भारत में कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) का उपयोग - अवसर और चुनौतियाँ
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कृत्रिम बुद्धिमता, जिसे संक्षिप्त में एआई कहा जाता है,
उसके बारे में बहुत चर्चा है। मैंने भारत के वित्तमंत्री द्वारा जारी 2024-25 का आर्थिक
सर्वेक्षण देखा तो पाया कि वह भी इससे अछूता नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण में मानव-केंद्रित
स्वचालन के भविष्य पर चर्चा की गई है। यह प्रश्न उठाता है कि कृत्रिम बुद्धिमता
(Artificial Intelligence - AI) युग में श्रम व्यवस्था संकट में है या उत्प्रेरक है।
यह निम्न बातें बताता है –
(1)
श्रम-समृद्ध भारत में एआई का उपयोग अवसर और चुनौतियाँ
दोनों प्रस्तुत करता है।
(2)
अतीत में हुई प्रौद्योगिक क्रांतियों का सावधानीपूर्वक
प्रबंधन नहीं किए जाने की स्थिति में वे दीर्घकालीन प्रतिकूल प्रभावों सहित कष्टकारी
रही हैं।
(3)
भारत के श्रम बाजारों के जोखिमों को कम करने के लिए मजबूत
सक्षम, बीमाकरण और प्रबन्धकारी संस्थानों की आवश्यकता है।
(4)
लम्बे समयकाल तक अनुकूलित सावधानीपूर्ण परिनियोजन तयह
सुनिश्चित कर सकता है कि एआई श्रम को बढ़ावा दे और व्यापकता आधारित सामाजिक हितलाभ प्रदान
करे।
(5)
सरकार, निजी क्षेत्र और अकादमिक जगत के बीच समन्वित प्रयासों
की आवश्यकता है ताकि भविष्य में काम का ऐसा माहौल बने जिसमें एआई 'श्रम प्रतिस्थापक'
के बजाए 'श्रम संवर्धक' बन सके।
अवसर
यदि हम अवसरों की बात करें तो एआई के उपयोग से हमें निम्न
अवसर मिल सकते हैं -
- एआई द्वारा उद्योगों में प्रक्रियाओं का स्वचालन
(automation) तेज हो सकता है, जिससे विभिन्न उद्योगों में उत्पादकता में सुधार होगा।
- एआई आधारित स्टार्टअप और तकनीकी परियोजनाओं से नए प्रकार
के रोजगार सृजित हो सकते हैं।
- कृषि के क्षेत्र में एआई आधारित सटीक खेती से कृषि उत्पाद
में बढ़ोतरी की जा सकती है।
- एआई के उपयोग से स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार किया जा
सकता है और स्वास्थ्य सेवाओं में रोग निदान बेहतर हो सकता है।
- एआई शिक्षण पद्धतियों को अनुकूलित कर सकता है, जिससे
शिक्षण के और कुशल तरीके विकसित हो सकेंगे।
यदि हम औद्योगिक क्रांति का इतिहास देखें तो हमें पता
चलता है कि पूर्व में हुई औद्योगिक क्रांतियों ने उत्पादन क्षमता को बढ़ाया, लेकिन
उचित प्रबंधन न होने के कारण मजदूर वर्ग का शोषण हुआ और व्यापक सामाजिक असमानता बढ़ी।
स्वचालन के कारण कई परंपरागत नौकरियाँ समाप्त हो गईं, जिससे रोजगार संकट पैदा हुआ।
तकनीकी नवाचार का लाभ केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित रहा, जिससे विकासशील देशों में
असमानता और बढ़ी। प्रौद्योगिक क्रांतियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक
दोहन हुआ, जिससे पर्यावरणीय संकट बढ़ा। ये सब बातें हमें सीख देती हैं कि औद्योगिक
क्रांतियों का प्रबंधन समावेशी, संवेदनशील और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए,
ताकि मानव समाज उसका अधिक से अधिक लाभ ले सके।
जैसा कि ऊपर बताया गया है कि श्रम बाजारों के जोखिमों
को कम करने के लिए मजबूत सक्षम, बीमाकरण और प्रबन्धकारी संस्थानों की आवश्यकता है।
इसका कारण है कि एआई और स्वचालन से श्रमिकों के विस्थापन का खतरा बढ़ सकता है, जिससे
श्रम बाजार में अस्थिरता आ सकती है। रोजगार और आजीविका की सुरक्षा के लिए बीमाकरण योजनाएँ
आवश्यक हैं, ताकि आर्थिक अस्थिरता के समय श्रमिकों को सहायता मिल सके। श्रमिकों को
नए कौशलों में प्रशिक्षित करने के लिए प्रबन्धकारी संस्थानों की आवश्यकता है। नियोक्ता
संस्थान भी मजबूत हों, जो श्रमिकों को न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा, और
पेंशन जैसी सेवाएँ प्रदान कर सकें।
हमें यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि एआई के सावधानीपूर्ण
परिनियोजन से श्रम को बढ़ावा कैसे मिल सकता है और सामाजिक हितलाभ कैसे प्राप्त हो सकता
है? यदि श्रम और एआई का प्रभावी संतुलन किया जाए तो हम यह प्राप्त कर सकते हैं। एआई
को सहायक उपकरण के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि यह श्रम प्रतिस्थापन के बजाय
श्रमिकों की दक्षता और उत्पादकता बढ़ाए। सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए श्रमिकों
के लिए न्यूनतम आय गारंटी और रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। इस सम्बन्ध में दीर्घकालिक
योजना के तहत नीतिगत स्तर पर एआई को सामाजिक और आर्थिक विकास का एक उपकरण बनाया जाए।
शिक्षा और शोध के क्षेत्र में एआई अनुसंधान को मानव-केंद्रित रखा जाए, जिससे यह समाज
के सभी वर्गों के लिए लाभकारी हो।
सरकार, निजी क्षेत्र और अकादमिक जगत के समन्वित प्रयासों
से एआई को 'श्रम प्रतिस्थापक' के बजाय 'श्रम संवर्धक' बनाया जा सकता है। इसमें सरकार
का निम्न योगदान हो सकता है –
- एआई नीतियों को श्रम हितैषी बनाना।
- कौशल विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहन देना।
- रोजगार गारंटी योजनाओं को सुदृढ़ करना।
निजी क्षेत्र का योगदान निम्न हो सकता है –
- एआई तकनीकों
का उपयोग कर्मचारियों के साथ सहयोगात्मक कार्य के लिए करना।
- सीएसआर के माध्यम से कौशल विकास और शिक्षा में निवेश
करना।
अकादमिक जगत इस ओर निम्न योगदान दे सकता है –
- एआई पर अनुसंधान और विकास के माध्यम से मानव-केंद्रित
समाधान प्रदान करना।
- समाज के लिए अनुकूल एआई मॉडल विकसित करना।
चुनौतियाँ
एआई के उपयोग से बहुत सी चुनौतियाँ भी हमारे सामने हैं,
जिनमें कुछ निम्न हो सकती हैं -
- एआई के उपयोग से कम कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार के
अवसर कम हो सकते हैं, जिससे समाज में असमानता बढ़ सकती है। एआई के प्रायोगिक मॉडल को
व्यावसायिक रूप से सफल और किफायती बनाना एक चुनौती है।
- स्वचालित प्रणालियों में त्रुटियाँ होने पर परिणाम गंभीर
हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य सेवा में गलत निदान।
- उद्योग जगत में प्रक्रियाओं के स्वचालन के कारण कई पारंपरिक
नौकरियाँ समाप्त हो सकती हैं।
- एआई का उपयोग जानने के लिए तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता
है, जिसके लिए श्रमिकों को नई तकनीकों के लिए प्रशिक्षित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता
है।
- एआई के उपयोग
से डाटा गोपनीयता और नैतिकता संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
- एआई के लिए बड़े पैमाने पर डाटा केंद्र, क्लीनिंग पाइपलाइंस
और अन्य संसाधनों की आवश्यकता है, जो महंगे हैं।
- एआई मॉडल ऊर्जा और संसाधनों की खपत करते हैं। इनके निर्माण
के लिए दुर्लभ खनिजों पर निर्भरता को कम करने के लिए संधारणीय (sustainable) नवाचार
आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है,
लेकिन इसके प्रभाव को सकारात्मक बनाए रखने के लिए सावधानीपूर्वक रणनीति और समन्वित
प्रयासों की आवश्यकता है। यह आवश्यक है कि एआई श्रमिकों के लिए एक पूरक उपकरण बने,
न कि प्रतिस्थापन। शिक्षा, कौशल विकास, और सामाजिक सुरक्षा पर निवेश के साथ एआई का
परिनियोजन समाज में समानता और समावेशिता सुनिश्चित कर सकता है। एआई को केवल तकनीकी
नवाचार के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का साधन माना जाना चाहिए।
सादर,
केशव राम सिंघल
प्रतीकात्मक चित्र - साभार NightCafe