाने आया है,

तू हमसे भिड़ने आया है?


याद रख, हस्ती मिटती नहीं हमारी,

हम बुलबुलें हैं इस की, यह गुलसिताँ हमारा, 

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा! 


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काव्य-संस्मरण: मेरा माफीनामा


मैं यह माफीनामा लिख रहा हूँ,

हर उस व्यक्ति के नाम—

जो कोविड काल की क्रूरता में, 

यह दुनिया छोड़ चला गया। 


मुझे गहरा दुःख है,

कि तुम अचानक चले गए...

और हम तुम्हारी विदाई को,

न ढंग से स्वीकार कर सके,

न तुम्हारे सम्मान में दो शब्द बोल सके।


शोक की उस घड़ी में,

बहुतों को अपनों का कंधा तक नसीब न हुआ।

सत्य तो यही है कि जो भी इस कालखंड में,

हमसे सदा के लिए दूर चले गए—

वे सभी इस 'व्यवस्था की विफलता' के जीवित दस्तावेज़ हैं।


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काव्य-संस्मरण: कोरोना काल


दिन हो या रात,

शमशानों में अब अनगिनत चिताएँ जल रही हैं,

गलियों से जनाज़े उठ रहे हैं,

और विडम्बना देखिए...

मुर्दे भी अब कतारों में पड़े हैं, 

अपनी बारी के इंतज़ार में!


तुम्हें अब अस्पताल चाहिए?

तुम्हें अस्पताल में ऑक्सीजन और बेड चाहिए?

पर याद करो—तुमने वोट तो मंदिर के नाम पर दिया था,

तुमने वोट अस्पताल के लिए तो कभी दिया ही नहीं था!

फिर आज किस हक से अस्पताल और बेड मांगते हो? 


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कोरोना काल में वह दौर भी था, जब चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल था। एक व्यक्ति की पत्नी कोरोना से संक्रमित हुईं और बड़ी मशक्कत के बाद उन्हें अस्पताल में एक बेड मिल सका। डॉक्टर ने उपचार के लिए 'रेमडेसिविर' इंजेक्शन की तत्काल व्यवस्था करने को कहा। वह व्यक्ति जब बाज़ार निकला, तो उसे पता चला कि उस जीवनरक्षक दवा की भारी कालाबाज़ारी हो रही है। अपनी जीवनसंगिनी की जान बचाने की खातिर उसने अपनी उम्र भर की सारी जमा-पूँजी उस इंजेक्शन को खरीदने और इलाज में झोंक दी।


विडंबना और त्रासदी की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब बाद में उसे पता चला कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 'रेमडेसिविर' को कोरोना के प्रभावी इलाज की सूची से बाहर कर दिया है। यह जानकर वह शख्स अपना माथा पकड़कर बैठ गया। उसकी बरसों की मेहनत की कमाई उस भ्रम की भेंट चढ़ गई थी, जिसे तंत्र ने समय रहते स्पष्ट नहीं किया था। वह हताश था, पर अपनी नियति के आगे कर भी क्या सकता था?


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यह एक ऐसा कड़वा सत्य है कि आज इस पूरे देश में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिले, जो यह कह सके कि उसने कोरोना काल की विभीषिका में अपने किसी परिचित, मित्र या सगे-संबंधी को नहीं खोया है। इस महामारी ने हर घर के आँगन में शोक की एक ऐसी लकीर खींच दी, जो दशकों तक हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन की स्मृतियों में दर्ज रहेगी।


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न केवल कोरोना, गरीबी भी महामारी है। कोरोना काल के दौरान सबसे पीड़ित गरीब ही रहा। उसके पास न तो संचित पूँजी थी और नहीं कल के भोजन का कोई जुगाड़ या भरोसा। कोरोना वायरस ने तो शरीर पर वार किया, पर गरीबी ने उसकी गरिमा और अस्तित्व पर ही प्रहार कर दिया। 


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कोरोना काल में हर व्यक्ति दूसरे के लिए सलाहकार, वैद्य या डॉक्टर बन गया था। चारों ओर नुस्खों और मशवरों का अंबार लगा था।


लोगों का मानना था कि साँस लेने में ज़रा सी भी दिक्कत कोविड का संकेत है। सलाह दी जाती थी कि एसी और फ्रिज के ठंडे खाने से बचें और सामान्य तापमान में रहने की आदत डालें। उस समय कुछ 'घरेलू उपाय' और 'नुस्खे' रामबाण की तरह प्रचारित हो रहे थे -


अग्निबाण - लहसुन, प्याज और अदरक के रस में नींबू, काला नमक और काली मिर्च का मिश्रण—इसे हर रोग की काट माना जाने लगा।


प्राकृतिक चटनी - 11 तुलसी के पत्ते, 11 नीम के पत्ते और 11 काली मिर्च के दानों को पीसकर बनाई गई चटनी लोगों को भाने लगी। 


बच्चों के लिए - लहसुन, प्याज और अदरक की चटनी शहद के साथ लोग बच्चो को चटाने लगे।


त्रिवेणी - अदरक, प्याज और लहसुन की चटनी में नींबू रस और मसालों का संगम लोगों ने खूब उपयोग में लिया।


लोग इन उपायों को एक सुरक्षा कवच की तरह अपना रहे थे, क्योंकि उस समय 'भरोसा' ही सबसे बड़ी औषधि थी। ये वे विशिष्ट नुस्खे थे, जो कोरोना काल में सोशल मीडिया में गूँज रहे थे। ये नुस्खे देसी उपचार की महत्ता को जनता के बीच रख रहे थे। भले ही ये वैज्ञानिक रूप से सटीक इलाज न हों, लेकिन अदरक, तुलसी और काली मिर्च ने लोगों की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' (Immunity) और 'मनोबल' को बढ़ाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई। अंकों का मनोविज्ञान लोगों को खूब भाया - "11 पत्ते, 11 दानों" ने भारतीय मानसिकता में शुभ और सटीक होने का अहसास कराया। 


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काव्य-संस्मरण


कई बार दुआ ही सबसे बड़ी दवा बन जाती है,

जहाँ विज्ञान और औषधि हार मान लें, 

वहाँ मौन प्रार्थना भी काम कर जाती है।


औरों के सुख के लिए की गई हमारी निस्वार्थ दुआ,

अक्सर हमारे स्वयं के दुःखों की दवा बन जाती है।


शुभ भावनाओं में एक असीम, अलौकिक शक्ति होती है,

इसलिए मन में हमेशा सबके लिए कल्याणकारी भाव रखें।


शायद यही वो कल्याणकारी 'अभय कवच' था,

जो उस भीषण कोरोना काल में हमारे काम आया।


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सत्य तो यह है कि चिकित्सा पद्धति चाहे कोई भी रही हो, कोरोना के इलाज में अधिकतर चिकित्सक 'अँधेरे में तीर' ही चला रहे थे। उस अनिश्चित कालखंड में चिकित्सक मुख्य रूप से अपने विवेक और पिछले अनुभवों के सहारे ही उपचार कर रहे थे, क्योंकि वे स्वयं भी इस नई महामारी की सटीक चिकित्सा विधि से अनभिज्ञ थे।


एलोपैथी के क्षेत्र में भी विरोधाभासों का अंबार था। हज़ारों मरीज़ों को महँगी 'प्लाज्मा थेरेपी' देने के बाद अंततः विशेषज्ञों ने स्वीकार किया कि यह कोरोना के इलाज में प्रभावी नहीं है। ऐसा प्रतीत होता था मानो लाचार जनता को प्रयोगशाला बना दिया गया हो। जहाँ कुछ चिकित्सक पूरी निष्ठा से जूझ रहे थे, वहीं कुछ ने इन विषम हालातों का लाभ उठाने में भी संकोच नहीं किया।


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कोरोना काल की एक समीक्षा -


कोरोना महामारी ने न केवल आम जन को, बल्कि विश्व की तथाकथित सर्वशक्तिमान सरकारों को भी घुटनों पर ला दिया था। हमारे देश की केंद्र और राज्य सरकारों ने प्रयास तो किए, पर वे उस स्तर के नहीं थे जितनी संकट की गंभीरता थी। इच्छाशक्ति का अभाव और भविष्य की स्पष्ट योजनाओं की कमी ने आम नागरिक को बेसहारा छोड़ दिया।


इस दौर की कुछ कड़वी सच्चाइयाँ - 


- अर्थव्यवस्था और शिक्षा - रोजगार पटरी से उतर गया, महँगाई बढ़ी और आय के स्रोत सिमट गए। शिक्षण संस्थानों में ताले लटकने से बच्चों का भविष्य धुंधला गया।


- स्वास्थ्य और टीकाकरण - स्वास्थ्य सेवाएँ चरमरा गईं और विशाल जनसंख्या का टीकाकरण एक अभूतपूर्व चुनौती बनकर उभरा।


- दिवंगतों को अंतिम गरिमा - सबसे हृदयविदारक बात वह थी कि महामारी की भेंट चढ़े बहुत से दिवंगतों को एक सम्मानजनक विदाई तक नसीब न हो सकी।


- आंकड़ों का शोर - सरकारी अनुमानों के अनुसार चार करोड़ से अधिक संक्रमण के मामले और पाँच लाख से अधिक मौतें दर्ज हुईं, पर वास्तविक टीस इन आंकड़ों से कहीं अधिक गहरी थी।


भले ही महामारी का प्रकोप कम हो गया है, पर संक्रमण का डर आज भी शेष है। अब हमें सजग रहकर ही जीवन बिताना होगा। कुछ बुनियादी नियम जो आज भी हमारा 'अभय कवच' हैं -


- सीमित आवागमन - अनावश्यक यात्राओं से आज भी बचना ही श्रेयस्कर है।


- शारीरिक दूरी - भौतिक संपर्क में दूरी बनाए रखना अभी भी सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है।


- मास्क का महत्त्व - भीड़भाड़ वाले स्थानों पर मास्क का प्रयोग अब भी लाभदायक है।


- टीकाकरण - जिन्होंने टीका नहीं लगवाया है, उन्हें इसे अवश्य लगवाना चाहिए। टीकाकरण ही इस अदृश्य शत्रु के विरुद्ध हमारा वास्तविक सुरक्षा कवच है।


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 


सादर, 

केशव राम सिंघल 


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 3

कोरोना काल के संस्मरण - 3 

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कोरोना महामारी ने मनुष्य को जीवन जीने के नए और अनपेक्षित तरीके सिखा दिए। अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में वह 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) और 'मास्क प्रोटोकॉल' जैसी नई शब्दावलियों को आत्मसात करने लगा। देखते ही देखते दुनिया का स्वरूप बदल गया; बैठकें 'ज़ूम मीटिंग्स' में सिमट गईं, दफ्तर घर के किसी कोने में तब्दील हो गए और शिक्षा का मंदिर मोबाइल की स्क्रीन बन गया। लोग अब डॉक्टर से ऑनलाइन परामर्श ले रहे थे और घर की बुनियादी ज़रूरतें भी डिजिटल माध्यमों से पूरी होने लगी थीं।


यह सब केवल विवशता नहीं थी, बल्कि मनुष्य की वह जिजीविषा थी जिसके सहारे वह कोरोना के उस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु को पछाड़ने का संकल्प लिए हुए था। हालाँकि, इस कालखंड का दुःखद पक्ष किसी से छिपा नहीं है। संक्रमण की पीड़ा और अपनों को खोने का असहनीय शोक हर किसी ने महसूस किया। किंतु प्रकृति का शाश्वत नियम है कि स्थायित्व शाश्वत नहीं है, हर काली रात के बाद एक उजली सुबह आती है और दुःख के बाद सुख का चक्र अवश्य घूमता है। इसी विश्वास के साथ मनुष्य इस महासंकट से जूझता रहा। वास्तव में, मानव जाति की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि उसमें गहरा दर्द और अपार नुकसान को अपने भीतर 'ज़ज्ब' कर लेने की अकूत क्षमता है। वह गिरकर संभलना और मलबे से नया संसार खड़ा करना बखूबी जानता है।


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वर्ष 2020 का अंत होते-होते भारत की स्थिति वैश्विक मानचित्र पर अत्यंत चिंताजनक हो चुकी थी। 31 दिसंबर 2020 तक देश में कोरोना संक्रमण के मामले एक करोड़ दो लाख छियासठ हजार छह सौ चौहत्तर (1,02,66,674) तक जा पहुँचे थे, जिसने भारत को दुनिया का दूसरा सबसे अधिक प्रभावित देश बना दिया था। किंतु, इन भयावह आँकड़ों के बीच एक बड़ी राहत यह रही कि कुल एक लाख अड़तालीस हजार सात सौ अड़तीस (1,48,738) मौतों के साथ हमारा देश दुनिया में सबसे कम 'मृत्यु दर' वाले देशों में से एक था। यह तथ्य हमारे स्वास्थ्य तंत्र की अटूट जिजीविषा और देशवासियों के सामूहिक प्रयासों का एक सकारात्मक परिणाम था।


इसी अंधकारमय समय में वैक्सीन की खोज ने मानव जाति के खोए हुए विश्वास को पुनः जागृत किया। यह वैज्ञानिकों के प्रयासों का ही फल था कि 'आशा' अब एक मूर्त रूप ले रही थी। भारत सरकार ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए टीकाकरण अभियान को एक विशाल राष्ट्रीय मिशन के रूप में आयोजित करने का सफल प्रयास किया। यह सुनिश्चित किया गया कि तकनीक और सुलभता के माध्यम से देश की आम जनता तक बचाव का यह सुरक्षा कवच पहुँच सके। वैक्सीन केवल एक दवा नहीं थी, वह तो 'जीवन-अमृत' था; उस लंबी और थका देने वाली लड़ाई को जीतने का एक अमोघ अस्त्र, जिसका इंतज़ार हर भारतीय बड़ी बेसब्री से कर रहा था।


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कोरोना महामारी का सबसे घातक प्रहार बुजुर्गों पर हुआ, जिन्हें न केवल शारीरिक जोखिम बल्कि एक गहरी मानसिक वेदना से भी गुज़रना पड़ा। सुरक्षा के नाम पर उन्हें घर की चारदीवारी में 'कैद' होकर रहना पड़ा। सबसे विकट परिस्थिति उन बुजुर्गों की थी, जिनके बच्चे आजीविका के कारण दूसरे शहरों या विदेशों में थे और वे घरों में अकेले रह गए थे। महामारी से पूर्व बच्चे सप्ताहांत या महीने-दो महीने में आकर माँ-बाप का हाल-चाल ले लिया करते थे, किंतु उन दिनों यातायात के साधनों पर पाबंदी और संक्रमण के खौफ ने इस मिलन पर भी ताला लगा दिया था।


वृद्ध आँखें हर दिन दरवाज़े पर टकटकी लगाए अपने बच्चों की राह देखतीं, पर अंततः उन्हें मोबाइल की निर्जीव आवाज़ों से ही संतोष करना पड़ता था। जिन्हें तकनीक की विशेष जानकारी नहीं थी, उनके लिए सही सूचनाएँ प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती था। 'सोशल डिस्टेंसिंग' (सामाजिक दूरी) की अनिवार्यता ने उन्हें एक ऐसे अकेलेपन में धकेल दिया जहाँ केवल चिंताएँ और अनिश्चितता ही उनकी साथी थीं। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि मानसिक तनाव शरीर की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' को क्षीण कर देता है, और इसी कारण बुजुर्गों के लिए संक्रमण का खतरा और भी भयावह हो गया था।


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मैं स्वयं भी इस विषम परिस्थिति का साक्षी रहा। 2020 के प्रारम्भ में जब कोरोना ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू किया, उस समय मैं अजमेर स्थित अपने घर में अकेला था। मेरी पत्नी एक बेटी के पास गोवा गई हुई थीं और शेष दो बेटियाँ भी दूसरे शहरों में थीं। उस एकांत में मेरे लिए सबसे बड़ी राहत बेटियों का वह स्नेह और चिंता थी, जो रोज़ाना मोबाइल के माध्यम से मुझ तक पहुँचती थी। उन्होंने ही मुझ पर प्यार भरा दबाव डाला और मुझे किसी एक बेटी के पास चले जाने के लिए प्रेरित किया। अंततः, मैंने उनकी सलाह मानी और अहमदाबाद अपनी उस बेटी के पास चला गया, जो उस समय अविवाहित थी और वहाँ अकेली रह रही थी। वह निर्णय न केवल शारीरिक सुरक्षा के लिए, बल्कि मानसिक संबल के लिए भी मुझे अनिवार्य लग रहा था।


उस समय मेरी आयु 69 वर्ष थी। यद्यपि मैं सुरक्षित परिवेश में पहुँच गया था, किंतु पीछे छूट गए बंद घर की चिंता रह-रहकर मन को सताने लगती। वह घर जिसे तिनका-तिनका जोड़कर बनाया था, जहाँ मेरी स्मृतियाँ और जीवन की तमाम ज़रूरी चीज़ें रखी थीं, उसकी सुरक्षा का विचार मन को भारी कर देता था। नियति का खेल देखिए, उस प्रवास के बाद एक लंबे अरसे तक मेरा अजमेर लौटना संभव न हो सका। वह 'बंद घर' और उसकी प्रतीक्षा, मेरे कोरोना काल के प्रवास की एक लंबी और व्याकुल कर देने वाली कहानी बन गई।


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लॉकडाउन की आकस्मिक घोषणा के बाद देश ने वह मंज़र भी देखा जब हजारों लोग भूखे-प्यासे, नंगे पाँव सड़कों पर बेबस भटकने को मजबूर थे। यह कोरोना काल की विडंबना ही थी कि जब पूरा देश अपनी आँखों से और सोशल मीडिया के माध्यम से मजदूरों के महा-पलायन के कारुणिक दृश्य देख रहा था, ठीक उसी समय सरकार के नुमाइंदे देश की सर्वोच्च अदालत में यह दलील दे रहे थे कि "सड़कों पर कोई नहीं है।"


प्रशासनिक दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच की यह खाई उस समय पूरी तरह बेपर्दा हो गई, जब एक रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर अपनी मरी हुई माँ की चादर खींचते एक मासूम बच्चे का वीडियो सामने आया। वह दृश्य इतना मर्मभेदी था कि पूरा देश सकते में आ गया। सोशल मीडिया पर दिख रहे महा-पलायन के दृश्य और वह बच्चा अदालत में दिए गए उन सरकारी बयानों को झुठला रहा था, जो मानवीय संवेदनाओं से कोसों दूर थे। यह वह दौर था जब सरकारी तंत्र की आँखों पर पट्टी बँधी थी और सड़कों पर बिखरा आम आदमी केवल अपनी नियति के भरोसे छोड़ दिया गया था।

 

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कोरोना महामारी के उस खौफनाक दौर में बहुत से 'अपने' परायों जैसा व्यवहार कर रहे थे, वहीं मानवता की कुछ ऐसी मिसालें भी सामने आईं जिन्होंने समाज का मस्तक ऊँचा कर दिया। महाराष्ट्र के पुणे में कोरोना संक्रमित एक डॉक्टर की दुःखद मृत्यु हो गई। विडंबना देखिए, जिस डॉक्टर ने उम्र भर लोगों का उपचार किया, उसके अंतिम संस्कार के लिए कोई भी परिचित या सम्बन्धी आगे आने को तैयार नहीं था। जानकारी के अनुसार, डॉक्टर का इकलौता पुत्र अमेरिका में था और यात्रा प्रतिबंधों के कारण भारत आने में असमर्थ था और उनकी 74 वर्षीय पत्नी असहाय महसूस कर रही थीं।


कोरोना संक्रमण के भय ने रिश्तों की गर्माहट को इस कदर सोख लिया था कि डॉक्टर का कोई भी संबंधी शव को कंधा देने या अंतिम संस्कार में शामिल होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। ऐसी विषम परिस्थिति में मुस्लिम समुदाय के युवाओं ने न केवल संवेदनशीलता दिखाई, बल्कि आगे बढ़कर अंतिम संस्कार की पूरी ज़िम्मेदारी संभाली। उन्होंने न केवल शव को कंधा देकर श्मशान घाट पहुँचाया, बल्कि हिन्दू विधि-विधान के साथ अंतिम विदाई भी दी। यह घटना उस दौर के उस 'डर' पर एक करारी चोट थी जिसने रिश्तों को दरका दिया था, और उस 'सांझी विरासत' का प्रमाण थी जो धर्म से ऊपर उठकर केवल मानवता को पहचानती है।


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काव्य-संस्मरण 


मेरी पत्नी और मैंने, कोविड की वैक्सीन लगवाई,

सर्वव्यापी इस व्याधि से, कुछ हद तक मुक्ति पाई।

कुछ हद तक मुक्ति पाई, अभी तो एक और लगवानी है,

अट्ठाईस दिनों के बाद फिर, अस्पताल की राह बनानी है।

 

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काव्य-संस्मरण 


हे कृपा निधान!


मरने से पहले, हर पल मर रहा हूँ मैं,

अब खुद में ही सिमटा-सहमा रहता हूँ मैं,

हर दूसरे को शक की निगाह से देखता हूँ मैं,

कोई पास आ जाए तो कोरोना से डरता हूँ मैं!


हालात बहुत ख़राब हैं, मंज़र डरा रहे हैं,

दुःखद समाचार हर पल मन को रुला रहे हैं,

जीवन में ऐसा दौर कभी पहले देखा न था,

हर तरफ लोग बेबस ठोकरें खा रहे हैं!


चाहता हूँ कि अब कोई 'प्रणय-गीत' लिखूँ,

रिश्तों के प्यार और 'सद्भाव' का संगीत रचूँ,

मगर क्या करूँ कि हालात बहुत बेहाल हैं,

नहीं चाहता कि कोई 'शोक-गीत' लिखूँ!


दुःखों का सैलाब है... हर ओर बस रोना है,

चैन छीना, सुख लूटा, यह कैसा कोरोना है?

हे कृपा निधान! बस यही एक प्रार्थना है,

इस महामारी से शीघ्र छुटकारा देना है!

 

29

काव्य-संस्मरण


आपदाकाल में प्रकृति स्वयं अपना उपचार करती है,

खुद को अधिक स्वच्छ, पोषक और निर्मल बनाती है!


दिन सुधरेंगे, निश्चित रहें - 

कोरोना का यह काल भी जाएगा, 

और फिर वही सुनहरे दिन लौट आएँगे, 

जिनका हमें बेसब्री से इंतज़ार है।


डर ही वायरस है,

विश्वास ही वैक्सीन है,

सकारात्मकता ही वास्तविक दवा है।


आजकल कमरे में ही बंद रहता हूँ,

शायद इसीलिए खूब पढ़ता और लिखता हूँ।

यही एक सार्थक काम अब मेरे हिस्से बचा है,

मन में जो भी विचार आए, 

बस उसे कागज़ पर उकेरता रहता हूँ! 


30

काव्य-संस्मरण


कोरोना...

कोरोना एक भीषण युद्ध है,

लोग मर रहे हैं, लोग जी भी रहे हैं,

मगर समय का पहिया, क्रूरता से चल रहा है!


वैक्सीन गायब, दवा गायब,

यहाँ तक कि प्राण-वायु (ऑक्सीजन) गायब!

अस्पतालों से बेड गायब,

श्मशानों से सूखी लकड़ी गायब,

और सबसे बढ़कर... संकट के समय राजनेता गायब!


वे बैठे हैं सुरक्षित अपने घरों में दुबके हुए,

एक अस्पष्ट टीकाकरण नीति, परदों में छुपाए हुए।


इधर 'आपदा में अवसर' खोज रहे कुछ लोग कहते हैं—

"नकारात्मकता मत फैलाओ,

सकारात्मकता को तवज्जो दो!"


वे चाहते हैं—

दवा न मिले, तो भी संतुष्ट रहो,

अस्पताल में बेड न मिले, तो भी संतुष्ट रहो,

ऑक्सीजन के बिना दम घुट जाए, फिर भी संतुष्ट रहो!

वे कहते हैं— नकारात्मकता फैलाने वाले 'गिद्धों' से बचो,

काहे परेशान होते हो भाई, यह तो सब भाग्य का खेल है! 


आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। शेष फिर ......


सादर,

केशव राम सिंघल 


रविवार, 15 फ़रवरी 2026

कोरोना काल के संस्मरण - 2

कोरोना काल के संस्मरण - 2 

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11

यह सत्य है कि कोरोना ने मानवीय संबंधों के ताने-बाने में अविश्वास और भय का अंधेरा फैलाया, किंतु इसी अंधकार के बीच संवेदनाओं के कुछ 'रोशनी के कण' भी छितराए हुए दिखाई दिए। जहाँ एक ओर आपस में दूरियाँ बढ़ीं, वहीं दूसरी ओर मध्य-वर्ग के भीतर 'पारिवारिकता' और 'सामुदायिक सहयोग' की एक नई चेतना भी जाग्रत हुई। संकट ने सिखाया कि जब बाहर के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तब केवल 'आपसी जुड़ाव' ही एक-दूसरे के लिए संबल बनता है।


इसका एक जीवंत उदाहरण उस कॉलोनी में देखने को मिला, जहाँ एक पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आ गया था। उस एकाकीपन और बीमारी के दौर में उनके अपने सगे-संबंधी भले ही भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन पड़ोसियों ने 'पड़ोस-धर्म' की एक नई इबारत लिख दी। उन पड़ोसियों ने न केवल संक्रमित परिवार के लिए भोजन और दवाइयों का प्रबंध किया, बल्कि उनकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखा। ऐसे समय में मोबाइल की घंटियाँ केवल हाल-चाल पूछने का जरिया नहीं थीं, बल्कि वे संक्रमित परिवार को यह अहसास दिलाती रहीं कि "आप अकेले नहीं हैं।" यह सहयोग का भाव यह बताता है कि कोरोना जैसी आपदा ने जहाँ हमारे कुछ पुराने मूल्यों को झकझोरा, वहीं 'सह-अस्तित्व' और 'निःस्वार्थ सेवा' के कुछ नए अंकुर भी हमारे भीतर फूटने लगे हैं।


12

कोरोना काल ने आदमी को यह अहसास करा दिया कि उसका अस्तित्व कितना भंगुर है, कुछ भी स्थाई नहीं है। इस आपदा में मानवता ने बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया—किसी ने अपने प्रियजन खोए, तो किसी की जीवन भर की जमा-पूंजी इलाज की भेंट चढ़ गई। आर्थिक गतिविधियाँ रुक जाने से मध्यम और निम्न वर्ग के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। लेकिन, जहाँ आदमी के लिए यह समय 'महाविनाश' जैसा था, वहीं प्रकृति के लिए यह 'पुनर्जन्म' का काल सिद्ध हुआ।


जब आदमी अपनी सुरक्षा के लिए घरों में कैद हुआ, तो प्रकृति मानो अपनी बेड़ियाँ तोड़कर मुस्कुराने लगी। वर्षों से धुएँ और शोर से घुट रहे पेड़ों में एक नई जान आ गई; उनकी हरियाली में एक अनोखी चमक लौट आई। सड़कों का सन्नाटा पक्षियों के कलरव से भर गया। वे चिड़ियाँ, जो शहरों के कंक्रीट के जंगलों में कहीं खो गई थीं, अब बालकनियों और छतों पर बेखौफ़ चहकने लगीं। प्रदूषण कम हुआ, तो आसमान का नीला रंग अपनी असली आभा में दिखने लगा। चिमनियों से उगलते विषैले धुएँ पर विराम लगा, तो नदियों का जल भी साफ दिखने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति मानो यह संदेश दे रही हो कि आदमी के बिना वह फल-फूल सकती है, लेकिन प्रकृति के बिना आदमी का कोई अस्तित्व नहीं। यह उस दौर का सबसे बड़ा विरोधाभास था—इंसान वेंटिलेटर के सहारे था और प्रकृति गहरी सांसें ले रही थी।


13

लॉकडाउन की अचानक हुई घोषणा ने उन प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया, जो शहरों की चकाचौंध और विकास के असली शिल्पकार थे। देखते ही देखते सड़कें, पगडंडियाँ, खेतों के ऊबड़-खाबड़ रास्ते और रेल की पटरियाँ एक बेबस भीड़ के सैलाब से भर गईं। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं था, बल्कि व्यवस्था पर से आम आदमी के भरोसे का सामूहिक बिखराव था। इनमें से कई अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रेल की पटरियों पर कट मरे या सड़क हादसों का शिकार हो गए, पर विडंबना देखिए कि सरकारी संवेदनाओं का ग्राफ 'शून्य' ही रहा।


आजादी के पिचहत्तर वर्षों के गौरवशाली उत्सवों के बीच भारत के औसत मजदूर की यह नियति मन को व्यथित करती है। आज भी हमारे देश में मजदूर की छवि एक लाचार और बेबस इकाई बनकर रह गई है। वह चाहे अपने गाँव में पसीना बहाए या किसी महानगर के निर्माण में अपना रक्त-स्वेद दे, बुनियादी तौर पर वह 'असंगठित' और 'उपेक्षित' ही है। संकट के उन दिनों में यह साफ हो गया कि मजदूर शायद कभी सरकारों की प्राथमिक सूची में थे ही नहीं। अचानक लगे लॉकडाउन ने वह अनिश्चितता पैदा की, जिसने लाखों लोगों को नंगे पाँव सैकड़ों किलोमीटर चलने पर मजबूर कर दिया। न तो राज्य सरकारों के पास कोई ठोस राहत योजना थी और न ही केंद्र के पास कोई प्रभावी समन्वय। जब सब कुछ 'भगवान भरोसे' छोड़ दिया गया था, तब देश के सत्ताधीशों ने जनता से थाली और बर्तन बजवाकर कोरोना भगाने का एक अतार्किक मूलमंत्र सामने रखा। विज्ञान और चिकित्सा की इस सदी में प्रतीकों का ऐसा प्रदर्शन एक मजाक जैसा लग रहा था।


एक तरफ प्रवासी मजदूरों की आँखों में कोरोना का खौफ था और दूसरी तरफ परिवार के भरण-पोषण की चिंता उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। उनके लिए 'घर' ही आखिरी उम्मीद थी, लेकिन घर लौटने की राह लहूलुहान थी। इस त्रासदी ने यह अनिवार्य प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हमें अब भी एक व्यापक 'राष्ट्रीय मजदूर नीति' की जरुरत नहीं है? क्या हम केवल राष्ट्रीय उत्सवों के शोर में डूबे रहेंगे या उस हाथ को भी गरिमा देंगे, जो इस राष्ट्र की नींव का पत्थर है? 


14

कोरोना काल के दौरान हुए कुछ अध्ययनों ने एक भयावह सत्य को उजागर किया। आंकड़ों के अनुसार, असंगठित क्षेत्र के केवल 17 प्रतिशत मजदूर ऐसे थे, जिनके 'नियोक्ता' (Employers) की पहचान की जा सकती थी। शेष 83 प्रतिशत मजदूर एक ऐसे 'अदृश्य गलियारे' में काम कर रहे थे, जिनका न कोई आधिकारिक रिकॉर्ड था और न ही कोई ज़िम्मेदार मालिक। जब संकट आया, तो इन मजदूरों को यह भी नहीं पता था कि वे अधिकार के साथ मदद के लिए किसका दरवाजा खटखटाएं। अधिकतर मजदूर दैनिक मजदूरी पर आश्रित थे, जिनके लिए 'अगले दिन की रोटी' हमेशा एक अनिश्चित और डरावना सवाल बनी रहती थी।


कोरोना ने केवल स्वास्थ्य पर हमला नहीं किया, बल्कि श्रमिकों की कमर ही तोड़ दी। विशेषकर निर्माण उद्योग और परिवहन जैसे क्षेत्रों के अचानक ठप हो जाने से करोड़ों हाथ अचानक बेरोजगार हो गए। जिस मजदूर का जीवन 'रोज कुआँ खोदना और रोज पानी पीना' था, उसके लिए लॉकडाउन एक ऐसी कैद बन गया जहाँ भूख की दीवारें सबसे ऊँची थीं। शहरों की ऊँची इमारतों को बनाने वाले ये मजदूर रातों-रात बेगाने हो गए; जिस तंत्र के लिए उन्होंने अपना पसीना बहाया, उसी ने संकट की घड़ी में उन्हें पहचानने तक से इनकार कर दिया। ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं हैं, बल्कि उस त्रासदी की सच्चाई हैं जो बताती हैं कि जो हाथ देश के विकास का पहिया घुमाते हैं, विपत्ति के समय उन्हें ही सबसे पहले हाशिए के बाहर धकेल दिया जाता है। 


15

कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र के लगभग समस्त संसाधनों और कार्मिकों को केवल कोरोना संक्रमण से निपटने के मोर्चे पर तैनात कर दिया गया था। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अन्य गंभीर बीमारियों—जैसे हृदय रोग, कैंसर और गुर्दा रोगों—से जूझ रहे मरीज पूरी तरह हाशिए पर चले गए। वे अपने इलाज और उपचार के लिए अंतहीन प्रतीक्षा करने को मजबूर हो गए। अस्पतालों में ओपीडी (OPD) सेवाएँ ठप थीं और जीवन रक्षक सर्जरी लगभग बंद कर दी गई थीं। वह समय ऐसा था जब व्यवस्था ने केवल एक बीमारी को 'संकट' माना और बाकी बीमारियों के मरीजों को उनकी नियति के भरोसे छोड़ दिया। यह स्वास्थ्य तंत्र की विवशता थी या दूरदर्शिता का अभाव, कह नहीं सकते, पर इसने कई उन मरीजों की जान जोखिम में डाल दी, जो अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे।



16

लॉकडाउन के दौरान

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आसमान में दिखा आसमान का असल नीला रंग

और सड़कों का मौन अब मुखरित हुआ जाता था।


मौन जब मुखरित होने लगे,

तब समझना कि क्रांति आने वाली है।


तो क्या कोरोना-काल सचमुच क्रांति का समय था?

या किसी आने वाली आँधी का आहट-भरा अहसास था?


कोरोना भी ताक रहा था अचरज से—ये कैसे लोग हैं,

जो मेरे साये में भी, खुश रहने की राह खोज रहे हैं?


आशा और निराशा की सड़क पर

सँभलकर चलते हुए सोच रहे लोग—

एक न एक दिन इस महामारी का अंत होगा,

और जीवन फिर से खुशहाल हो जाएगा।


आदमी डटा था, लड़ रहा था, 

हर विषम परिस्थिति से,

वह घर की चहारदीवारी से काम कर रहा था,

अस्तित्व बचाने के नए रास्ते तलाश रहा था

और संहारक कोरोना के विरुद्ध 

वैक्सीन के रूप में—

'जीवन का अमृत' खोज रहा था। 


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देश जनता से निर्मित होता है और उसका अस्तित्व जनता के कल्याण के लिए ही है। काश, संसार के राजनेता 'वोट बैंक' की संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर कुछ व्यापक सोच पाते। सत्य तो यह है कि देश और जनता—दोनों में से किसी की भी अनदेखी आत्मघाती है। हम जानते हैं कि एकता में अटूट शक्ति होती है, किंतु कोरोना के नाम पर संसार के अधिकांश शासकों ने 'असीमित अधिकार' अपने हाथों में केंद्रित कर लिए।


कोरोना के साये के साथ-साथ 'निरंकुशता' का काला खतरा भी दुनिया पर मंडराने लगा था। कुछ वैश्विक विचारकों ने इस ओर संकेत किया कि कोरोना से लड़ने के बहाने कई देशों के शासकों ने जो असाधारण शक्तियाँ अर्जित की हैं, वे लोकतंत्र के लिए आने वाले समय में घातक सिद्ध हो सकती हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता जब एक बार असीमित अधिकारों का स्वाद चख लेती है, तो वह उन्हें स्वेच्छा से आसानी से नहीं त्यागती। आशंका यही थी कि सुरक्षा के नाम पर कहीं वैयक्तिक स्वतंत्रता की बलि न चढ़ जाए। आने वाले समय में सत्ताधीश राजनेताओं के एकाधिकारवादी रवैये से लोकतांत्रिक मूल्यों का नुकसान और महामारी का अदृश्य दुष्प्रभाव की आशंका लगने लगी थी। 


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कोरोना काल में हम सब कोरोना महामारी से होने वाली मौतों की दैनिक संख्या और डरावने आंकड़ों के मायाजाल में उलझकर रह गए थे। दुर्भाग्य यह था कि महामारी के उस प्रारंभिक दौर में इस अदृश्य सूक्ष्म जीवाणु शत्रु का कोई निश्चित इलाज नहीं था और न ही कोई सुरक्षात्मक टीका बन पाया था। दुःख इस बात का था कि हमारा देश, भारत, दुनिया भर में संक्रमण से सबसे अधिक ग्रस्त देशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुँच गया था।


संख्याओं के वे आकड़े तब दुःख में बदल गए, जब हर व्यक्ति ने अपना कोई न कोई नजदीकी इस महामारी की भेंट चढ़ते देखा। मौतें अब केवल सरकारी बुलेटिन के 'आंकड़े' नहीं थे, बल्कि वे हमारे घरों के उजड़ते हुए प्रियजन थे। मैंने स्वयं इस क्रूर कालखंड में अपनी छोटी दिव्यांग बहन को खोया —एक ऐसा शून्य जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। केवल वही नहीं, अपनी पत्नी के भाई और उनके जीजा जी को भी इसी महामारी ने हमसे छीन लिया। अपनों को खोने का वह खालीपन और अंतिम विदा में उनके पास न जा पाने की लाचारी—यह वह टीस है, जो इस सदी के इतिहास और हमारे हृदय में हमेशा के लिए दर्ज हो गई है।


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कोरोना महामारी ने विश्व अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ी, साथ ही आगामी पीढ़ी की नींव—शिक्षा—को भी गहरे संकट में डाल दिया। यद्यपि तकनीक के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प सामने आया, किंतु 'डिजिटल इंडिया' की यह चमक देश के बड़े हिस्से के लिए बेमानी सिद्ध हुई। वास्तविकता यह थी कि करोड़ों बच्चों के पास न तो स्मार्टफोन थे और न ही इंटरनेट कनेक्शन। 


विभिन्न अनुमानों और नीति आयोग की रिपोर्टों के भयावह आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान भारत के लगभग 75 प्रतिशत छात्र ऑनलाइन कक्षाओं की पहुँच से बाहर रहे। ग्रामीण अंचलों में स्थिति और भी विकट थी, जहाँ मात्र 15 फीसदी लोगों के पास फोन कनेक्टिविटी थी। 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में लगभग पचपन हजार गाँवों में तो मोबाइल नेटवर्क तक नहीं था। विडंबना देखिए, जिस दौर में पूरी शिक्षा 'बिजली और इंटरनेट' पर निर्भर हो गई, उस समय देश के 36 प्रतिशत स्कूलों में बिजली का कनेक्शन तक नहीं था।


इस डिजिटल रिक्तता का परिणाम यह हुआ कि लगभग 28.6 करोड़ छात्र-छात्राओं का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में फंस गया। उच्च शिक्षा के प्रति भी छात्रों का मोहभंग हुआ और करीब 47 प्रतिशत विद्यार्थी दूसरे शहरों में जाकर पढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। मानव जाति ने प्रगति तो बहुत की है, लेकिन तकनीक और उसकी पहुँच के बीच की रिक्तता को वह आज तक नहीं भर पाई। तकनीक तो खोज ली जाती है, पर उसे खरीदने और उपयोग करने की आर्थिक शक्ति आधी आबादी के पास आज भी नहीं है। महामारी ने गरीबी बढ़ाई और बाजारों को सीमित कर दिया, जिससे 3 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चे केवल डिजिटल उपकरणों के अभाव में शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित रह गए। इसकी वजह से आने वाले समय में एक बड़ी सामाजिक असमानता आ सकती है।


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बाजार के सिकुड़ने और आर्थिक गतिविधियों के थम जाने से आम आदमी के रोजगार छिन गए और बेरोजगारी बढ़ गई। वहीं दूसरी ओर आश्चर्य यह रहा कि जहाँ मध्यम और निम्न वर्ग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, वहीं कॉर्पोरेट सेक्टर की बड़ी कंपनियों की आय में बेतहाशा वृद्धि हो रही थी। आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2020 से जुलाई 2020 की संक्षिप्त अवधि के बीच ही भारतीय अरबपतियों की संपत्ति में 423 अरब डॉलर की भारी वृद्धि दर्ज की गई।


इसे पूँजीवाद का चरित्र कहें या विडंबना, कि पूँजीपतियों ने इस वैश्विक त्रासदी को भी एक 'सुनहरे अवसर' के रूप में भुनाया। जब देश का एक बड़ा हिस्सा दाने-दाने को मोहताज था, तब इन औद्योगिक घरानों ने अपनी आय को कई गुना बढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कोरोना काल का यह कालखंड गवाह है कि कैसे एक ही संकट ने गरीब को और अधिक गरीब बना दिया और धनी को और अधिक धनी। 'आपदा में अवसर' खोजने की यह होड़ दरअसल उस आर्थिक विषमता की ओर इशारा करती है, जो किसी भी महामारी से अधिक संक्रामक और घातक हो सकती है।

आपको कोरोना काल के संस्मरण की यह शृंखला कैसी लगी कृपया बताएँ। 

सादर, 

केशव राम सिंघल